पुकराल जोहार
"युवा पीढ़ी आपके तरकश में अनेक तीर है, जिसे सही दिशा में चलाएं, वरना आपकी वजूद जख्मी होगा।"
"आज की युवा पीढ़ी को तर्क का सही उपयोग करना होगा, अन्यथा कोई भी आपके सदेह को बढ़ा-चढ़ाकर गलत अर्थ निकाल सकता है। कई स्थानों पर आपको ऐसे प्रतीक (स्तंभ) मिलेंगे, जिनके पीछे गहरा अर्थ, उद्देश्य, कारण, इतिहास और लक्ष्य होता है, जैसे कि घर, कोठा, द्वार, गांव, पेन, मदिर, डीही, डोंगर, मंडा, गुड़ी या टोटम आदि से जुड़े प्रतीक। बिना पूरी जानकारी के की गई कोई भी टिप्पणी इनके अर्थ को गलत दिशा में ले जा सकती है। आपको शायद पता हो कि कुछ समय पहले 'गोंडवाना समय' पत्रिका में मेरे द्वारा लिखित एक लेख में बघरूम पाठ के बारे में विस्तार से बताया गया था। इसमें यह स्पष्ट किया गया था कि किस तरह गांव के बाहर बघरूम पाठ को गलत तरीके से मदिर का रूप देकर उसकी वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि इसका वास्तविक अर्थ और उद्देश्य कुछ और ही है।"
Pukral Johar
"Young generation, there are many arrows in your quiver, shoot them in the right direction, otherwise your existence will be hurt."
"Today's young generation has to use logic properly, otherwise anyone can exaggerate your good intentions and take them in the wrong sense. At many places you will find such symbols (pillars) which have a deep meaning, purpose, reason, history and goal behind them, such as symbols related to house, room, door, village, pen, temple, dehi, dungar, manda, gudi or totem etc. Any comment made without complete information can take their meaning in the wrong direction. You may know that some time ago, in an article written by me in the magazine 'Gondwana Samay', Baghroom Paath was explained in detail. In this, it was clarified how Baghroom Paath is presented outside the village by distorting its reality by giving it the form of a temple, whereas its real meaning and purpose is something else."
🐃🐢🐍 #बैंसासुर/#भैंसासुर/#महिषासुर पेन हमारे हर गांव में है ▪▪▪ यह हमारे मूलनिवासी बहुल गावों की आत्मा है ...उनकी ऊर्जा हैं... उनकी समृद्ध जैवविविधता के वाहक हैं.. ▪▪▪ इसे कोई भी ताकत झुठला नही सकता •
बस्तर का हर मूलनिवासी बैंसासूर को अपने आराध्य पेन के रूप मे हजारो वर्षो से सेवा करते हुए आ रहा है. वास्तव मे यह नार व्यवस्था / ग्राम संरचना से संबंधित पेन है जिसमे बैंसासुर को भूमिगत जल संसाधनो के प्रबंधन व वितरण प्रणाली के निति निर्धारक पेन माना जाता है इस पेन के अदभूत जल संरक्षण सिस्टम के कारण ही कोया कोयतूर गावों में आज भी जल स्तर बहुत ही ऊपर लगभग सतह के समानांतर ही होता है भैंसासुर सेवा स्थल गाँव के जल प्रबंधन के नियंत्रण केन्द्र की तरह होता है इन जगहो पर लगभग वर्ष भर पानी की प्राकृतिक प्रवाह नियमित बनी हुई रहती है. अक्सर इन जगहो पर हम भरी गर्मियो में भी "भैसा कुलीय" पशुओ को पानी मे डुबे हुए या किचड़ पर बैठे हुए देख सकते है. दरअसल बस्तर में गाय- बैल के साथ ही भैस -भैसा चौपाये पशुओ का संतुलन भी बना हुआ है क्योंकि बस्तर मे भैंसासुर पेन सेवा केन्द्र के रूप मे ऐसे जगह हर गांव में होते है जो इन पशुओ को भारी गर्मी वह डिहाइड्रेशन से निजात दिलाने में अहम भूमिका निभाते है.।
ऐ जल केन्द्र जैव विविधता से भी परिपूर्ण होते है ।
