तुम हो कल के भारतवासी, तुम पर ही विश्वास टिका,
षड्यंत्रों के आगे क्यों यह, जीवन का स्वाभिमान रुका?
होश सम्भालों, निज पहचानो, छोड़ो यह उन्माद पुराना,
सत्य-समर में जीतो बाज़ी, भारत का मान बढ़ाना।
कुछ किताबें बस प्रेम से भरी होती हैं
जिसमें प्रेम भी होता है और इंतज़ार भी
तन्हाई भी होती है तो रुसवाई भी
जिद्द भी होती है तो तड़प भी
इकरार और इजहार भी होता है
एहसासों से जुड़ कर महसूस होने लगती हैं
और खो जाते हैं अपनी ही दुनिया में💕
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Israel Parliament confers the “Medal of the Knesset” upon Hon. Prime Minister Shri @narendramodi Ji during his address to the Knesset today.
He becomes the first-ever recipient of the Medal of the Knesset — the highest distinction conferred by the Speaker of the Knesset.
This historic recognition reflects the deepening strategic partnership between India and Israel, founded on shared democratic values, innovation, strong security cooperation, and an unwavering friendship.
Under the visionary leadership of PM Modi Ji, Bharat’s global stature continues to rise, earning respect and admiration across the world. 🇮🇳🤝🇮🇱
@KnessetENG
सनातन को बाँटने वाले UGC के नियम पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाये जाने पर हार्दिक आभार। आशा है इसे पूर्ण रूप से रोक दिया जाये। यह निर्णय भारत की सांस्कृतिक एकता और सनातन मूल्यों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण है।
#UGC_RollBack
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री श्री अजित पवार जी के आकस्मिक निधन का समाचार अत्यंत दुखद है।
जनसेवा और राज्य के विकास में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति और परिजनों को यह दुःख सहने की शक्ति दें। ॐ शांति।
#planecrash#AjithPavar
आज एक दुःखद हादसे में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और NDA के हमारे वरिष्ठ साथी अजीत पवार जी को खो देने की सूचना से मन अत्यंत व्यथित है।
अजीत पवार जी ने बीते साढ़े तीन दशकों में जिस प्रकार महाराष्ट्र के हर वर्ग के कल्याण के लिए खुद को समर्पित किया, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। वे जब भी मिलते थे, महाराष्ट्र की जनता के कल्याण संबंधी अनेक विषयों पर लंबी चर्चा करते थे। उनका निधन NDA परिवार के साथ ही मेरे लिए भी व्यक्तिगत क्षति है।
मैं पवार परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूँ। शोक की इस घड़ी में पूरा NDA शोक-संतप्त पवार परिवार के साथ मजबूती से खड़ा है। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें। ॐ शांति शांति शांति
राष्ट्र प्रेरणा स्थल हमारे देश के लिए एक प्रेरणादायी स्मारक बनेगा। हमें गर्व है कि हमारे देश की राजनीति एक परिवार से निकल कर राष्ट्र के लिए जागृत हो चुकी है।
#Lucknow#राष्ट्रप्रेरणास्थल
राष्ट्र प्रेरणा स्थल हमारे देश की महान विभूतियों के जीवन, उनके आदर्शों और अमूल्य विरासत को समर्पित एक प्रेरणादायी स्मारक है। आज सुशासन दिवस पर लखनऊ में इसका लोकार्पण कर अपार गौरव और आत्मिक संतोष की अनुभूति हुई।
@AnalyticalBong अरावली के साथ तो 1970 से छेड़छाड़ हो रही है और अब तक सब खामोश रहे। 2002-2003 में अशोक गहलोत ने ही सौ मीटर से कम वाली पहाड़ियों को खनन के ले लिए खोला था और अब वो ही जानता को गुमराह कर रहा है भाजपा को बदनाम कर सत्ता हासिल करने के चक्कर में।
#अरावली: उत्तर भारत की जीवनरेखा और उसकी संकट की कहानी।
अरावली सिर्फ पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं है, यह उत्तर भारत का प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के लिए यही पहाड़ भूजल, हवा और जलवायु संतुलन का आधार रहे हैं। लेकिन बीते कुछ दशकों में अरावली को जो नुकसान पहुँचा है, उसने इसे पर्यावरण से जुड़ा सबसे गंभीर मुद्दा बना दिया है।
