दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : 15 जून 2026
घुटनों पर गिड़गिड़ाते ट्रम्प ने
आखिर पाया एक समझौता
-सुनील कुमार
अमरीका और ईरान के बीच एक समझौते की घोषणा पाकिस्तान ने आज सुबह-सुबह की है। पाक पीएम की यह पोस्ट बताती है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत में पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है। इसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने समझौते की घोषणा की, और फिर ईरान ने भी। ट्रम्प पिछले दो दिनों से लगातार कह रहे थे कि इतवार को समझौते पर दस्तखत हो जाएंगे, लेकिन ईरान हमलावर ट्रम्प को उसके जन्मदिन पर यह तोहफा देना नहीं चाहता था, और उसने सोशल मीडिया पर इस बात को साफ-साफ लिख भी दिया था कि वह इस समझौते के ऐसे इस्तेमाल का मौका ट्रम्प को देना नहीं चाहता। खैर, शुक्रवार को इस पर स्विटजरलैंड में दस्तखत होंगे, लेकिन अभी से ही ईरान और लेबनान सहित तमाम मोर्चों पर फौजी हमले थम जाएंगे, ऐसा लग रहा है। अभी इजराइल की कोई प्रतिक्रिया इसे लेकर सामने नहीं आई है, और वह अमरीकी राष्ट्रपति को नाराज करने की कीमत पर भी लेबनान पर कुछ हमले कल तक करते रहा है, और इसके पहले ईरानी हमले के जवाब में उसे हमला न करने की सलाह ट्रम्प ने दी थी, लेकिन इजराइल ने उसे भी अनसुना कर दिया था। इसलिए अभी यह साफ नहीं है कि इस समझौते के बाद इजराइल के तेवर क्या रहेंगे, लेकिन यह ट्रम्प का सरदर्द है कि उसकी मदद पर जिंदा इस देश को काबू में रखे। फिलहाल तो दुनिया के अधिकतर प्रमुख पश्चिमी देशों की प्रतिक्रियाएं आई हैं जिन्होंने स्वागत के साथ ही यह भी उम्मीद जताई है कि तेल की आवाजाही में रोक-टोक और अड़ंगे खत्म होने से अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की बर्बादी थमेगी, और मध्य-पूर्व में चल रहा फौजी तनाव भी खत्म होगा।
दुनिया के विश्लेषक इस समझौते को लेकर हैरान हो रहे हैं कि अगर इन्हीं शर्तों पर बातें होनी थीं, तो अमरीका ने इजराइल के उकसावे में आकर यह जंग ही क्यों छेड़ी? अब अगर इन शर्तों पर समझौता हो रहा है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, उसे कुछ प्रतिबंधों में ढील मिलेगी, जलडमरूमध्य खुलेगा, और अगले 60 दिन की बातचीत में बाकी शर्तें तय होंगी, तो ये तमाम बातें तो बिना जंग के भी हो सकती थीं, बेहतर तरीके से हो सकती थीं। यह सोचने वाले विश्लेषकों का मानना है कि इससे तेल और गैस का बाजार बर्बाद हुआ, पूरी दुनिया का कारोबार चौपट हुआ, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा, मध्य-पूर्व के देशों के बीच आपस में अविश्वास बढ़ा, और कुल मिलाकर समाधान बातचीत से ही निकला, चाहे वह कतर ने करवाई, चाहे पाकिस्तान ने। कुछ दूसरे फौजी विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प ने हमला शुरू करने की रणनीति तो बना ली थी, जो कि इजराइल ने उसे झांसे में रखकर बेच दी थी, लेकिन जंग लंबा खींचने पर आगे क्या करना है, इसकी कोई स्पष्ट योजना ट्रम्प के पास नहीं थी। ट्रम्प के सामने यह धर्मसंकट था कि अगर वह ईरान पर हमले और तेज करता, जारी रखता, तो मध्य-पूर्व में क्षेत्रीय युद्ध का खतरा था, ईरान उन देशों पर भी हमले कर रहा था, जिनमें अमरीका के फौजी अड्डे हैं। ट्रम्प ने जंग को सीमित रखकर बातचीत की, तो यह बातचीत तो पहले भी हो सकती थी। अभी ईरान के मोर्चे पर अमरीका को जो मुंह की खानी पड़ी, दुनिया की सबसे बड़ी फौज को लेकर हमला करने के बाद भी ट्रम्प के पास जलडमरूमध्य को खुलवाने का कोई रास्ता नहीं था, और ईरान ने एक किस्म से विश्व अर्थव्यवस्था का गला ही दबाकर रखा था, पूरी दुनिया ट्रम्प को कोस रही थी। इसके अलावा इस मोर्चे की वजह से नाटो फौजी संगठन में अमरीका पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया। वह बाकी नाटो देशों के सामने गिड़गिड़ाते रहा कि जलडमरूमध्य की नाकाबंदी खोलने के लिए वे अपनी नौसेना भेजें, लेकिन किसी भी देश ने अमरीका के छेड़े हुए इस अवांछित युद्ध में शामिल होने से मना कर दिया, और अमरीका को बेसहारा छोड़ दिया। हक्का-बक्का ट्रम्प नाटो के साथी देशों के खिलाफ सार्वजनिक बदजुबानी करते रहा, उन्हें धमकाता रहा, लेकिन किसी देश ने उसका साथ नहीं दिया। बल्कि नाटो के कुछ देशों ने तो अमरीकी फौजी विमानों को अपने देश