इसलिए आज भी गाव के गायता/ पेरमाओ द्वारा इन जगहो पर कृत्रिम निर्माण कार्यो पर पाबंदी लगाते है संक्रमित मानवो को भी इनसे दूर ही रखने का फरमान जारी करते है। जल स्रोत का प्रबंधन इस पेन के हाथ मे होने से इन्हे "कृषि उत्पादन" का भी नियंत्रक पेन माना जाता है इसलिए प्रथम धान फसल पकने पर "पुनांग पंडुम"/नवाखाई त्योहार के पूर्व "बांलिग नेंग" पर इसी भैसासूर पेन को सेवा अर्जी कि जाती है. ।
इसी तरह से इन्हे गांव के सुरक्षा प्रणाली से सम्बंधित 10 "राव पेनों" में भी प्रमुख स्थान दिया गया है. इसके साथ ही "जल व भूमि" पर विचरण करने वाले एक सांप की दुर्लभ प्रजाति "एहरांज" सांप/सर्प को भी भैसासूर से जोड़कर देखा जाता है जो खेतो के मेंढो को समांतर छेद कर गांव वालो मे जल का समान /बराबर वितरण सुनिश्चित करती है इसतरह से बैंसासुर गांव की आत्मा की तरह है यहां तक कि हमारे पंडुम/त्योहारो व विवाह संस्कारो में भी भैसासूर को विभिन्न रश्मो मे ससम्मान याद करते हुए इनके नाम से सेवा अर्जी दिया जाता है विवाह संस्कार का "ऐर्र दोसाना"/पनबुड़ी नेंग" इसी का एक उदाहरण है. इस तरह के भैसासूर से जुड़े अनंत उदाहरण हर आदिवासी बहुल गांवो मे भरे पड़े है अनेक रेला पाटा /गीत, पीटोंग/कहानियो में इस पेन का वर्णन आता है. अगर कोई संकलित करना चाहे तो इनसे किताबो के लाखो पन्ने भरे जा सकते है. दुसरे शब्दो में कंहे तो भैसासूर किसी कोयतूर गांव की धड़कन की तरह है, इसी तरह हमारा गांव भिमाल पेन , तलुरमुत्ते, कण्डरेगाल, 10 राव पेन , जिमिदारीन/चिकला याया , भूमियार पेन, आदि पेन के सुव्यवस्थित प्राकृतिक ऊर्जा केन्द्रो से लयबद्ध होती है.।
अब प्रकृति विरोधी, पुंजीवाद के पोषक तत्व, विभिन्न धर्मो के लबादे ओढ़ आडम्बरो से चिपचिपाऐ कुछ लोगो के द्वारा दुनिया के सबसे स्वच्छ व आत्मनिर्भर इकोनॉमी वाले इन कोयतोरिन गावों में अपने धार्मिक कचरो को फैलाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है. जिसे अब हम मुहतोड़ जवाब देंगें •••• हड्डी तोड़ जवाब देगें
"तुम कितना भी क्यो न कर लो कोशिश हजार,
बैंसासुर पेन हमारे दिल मे हरदम धड़कते रहेगे।"
जय सेवा! प्रकृति सेवा! जय बैंसासुर! जय हजोर पेन!
~ नारायण मरकाम 🙏
एक तरफ सोना मंहगा हो रहा है और दूसरी तरफ आदिवासियों के नाम पर चांदी का धुआंधार प्रचार चल रहा है।
बाकी आप जो भी समझें।
न सोना खाने के काम आयेगा न चांदी।
वोधिराज
Nk
हम गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं #अमलेशनागेश समधी जी की आने वाली फिल्म का बेसब्री से इंतजार रहेगा गोण्डी कल्चर से बने हैं फ़िल्म
इस फिल्म का नाम दण्डाकोटुम गोंडी में है।
कोया फिल्म प्रोडक्शन व उनके टीम को ढेरों शुभकामनाएं व गाड़ा गाड़ा बधाई ।।
#AMLESH_NAGESH
"मासिक धर्म और इसके दौरान हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित व्यवस्था का उद्देश्य और महत्व हमेशा से हमारी मातृशक्ति के लिए जिज्ञासा का विषय रहा है।
कुछ प्रबुद्ध महिलाएँ इस व्यवस्था की उपेक्षा तक करती हैं। मेरी पुस्तक "कोया बूम: एक समृद्ध ग्राम व्यवस्था" इस विषय पर जवाब प्रस्तुत करती है, जो उनकी जिज्ञासा को काफी हद तक शांत करने का प्रयास करती है।
यह पुस्तक उन्हें इस बात पर गर्व करने का अवसर देगी कि हमारे पूर्वज महान थे, हैं और सदा रहेंगे। सेवा जोहार।"
✍️ @dpkodape2250
"बमलाई दाई की जय, सेवा जोहार, कोया भूम जोहार, जय जोहार"
आज हम अपनी समृद्ध संस्कृति और इतिहास को भूलते जा रहे हैं।
आइए, पुनः अपनी जड़ों से जुड़ें!
