2008 में जब मायावती जी ने कांशीराम जी को भारत रत्न देने की मांग की थी, तब केंद्र में कांग्रेस सरकार ने इसे यह कहकर ठुकरा दिया कि यह सम्मान केवल “राष्ट्रीय हस्तियों” के लिए है
राहुल गांधी जी को शर्म आनी चाहिए
बहुजन समाज पार्टी (बी.एस.पी.) के जन्मदाता एवं संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम जी को, आज उनकी जयंती पर मेरे व मेरे नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश भर में उनके अनुयायियों द्वारा शत्-शत् नमन व अपार श्रद्धा-सुमन अर्पित, जिन्होंने परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर की ‘सोच एवं मूवमेन्ट’ को पूरे देश में ज़िन्दा करके व उनके कारवाँ को आगे बढ़ाकर सत्ता की मंज़िल तक पहुँचाने के मिशन हेतु अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करके लगातार कड़ा संघर्ष किया तथा जाति के आधार पर तोड़े और पछाड़े गये लोगों को ’बहुजन समाज’ की एकता में जोड़ने के उस ऐतिहासिक योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुये, बी.एस.पी. के ’सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति’ मूवमेन्ट को तन, मन, धन से मज़बूत बनाने व पूरी ज़िद के साथ चुनावी सफलता अर्जित करने के संकल्प को दोहराया, जिसके लिए मैं पार्टी प्रमुख के रूप में, सभी लोगों का तहेदिल से आभार, धन्यवाद व शुक्रिया अदा करती हूँ।
साथ ही, यह आह्वान भी है कि ’बहुजन समाज’ के लोग ’बी.एस.पी. मूवमेन्ट से जुड़कर मिशनरी व ईमानदार अम्बेडकरवादी बने’ और अपने वोटों की शक्ति से सत्ता की मास्टर चाबी हासिल करें ताकि बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर द्वारा संविधान में देश के बहुजनों के हित, कल्याण, उत्थान तथा उनकी सुरक्षा व आत्म-सम्मान हेतु प्रदत्त अधिकारों को ज़मीन पर लागू करके वे भी, गुलामी और लाचारी के त्रस्त जीवन से मुक्ति पाकर, रोटी-रोज़ी-युक्त अच्छे दिन वाला ख़ुश एवं ख़ुशहाल जीवन व्यतीत कर सकें, जो कि मान्यवर श्री कांशीराम जी का मिशन व उनका जीवन संदेश भी है। धन्यवाद।
1. जैसा कि सर्वविदित है कि कांग्रेस पार्टी ने काफी वर्षो तक केन्द्र की सत्ता में रहकर दलितों के मसीहा व भारतीय संविधान के मूल निर्माता परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर का कभी भी आदर-सम्मान नहीं किया और ना ही उनको ’भारतरत्न’ की उपाधि से भी सम्मानित किया। भला फिर यह पार्टी अब मान्यवर श्री कांशीराम जी को कैसे इस उपाधि से सम्मानित कर सकती है?
2. इसी कांग्रेस पार्टी ने केन्द्र में अपनी सत्ता के रहते हुये इनके (मान्यवर श्री कांशीराम जी के) देहान्त होने पर एक दिन का भी राष्ट्रीय शोक घोषित नहीं किया तथा ना ही उस समय यू.पी. की सपा सरकार ने भी राजकीय शोक घोषित किया। इसी प्रकार दूसरी पार्टियों के हाथों में खेल कर दलित समाज के बने अनेकों संगठन व पार्टियाँ आदि भी इनके नाम को भुनाने की कोशिश में हमेशा लगी रहती हैं।
3. अब ये सभी पार्टियाँ आएदिन क़िस्म-क़िस्म के हथकण्डे इस्तेमाल करके मान्यवर श्री कांशीराम जी द्वारा बनाई गई पार्टी बी.एस.पी. को कमजोर करने में लगी हैं। अतः इनके अनुयायी व समर्थक हमेशा इनसे सचेत रहें। ख़ासकर कांग्रेस पार्टी से ज़रूर सजग रहें, जिसकी दलित-विरोधी सोच व मानसिकता होने की वजह से ही बी.एस.पी. बनानी पड़ी है।
4. साथ ही, कल दिनांक 15 मार्च 2026 को मान्यवर श्री कांशीराम जी की जयन्ती पर, इनकी द्वारा निर्मित पार्टी बी.एस.पी. के सभी कार्यक्रर्मों को उ.प्र. सहित पूरे देश में पार्टी के लोग ज़रूर कामयाब बनायें , यही अपील।
मौजूदा सत्ताधारी निश्चय ही जबर्दस्त योजनाकार हैं. अपने ही दौर में लाये UGC की भेदभाव-विरोधी नियमावली का अपने ही लोगों द्वारा विरोध करा रहे हैं ताकि यह नियमावली सामाजिक न्याय की दिशा में मामूली दखल भी न दे सके! UGC को सरकार के चलते नहीं, सुप्रीम कोर्ट के चलते कानून लाना पडा था!
