' तक्षशिला - नालंदा के
मैं ज्ञान गिरा का स्वर हूं
सत्य सनातन संस्कृति की
जीवन शैली का वर हूं
आह किसी की मुझे ना लगे
इससे बस डरता हूं
किंतु देशहित की रक्षा में
नागयज्ञ करता हूं...' डॉ. दिनेश दिनकर
' युग संस्कृतियों देख मुझे
मैं सीना तान खड़ा हूं
शक मंगोल हूण यवनों
अंग्रेजों को झेला हूं
कपट और छल छद्मों का
मैं खेल नहीं खेला हूं
परशुराम - सा मैं संहारक
शंकर का चेला हूं...'.डॉ. दिनेश दिनकर
' सन् सैंतालिस बासठ पैंसठ इकहत्तर को देखा
करगिल उरी पठानकोट की
पढ़ ले जीवन रेखा
यदि टूटेगा बांध सब्र का
कब्रिस्तान बनेगा
उस पर गाड़ तिरंगा जन जन
हिंदुस्तान कहेगा...' डॉ. दिनेश दिनकर
' लोकतंत्र का महातीर्थ मैं महाकुंभ जन मन का
राष्ट्रधर्म का राजघाट
द्वारिकाधाम निर्धन का
जीवन जय मैं संविधान का
जग मंगलता दाता
सारी दुनिया मान रही है
भारत भाग्य विधाता..'- डॉ. दिनेश दिनकर
'पंचवटी निशिचर विनाश का
चित्रकूट मैं तप का
रामेश्वर रावण विनाश का
सिंधुसेतु सत्पथ का
शरणागत को अभयदान
देना मेरी परिपाटी
खाता जग का नाथ
सुदर्शनधारी मेरी माटी '.. डॉ. दिनेश दिनकर
' मेरे शौर्य - पराक्रम करते मानवता की रक्षा,
ध्रुव प्रह्लाद और नचिकेता मेरा
बच्चा बच्चा
संकल्पों की महासिद्धि का
मैं सुभाष - गांधी हूं
मलयागिरि की हवा और मैं विप्लव की आंधी हूं...'..डॉ. दिनेश दिनकर
मलया
' मैं भारत हूं बुद्ध पथी पर धर्मयुद्ध का नायक
हरि का चक्र सुदर्शन घातक
रामचंद्र का सायक
पांचजन्य मैं कुरुक्षेत्र का
लक्ष्यभेद अर्जुन का
मैं ब्रह्मास्त्र ब्रह्म का निष्फल, राष्ट्रगान की धुन का.'...' डॉ. दिनेश दिनकर
कोटि - कोटि प्राणों से तेरा अभिनंदन करता हूं,
ओजदिप्त स्वर देश राग में
पग वंदन करता हूं।
राष्ट्रदेवता ! शान तुम्हारी
कभी न झुकने दूंगा
कमर तोड़ दुश्मन की उसको
कभी न उठने दूंगा...
डॉ. दिनेश दिनकर
चलती फिरती माटी की मूरतें तुम्हें बतलाएंगीं,
अलगू - जुम्मनकी हमजोली
जीवन मंत्र सुनाएगी,
चौपालों के भाईचारे पंचायत के न्यायों में,
तुम्हें मिलेगा भारत सीमाओं से लेकर गांवों में..
और अधिक परिचय चाहो तो पूछो हल्दीघाटी से
जलियावाला बाग तराइन
सत्तावन की माटी से
जेल सेल्युलर कालापानी
गोले गोली डंडों से
फांसी के तख्तों से पूछो
या फांसी के फंदों से..
'लोकतंत्र का मैं उन्नायक
जन-गण का रखवाला
राम - कृष्ण बन घर आता है
मेरे ऊपर वाला... सिंधु पी गये मेरे पूर्वज
निगल गए सूरज को
अंधकार की घोर निशा में
वेद दिया हूं जग को..
' पिता हिमालय माता गंगा
घर घर मेरा घर है
मन मनमोहन - सा मतवाला
तन भोला शंकर है।
नहीं चाह सिंहासन की
सिरमुकुट न मुझको भाया
पूछो चित्रकूट से किसने
चरण पादुका लाया...'
' मैं भारत हूं अखिल विश्व के प्राणों का स्पंदन,
मानवता का विजय भाल,
जग के माथे का चंदन।
शांति - अहिंसा के मंत्रों को
पढ़ पढ़ बड़ा हुआ हूं,
वाणों पर वेदांत उड़ाकर,
अपने पैर खड़ा हूं....'