मेरी पुस्तक "कोया बूमः एक समृद्ध ग्राम व्यवस्था" आपको ले जाएगी एक ऐसी यात्रा पर, जहाँ आप जानेंगे कि कैसे एक ग्राम की दाई, कुलदाई और कोया की मानता दाई किसी गढ़, परगना या स्थान की प्रमुख दाई बनकर उभरती है। यह पुस्तक आपको हमारी पुरातन संस्कृति से रूबरू कराएगी और आपके भीतर गर्व का भाव जगाएगी।
चलें, अपनी कुलदाई के सान्निध्य में अपनी सांस्कृतिक विरासत को फिर से जीवंत करें!
पुस्तक प्राप्त करें और अपनी जड़ों से जुड़ें!
@dpkodape2250 ✍️
#गुप्तेना है इसे #भुनाटी और #गोफन आदि नामो से जाना जाता है
🙏सेबाजोहार 🙏
⚡साथियों यह एक ऐसा उपकरण है
जिसने मानव सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है
इसलिए हम इसे पवित्र "गो" से "#गोफन कहा गया है !
🌻 इसका इतिहास हमें पाषाण काल से ही मिलने लगता है कई भित्ति चित्रों में इसके साक्ष्य प्राप्त होता है प्राचीन काल में इस उपकरण का प्रयोग शिकार करने के लिए किया जाता था खासकर पक्षियों का!
🍎धीरे धीरे यह उपकरण विश्व के हर हिस्से में फैला गया यह भी महत्वपूर्ण है कि यह टेक्निक प्राचीन समय से लगातार चली आ रही है
🍭इस उपकरण के खोज से पहले मानव तीर धनुष और गुलैल की खोज नहीं कर पाया था कुछ मानव समुदाय इस दौर में
#आस्ट्रेलिया जैसे द्वीप में बस गये वहाँ आज भी तीर धनुष प्रचलित नहीं हो पाया है बल्कि उसकी जगह बुमरैंग इस्तेमाल किया जाता है जिसे फैकने पर वापस लौट कर आ जाता है
❣️हमारे समुदाय के लिए भी #गोफन बहुत महत्वपूर्ण उपकरण रहा है
इससे हम शिकार के अतिरिक्त अपने फसलों को पक्षियों व जानवरों से बचाने के लिए भी इस्तेमाल करते आऐ हैं
🍬 इस उपकरण को बनाने के लिए एक रस्सी का जाल बनाया जाता है
जिसमें #पत्थर/गोली फसता है
☀️जिसे हाथों से जोर जोर से घुमाकर हवा में छोड़ा जाता है जिससे एक "भून " की आवाज के साथ गोली हवा में बहुत दूर तक तेज गति करते हुए शिकार तक पहुचता है
इस "भून" "भून " आवाज के कारण ही इसका "भून्नाटी" नाम पड़ा है
इसी तरह गोली या पत्थर को लपेट कर रखने के लिए जो जालनूमा सरचंना बनाते हैं उसे
#गोडी_लैंग्वेज में "गुप्ती" कहा जाता है इसलिए इसका एक नाम "#गुप्तेना " पड़ा.... इसी नाम से फिर एक और विकसित उपकरण बना उसे गोडी
#लैंग्वेज में "#गुलैल" नाम दिया गया बाद में यह पुरे देश में इसी नाम से प्रचलित हुआ
बचपन में मै भी मेरे भाइयों व दोस्तों के साथ फसल की रखवाली करने जाता था तो भुन्नाटी का खुब मजा लेता था आज भी मै
#भून्नाटी से आम के फलों को पेड़ से गिरा सकता हूँ
किन किन साथियों ने भुन्नाटी/गोफन/गुप्तेना का इस्तेमाल किया है कमेंट कर जरूर बताऐ...
YogeshNuret ✍️
कुछ ज्ञान की बातें जीबन में काम आएंगे आपकी ।
चार से विवाद मत करो
1. मूर्ख
2. पागल से
3. गुरु से और
4. माला पिता से
चार से शर्म मत करना
1. पुराने कपड़ो में
2. गरीब साथियो में
3. बूढ़े माता पिता में
4. सादे रहन सहन
"Our ancestors were extremely security conscious. To protect themselves from external forces and epidemics, they used to perform 'Khila Khunti' (village bond) once a year, in which the border deities (Rao Pat) were remembered and alerted. This tradition is still alive today."