शादी होने के बाद भी कुछ महिलाएं दूसरे मर्दों के साथ गलत ���िश्ते बना रही हैं
इस गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड के दौर ने पूरे समाज के अंदर गंध फैला रखी है
शर्म तो तब आती है जब शादीशुदा लोग भी, लड़के वाले हो करके ऐसी हरकत कर...Read more
आर्काइव |चुनावी बॉन्ड के मामले में, चंद्रचूड़ की पांच जजों की संविधान पीठ ने इसे असंवैधानिक करार दिया और इस बात पर ज़ोर दिया कि भारतीय स्टेट बैंक दान��ाताओं और प्राप्तकर्ताओं के बारे में डेटा का खुलासा करे, लेकिन खुलासे के बाद, जब उन्होंने कथित लेन-देन की जांच की मांग करने वाली एक बाद की याचिका ली, तो उन्होंने याचिका को 'समय से पहले' और 'अनुचित' बताकर ख़ारिज कर दिया.
2019 में मिश्रा के बाद सीजेआई बने रंजन गोगोई ने 'राम जन्मभूमि विवाद' मामले की सुनवाई के लिए पांच जजों की बेंच बनाई, जिसमें चंद्रचूड़, बोबडे, अशोक भूषण और एस. अब्दुल नज़ीर शामिल थे. 9 नवं���र को उन्होंने 1,045 पन्नों का फ़ैसला सुनाया. 70 साल की मुकदमेबाज़ी और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद, आख़िरकार जो फ़ैसला आया, वह अजीबोग़रीब था. जबकि अदालत ने यह माना कि बाबरी मस्जिद को गिराया जाना और उससे पहले उसमें मूर्ति रखना गैरकानूनी कृत थे, फिर भी बेंच ने पूरी विवादित भूमि राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार द्वारा भविष्य में गठित किए जाने वाले एक ट्रस्ट को सौंप दी.
सबसे अजीब बात यह थी कि फ़ैसला लिखने वाले जजों के नामों का उल्लेख नहीं किया गया था. सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व न्यायाधीशों ने मुझे बताया कि फ़ैसले की भाषा और शैली चंद्रचूड़ की ओर इशारा करती हैं.
चंद्रचूड़ की अदालत में राजनीतिक कैदी सलाखों के पीछे सड़ते रहे. भीमा कोरेगांव मामले में जीवित बचे 15 आरोपियों में से छह, गौतम नवलखा, शोमा सेन, वर्नोन गोंजाल्विस, अरुण फरेरा, महेश राउत और ज्योति जगताप, की जमानत याचिकाओं पर या तो सुनवाई हो चुकी है या अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं या ��न्हें 3 से 17 महीने तक की देरी का सामना करना पड़ रहा है. एक अन्य सह-आरोपी हनी बाबू ने मई 2024 में अपनी जमानत याचिका तब वापस ले ली, जब उन्हें पता चला कि त्रिवेदी इस पर सुनवाई करेंगी.
अडानी-हिंडनबर्ग प्रकरण में भी जनवरी 2024 के अपने आदेश में, चंद्रचूड़ ने अडानी के कथित स्टॉक हेरफेर की अदालत की निगरानी वाली विशेष जांच टीम या सीबीआई जांच का आदेश देने से इनकार कर दिया था.
पढ़ें: https://t.co/TBBGTdGEZM
#DYChandrachud #judge
Union Minister Giriraj Singh calls Muslims ‘namak haram’. Another BJP MP purifies a spot where Namaz was offered. In Saharanpur a pick up driver, Hamid Ali was beaten to death by two men. No outrage needed
“Never befriend an RSS member. Not only friend, even if it is your family, your father, brother or son, cut them off your life. They carry so much venom. They are the real abusers”
Wrote Anandu Aji an IT professional in his ‘final insta post’ before committing suicide due to sexual abuse by multiple RSS members.
RSS is a threat to Nation.
@Jeetuburdak@JioCare
It is not only a matter of rural areas but it is their work culture to extract money without providing any service.
And even after registering a complaint repeatedly, they provide a false assurance but no work on the ground.
आर्काइव | गोधरा कांड हिंसा के दौरान अपना कर्तव्य निभाने वाले कई अधिकारियों के स्थानांतरण पर एक नजर डालें तो एक पैटर्न दिखाई देता है. दंगों को रोकने वाले अच्छे ��धिकारियों को बाहर कर दिया गया जबकि बेअसर अधिकारी अपनी जगहों पर बने रहे. लेकिन एसआईटी यह दावा करते हुए इसे खारिज कर देती है कि तबादला करना सरकार का विशेषाधिकार है. यह तर्क उस मामले में बहुत कम समझ में आता है जहां सरकार खुद आरोपी है.
भारतीय जनता पार्टी सरकार ने चुनिंदा रूप से अपने सहयोगी संगठन, विश्व हिंदू परिषद से सरकारी अभियोजकों की नियुक्ति की, यहां तक कि उन मामलों में भी जहां हिंसा के आरोपी संघ परिवार के थे. इस अवधि के दौरान मोदी ने कम से कम एक साक्षात्कार दिया जिसमें हिंसा को प्रतिक्रिया के रूप में समझाने की कोशिश की और अपने सार्वजनिक भाषणों में मुसलमानों को निशाना बनाया. एसआईटी ने मोदी के एक अर्थहीन स्पष्टीकरण को यूं ही मान लिया.