में उतरने से भी रोक दिया, जो कि ईरान तक जाने के रास्ते में अमरीकी फौज की जरूरत थी। एक-एक करके बहुत से पश्चिमी देशों, नाटो देशों ने ट्रम्प के इस अवांछित हमले का विरोध किया, खुद अमरीकी संसद में ट्रम्प मतदान के पहले तक खूब आलोचना झेलते रहा, और अमरीकी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई। नवंबर में अमरीका में मध्यावधि चुनाव है जिसमें ट्रम्प की अग्निपरीक्षा होगी, और उसी को ध्यान में रखकर ट्रम्प ईरान के सामने एक किस्म से समझौते के लिए इन महीनों में गिड़गिड़ाते रहा, और ईरान था कि उसने दुनियाभर में बिखरे हुए अपने दूतावासों के सोशल मीडिया अकाऊंट्स पर ट्रम्प के खिलाफ भयंकर तीखे कार्टून बना-बनाकर उसकी खिल्ली उड़ाई।
इस पूरे मोर्चे पर ईरान एक विजेता की तरह सामने आया है जिसने अमरीका को घुटनों पर ला दिया, नाटो के भीतर गहरी दरार खड़ी कर दी, और इजराइल को एक किस्म से अमरीका से कुछ अलग भी कर दिया। ईरान ने इन चार महीनों में मध्य-पूर्व के अमरीकी-पिट्ठू देशों को यह भी दिखा दिया कि एक समझौते के लिए अमरीका किस तरह उन सबके कारोबारी, और सुरक्षा संबंधी हितों को कचरे की टोकरी में डाल सकता है। इस तरह मध्य-पूर्व में अमरीका की एक संरक्षक या दादा जैसी साख को भी ईरान ने गहरी चोट पहुंचाई है, और अब वहां के अलग-अलग देश अमरीका से परे भी अपनी जिंदगी के बारे में सोचेंगे। एक मजे की बात यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति, और उसके जंग मंत्री पहले दिन से ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात भी कर रहे थे। लेकिन इतने भयानक हमलों के बाद भी, वहां के सुप्रीम लीडर को, सारे फौजी सेनापतियों को मार डालने के बाद भी ईरान की सरकार ज्यों की त्यों बनी हुई है, वहां कोई सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ, बल्कि सरकार के खिलाफ वहां जो घरेलू नाराजगी चल रही थी, वह भी कुछ हद तक कम हुई है कि अमरीकी हमलों के सामने देश को एक रहना है।
ट्रम्प को नवंबर के मध्यावधि चुनावों के पहले अपनी इज्जत बचानी थी, जो कि जंग के इन महीनों में लंगोटी से भी घटकर बस उसकी लाल टाई से ढंकी रह गई थी, इसके लिए उसने पाकिस्तान का सहारा लिया, और किसी तरह घुटनों के बल आकर एक समझौते तक पहुंचा। अब अगले 60 दिनों में ईरान के साथ समझौते की बारीक बातें जब तय होंगी, तब पता लगेगा कि एक पिछले डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति, बराक ओबामा के ईरान के साथ किए गए जिस परमाणु समझौते को ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में फाडक़र फेंक दिया था, क्या अब होने जा रहा समझौता उसके मुकाबले अमरीका के हित में कुछ अधिक होगा? फिलहाल तो दुनिया के समझदार लोगों के बीच ट्रम्प मखौल का सामान बन गया है कि उसने अमरीकी जनता पर अंधाधुंध बोझ डालकर, उनके हक के करीब सौ बिलियन डॉलर ईरान के मोर्चे पर झोंक दिए हैं, जिस मोर्चे की कोई जरूरत ही नहीं थी। इसी जंग के चलते ट्रम्प के कुछ सबसे करीबी और महत्वपूर्ण सदस्य सरकार छोडक़र निकल गए, संसद में उसकी पार्टी के कई सांसद उसके खिलाफ हो गए, और दुनिया की नजरों में वह परले दर्जे का बेवकूफ भी साबित हुआ। ट्रम्प के खिलाफ यह बात भी जाती है कि पिछली आधी सदी से इजराइल अमरीकी राष्ट्रपतियों को ईरान पर हमले के लिए तैयार करने की कोशिश करते आ रहा था, लेकिन कोई भी उसके झांसे में नहीं आया था। ट्रम्प ऐसा पहला बेवकूफ था जो कि नेतन्याहू के जाल में फंसकर इस जंग में उलझ गया, जिसके चक्रव्यूह से बाहर निकलना उसने माँ के पेट में सीखा नहीं था। इस पूरी जंग से ईरान एक विजेता की तरह उभरकर सामने आया है कि अमरीका और इजराइल की मिली हुई फौजी ताकत भी उसके खिलाफ इतने भयानक हमलों को जारी नहीं रख पाई, और उन्हें एक किस्म से मुंह की खानी पड़ी। अगले 60 दिन की बातचीत का नतीजा भी अमरीका के मध्यावधि चुनावों के नवंबर के पहले ही आ जाएगा, और ट्रम्प हर हाल में अपने इस समझौते को ओबामा के समझौते से बेहतर साबित करने की कोशिश करेगा, आने वाले दो महीने, अगर यह युद्धविराम कायम रहा तो, देखने लायक मोलभाव के रहेंगे।
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दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : 14 जून 2026
बाजार में जमकर आए जामुन कुदरत का संदेश भी लाए हैं!
