मैं भी @RubikaLiyaquat को जौहर पर डिबेट की चुनौती देता हूँ मुझसे कर लेवे इस मुद्दे पर डिबेट।
AC रूम में बैठ कर इतिहास के हर घटना क्रम को जस्टिफाई करने की आदत को खुली चुनौती देता हूँ कर लो मुझे डिबेट।
MBBS सीट करोड़ों में बेचने का खेल रहा है। अब तक न जाने कितने फर्जी डॉक्टर बनाये जा चुके है।
सोचिए एक तरफ़ संसाधन विहीन बहुजन कट ऑफ पार करने के लिए जी तोड़ मेहनत करते है वही दूसरी तरफ़ जातंकवादी पैसे के दम पर बिना किसी कट ऑफ के सीधे फर्जी एडमिशन और डॉक्टर बन रहे है।
E20 पेट्रोल में गन्ना प्रयोग करके पैसे बचाने की बात प्रचारित की गई लेकिन एक्चुअल डेटा तो उलट है।
चीनी, गुड, चावल कनकी, मक्के का आटा, इड्ली रवा/राइस फ्लोर, पशु आहार, पोल्ट्री फीड सबके दाम बढ़ गए इससे दूध, अंडे इत्यादि के भी दाम बढ़ गए है।
पेट्रोल धनी लोगो के लिए था लेकिन घरेलू दाम गरीबो के लिए भी बढ़ गए?
पहले चीनी शीरा निर्यात होता था अब आयात करने की नौबत आ गई है।
ब्राह्मण और ब्राह्मणोत्तर जातियों ने एक फेक नेरेटिव चलाया की आरक्षण वाले कम नंबर पर सेलेक्ट होते है इसलिए उनसे इलाज नहीं करवाना चाहिए जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है।
Fact: NEET, MBBS में एडमिशन लेने वाले बॉटम 10,000 स्टूडेंट्स में से सबसे ज़्यादा बच्चे जनरल वर्ग के होते है।
यानी ब्राह्मणों के नेरेटिव अनुसार जनरल वर्ग से बने डॉक्टर से कतई इलाज न कराये?
SC/ST आरक्षण को दोष देने वालो के मुंह पर जोर का करारा तमाचा।
RPSC - Asstt Professor (General Medicine) Cut-off Marks - Result dt. 17.08.2026
General - 75.33
Gen(W) - 65.67
SC - 75
ST - 71
OBC - 67
OBC(w) - 56.33
MBC - 48
EWS - 59
जनरल केटेगरी का ओवर रिप्रजेंटेशन 12 पब्लिक सेक्टर बैंक्स में।
यानी SC/ST/OBC के घरों की रोटी अथवा प्रतिनिधित्व जनरल वर्ग खा रहा।
ब्राह्मणिक ओवररिप्रजेंटेशन हटाओ। देश के विकास में ये नासूर साबित होते जा रहा है।
जनसंख्या प्रतिशत के अनुसार प्रतिनिधित्व लाओ।
-40 नंबर पर मेडिकल में एडमिशन हुआ एक्सपोज़्ड। SC/ST/ओबीसी ने नहीं जनरल लड़के ने लिया था सबसे कम मार्क्स पर एडमिशन।
लड़के ने पूरी पोल सबूतों के साथ खोल दी। Must Watch
आरक्षण हटाओ नहीं… “ओवर रिप्रेज़ेंटेशन हटाओ आंदोलन”
मूल सिद्धांत
यदि किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय का सरकारी संस्थानों, न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालयों, नौकरशाही, निजी क्षेत्र या अन्य प्रभावशाली पदों पर उसकी जनसंख्या की तुलना में अत्यधिक प्रतिनिधित्व (Overrepresentation) है, तो वास्तविक समान अवसर का प्रश्न वहीं से शुरू होता है।
नारा:
“जिसकी जितनी संख्या, उतनी हिस्सेदारी।”
⸻
Claim 1. “सभी के लिए Exam Fee समान हो”
डिबंक
यह समस्या का कारण नहीं, परिणाम है।
Exam Fee में छूट इसलिए दी जाती है क्योंकि विभिन्न वर्गों की औसत आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति समान नहीं है।
यदि वास्तव में समानता चाहिए तो पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि
गुणवत्तापूर्ण स्कूल
कोचिंग
भाषा
इंटरनेट
किताबें
सामाजिक पूंजी
अवसर
सभी को समान उपलब्ध हों।
जब शुरुआती अवसर असमान हों तो केवल परीक्षा शुल्क बराबर कर देना वास्तविक समानता नहीं बनाता।
यदि शुल्क समान करना है तो
सभी जाति के विद्यार्थियों को समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
समान संसाधन
समान सामाजिक अवसर
पहले उपलब्ध कराने होंगे।
⸻