अखिलेश यादव जी के सांसद बर्क व चन्द्रशेखर जी के मध्य इसपर ओपन डिबेट करवाई जाए।
UGC का विरोध कर रहे अखिलेश जी के सांसद व चन्द्रशेखर में कौन ज्यादा प्रभावी तरीके से इसे समझा पाता है। ।।
महत्वपूर्ण रहेगा।
विकास कुमार जाटव
पिछड़ा, दलित व आदिवासी समाज आज भी उच्च शिक्षा में असमानता झेलता है। इसे खत्म करने के लिए सख़्त, जवाबदेह नियम ज़रूरी हैं। UGC का नया प्रावधान इसी दिशा में आवश्यक कदम है।
#We_support_UGC
UGC के समता संवर्धन विनियम-2026 पर हिंदी क्षेत्र के सवर्ण युवाओं-बुजुर्गों का ग़ुस्सा देखकर चकित होने की ज़रूरत नहीं!1990 में मंडल कमीशनऔर वी पी सिंह की सरकार पर जो ग़ुस्सा था,उसके मुक़ाबले यह कुछ भी नहीं! हाँ, सोशल मीडिया होने के चलते आज ‘वैकल्पिकों’ की असलियत ज़रूर खुल रही है!
1.देश की उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादी भेदभाव के निराकरण/समाधान हेतु विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूजीसी, द्वारा सरकारी कॉलेज एवं निजी यूनिवर्सिटियों में भी ’इक्विटी कमेटी’ (समता समिति) बनाने के नये नियम के कुछ प्रावधानों को सामान्य वर्ग के केवल जातिवादी मानसिकता के ही लोगों द्वारा इसे अपने विरुद्ध भेदभाव व षडयंत्रकारी मानकर इसका जो विरोध किया जा रहा है, तो यह कतई भी उचित नहीं है।
2. जबकि पार्टी का यह भी मानना है कि इस प्रकार के नियमों को लागू करने के पहले अगर सभी को विश्वास में ले लिया जाता तो यह बेहतर होता और देश में फिर सामाजिक तनाव का कारण भी नहीं बनता। इस ओर भी सरकारों व सभी संस्थानों को ज़रूर ध्यान देना चाहिये।
3. साथ ही, ऐसे मामलों में दलितों व पिछड़ों को भी, इन वर्गों के स्वार्थी व बिकाऊ नेताओं के भड़काऊ बयानों के बहकावे में भी क़तई नहीं आना चाहिये, जिनकी आड़ में ये लोग आएदिन घिनौनी राजनीति करते रहते हैं अर्थात् इन वर्गों के लोग ज़रूर सावधान रहें, यह भी अपील।
कांशीराम: राजनीति का बेमिसाल रसायनशास्त्री
🖊️दिलीप मंडल (2015 में पहली बार प्रकाशित हुआ लेख)
भारतीय राजनीति में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. और दूसरी बार ऐसा कब होगा, यह सवाल भविष्य के गर्भ में है.
लगभग 50 साल की उम्र में एक व्यक्ति, वर्ष 1984 में एक पार्टी का गठन करता है. और देखते ही देखते देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश, जहां से लोकसभा की 85 सीटें थीं, में इस पार्टी की मुख्यमंत्री शपथ लेती है. यह पार्टी पहले राष्ट्रीय पार्टी और फिर वोट प्रतिशत के हिसाब से देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन जाती है.