अरावली को लेकर विवाद 1970 के दशक में गहराने लगा। 1975 के बाद खनन, पत्थर तोड़ने और तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने पहाड़ियों को कमजोर करना शुरू किया। धीरे-धीरे यह इलाका उद्योग, रियल एस्टेट और अवैध खनन के लिए आसान शिकार बन गया। अब तक अरावली की करीब आठ प्रतिशत पहाड़ियाँ खत्म हो चुकी हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में 22 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह समाप्त हो सकता है।
कांग्रेस के लंबे कार्यकाल में अरावली सबसे ज्यादा उपेक्षा का शिकार रही। सबसे बड़ा नुकसान नीतिगत भ्रम से हुआ। अलग-अलग राज्यों ने अरावली की अलग-अलग परिभाषा तय कर दी। कहीं ऊँचाई को आधार बनाया गया, तो कहीं भू-राजस्व रिकॉर्ड को। 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को कई जगह अरावली से बाहर मान लिया गया। इसका सीधा फायदा खनन माफिया और बिल्डरों को मिला। हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली से सटे इलाकों में अवैध खनन धड़ल्ले से चलता रहा। पर्यावरणीय मंजूरी के बिना खदानें खुलती रहीं और सरकारें आंखें मूंदे रहीं। परिणाम साफ दिखा। भूजल स्तर तेजी से गिरा, प्राकृतिक जल निकासी टूट गई और NCR क्षेत्र में गर्मी, धूल और जल संकट बढ़ता चला गया।
जब सरकारें नाकाम रही तो मामला अदालत तक पहुँचा। 1985 और फिर 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र में खनन पर सख्त रोक लगाई। अदालत ने माना कि यह पहाड़ियाँ पूरे इलाके की जीवनरेखा हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अरावली की सुरक्षा राज्यों की मनमानी परिभाषा पर नहीं छोड़ी जाएगी। 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियां भी संरक्षण के दायरे में आयेंगी। कोर्ट ने कहा कि अरावली की वास्तविक भौगोलिक स्थिति को आधार बनाया जायेगा, न कि कागजी चालाकी को। यह आदेश सीधे उन नीतियों पर चोट था, जिनके जरिए पहले खनन को वैध बनाने की कोशिश होती रही।
भाजपा सरकार ने अरावली के मुद्दे पर खुद को संरक्षण के पक्ष में रखा है। राजस्थान में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जी ने साफ कहा कि अरावली क्षेत्र में किसी भी हालत में खनन की अनुमति नहीं दी जायेगी। केंद्र सरकार का भी कहना है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जहाँ बिना पर्यावरणीय स्वीकृति माइनिंग संभव नहीं है। इसके साथ ही अरावली विकास प्राधिकरण, इकोलॉजिकल सर्वे और वैज्ञानिक मैपिंग जैसे प्रस्ताव सामने आये हैं, ताकि पूरे क्षेत्र की स्पष्ट पहचान हो और आगे किसी तरह की कानूनी अस्पष्टता न रहे।
अरावली में जो नुकसान हुआ, वह अचानक नहीं हुआ। यह उस दौर की देन है जब केंद्र और कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थी। उसी समय अरावली क्षेत्र में खनन, पत्थर तोड़ने और निर्माण गतिविधियां लगातार बढ़ती रही। तब न तो इस पर सार्वजनिक बहस थी और न ही सरकारों पर कोई खास दबाव। सोशल मीडिया जैसा कोई माध्यम नहीं था, जिससे आम लोग सीधे सवाल उठा सकें। मुद्दे अखबारों और फाइलों तक सीमित रह जाते थे। नतीजा यह हुआ कि अवैध खनन एक नॉर्मल गतिविधि बनता चला गया और प्रशासनिक चुप्पी उसे संरक्षण देती रही।
विशेष रूप से 2002–2003 का दौर महत्वपूर्ण है। राजस्थान की तत्कालीन गहलोत सरकार ने अरावली क्षेत्र की परिभाषा और उसकी कानूनी स्थिति को लेकर ऐसे प्रशासनिक फैसले किये, जिनसे खनन और निर्माण का रास्ता खुल गया। कई पहाड़ियों को राजस्व रिकॉर्ड में गैर-पहाड़ी या गैर-वन क्षेत्र की श्रेणी में डालने की प्रक्रिया शुरू हुई। पुराने खनन पट्टों के नवीनीकरण को आसान बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट पहले ही अरावली को संवेदनशील क्षेत्र मान चुका था, लेकिन उन फैसलों के जरिए वन संरक्षण कानून और पर्यावरणीय प्रतिबंधों से बचने की कोशिश हुई। इन फैसलों का सीधा असर यह हुआ कि खनन माफिया को कानूनी ढाल मिल गई और अवैध गतिविधियाँ वैध दिखने लगी। यही कारण है कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा।
आज कांग्रेस खुद को अरावली का संरक्षक दिखाने की कोशिश कर रही है, लेकिन 2002–2003 के फैसले इस दावे को कमजोर करते हैं। अगर उस समय सच में संरक्षण की नीयत होती, तो अरावली को कागजों में कमजोर करने की कोशिश नहीं होती। सच यह है कि अरावली को सबसे ज्यादा नुकसान न नारों से हुआ, न विकास से, बल्कि उन नीतिगत फैसलों से हुआ जो चुपचाप फाइलों में लिए गये।
#SaveAravali
#savearavallihills
~ डॉ. ऋषि अग्रवाल ‘सागर’