Claim 2. Age Limit सबकी समान हो
डिबंक
यदि किसी समूह को ऐतिहासिक रूप से
खराब विद्यालय
आर्थिक अभाव
जातिगत तथा धर्म आधारित पिछड़ापन या बहिष्कार
का सामना करना पड़ा है, तो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी औसतन अधिक समय लग सकता है।
Age relaxation का उद्देश्य प्रतियोगिता को आसान बनाना नहीं बल्कि प्रारम्भिक असमानताओं की आंशिक भरपाई करना है।
यदि वास्तव में समान आयु सीमा चाहिए तो
पहले समान स्कूली शिक्षा
समान आर्थिक अवसर
समान सामाजिक परिस्थितियाँ, जातिगत भेदभाव फ्री समाज सुनिश्चित करनी होंगी।
⸻
Claim 3. EWS को SC/ST जैसी Scholarship मिले
डिबंक
यहाँ तुलना दो अलग-अलग नीतिगत आधारों की है।
SC/ST/OBC से जुड़ी कई योजनाएँ केवल आय पर आधारित नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक बहिष्करण, भेदभाव और कम प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं।
दूसरी ओर EWS का आधार मुख्यतः आर्थिक स्थिति है
इसलिए इसे सामाजिक न्याय की योजनाओं के अनुकूल नहीं है क्योकि ये पहले से ही ओवररप्रसेंटेड है।
⸻
Claim 4. जाति के आधार पर अपमान करने पर सख्त कानून बने
डिबंक
इस बिंदु से व्यापक सहमति हो सकती है।
किसी भी छात्र का
जाति
धर्म
भाषा
लिंग
क्षेत्र
आर्थिक स्थिति
के आधार पर अपमान या उत्पीड़न स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
प्रश्न यह होगा कि जातिवाद की मुख्य जड़ धार्मिक किताबो पर प्रतिबंध लगे या फिर भेदभावी धर्म को ही बैन कर दिया जाय?
⸻
Claim 5. EWS Reservation 10% से बढ़ाकर 30% किया जाए
डिबंक
यदि उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता है, तो जिस जाति के छात्र अंडरप्रेज़नेशन में है उनके छात्रवृत्ति, फीस सहायता, शिक्षा ऋण, आवास, भोजन सहायता जैसे उपाय अधिक प्रत्यक्ष हो सकते हैं।
यदि उद्देश्य प्रतिनिधित्व है, तो पहले यह देखना होगा कि विभिन्न वर्गों का वास्तविक प्रतिनिधित्व क्या है।
यदि कोई वर्ग पहले से ही अपने जनसंख्या अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व रखता है, तो उसको आरक्षण देने का कोई मतलब ही नहीं बनता।
⸻
Claim 6. EWS Certificate 1 वर्ष से 5 वर्ष किया जाए
डिबंक
यह एक प्रशासनिक सुधार का सुझाव है।
यदि सरकार यह सुनिश्चित कर सके कि सभी भारतीय हरेक साल की जगह 5 साल में टैक्स भर सके, तो प्रमाणपत्र की अवधि बढ़ाने पर चर्चा की जा सकती है।
इसका आरक्षण के सिद्धांत से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।
⸻
असली सवाल क्या होना चाहिए?
यदि समान अवसर ही लक्ष्य है, तो केवल आरक्षण पर बहस पर्याप्त नहीं है।
पहले इन संस्थानों का सामाजिक प्रतिनिधित्व सार्वजनिक होना चाहिए—
न्यायपालिका
कार्यपालिका
विधायिका
विश्वविद्यालय
IIT
IIM
AIIMS
निजी विश्वविद्यालय
मीडिया हाउस
कॉरपोरेट बोर्ड
समाचार चैनल
संपादकीय बोर्ड
प्रोफेसर
कुलपति
निदेशक
न्यायाधीश
सचिव स्तर के अधिकारी
सभी मंदिरों में पुजारी और ट्रस्टी मेंबर्स
यदि किसी भी जाति या समुदाय का प्रतिनिधित्व उसकी जनसंख्या की तुलना में अत्यधिक अधिक है, तो उस असंतुलन की समीक्षा सार्वजनिक नीति का विषय हो सकती है।
⸻
इसलिए सही नारा
आरक्षण हटाओ नहीं।
ओवर रिप्रेज़ेंटेशन हटाओ।
सभी संस्थानों में पारदर्शी सामाजिक प्रतिनिधित्व लागू करो।
जिसकी जितनी संख्या, उतनी हिस्सेदारी।
नरेंद्र मोदी डर गया है.
मोहन भागवत को हमसे डिबेट करना होगा.
भागवत और मोदी को खुली चुनोती!
गुजरात हाईकोर्ट में गुजरात सरकार तथा जज ने जो ड्रामा किया उसका भी पर्दाफाश होगा!!