-सुनील कुमार
आज वॉट्सऐप पर एक जानकारी मिली कि इस साल बाजार में जितने जामुन देखने मिल रहे हैं, उतने पिछले तीन दशक में कभी देखने नहीं मिले थे। इस बात के साथ किसी ने यह लिखा है कि उनकी दादी कहती थीं कि जिस गर्मी में जामुनों का ऐसा ढेर लगता है, उस साल सूखा पड़ता है। इसके साथ-साथ इस संदेश में कई वैज्ञानिक शब्द इस्तेमाल करके यह बताया गया कि किस तरह वनस्पति विज्ञान पौधों की, पेड़ों की इस बहुत अधिक उपज को अधिक से अधिक फल देने की आखिरी कोशिश मानता है, और जब पेड़ों को जमीन के नीचे पानी की एकदम कमी लगती है, या मौसम में बड़े बदलाव के संकेत मिलते हैं, तो पेड़ प्रतिरक्षात्मक अंदाज में चले जाता है, और उसे लगता है कि आगे वो शायद न जी पाए, इसलिए वह अपनी प्रजाति को धरती पर बनाए रखने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा अधिक से अधिक फल, यानी अधिक से अधिक बीज बनाने में लगा देता है। इस संदेश में लिखा गया है कि जामुन का पेड़ इस बरस आत्महत्या नहीं कर रहा है, बल्कि अपना बलिदान देकर अपनी अगली पीढ़ी, यानी बीजों को अधिक से अधिक बढ़ा रहा है। इसलिए जामुन के इस बर्ताव को जलवायु परिवर्तन, और पानी की कमी से जोडक़र देखें। इस बारे में जब वैज्ञानिक तथ्य ढूंढने की कोशिश की गई, तो कुछ हैरतअंगेज बातें पता लगीं।
जामुन को लेकर भेजे जा रहे संदेशों में इसे स्ट्रेस फ्रूटिंग कहा गया है। इसके बारे में विज्ञान का कहना है कि जब भी कोई पेड़ अत्यधिक सूखे, पानी की कमी, या पर्यावरण के खतरे से गुजरता है, तो उसके भीतर अस्तित्व जिंदा रखने का हौसला जाग जाता है। पेड़ को लगता है कि वह मर सकता है, तब वह अपनी बची-खुची पूरी ऊर्जा नई पत्तियां उगाने के बजाय, फूल और फल (बीज) बनाने में झोंक देता है, ताकि उसकी नस्ल बची रहे। इसे विज्ञान ने स्टे्रस इंड्यूज्ड फ्लॉवरिंग भी कहते हैं। जामुन की जड़ें बहुत गहरी होती हैं, इसलिए जब भूजल स्तर गिरता है, तो जामुन का पेड़ इसे इंसानों से बहुत पहले भांप लेता है, और अपनी प्रतिक्रिया देता है। प्रकृति का इतिहास बताता है कि कुछ पौधों में अत्यधिक फल आने के बाद वे सचमुच मर जाते हैं, और इसलिए उनके फलने-फूलने को सुसाइड फ्रूटिंग भी कहते हैं। लेकिन जामुन का पेड़ बांस या ताड़ की कुछ प्रजातियों सरीखा नहीं रहता, इसलिए उसे सुसाइड फ्रूटिंग के बजाय इमरजेंसी फ्रूटिंग कहना बेहतर होगा।
हम विज्ञान को पूरी तरह जाने बिना सिर्फ सतही जानकारी को क्रॉसचेक करके इन बातों को लिख रहे हैं, क्योंकि हम कोई वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालने के बजाय उसे जलवायु परिवर्तन के व्यापक खतरे के साथ जोडक़र देखना चाहते हैं, देख रहे हैं। बदलते पर्यावरण को समझने के लिए प्रकृति की सामान्य समझबूझ की बातों पर एक नजर डाल रहे हैं। भारत में यह प्रचलित धारणा है कि जिस साल जामुन और आम में बम्पर क्रॉप आती है, उस साल कड़ी गर्मी और कम बारिश के आसार होते हैं। मौसम विभाग भी इस बार औसत से कम बारिश की भविष्यवाणी कर चुका है। जामुन के बारे में यह ‘वॉट्सऐप-वैज्ञानिक’ जानकारी तो बाद में आई है। विज्ञान की सामान्य जानकारी बताती है कि अत्यधिक गर्मी और पानी की प्रारंभिक कमी ही पेड़ों में स्ट्रेस हार्मोंस को सक्रिय करती है, जिससे फूलों की, यानी फलों, और बीजों की संख्या बढ़ जाती है।