फागुन - डॉ. वर्षा सिंह
धीरे-धीरे बढ़ रहा, सूरज वाला ताप ।
कानों में पड़ने लगी, फागुन की पदचाप।।
"वर्षा" की शुभकामना, रहें सभी ख़ुशहाल।
अपनेपन का, प्रेम का, मौसम रहे बहाल।।
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याद उसको उसी रास्ते की कथा
जिसमें मिलती रही है व्यथा ही व्यथा
जब से अस्मत लुटी एक मासूम की
देवता पर न उसकी रही आस्था
किस तरह वो तरक्क़ी करेंगे भला
जिनके पैरों में जकड़ी पुरानी प्रथा
बेवज़ह ज़िद पे अड़ने का जिनको शगल
बात करना भी उनसे यकीनन वृथा
-डॉ. वर्षा सिंह
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शायरी मेरी सहेली की तरह
- डॉ. वर्षा सिंह
शायरी मेरी सहेली की तरह
मेंहदी वाली हथेली की तरह
हर्फ़ की परतों में खुलती जा रही
ज़िन्दगी जो थी पहेली की तरह
मेरे सिरहाने में तकिया ख़्वाब का
नींद आती है नवेली की तरह
ये मेरा दीवान "वर्षा"- धूप का
रोशनी की इक हवेली की तरह
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नये साल में
- डॉ. वर्षा सिंह
पूरी होंगी चर्चाएं जो बाकी हैं
नये साल में नयी उमीदें जागी हैं
आने वाले दिन शायद कुछ बेहतर हों
पिछली यादें बड़ी रुलाने वाली हैं
सच तो ये है
- डॉ. वर्षा सिंह
रेशमी फूल हवा भी ताज़ा
ख़त मेरे नाम क्यों नहीं आया
झील में अक़्स देखना मुश्किल
इस तरफ हैं शजर, उधर छाया
उम्र मेरी तमाम भीग गई
चूम कर वो गया मेरा माथा
शीत-"वर्षा" का ये अजब मौसय
बर्फ सी रात, दिन हुआ पारा
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