जिस व्यक्ति ने इस पार्टी का गठन किया, वह बेहद साधारण परिवार से संबंधित था. उस समुदाय से, जिसे पढ़ने-लिखने का हक नहीं था और जिन्हें छूने की शास्त्रों में मनाही है. यह चमत्कार कितना बड़ा है, इसे समझने के लिए बीजेपी (जनसंघ) और कांग्रेस जैसी मुकाबले की दूसरी पार्टियों को देखें, जिनकी लंबी-चौड़ी विरासत है और जिन्हें समाज के समृद्ध और समर्थ लोगों का साथ मिला.
सरकारी कर्मचारी पद से इस्तीफा दे चुके इस व्यक्ति के पास संसाधन के नाम पर कुछ भी नहीं था. न कोई कॉर्पोरेट समर्थन, न कोई और ताकत, न मीडिया, न कोई मजबूत विरासत. सिर्फ विचारों की ताकत, संगठन क्षमता और विचारों को वास्तविकता में बदलने की जिद के दम पर इस व्यक्ति ने दो दशक से भी ज्यादा समय तक भारतीय राजनीति को कई बार निर्णायक रूप से प्रभावित किया.
दुनिया उन्हें कांशीराम के नाम से जानती है. समर्थक उन्हें मान्यवर नाम से पुकारते थे.
कांशीराम ने जब अपनी सामाजिक-राजनीतिक यात्रा शुरू की, तो उनके पास पूंजी के तौर पर सिर्फ एक विचार था. यह विचार भारत को सही मायने में सामाजिक लोकतंत्र बनाने का विचार था, जिसमें अधिकतम लोगों की राजकाज में अधिकतम भागीदारी का सपना सन्निहित था.
कांशीराम अपने भाषणों में लगातार बताते थे कि वे मुख्य रूप से संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन बाबा साहब भीमराव आंबेडकर और उनके साथ क्रांतिकारी विचारक ज्योतिराव फुले के विचारों से प्रभावित रहे.
1980 में लखनऊ में एक सभा में उन्होंने कहा था कि “अगर इस देश में फुले पैदा न होते, तो बाबा साहब को अपना कार्य आरंभ करने में बहुत कठिनाई होती.” कांशीराम ने बहुजन का विचार भी फुले की ‘शुद्रादिअतिशूद्र’ (ओबीसी और एससी) की अवधारणा का विस्तार करके ही हासिल किया.
कांशीराम के बहुजन का अर्थ देश की तमाम वंचित जातियां और अल्पसंख्यक हैं, जिनका आबादी में 85% का हिस्सा है. कांशीराम मानते थे देश की इस विशाल आबादी को राजकाज अपने हाथ में लेना चाहिए. इसे वे सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना और देश के विकास के लिए अनिवार्य मानते थे. इसके लिए वे सामाजिक वंचितों के आर्थिक सबलीकरण के भी प्रबल पक्षधर रहे.
इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए कांशीराम ने अपना ध्यान सबसे पहले इन जातियों के सरकारी कर्मचारियों पर केंद्रित किया. वे मानते थे कि ये लोग राजनीतिक गतिविधियों में बेशक हिस्सा नहीं ले सकते. लेकिन बुद्धिजीवी होने के कारण, समाज को बौद्धिक नेतृत्व और आर्थिक संबल देने में यह तबका सक्षम है.
आजादी के बाद से आरक्षण लागू होने के कारण उस समय तक मोटे अनुमान के मुताबिक इन जातियों के 20 लाख से ज्यादा सरकारी कर्मचारी थी. कांशीराम ने 1978 में सरकारी कर्मचारियों का संगठन बामसेफ यानी बैकवर्ड (एससी/एसटी/ओबीसी) एंड मायनॉरिटी कम्युनिटीज इंप्लाइज फेडरेशन का गठन किया और देखते ही देखते लाखों लोग इससे जुड़ गए.