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस साल जामुन का आकार कम है, लेकिन वह मीठा अधिक है। इस बारे में जांचने-परखने पर विज्ञान हमारी इस मामूली समझ को कुछ हद तक सही ठहराता है कि जब पेड़ों को पानी कम मिलता है, तो उनके फल अधिक मीठे होते हैं। हालांकि हमने यह पाया है कि कुओं के किनारे लगे हुए जाम या आम के पेड़ जो कि खूब सारा पानी पाते हैं, कम मीठे फल देते हैं। जो पेड़ सूखी जमीन के बीच में रहते हैं, उनके फल अधिक मीठे होते हैं। और इसकी सबसे बड़ी मिसाल रेगिस्तान में बिना एक बूंद पानी के तपने वाले खजूर के पेड़ होते हैं, जो कि दुनिया का सबसे मीठा फल देते हैं। खजूर उत्पादक देशों में एक समस्या बड़ी आम चर्चा में रहती है कि अगर फल पकने के समय बारिश हो जाए, या अत्यधिक सिंचाई हो जाए, तो फलों की मिठास घट सकती है, गुणवत्ता गिर सकती है, और फल फट भी सकते हैं। अब इस बरस भारत में अगर जामुन सचमुच ही अधिक मीठे हो गए हैं, और प्रकृति के इस संदेश को पढऩे वाले लोगों की वैज्ञानिक जानकारी सही है, तो यह गिरते हुए भूजल स्तर, और आने वाले सूखे मौसम के बीच का संदेश है। यह कैसी अजीब बात है कि पेड़ सूखकर खत्म हो जाने का खतरा भांपकर अपनी पूरी ताकत नए फूल और फल बनाने में लगा देते हैं, ताकि उनकी नस्ल चलती रहे। उन्हें नस्ल आगे बढ़ाने के लिए आईवीएफ सेंटरों की जरूरत नहीं पड़ती, न ही सरोगेसी की। वे इतने फल पैदा कर देते हैं कि जिन्हें जानवर और पशु-पक्षी खाकर पूरी तरह खत्म न कर सकें, और बचे हुए बीजों से पेड़ों की नस्ल आगे बढ़ जाए! आज दुनिया में कई देशों, और नस्लों के इंसानों की आबादी गिरती चल रही है। आबादी का संतुलन बनाए रखने के लिए प्रति महिला 2.1 बच्चों का औसत रहना चाहिए, और कई देश-प्रदेशों में यह औसत इससे बहुत नीचे गिर चुका है, अब देश और सरकारें फिक्रमंद हैं कि आबादी को लगातार गिरते चले जाने से कैसे रोकें? लेकिन पेड़-पौधे इंसानों के मुकाबले शायद अधिक समझदार रहते हैं, और इस बार जैसी कि जनचर्चा है, जामुन अपने पर आते खतरे की आशंका से अधिक फल-बीज उगाने में लग गया है!
हमें बार-बार लगता है कि इंसानों को नियमित रूप से कुछ वक्त प्रकृति के साथ गुजारना चाहिए, उससे बहुत कुछ सीखने मिलता है। एक वक्त था जब इंसान ने खेती सीखी, और उसमें अधिक मेहनत लगती थी, इसलिए उसे अधिक बच्चे पैदा करने की जरूरत भी लगती थी। कृषि अर्थव्यवस्था अधिक बच्चों पर टिकी हुई थी। अब जैसे-जैसे इसमें मशीनीकरण बढ़ते गया, पहले जानवरों का उपयोग हुआ, फिर ट्रैक्टरों का, और फिर हार्वेस्टर जैसी फसल कटाई की मशीन का, वैसे-वैसे इंसानों की जरूरत घटने लगी, और किसानों में बच्चों की संख्या भी कम होने लगी। एक वक्त अधिक बच्चों के अधिक हाथ अधिक उत्पादक थे, और फिर मशीनी-मजदूर मिल जाने से अब उन बच्चों के पेट अधिक खपत करने वाले हो गए! अब इंसानों ने प्रकृति से सीखा होगा, इंसानों के पास तो ऐसा कुछ है नहीं, जिससे कि जामुन, या दूसरे पेड़ कुछ सीख सकें।
फिलहाल तो लोगों को इस प्राकृतिक तथ्य को भी याद रखना चाहिए कि कम पानी पर जिंदा रहने वाले, सूखा झेलने वाले पेड़ अमूमन अधिक मीठे फल देते हैं। इंसानों में भी जो अधिक अभाव में बड़े होते हैं, वे अधिक कामयाब भी होते हैं, और उनमें अपने ऐसे दौर की वजह से एक बुनियादी विनम्रता भी आ जाती है, जो कि व्यवहार की मिठास ही होती है। आज की यह बात प्रकृति, विज्ञान, और मानव स्वभाव के बीच भटकती हुई बात है, जो कि प्रकृति से मिलने वाले संकेतों से शुरू हुई है, और इंसानों की समझ पर जाकर खत्म होगी, या तो इंसान समझेंगे, या खत्म होंगे!
@LGIndia fridge developed problem. Service center technician visited twice, charged fees, said door hinges outlived, now door will not close properly. Parts not suppied anymore. Can not b repaired. An outside technician called. He put a chip of stone under stand. Working fine now
JUST IN: This Is A Pretty Stunning Observation.
Trump is celebrating a new Iran agreement centered on a commitment that Iran will never obtain a nuclear weapon.
According to ABC's Jonathan Karl, that same commitment appeared in the very first paragraph of President Obama's nuclear deal more than a decade ago.
Think about that.
First came Obama's agreement.
Then Trump tore it up.
