सृष्टि के कण-कण में वही एक ब्रह्म, वही परम सत्ता व्यापक रूप से प्रतिष्ठित है। आकाश, धरा, अग्नि, जल और वायु - ये पंचमहाभूत हों, अथवा वृक्ष-वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी और मनुष्य - सभी उसी ब्रह्म की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। इस दृष्टि से समस्त सृष्टि के साथ एकात्मता, सह-अस्तित्व और सौहार्द्र का भाव रखना ही जीवन का श्रेष्ठ ध्येय होना चाहिए, क्योंकि हम सब उसी एक परम चेतना के अंश हैं। यही भाव हमें प्रेरित करता है कि हम प्रकृति और अपने आसपास के प्रत्येक जीव के प्रति सम्मान, करुणा और आत्मीयता से व्यवहार करें; क्योंकि सबमें वही परमात्मा विद्यमान है।
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कारणं व्यतिरेकेण पुमानादौ विलोकयेत्।
अन्वयेन पुनस्तद्धि कार्ये नित्यं प्रपश्यति।।१३८।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैतवेदान्त में सत्य-असत्य के विवेक हेतु अन्वय-व्यतिरेक की पद्धति अत्यन्त प्रामाणिक और सूक्ष्म साधन मानी गई है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य इसी तत्त्वज्ञान की विधि को स्पष्ट करते हुए साधक को यह उपदेश देते हैं कि वह कारण अर्थात् ब्रह्म का बोध पहले व्यतिरेक से करे और तत्पश्चात् अन्वय से उसे सर्वत्र अनुभूत करे।
“कारणं व्यतिरेकेण पुमानादौ विलोकयेत्” - यहाँ ‘पुमान्’ अर्थात् साधक, प्रारम्भ में व्यतिरेक-विचार द्वारा कारण का अवलोकन करे। व्यतिरेक का अर्थ है - जो जहाँ नहीं है, वहाँ भी जो सत्ता बनी रहती है, वही सत्य है। साधक को यह देखना चाहिए कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि ये सब परिवर्तनशील हैं; जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति - तीनों अवस्थाओं में इनका आविर्भाव और तिरोभाव होता रहता है। किन्तु एक साक्षी-चैतन्य ऐसा है, जो इन सबके अभाव में भी बना रहता है। जब शरीर नहीं है (स्वप्न में), जब मन भी लीन है (सुषुप्ति में), तब भी जो ‘मैं हूँ’ का सूक्ष्म बोध शेष रहता है, वही आत्मा, वही ब्रह्म है। इस प्रकार, जो सभी उपाधियों के अभाव में भी अवशिष्ट रहता है, वही कारणतत्त्व है; नित्य, अविनाशी और स्वतःसिद्ध।
इसके पश्चात् “अन्वयेन पुनस्तद्धि कार्ये नित्यं प्रपश्यति” - साधक को अन्वय-विचार के द्वारा उसी कारण को कार्य में सर्वत्र देखना चाहिए। अन्वय का अर्थ है - जहाँ-जहाँ कार्य है, वहाँ-वहाँ कारण का अनिवार्यतः होना। जैसे घट में मृत्तिका है, आभूषण में स्वर्ण है, तरंग में जल है उसी प्रकार समस्त जगत् में ब्रह्म ही अन्तःस्थित है। जो भी दृश्य है, जो भी अनुभवगम्य है, वह सब उसी चैतन्य की अभिव्यक्ति है। इस दृष्टि से जगत् ब्रह्म से भिन्न नहीं, अपितु उसी का नाम-रूपात्मक विस्तार है।
इस प्रकार व्यतिरेक और अन्वय दोनों दृष्टियों का समन्वय साधक को अद्वैत के परम सत्य तक पहुँचाता है। व्यतिरेक से वह जानता है कि ब्रह्म उपाधियों से परे, निरपेक्ष और स्वतन्त्र है; और अन्वय से वह देखता है कि वही ब्रह्म समस्त नाम-रूप में व्याप्त है। एक ओर ‘नेति-नेति’ द्वारा वह सबको नकारता है, दूसरी ओर ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ के द्वारा सबमें उसी का दर्शन करता है।
भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य जी की यह शिक्षण-पद्धति अत्यन्त वैज्ञानिक और अनुभवपरक है। यह केवल तर्क नहीं, अपितु साधक के प्रत्यक्ष अनुभव का मार्ग है। जब साधक इन दोनों प्रकार के विचारों में निपुण हो जाता है, तब उसके लिए जगत् में ब्रह्म का दर्शन सहज हो जाता है; न केवल समाधि में, अपितु जाग्रत अवस्था के प्रत्येक क्षण में।
अन्ततः यह बोध दृढ़ हो जाता है कि जो कारण है, वही कार्य के रूप में प्रतीत हो रहा है; और जो कार्य है, वह कारण से भिन्न कुछ भी नहीं। भेद केवल नाम-रूप का है, तत्त्वतः सब एक ही है।
अतः निष्कर्षतः व्यतिरेक से ब्रह्म की निर्लेपता का बोध होता है, और अन्वय से उसकी सर्वव्यापकता का अनुभव। इन दोनों के समन्वय से साधक अद्वैत सत्य में स्थित होकर जान लेता है कि वही एक ब्रह्म सर्वत्र, सर्वदा, सर्वरूपेण प्रकाशित है।
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उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में “सशक्त उत्तराखंड” की परिकल्पना को केंद्र में रखते हुए दैनिक जागरण समूह द्वारा आयोजित “जागरण फोरम” संवाद कार्यक्रम के धर्म सत्र में श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, अनन्तश्रीविभूषित, जूनापीठाधीश्वर, आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज (पूज्य आचार्यश्री जी) ने “जेन-जी का धर्म” विषय पर समकालीन, चिंतनशील और मार्गदर्शक संवाद प्रस्तुत किया।
इस वैचारिक मंथन के विभिन्न सत्रों में वक्ता के रूप में भारत के महामहिम उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन जी, उत्तराखंड के महामहिम राज्यपाल ले. जनरल श्री गुरमीत सिंह जी, मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी, पर्यावरणविद् पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी जी तथा सिने कलाकार श्री सुनील शेट्टी जी ने भी सहभागिता कर अपने विचार साझा किए।