कांशीराम ने कर्मचारियों को ‘पे बैक टू सोसायटी’ की अवधारणा से अवगत कराया. इसकी वजह से उन्हें हजारों समर्पित कार्यकर्ता मिले और संगठन चलाने के लिए धन भी.
बामसेफ ने 1980 में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के तहत 9 राज्यों के 34 स्थानों पर चलता-फिरता आंबेडकर मेला सफलतापूर्व आयोजित कर स्थापित कर दिया कि कांशीराम जो सपना देख रहे हैं, उसे आगे बढ़ाने का रास्ता खुल चुका है. इसके बाद पहले राजनीतिक संगठन के रूप में कांशीराम 1981 में डीएस-4 यानी दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का गठन करते हैं और 1984 में बीएसपी यानी बहुजन समाज पार्टी की स्थापना होती है.
कांशीराम के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक अभियानों में उनकी 3000 किलोमीटर की साइकिल यात्रा उल्लेखनीय है, जिस दौरान वे हजारों लोगों से सीधे मिले और लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचाई. इसके बाद कांशीराम के 2004 में सेहत खराब होने तक तक बीएसपी जो राजनीतिक सफर तय करती है, वह समकालीन इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है.
बाबासाहब की तरह कांशीराम भी बौद्ध धर्म स्वीकार करना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने 2006 में अक्टूबर महीने की तारीख भी तय कर ली थी. लेकिन इससे पहले उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता चला गया और 9 अक्टूबर, 2006 को उनका निधन हो गया. उनका शवदाह बौद्ध विधि से दिल्ली में हुआ.
कांशीराम की राजनीतिक विरासत पर विचार करते हुए इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वे भारतीय राजनीति के पहले शख्स हैं, जिन्होंने दलितों को शासक बनने का न सिर्फ सपना दिखाय़ा, बल्कि उसे साकार करने का रास्ता भी बताया.
राजनीतिक उद्देश्यों के लिए साधन की पवित्रता के हिमायती वे कभी नहीं रहे. राजनीतिक समझौतों की सवारी करते हुए अपनी विचारधारा की राजनीति को लगातार नई ऊंचाइयों तक ले जाते रहे. उन्होंने पवित्रतावाद की जगह, अवसर को सिद्धांत में तब्दील कर दिया.
बीएसपी की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक समय में देश का हर सोलहवां वोटर इस पार्टी के हाथी निशान पर बटन दबा रहा था. अपनी राजनीति को कामयाबी तक पहुंचाने की दिशा में कांशीराम को मिली सफलताओ ने उनके व्यक्तित्व को वह चमक दी, जिसकी कोई भी राजनेता सिर्फ कामना ही कर सकता है.
मान्यवर कांशीराम को नमन.
आपने भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को गहरा किया.
निम्नवर्ग को ये दिखाया कि लोकतंत्र में आपकी जगह है.
आप करोड़ों स्मृतियों में हमेशा जिंदा रहेंगे.
आज हर दल आपकी रणनीति को कॉपी कर रहे हैे.
जय भीम, जय भारत.
बाबा साहेब के बाद देश के बहुजन समाज के लिए सबसे बड़ा चेहरा सिर्फ और सिर्फ कांशीराम ही थे ,हैं और रहेंगे ---- उनके दौर का एक नारा मुझे याद आ रहा है ---
कांशी तेरी नेक कमाई ,तूने सोती कौम जगाई ---
पुण्यतिथि पर कांशीराम जी को विनम्र श्रद्धांजलि ---------
यूपी के चार मेडिकल कॉलेजों में SC/ST का स्पेशल आरक्षण समाप्त करने के हाईकोर्ट के फ़ैसले के खिलाफ हमारी टीम ने सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमा दायर कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में चार मेडिकल कालेजों की स्थापना स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान के तहत की गयी थी, जिस कारण यहाँ पर आरक्षण अलग मानक पर चलता है।
इसमें हमनें माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का अध्ययन किया।
समाज कल्याण मंत्रालय, उत्तर प्रदेश भी इसमें पार्टी बनेगा क्योंकि स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान की ज़िम्मेदारी हमारी है।
कमजोर वर्गों के हित को सुरक्षित रखने के लिए हम आदेश के विरुद्ध अपील करेंगे।