Now Trump is celebrating an agreement built around the same core promise.
In an effort to achieve ‘Zero Accident Kumari,’ Kanniyakumari police had recently launched “Kaaval AI-Automatic Traffic Violation Detection System,” on a pilot basis at the roundabout near the district Collectorate, which falls under Nagercoil subdivision.
https://t.co/VxxYJ2UUcN
In just 100 days, we’ve burned through a reported $100 BILLION on Trump’s reckless war of choice with Iran. With that money, we could cancel more than half the medical debt in the U.S.
Trump has plenty of $ for defense contractors. Nothing to make healthcare more affordable.
A federal judge has voided President Donald Trump’s requirement of a $100,000 application fee for H-1B visas, ruling that he lacked authority to impose the new policy for a program used by companies to hire highly skilled foreign workers in specialized fields. https://t.co/P7mG2iCGkP
Asked for actual evidence of his claims, Trump throws a tantrum and runs away.
Notice—he never offered a shred or scintilla of evidence.
He just yelled at her and ran away.
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : 7 जून 2026
आए दिन पेट्रोलियम के बदलते-बढ़ते रेट
बाजार को बुरी तरह अस्थिर कर रहे!
-सुनील कुमार
पिछले कुछ दिनों में भारत में कई बार डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ गए, और कई बार रसोई गैस या कमर्शियल गैस के। इसके पहले कि राज्य सरकारें बसों का भाड़ा तय कर सकें, ऑटोरिक्शा का भाड़ा तय कर सकें, ईंधन के दाम एक बार फिर बढ़ जाते हैं। ऐसे में बस चलाने वाले कारोबारी सरकार का इंतजार किए बिना अपनी मर्जी से ही जितना चाहे उतना किराया बढ़ा दे रहे हैं। और माल परिवहन करने वाले ट्रकों सरीखे कारोबार पर तो पहले से ही कोई सरकारी काबू था नहीं। अब हालत यह होती है कि ट्रांसपोर्ट के कारोबार में ईंधन खर्च एक हिस्सा रहता है, पूरा का पूरा कारोबार सिर्फ ईंधन के खर्च पर टिका नहीं रहता। लेकिन जब दो फीसदी या चार फीसदी रेट पेट्रोल-डीजल का बढ़ जाता है, तो कारोबारी भाड़े को भी कम से कम उतना फीसदी तो बढ़ा ही देते हैं, और कई बार तो उससे कई गुना अधिक भी बढ़ा देते हैं। इसका कोई तर्क नहीं होता क्योंकि बस-ट्रक कारोबार में ईंधन के अलावा भी कई और चीजों का खर्च रहता है, और उन सबका भाव तो ईंधन जितना बढ़ा नहीं है। जहां पर सरकार की मर्जी रहती है, वहां पेट्रोलियम जैसी चीजों का दाम रातों-रात कितना भी बढ़ा दिया जाता है। इस देश में पेट्रोलियम के दाम तय करने का एकाधिकार सरकार, या पेट्रोलियम कंपनियों का है। ऐसे में जब हर कुछ दिनों में दाम बढ़ते हैं, तो बाजार अपने को उस रफ्तार से बदल नहीं पाता। नतीजा यह होता है कि दो सौ रूपए की बस टिकट 210 की हो जानी थी, लेकिन वह 240 कर दी जाती है।
इस देश में केन्द्र सरकार में पिछले एक दशक से अधिक से अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ते में तेल पाया है। अर्थशास्त्रियों का अंदाज है कि जब तेल सरकार को पानी के भाव मिल रहा था, तब भी सरकार ने जनता को पेट्रोल-डीजल सस्ता नहीं दिया, गैस-सिलेंडर महंगा ही बनाए रखा। इसलिए उस पूरे दौर में जो लाखों करोड़, या दसियों लाख करोड़ की कमाई सरकार को हुई है, उससे सरकार के पास बचत का एक खजाना तो बना ही है। आज पहले रूस-यूक्रेन की जंग, और फिर ईरान पर अमरीकी-इजराइली हमलों को देखें, तो कुछ चीजें भारत सरकार की पहुंच से परे की हो सकती हैं, लेकिन यह बात कहीं से भी गले नहीं उतरतीं कि सरकार हर कुछ दिनों में अपनी मर्जी से रेट बढ़ाती चले। बाजार व्यवस्था को कच्चे माल के दाम का एक भरोसा लगता है। भारत में डीजल-पेट्रोल, और गैस के भाव तीन-तीन महीने में न सही, कम से कम एक महीने तक तो नहीं ही बढऩे चाहिए। अब मान लें कि सरकार यह तय कर ले कि हर महीने की एक तारीख को उस पूरे महीने के लिए पेट्रोलियम के दाम घोषित कर दिए जाएंगे, तो जो लोग बाजार में इसे कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करते हैं, कारोबारी इस्तेमाल करते हैं, वे कम से कम एक महीने के लिए तो निश्चिंत हो सकेंगे, और यह तय कर सकेंगे कि जून में समोसा कितने का बेचना है, बसों की टिकट इस महीने कितनी होगी, और जहां कहीं ऑटोरिक्शा मीटर से चलते हैं, वहां तय हो जाए कि प्रति किलोमीटर का भाड़ा इस महीने कितना होगा।