गोधरा अग्निकांड के तुरंत बाद शवों की हैंडलिंग के संबंध में एसआईटी ने जो सबूत जुटाए, वे बताते हैं कि सभी मानदंडों के उल्लंघन में विहिप ने अनुचित हस्तक्षेप किया हैं और यहां तक कि अहमदाबाद में 12 शवों के अंतिम संस्कार का जुलूस निकाले जाने का सबूत भी देते हैं. लेकिन एसआईटी एक कनिष्ठ अधिकारी पर शवों को विहिप को सौंपने का आरोप लगाती है और जुलूस के बारे में चर्चा तक नहीं करती है.
शायद अब हम जो देख रहे हैं वह न्याय न मिल पाने का विकसित रूप है. यह एक व���डंबना है कि नरसंहार के वक्त गुजरात पुलिस के महानिदेशक और अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त ने एक ऐसी पुलिस का नेतृत्व करने के लिए एक भी दिन जेल में नहीं काटा जिसने मुस्लिमों को चुन-चुन कर लक्षित किया, जबकि जिस व्यक्ति ने इस विफलता को उजागर करने के लिए भारी व्यक्तिगत जोखिम उठाया वह अब जेल में है. 1984 के अनुभव ने हमारी न्याय प्रणाली को बेहतर नहीं ��नाया है बल्कि इसने इसे और खराब कर दिया है. 1984 के मामले में राज्य और न्याय प्रणाली सरकार के आचरण के बारे में उठाए गए सवालों के संतोषजनक जवाब देने में असमर्थ थी, जबकि 2002 के संबंध में क्या हम मान लें कि हम उस बिंदु पर पहुंच गए हैं जहां सवाल उठाने की प्रक्रिया को भी अपराध घोषित कर दिया जा रहा है?
1984 की घटनाओं को लगभग चार दशक और 2002 की हिंसा को दो दशक हो चुके हैं. दोनों ही मामलों में प्रशासन की पूरी जिम्मेद��री वाले व्यक्ति ने या तो प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला, जैसा कि राजीव गांधी के मामले में था, या वह आगे चलकर प्रधानमंत्री बना, जैसा मोदी के साथ के है. दोनों ने हत्याओं को “क्रिया की प्रतिक्रिया” बोल कर सार्वजनिक बयान दिए, और अल्पसंख्यक के बारे में भड़काउ टिप्पणियां करने के बाद चुनाव अभियान से दोनों को फायदा हुआ. यहां तक कि अगर हम राजनीतिक दोष के सवाल को अलग रखते हैं, तो यह कैसे संभव है कि हिंसा से निपटने में विफल होने के लिए किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई नहीं की गई? पढ़ें: https://t.co/axhiO23nLt
एक तरफ़, हिंदुत्ववादी कट्टरपंथी गरबा पंडाल में घुसने से पहले धर्म पूछ रहे हैं। उनका दावा है कि गरबा धार्मिक आयोजन है।
मुसलमान कट्टरपंथी भी अपने लोगों को गरबा से दूर रहने का फ़रमान दे रहे हैं।
दूसरी तरफ़, पब्लिक स्पेस में गरबा हो रहा है और लोग देखकर ग��गद हैं।
अपने धर्म की आस्था पब्लिक में दिखाओ तो वाह-वाह।
दूसर�� धर्म वाले वही करें तो FIR और लाठीचार्ज।
दरअसल, अब स्पिरिट ऑफ़ इंडिया यही है।
My father, Prof VK Tripathi and I have come to Mumbai to spread a simple message of humanity about the suffering of innocent children in Gaza. While in Dharavi, my father was stopped by the police and was prevented from distributing leaflets; he was taken to the police station for about three hours.
किम इल-सुंग का जन्मदिन उत्तरी कोरिया में सरकारी त्यौहार की तरह मनाया जाता था। जनता मुट्ठी भर चावल के लिए तरसती थी लेकिन जन्मदिन के उत्सव पर करोड़ों फूँक दिए जाते थे। हर नागरिक के लिए इनमें हिस्सा लेना ज़रूरी था।
अगर कोई उसके जन्मदिन उत्सव में शामिल न होता था तो उसको देशद्रोही घोषित कर दिया जाता था जिसकी सज़ा निर्वासन या मौत थी।
[ तानाशाहों के अपने जन्मदिन मनाने के शौक़ पर कुछ और क़िस्से मेरी जल्द आने वाली किताब #बीसवींसदीकेतानाशाह में होंगे]
Today marks a dark chapter in our republic’s history- 5 years of Umar Khalid’s incarceration without trial. Sharing below the cover of a book put together by his friends as an act of solidarity & as a reminder on why we must continue to fight against injustice.
Thasneef Hussain, father of anti-CAA activist Gulfisha Fatima, who has been languishing in jail under UAPA since 2020, said at the Freedom March in JNU: “We are being punished only for being Muslims.”
Watch:
A shocking incident has surfaced from the Yamuna Bazar area of the national capital, Delhi, where a group of Muslims returning from Umrah were allegedly harassed and humiliated by a Hindutva group near a Hanuman temple. The disturbing episode was caught on video, which has since gone viral on social media on September 7th.
@ghazalaahmad5 reports:
https://t.co/NDuBoLFvBa
The Gujarat Police is facing sharp criticism after Congress state working committee president and MLA @jigneshmevani80 demanded accountability over the alleged custodial torture of a 17-year-old Muslim boy in Botad district, who is now battling for his life due to kidney failure in an Ahmedabad hospital.
https://t.co/WVj1O70408