आज ठप्पा लग गया कि बीजेपी OBC, SC, ST विरोधी है। OBC, SC, ST के पुरुषों ने भी आज देख लिया कि जब महिला आरक्षण बिल आया, और OBC, SC, ST की महिलाओं को आरक्षण देने की बात हुई, तो बीजेपी ने उन्हें ठेंगा दिखा दिया। बीजेपी अब OBC, SC, ST को अपना मुँह नहीं दिखा पाएगी। OBC, SC, ST बीजेपी को दौड़ा लेंगे।
एक दौर था जब समाजवादी आंदोलन केवल सत्ता पाने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की मशाल हुआ करता था। उस दौर के नेता संसद में भी गर्जते थे और सड़कों पर भी संघर्ष करते थे। मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को लागू कराने की लड़ाई हो या पिछड़ों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का सवाल - इन नेताओं ने हर कठिन मोड़ पर इतिहास में गहरी लकीर खींची।
लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, गोपीनाथ मुंडे और नीतीश कुमार जैसे नेताओं का तेवर देखिए - उन्होंने सत्ता को लक्ष्य नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का साधन माना। कुर्सी के लिए सिद्धांत नहीं बदले, बल्कि सिद्धांतों के लिए कुर्सी तक दांव पर लगा दी। उनके लिए राजनीति अवसर नहीं, सामाजिक परिवर्तन का संकल्प थी।
लेकिन समय की धारा में पिछड़ों की आवाज़ों में से कई आवाज़ें धीमी पड़ती चली गईं। संघर्ष की जगह समझौतों ने ले ली, और विचारधारा की जगह सत्ता की राजनीति ने। यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक न्याय की मूल भावना के लिए भी एक गंभीर चुनौती है।
महिला आरक्षण के सवाल पर भी समाजवादी परंपरा ने साफ कहा - जब तक आरक्षण के भीतर आरक्षण नहीं होगा, तब तक प्रतिनिधित्व अधूरा रहेगा। पिछड़ी और दलित महिलाओं के लिए अलग हिस्सेदारी की मांग केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि समान भागीदारी के लोकतांत्रिक सिद्धांत का प्रश्न है।
आज भी अनेक पिछड़े और दलित संगठन सत्ता के विभिन्न खेमों में मौजूद हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि इतिहास केवल सत्ता के समीकरण नहीं देखता - वह यह भी दर्ज करता है कि किसने अपने समाज की आवाज़ बुलंद की और किसने उसे दबा दिया।
अंतरात्मा की आवाज़ कभी पूरी तरह ख़ामोश नहीं होती। सवाल केवल इतना है - क्या हम उसे सुनने का साहस रखते हैं? क्योंकि इतिहास का न्याय देर से होता है, पर होता ज़रूर है।
पहले किसान विरोधी अब महिला विरोधी बिल वापिस तो फिर पैरा मिलिट्री विरोधी काला बिल वापिस क्यों नहीं। बुढ़ापे की लाठी पुरानी पेंशन छीन ली, अब तो बेहतर समयबद्ध पदोन्नति के रास्ते बंद हो गए।
#CAPF_Wants_OPS_OGAS
एक समय था जब हमें सरकारी स्कूल में किताबे मिलती थी।
उस दिन की खुशी, वो नई किताबें, उनमें कवर चढ़ाना,
आजकल तो ये सिर्फ धंधा बन चुका है,
ऐसा क्या प्रिंट होता है इनमें जो किताबें 500 रुपए की होती हैं?
सरकार इन पर लगाम क्यों नहीं लगाती हैं?
🚨 कर्मचारियों को 60 साल बाद भी पेंशन नहीं,
नेताओं को 5 साल में पेंशन
पेंशन व्यवस्था पर बड़ा सवाल, समानता और सामाजिक न्याय की मांग तेज
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2 अप्रैल को TET मेंशन मेमो पर सुप्रीम कोर्ट पर निगाह।