हम जो सुझा रहे हैं, उसमें सरकार को न किसी तरह की दिक्कत होगी, न ही सरकारी खजाने को किसी तरह का नुकसान होगा। पेट्रोलियम से होने वाली कमाई की तिजोरी खासी बड़ी रहती है, किसी महीने अगर सरकार को खरीदी में तेल कुछ महंगा मिला, तो उसकी भरपाई सरकार अगले महीने भाव बढ़ाकर भी कर सकती है। आज सडक़ किनारे कहीं पर कुछ खाएं-पिएं, तो उसके दाम कब कितने बढ़ जाते हैं, उसका ठिकाना नहीं रहता। ठेले-खोमचे वालों का तर्क रहता है कि गैस कब कितनी महंगी हो गई, उन्हें पता ही नहीं रहता, और उन्हें लागत निकालने के लिए रेट बढ़ाना पड़ता है। यही पेट्रोलियम रेट अगर तीन-तीन महीने में एक बार तय हो, तो सरकार पिछले तीन महीनों के अपने नफा-नुकसान को देखकर अगले तीन महीनों का रेट तय कर सकती है, क्योंकि यह कोई मौसमी सामान तो है नहीं, घर और बाजार दोनों की इसकी बारहमासी जरूरत रहती है, और सरकार बड़ी आसानी से पिछले तीन महीनों का अपना खाता देखकर एक बार अगले तीन महीनों के रेट तय कर सकती है।
अपने ही देश की जनता, और उस जनता से जुड़े हुए कारोबार को लेकर सरकार का एकाधिकारी रूख जब सनकी या मनमानी होने लगता है, तो जनता में एक अनिश्चितता छा जाती है। मानो यह कोई सरकारी कारोबार नहीं है, बल्कि सरकारी मिजाज है जो कि ट्रम्प के मिजाज की तरह कभी भी ऊपर-नीचे आता-जाता है। आम जनता तो अपने घर का, काम या पढ़ाई पर आवाजाही का, बजट बनाने की जरूरत रहती है। बाजार पेट्रोलियम या ऐसे दूसरे सामानों का रेट देखकर अपने सामानों की लागत निकालता है, और बिक्री का रेट तय करता है। यह सिलसिला हर दो-चार दिन में बदलने वाले रेट की वजह से ठीक से चल ही नहीं पाता। जिस तरह देश या प्रदेशों में टैक्स साल में एक बार, बजट में घोषित किया जाता है, और फिर वह अगले वित्तीय वर्ष में बारह महीने लागू होता है, तो उससे लोग अपना आगे का हिसाब-किताब लगा पाते हैं।
सरकार की यह जिम्मेदारी रहती है कि वह जनता की सहूलियत की बात करे, अपना रूख जनकल्याणकारी रखे। सरकार को मनमानी करने का अधिकार तो है, लेकिन मनमानी करने वाली सरकार जनकल्याणकारी नहीं मानी जाती। अभी एक दूसरे मोर्चे पर सरकार एक ठीक काम करने जा रही है कि खाना पकाने के तेल की पैकिंग का आकार सरकार तय कर रही है। आज हर कंपनी अलग-अलग कई तरह के नाप और वजन वाली पैकिंग में तेल बेच रही हैं। ग्राहकों को दो ब्रांड के बीच तुलना करने में मुश्किल रहती है, क्योंकि किसी एक में 8 सौ एमएल तेल है, तो दूसरे में 910 एमएल। सरकार ने पिछले दिनों सामानों की पैकिंग पर यह लिखवाना भी शुरू किया है कि पैकेट या बोतल जितने भी ग्राम की हो, उसके भीतर के सामान का प्रति ग्राम दाम कितना बढ़ रहा है। लेकिन यह तुलना भी किसी दुकान या बाजार में खड़े रहकर आसान नहीं रहती। इसलिए सरकार अब तेल से यह काम शुरू कर रही है कि उसकी पैकिंग का साइज सरकार तय करेगी। यह ग्राहकों की सहूलियत का काम है, और सरकार को बाकी सामानों के लिए भी ऐसे आकार तय करने चाहिए। आखिर ईयू ने योरप के देशों में बिकने वाले सारे मोबाइल फोन के लिए एक सरीखा चार्जर तय किया है, और वह लागू भी हो गया। अब योरप के किसी भी देश में मोबाइल बेचने वाली कंपनी को ऐसे ही मॉडल बनाने होंगे जिनकी बैटरी लोग बाजार से खरीदकर बदल सकें। ऐसी कई और शर्तें कारोबारियों पर लागू की गई हैं। भारत में जो कि पेट्रोलियम की सबसे बड़ी कारोबारी सरकार खुद है, उसे तीन महीने में एक बार रेट कम-ज्यादा करने का नियम बनाना चाहिए, एक तय तारीख को अगले तीन महीने का रेट घोषित हो जाए, ताकि लोग कुछ तो हिसाब-किताब तय कर सकें। महंगाई से परेशान जनता और बाजार इन दोनों के ऊपर अस्थिरता जले पर नमक की तरह साबित हो रही है, सरकार कम से कम नमक छिडक़ने से तो बच सकती है।
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का ‘आजकल’ : 7 जून 2026
भारत के बेहतर प्रदेशों में नए जन्म, योरप के देशों जितने कम हो चुके हैं!
