Birthday wishes to Union Minister Shri Dharmendra Pradhan Ji. He is making commendable efforts towards the implementation of the National Education Policy, which seeks to make India a hub for knowledge, learning and innovation. Praying for his long and healthy life.
@dpradhanbjp
The era of rubber stamp CMs is breaking state governance. Appointing weak, low-profile yes-men, political high commands ensure total control. Knowing their tenure is short and fragile, these state heads quickly abuse power and maximize local corruption before they are replaced!
In any other country (even 3rd world like us, forget a country claiming to be a Vishwaguru), even a single such incident in a year would have caused massive uproar.
But for us, it’s probably 50th case in this year of being killed by the all-pervasive corruption-nexus of govt, IAS, and business.
Nothing will change and next time it would you be you or me or our families perishing in this hellhole created by cruel systems.
हर्षद मेहता सीरीज़ में एक डायलॉग है कि जब किसी का काम खराब नहीं कर सकते तो उसका नाम खराब कर दो। दुर्भाग्य से नेहरू इस देश की सबसे मिसअंडरस्टुड शख्सियत हैं, इतने कि कुछ लोग शास्त्री जी से भी उनकी तुलना करके शास्त्री जी को महान बताने का प्रयास करते हैं। पता नहीं, शास्त्री जी ये सब देखते तो ऐसे लोगों को क्या कहते।
जब तक नेहरू जीवित थे, न तो विपक्ष में किसी का क़द उनके सामने राजनीति करने लायक़ था, और न ही कांग्रेस में कोई उनके खिलाफ जाने की हैसियत रखता था।
तब घोर रूढ़िवादी कांग्रेसी उन्हें कट्टर कम्युनिस्ट कहते थे, मुस्लिम लीगी उन्हें कट्टर हिंदुवादी कहते थे, सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट उन्हें पूँजीपतियों का एजेंट कहते थे। महासभाई और संघी उन्हें मुस्लिम तुष्टिकर्ता कहते थे।
यह महासभाइयों का फैलाया हुआ झूठ ही है कि नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और केवल दुर्घटनावश हिन्दू हूँ, जो आज सच की तरह बिकता है।
नेहरू दुनिया के उन दुर्लभतम पिता-पुत्र द्वय में से एक हैं, जिन्होंने जब अपने महान पिता की पगड़ी अपने सिर पर बांधी तो उनके पिता की पहचान फुटनोट्स में समा गई। यह पंडित मोतीलाल नेहरू ही थे जिन्होंने लॉर्ड बिर्किनहेड की इस चुनौती का कि इंडियन इतने मैच्योर नहीं हैं कि स्वयं अपने शासन के लिए संविधान लिख सकें, प्रत्युत्तर नेहरू रिपोर्ट लिखकर दिया था, जिसे भारत का पहला लिखित संविधान माना जाता है। इसी रिपोर्ट में पहली बार भारत को एक आज़ाद देश के रूप में देखने की अवधारणा दी गई थी।
नेहरू शौक से कम्युनिस्ट नहीं थे, उस वक्त तीसरी दुनिया ही पूरी तरह से कम्युनिज़्म की चपेट में थी। यूरोप की तरह यहाँ दुनिया भर से लूटकर लाई गई संपदा नहीं थी और इन्हीं यूरोपियन्स से आबाद हुए अमेरिका जैसे विभिन्न पूंजी के स्रोत भी नहीं थे।
इनमें से ज़्यादातर देशों में पारंपरिक सामंती व्यवस्था थी। पूंजी के एकमात्र स्रोत भूमि पर असमान स्वामित्व था। भारत भी इससे अछूता नहीं था। कम्युनिज़्म जहाँ भी फैला, उसके लिए सबसे उर्वर भूमि यहाँ भी थी। बड़े संख्या में जमींदार थे , जो कि विभिन्न व्यवस्थाओं के दें थे। देशभर में बड़े ज़मींदारों से लेकर छोटी जोत के किसान भी स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेसी थे। कई जगहों पर ज़मींदारों ने स्वतंत्रता के लिए अपना सबकुछ लुटा दिया था। वे कांग्रेस से लेकर क्रांतिकारी संगठनों तक की फंडिंग करते थे। इनके योगदान को भुलाकर नेहरू इन्हें कम्युनिस्टों के हवाले नहीं छोड़ सकते थे, जो कल्चरल रेवोल्यूशन के नाम पर सबको मरवा दें और फिर बाद में जिनसे मरवाएँ उन्हें भी भूखे मरने के लिए छोड़ दें, जैसे माओ ने छोड़ दिया था।
नेहरू ने अपनी सूझबूझ से पहले तो कम्युनिस्टों को लोकतंत्र स्वीकारने पर मजबूर किया, फिर उनके सशस्त्र विद्रोह के ख्वाबों के एक-एक करके पर कुतरे। फिर उनकी जायज नीतिओं को स्वीकारा , भूमि सुधार लागू किया। पूंजी के नए स्रोतों का सृजन किया।
@MrDemocratic_ बीजेपी ज्वॉइन करने की अटकलों पर जो स्पष्ट 'मना' करने की जगह पत्रकारों से ये कहे कि 'मैं जो भी फैसला लूंगा सबसे पहले आपको बताऊंगा' और अटकलों को जिंदा रखे और फिर उसके बाद राज्यसभा सीट की अपेक्षा करे तो वो नेता और उसके अनुयायी दोनों मूर्ख है!
भाई ने प्रथम एटेम्पट में ही इनश्योर कर दिया है कि यूरेशिया में फ़िल्म इंडस्ट्री नहीं होगी। अगर होगी भी तो उसमें UP के कान्यकुब्ज़ों की एंट्री नहीं होगी।
@kuldeepmishra@Roshanjnu चलो मान लिया TMC के खिलाफ लोगो ने वोट किया, अब आप ये बता दीजिए कि इलेक्शन कमीशन, केंद्रीय बलों और बाकी के संसाधनों ने लड़ाई बराबर होने दी या नहीं!!!
I feel no sympathy for the students getting lathi-charged by the police in Patna for demanding jobs.
They all are above 18, Every year, they protest against the government, face lathi charges, and still end up voting for the BJP.
Their parents, meanwhile, continue supporting the BJP because of cash-benefit schemes and Ladli Behna-style welfare programs.
They voted for this government, they should wholeheartedly accept whatever government gives them.