धर्म सत्र में उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष श्री विनय रोहेला जी, दैनिक जागरण के प्रधान संपादक श्री अनंत विजय जी, उत्तराखंड राज्य संपादक श्री मनोज झा जी, देहरादून समाचार संपादक श्री देवेंद्र सती जी, दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल जी, खुर्जा, उत्तर प्रदेश, विधायक श्रीमती मीनाक्षी सिंह सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
आधुनिक पीढ़ी की चेतना और सनातन मूल्यों का समन्वय- ऐसे संवादों को केवल चर्चा नहीं रहने देता; वे समाज को दृष्टि, दिशा और चरित्र-निर्माण का आधार प्रदान करते हैं।
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"श्रीदक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्"
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि ।
व्यावृत्ताः स्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ॥
स्वात्मानं प्रकटी करोति भजतां यो मुद्रया भद्रया ।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥७॥
इस मंत्र में भगवद्पादाचार्य आद्य शंकराचार्य आत्मा की निरन्तरता, अपरिवर्तनीयता और सर्वावस्थापर्यवाप्ति को उजागर करते हैं। बाल्य, यौवन, जरा- शरीर की अवस्थाएँ बदलती हैं; जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति- चित्त की अवस्थाएँ परिवर्तित होती हैं; परन्तु “अहम्” की अंतःप्रज्ञा- “मैं हूँ” की भावना सदा एक समान बनी रहती है।
आद्य शंकराचार्य इस ‘अहं-स्फुरणा’ को आत्मा की नित्य स्फुरणात्मक उपस्थिति कहते हैं — जो अनुभवगम्य है, किन्तु अज्ञान से आवृत रहती है। यह वही आत्मा है, जो बाल्यावस्था में भी थी, यौवन में भी है, वृद्धावस्था में भी रहेगी। वह न तो शरीर है, न मन; वह है चैतन्यस्वरूप, जो सदा “अहम्” के रूप में अंतः में प्रकाशित रहता है।
परन्तु यह आत्मा- यद्यपि अनुभव का आधार है, तब तक प्रत्यक्ष नहीं होती, जब तक गुरु कृपा से उसका स्वरूप-प्रकाश न हो। आद्य शंकराचार्य कहते हैं कि जो सद्गुरु भद्र मुद्रा (जैसे चिन्मुद्रा) के द्वारा इस नित्य स्फुरणशील आत्मा को उपासक के हृदय में प्रकट कर देते हैं - वही हैं, श्रीदक्षिणामूर्ति।
स्वरूपानुभूति किसी बाह्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं रखती — वह तो स्वयं स्फुरमाण होती है, किन्तु माया के कारण अज्ञेय बनी रहती है। गुरु, अपने मौन उपदेश (मुद्रा) से उसी को प्रकाशित करते हैं। यही अद्वैत वेदान्त का सार है — नवीन ज्ञान नहीं, अपितु चिरंतन का अनावरण। ऐसे श्रीदक्षिणामूर्ति गुरु को नमन, जो आत्मा को आत्म-स्वरूप में प्रतिष्ठित कराते हैं।
“In childhood, youth, and old age,
in waking, dream, and deep sleep
that which ever shines within as the constant inner awareness,
the unchanging ‘I am’ - He who reveals this Self to seekers
through the sacred gesture of wisdom (mudrā), to that Guru, Śrī Dakṣiṇāmūrti, I offer my salutations.”
In this deeply contemplative verse, Ādi Śaṅkarācārya brings out a central truth of Advaita Vedānta — the unbroken continuity of the Self (Ātman) amidst the apparent changes of body, mind, and states of experience.
Childhood passes into youth and youth into old age; waking shifts to dream and to deep sleep — but the core sense of self, the inner luminous awareness “I am”, remains untouched and ever-present. This constant, self-effulgent presence is the real Ātman — the unchanging witness that illumines all states without itself being affected.
Śaṅkara describes this as the sphuraṇa — the spontaneous, intuitive radiance of the Self within. Though it always shines, it is concealed by avidyā (ignorance) and misidentified with body and mind. The Guru, however, through the silent teaching symbolized by the cinmudrā (gesture of knowledge), awakens this recognition in the seeker’s heart — not by giving something new, but by removing the veil.
Śrī Dakṣiṇāmūrti, the embodiment of silent knowledge, is thus saluted as the one who reveals the Self — not through speech, but through presence and realization.
The Self is not something to be achieved; it is already present — shining quietly as the ‘I’ in all our experiences. It is the Guru, through his grace and silence, who reveals this ever-existing truth. Such a Guru is none other than Śrī Dakṣiṇāmūrti — the embodiment of awakened knowledge. To Him, the knower of Brahman, we bow.
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