-सुनील कुमार
दुनिया के सबसे चर्चित कारोबारी, और अब शेयर बाजार में पूंजी जुटाने के लिए दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ लेकर आ रहे एलन मस्क ने कल भारत के बारे में एक ट्वीट किया है। अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने एक अमरीकी समाचार स्रोत की पोस्ट दुबारा डाली है जिसमें भारत की आबादी की घटती हुई बढ़ोत्तरी दिख रही है। उन्होंने अपनी तरफ से लिखा है कि कुछ लोगों को आज लग रहा है कि भारत की जन्मदर रिप्लेसमेंट रेट से नीचे आ गई है। लेकिन जानकार जानते हैं कि यह तो कई बरस पहले ही हो चुका था।
एलन मस्क से परे, भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक ताजा आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली राज्य, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और आंध्रप्रदेश ये प्रति महिला बच्चों के मामले में फिनलैंड और नॉर्वे तक पहुंच चुके हैं। तेलंगाना भी नॉर्वे के करीब है। दूसरी तरफ राजस्थान, उत्तरप्रदेश, और बिहार में प्रति महिला बच्चों की संख्या बांग्लादेश से भी अधिक है। पूरे भारत में यह आंकड़ा पिछले एक दशक में ही 2.3 से घटकर 1.9 हो चुका है। जनसंख्या-शब्दकोष की भाषा में कहें, तो भारत में अब आबादी उतनी ही बनी रहने लायक नए जन्म नहीं हो रहे हैं। मौजूदा आबादी की वजह से अभी कुछ अरसा जनसंख्या बढ़ती दिखेगी, लेकिन दुनिया में आबादी को स्थिर करने के लिए प्रति महिला 2.1 बच्चों का जन्म जरूरी होता है, और भारत उसके नीचे आ चुका है।
2019 के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनसंख्या विस्फोट की चर्चा की थी, उस वक्त भी कई जनसंख्या-विशेषज्ञों ने कहा था कि भारत जनसंख्या-विस्फोट के दौर से निकल चुका है, अब यह बात प्रासंगिक नहीं रह गई है। फिर भी प्रधानमंत्री ने वह बात एक ऐतिहासिक मौके पर कही थी, इसलिए जनसंख्या के संदर्भ में हम उसे कम महत्वपूर्ण नहीं आंकते। उसका विश्लेषण करने और तथ्य ढूंढने पर पता लगता है कि 1990 के दशक में भारत का टीएफआर (टोटल फर्टिलिटी रेश्यो) यानी प्रति महिला पैदा होने वाले बच्चे, यह आंकड़ा करीब 4 था। पन्द्रह बरसों के भीतर, 2005-06 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-3 के मुताबिक यह 2.7 तक पहुंच गया था। इसके दस बरस बाद के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 के मुताबिक यह लगभग 2.2 हो गया था। 2019 में जब यह भाषण हुआ, तब भारत आबादी स्थिरीकरण के स्तर, 2.1, के बहुत करीब पहुंच गया था। इस भाषण के बाद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 (2019-21) में टीएफआर 2.0 दर्ज हुआ। मतलब यह कि जिस वक्त प्रधानमंत्री इसे विस्फोट पा रहे थे, उस दिन वह स्थिरीकरण से कम आबादी-बढ़ोत्तरी दर हो चुकी थी। उसी समय जनसंख्या विशेषज्ञ यह हिसाब लगा रहे थे कि अगले किस सर्वे में, कितने दिनों में, बच्चों का जन्म आबादी स्थिरीकरण से कम हो जाएगा। और अगले ही बरस के सर्वे में यह हो चुका था।
कुल मिलाकर मतलब यह कि आबादी के बढ़ते हुए आंकड़े हमेशा ही भविष्य की बढ़ती हुई आबादी का संकेत नहीं रहते। कुछ बरस या कुछ दशक बाद जाकर यह आबादी गिरने वाली भी हो सकती है। अब जैसे भारत के राज्यों को अलग-अलग करके देखें, तो जनसंख्या स्थिर रखने के लिए जरूरी, प्रति महिला 2.1 बच्चों से भारत नीचे आ चुका है, अब देश में प्रति महिला कुल 1.9 बच्चे पैदा हो रहे हैं। दिल्ली में तो एक महिला के 1.2 बच्चे ही हो रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ दूसरे राज्यों को भी देखने की जरूरत है। भारत का दक्षिणी हिस्सा योरप के करीब पहुंच चुका है, केरल, और तमिलनाडु में यह आंकड़ा 1.3 तक आ गया है, तेलंगाना में 1.5 है, पश्चिम बंगाल और आंध्र में भी यह आबादी स्थिर रखने की जरूरत से खासा नीचे आ चुका है। दूसरी तरफ इस देश में आबादी का संतुलन राजस्थान (2.3), यूपी (2.6), और बिहार (2.9), (बच्चे प्रति महिला) की वजह से राष्ट्रीय औसत 1.9 बना हुआ है।
अब हमने यह समझने की कोशिश की कि जिन राज्यों में आबादी-बढ़ोत्तरी गिरती जा रही है, उन राज्यों में तो प्रति व्यक्ति आय अधिक दिख रही है, जैसे दिल्ली, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, आंध्र। दूसरी तरफ आबादी बढ़ाने के लिए बदनाम तीन राज्यों, बिहार, यूपी, और राजस्थान में औसत आय दक्षिण के इन राज्यों और दिल्ली के मुकाबले बहुत कम है। क्या इसका एक मतलब यह निकाला जाए कि भारत में आबादी अभी जो कायम बने रहने के आसार हैं, वे आसार गरीब पैदा करने वाले राज्यों की मेहरबानी से हैं? क्या पैदा होने वाली बहुतायत गरीब राज्यों की गरीब आबादी रहेगी, और उससे देश को कुछ हासिल नहीं हो सकेगा?
