Captain Smit Machchhar is a HERO.
In the face of the gravest danger and despite being seriously injured, he showed immense courage and an unwavering resolve to protect the lives of others.
His valour helped save hundreds of lives and avert a great tragedy.
India is proud of Captain Machchhar.
Praying for his speedy recovery, renewed strength and good health.
@awasthis पत्रकार जी 100 योग्य वोटर भी ढूँढकर लाईये।AC से निकलकर स्टोरी भी कीजिये। जो कहें कि मेरा वोट नहीं बना।विनम्रतापूर्वक यह भी स्वीकार करिये।
और हाँ, स्टोरी सीधी सीधी कीजियेगा। ट्विस्ट मत कीजिएगा।
हिन्दू उत्तर प्रदेश मे 9 साल से,देश मे 12साल से मजे मे है।मजे में पड़े पड़ें शरीर दुखने लगा है।
अब मजे में रहना बर्दाश्त नहीं हो रहा।या तो थोड़ी सिकाई हो जाये।
पैरों में भी बहुत दर्द हो रहा है। कोई कुल्हाड़ी मिल जाए।
🌺बर्बादी माता की जय🌺
Chinmoy Prabhu cannot carry the weight of this pain alone.
The entire Sanatani Hindu community around the world must share this pain, this suffering, and these tears. No one can silence this cry in the name of secularism.
बांग्लादेश से ये दिल चीर देने वाली तस्वीरे है, रेफरेंस सबको पता है:
ये देश मात्र 80 साल पहले हिंदू बाहुल्य था, बंटवारे के बाद भी बहुत लोगो ने हिंदुओं से बँटकर भाईचारा निभाने की ज़िद्द की।
आज हिंदू विहीन होने के कगार पर है- इसीलिए सटीकता से कहा कि
“बटोगे तो काटोगे”
Whether the hijab is essential to Islam or not is for religious scholars to decide.
From a socio-political standpoint, we stand firmly for women’s bodily autonomy and agency.
Every woman, irrespective of caste, class or religion, is entitled to wear what she chooses — hijab, ghoonghat or anything else.
#BreakTheCage #SmashThePatriarchy
25 अगस्त/बलिदान-दिवस
आजाद हिन्द फौज के सेनानी मेजर दुर्गामल्ल
मेजर दुर्गामल्ल का जन्म डोइवाला (देहरादून) में एक जुलाई, 1913 को गोरखा राइफल्स में नायब सूबेदार गंगाराम एवं पार्वती देवी मल्ल के घर में हुआ था। यहां भारतीय सेना से अवकाश प्राप्त नेपाली मूल के गोरखा लोग बड़ी संख्या में बसे हैं। आज भी गोरखाली युवाओं की प्राथमिकता सेना ही होती है। एक बार फील्ड मार्शल मानेकशाॅ ने कहा था कि यदि कोई कहे कि मैं मौत से नहीं डरता, तो या तो वो झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है।
दुर्गामल्ल की पढ़ाई गोरखा मिडिल स्कूल में हुई। वे खेलकूद तथा पढ़ाई दोनों में ही आगे रहते थे। कविता तथा नाटक में भी उनकी रुचि थी। वे कविता लिखते भी थे। कक्षा दस में पढ़ते समय स्वाधीनता सेनानी खड़क बहादुर सिंह बिष्ट और रामसिंह ठाकुर से प्रेरित होकर उन्होंने मित्रों के साथ जुलूस निकाला। वे गोरखा पल्टन की दीवारों पर छिपकर पोस्टर भी लगाने लगे। इस पर पुलिस छात्रों को पकड़ने लगी। यह देखकर दुर्गामल्ल के पिता उसे अपने भाई केदार मल्ल के घर ग्राम माग्सू, जिला कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में छोड़ आये।
पर दुर्गामल्ल तो फौज में जाना चाहते थे। अतः 1931 में वे धर्मशाला छावनी में जाकर गोरखा राइफल्स में भरती हो गये। 1941 में उनका विवाह शारदादेवी से हुआ। विवाह के बाद दुर्गामल्ल अपने घर डोइवाला आये ही थे कि मुख्यालय से बुलावा आ गया। उनके विवाह को केवल नौ दिन ही हुए थे; पर दुर्गामल्ल सैन्य अनुशासन का पालन करते हुए तुरंत चल दिये।
उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध का दूसरा चरण चल रहा था। दुर्गामल्ल को सिंगापुर और फिर मलाया भेज दिया गया। वहां जापान से लड़ते हुए वे और उनके सैकड़ों साथी बंदी बना लिये गये। उन्हीं दिनों आजाद हिन्द फौज का गठन हुआ था। सुभाष चंद्र बोस जापान का सहयोग लेकर भारत से अंग्रेजों को निकालना चाहते थे। अतः उनसे सहानुभूति रखने वाले सैनिकों को जापान ने मुक्त कर आजाद हिन्द फौज में भेज दिया।
दुर्गामल्ल की योग्यता देखकर उन्हें मेजर पद तथा गुप्तचर विभाग में काम दिया गया। वे गुप्त सूचनाएं रंगून मुख्यालय में भेजते थे। आजाद हिन्द फौज आगे बढ़ रही थी; पर युद्ध में जीत के साथ हार भी लगी ही रहती है। 27 मार्च, 1944 को माशीपुर अखरूल (कोहिमा) में ब्रिटिश सेना ने उन्हें पकड़ लिया और युद्धबंदी के रूप में दिल्ली के लालकिले में बंद कर दिया।
