गणेश उत्सव आते ही घर-घर में वे कथाएं फिर दोहराई जाने लगती हैं जो बचपन से सुनी हैं। एक बालक है, जिसे माता पार्वती ने द्वार पर बिठाया है। शिवजी आते हैं और बालक उन्हें भीतर जाने से रोक देता है। लोग सोचते हैं कि इसने पिता की अवज्ञा की, पिता के आदेश का पालन नहीं किया, तो पिता ने कुपित होकर बालक का सिर काट दिया। और फिर जब माता ने कहा कि मेरे बालक का सिर आपने कैसे काट दिया, तो जाकर एक हाथी का सिर ले आए और बालक को वह सिर लगा दिया।
लोग कहानी को इसी तरह सुनते हैं, और कहानी ऐसी ही है। लेकिन उस कहानी के भीतर गहरे अर्थों के कई तल हैं। इसको अगर ऐसे सोचेंगे कि जैसे आम परिवार होते हैं और उनमें कोई घटना घटती है, तो यह बात अचंभे की लगेगी ही, समझ में नहीं आएगी। पर जब इस बात को गहराई से और वेदांत की दृष्टि से देखेंगे, तो बात एकदम साफ होकर उभरती है। उन अर्थों को जब समझा जाता है, तभी वह कथा हमारे जीवन को समृद्ध कर पाती है, हमें कुछ बोध दे पाती है। नहीं तो हम करते क्या हैं? इतनी सारी बोध-कथाएँ हैं, उनको हम लगभग मनोरंजन जैसा बना लेते हैं। फिर उनसे लाभ नहीं हो पाता।
#GanpatiUtsav #AcharyaPrashant @Advait_Prashant
Climate change की बात कोई नहीं करना चाहता
क्योंकि अगर हम बात करते हैं, तो असुविधा होगी। जो हमारा consumption-centric mind है, उसको बुरा लगेगा, अगर हम बात करेंगे climate change की। तो हम climate change की बात को दबाकर रखते हैं।
Media में भी आप ज़्यादा नहीं सुनते। Summits होती हैं, उसमें राष्ट्राध्यक्ष मिलते हैं और वो एक-दूसरे के साथ चाय पीकर काम खत्म कर देते हैं। कुछ वहाँ पर वो संकल्प या resolution कर लेते हैं, जो कि कभी पूरा नहीं किया जाताऔर हम बस ऐसे आँख बंद करके शुतुरमुर्ग की तरह सर को मिट्टी में दिए हुए हैं कि खतरा तो कोई है नहीं।
With warming of the earth due to unrestricted exploitation and abuse—or use of it out of compulsions of increasing population in greed or need of development of infrastructure
It’s not the flood but—-
Glaciers every where, which will crack and break and fall below—-Causing obstructions in rivers below.
Sweeping away all below.
It can now be anywhere and every where.
Humanity is at risk. Whoever survives only nature know. Listen to @Advait_Prashant
नेपाल: बाढ़ कैसे आई? || आचार्य प्रशांत https://t.co/ij9s6Wla01 via @YouTube
पेपर लीक गंभीर मसला है, इस पर आवाज़ बिल्कुल उठनी चाहिए, यह हर छात्र का हक़ है। धांधली के खिलाफ लड़ना ज़रूरी है, और छात्रों की यह मांग पूरी तरह जायज़ है।
पर एक बात इससे कहीं गहरी है। पेपर तभी लीक होता है जब कोई बेचने को तैयार हो और कोई भारी दाम देकर खरीदने को भी। बाईस लाख अभ्यर्थी और कुछ हज़ार सीटें, इतनी भगदड़ में दलाल पैदा होंगे ही। पेपर का लीक होना इस बाज़ार की दुर्घटना नहीं, इस बाज़ार का उत्पाद है।
और यह बाज़ार न किसी दलाल ने सजाया, न किसी मंत्रालय ने। यह तो घर में बना है, रिश्तेदारों की बैठकों में बना है, अभिभावकों की निगरानी में बना है। जब तक यह भीतरी सच्चाई नहीं बदलती, बाहर की व्यवस्था कभी ईमानदार नहीं हो पाएगी।