प्रधानमंत्री ने जिसे जनसंख्या विस्फोट कहा था, वह बात जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से तो सही नहीं थी, लेकिन हम उस बात का एक दूसरा आर्थिक-सामाजिक विस्तार करके जब देखते हैं तो लगता है कि यह आबादी के आंकड़ों का विस्फोट चाहे न हो, यह देश के भीतर गरीब आबादी में एक विस्फोट जरूर है क्योंकि यूपी-बिहार, और राजस्थान प्रति व्यक्ति आय में एकदम नीचे हैं, और जिस प्रदेश में भी आबादी बढ़ती है, वहां पर गरीब तबके के भीतर बच्चे अधिक बढ़ते हैं। कुल मिलाकर बात यह कि दक्षिण भारत के राज्यों से पढ़े-लिखे और हुनरमंद लोग दूसरे देशों को अधिक जाएंगे, और भारत के भी दूसरे प्रदेशों में बेहतर कमाई वाले कामकाज के लिए जाएंगे। दूसरी तरफ यूपी-बिहार, राजस्थान से गरीब मजदूर देश के भीतर ही दूसरे प्रदेशों में अधिक जाएंगे, जहां पर उनकी खुद की आबादी बढऩा रूक जाएगी, और फिर धीरे-धीरे घटती भी जाएगी।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम अपने संपादकीय, और इस साप्ताहिक कॉलम में बार-बार यह लिखते हैं कि किसी भी देश में वहां की आबादी बोझ नहीं हो सकती, अगर सरकार इतनी कल्पनाशील हो कि वह आबादी को काम के लायक बनाएं। वही आबादी देश पर बोझ रहती है जिसे सरकारें काम नहीं दे पातीं। देश मेें आबादी के अलग-अलग आयु वर्ग के आंकड़ों को लेकर भारत को बड़ा गर्व रहता है कि उसके पास नौजवान वर्क फोर्स का अनुपात सबसे अधिक है। अब सवाल यह उठता है कि यह वर्क फोर्स किस तरह का काम करने के लायक है?
जब हमने चीन में नौजवान कामगार तैयार करने की वहां की सरकार की नीति और रणनीति को देखा, तो यह साफ दिखता है कि भारत को उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। भारत में जरूरत मशीन चलाने वालों की, कारीगरों की लाखों की संख्या में हैं। दूसरी तरफ इस देश में दसियों लाख डिग्रीधारी लोग बेरोजगार भटक रहे हैं, और उनकी बकाया जिंदगी भी उनके लिए कोई काम नहीं रहेगा। भारत में आईटीआई जैसे तकनीकी प्रशिक्षण संस्थानों को दूसरे दर्जे का माना जाता है, न मां-बाप बच्चों को वहां भेजना चाहते, न बच्चे कारीगर और हुनरमंद मैकेनिक बनना चाहते। भारत इतने इंजीनियर उगल चुका है, कि जिनके लायक काम अगले कई बरस पैदा नहीं होगा। दूसरी तरफ चीन में तकनीशियन बनाए जा रहे हैं, और वहां ट्रेनिंग स्कूलों का बड़ा सीधा रिश्ता कारखानों से जुड़ा रहता है। जो कारखाने आने वाले हैं, उनके लिए हुनरमंद कामगार तैयार करना पहले से शुरू हो जा रहा है। भारत में शिक्षा विभाग, और उद्योग विभाग के बारे में एक एआई ने कहा कि वे अलग-अलग ग्रहों पर बसते हैं।
इन सब बातों को देखें, तो यह समझ पड़ता है कि भारत किसी तरह की जनसंख्या विस्फोट का शिकार नहीं है, लेकिन सबसे गरीब प्रदेशों में बढ़ती हुई गरीब आबादी उन प्रदेशों के लिए, और बाकी देश के लिए भी एक बड़ी आर्थिक चुनौती है। राष्ट्रीय स्तर पर आबादी आज भी एक बिल्कुल ही उल्टी फिक्र का सामान बन गई है कि अगर यह आंकड़ा 1.9 से और नीचे जाएगा, तो कुछ दशकों में भारत की आबादी गिरती चली जाएगी। और वह नौबत आने के पहले भी जिस नौजवान आबादी पर भारत गर्व करता है, आबादी का वह आयु वर्ग अगर बेहतर तैयारी नहीं कर पाएगा, तो वह देश के भीतर ही मजदूरी के कामों के लिए एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश भटकते रहेगा। यह देश जनसंख्या विस्फोट का शिकार नहीं है, यह देश आबादी के बेहुनर, और अनुत्पादक होने के विस्फोट का शिकार है, और इसके लिए जनता नहीं, सरकार जिम्मेदार और जवाबदेह है।