यहां सैन्य न्यायालय में मेजर दुर्गामल्ल का कोर्ट मार्शल हुआ। गोरखा राइफल्स के सैनिक होते हुए भी वे आजाद हिन्द फौज में शामिल होकर ब्रिटिश फौज से ही लड़े थे। अतः उन पर धारा 121 के अन्तर्गत मुकदमा चलाया गया। उन पर कई बार क्षमा मांगने के लिए दबाव डाला गया; पर उन्होंने झुकना नहीं सीखा था। ऐसे व्यक्ति के लिए ब्रिटिश कानून में मृत्युदंड ही लिखा था।
यह सुनते ही दुर्गामल्ल के घर में हाहाकार मच गया। उनकी पत्नी और परिजनों को अंतिम भेंट के लिए दिल्ली लाया गया। पत्नी उन्हें देखकर बेहोश हो गयी; पर दुर्गामल्ल ने उन्हें संभाला और साहस दिया। अंग्रेज सोचते थे कि युवा पत्नी उन्हें माफी के लिए तैयार कर लेगी; पर दुर्गामल्ल के तकिये के पास ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ रखी थी। इससे स्पष्ट होता था कि वे मृत्यु के लिए तैयार थे। 25 अगस्त, 1944 को उन्हें दिल्ली के केन्द्रीय कारागार में फांसी दी गयी। वे यह गौरव पाने वाले आजाद हिन्द फौज के पहले गोरखा सेनानी थे।
यहां पति के साथ केवल नौ दिन बिताने वाली शारदादेवी का त्याग भी अनुकरणीय है। वे इंटरमीडियेट तक पढ़ी थीं। उन्होंने पुनर्विवाह न करते हुए स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर जीवन भर बच्चों को पढ़ाती रहीं। मेजर दुर्गामल्ल की स्मृति में डोइवाला में एक डिग्री काॅलिज बनाया गया है तथा उन पर पांच रु. का डाक टिकट भी जारी किया गया है।
(विकी तथा उत्तराखंड स्वराज/239, डा.एस.के कुडि़याल तथा जसप्रीत कौर)
#MajorDurgaMalla
#मेजर_दुर्गा_मल्ला
#AzadHindFauj #INA #NetajiSubhashChandraBose #IndianHistory #FreedomFighter
कौन हैं मदन दिलावर?
राजस्थान के शिक्षा मंत्री और छह बार के विधायक।
वे खटीक समुदाय (SC) से आते हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया जानकारी के अनुसार -
▪️ 1990 में कश्मीर में हुए हिंदुओं के नरसंहार के बाद उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक अनुच्छेद 370 नहीं हटेगा, तब तक वे बिस्तर पर नहीं सोएंगे।
▪️ 1990 में ही उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक अयोध्या में राम मंदिर नहीं बन जाता, तब तक किसी भी मौके पर माला स्वीकार नहीं करेंगे।
▪️ 2024 में उन्होंने एक और संकल्प लिया कि जब तक मथुरा में कृष्ण मंदिर नहीं बन जाता, तब तक वे दिन में सिर्फ एक बार खाना खाएंगे।
▪️ राजस्थान की इतिहास की किताबों में मुगलों के महिमामंडन की जगह महाराणा प्रताप के इतिहास पर ज्यादा जोर दिया।
▪️ स्कूलों के पाठ्यक्रम में गौ सेवा को शामिल किया।
▪️ राजस्थान के सरकारी और निजी स्कूलों की सुबह की प्रार्थना सभा में रोजाना सूर्य नमस्कार और वंदे मातरम् का पाठ अनिवार्य कराया।
▪️ स्कूल के समय शिक्षकों के स्मार्टफोन इस्तेमाल करने पर रोक लगाई।
▪️ छात्रों की शिकायत सीधे शिक्षा विभाग तक पहुंचाने की व्यवस्था शुरू की।
▪️ राजस्थान के सभी स्कूलों के कायाकल्प के लिए ₹12,000 करोड़ मंजूर किए। (सरकार का दावा)
▪️ स्कूलों में जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए कदम उठाए।
▪️ राजस्थान के स्कूलों में बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाया, जिसे विश्व रिकॉर्ड से जोड़ा गया।
▪️ राजस्थान के सरकारी स्कूलों की राष्ट्रीय प्रदर्शन रैंकिंग 13वें से तीसरे स्थान तक पहुंचने का दावा किया गया और 12 लाख से ज्यादा नए छात्रों के दाखिले का श्रेय भी उन्हें दिया गया। (सरकार का दावा)
▪️ स्कूलों में सुरक्षा को लेकर सख्त नियम लागू किए।
अब CJP ने उनके इस्तीफे की मांग की है।
सवाल है—क्या मदन दिलावर को इस्तीफा दे देना चाहिए?
क्या उनके कार्यों के चलते वे वामपंथियों के निशाने पर हैं?
दिव्या मिश्रा ह’ त्याकांड में बड़ा खुलासा :
मानस वाजपेई अपनी पत्नी दिव्या मिश्रा के साथ रहना चाहता था, लेकिन दिव्या नहीं तैयार थी |
यह खुलासा मानस के घर से बरामद पारिवारिक न्यायालय के दस्तावेजों के आधार पर हुआ |
दिव्या मिश्रा न्यायालय में वाद दायर कर 1 करोड़ रुपये हर्जाने व खर्च के लिए मांग किया साथ ही स्त्रीधन वापसी का भी वाद किया था |
• दिव्या मिश्रा अपने पति मानस वाजपेई कि मानसिक बिमार बहन के साथ नहीं रहना चाहती थी,
• अन्य वजह स्पष्ट नहीं है, क्यु तलाक ही चाहती थी, मानस के साथ नहीं रहना चाहती थी..
मानस वाजपेई :
मानस वाजपेई अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था, उसके माता-पिता का निधन पहले ही हो चुका था |
इस स्थिति में मानस कि इकलौती मानसिक बिमार बहन कि दवा व देख रेख सब भाई के कंधों पर ही था,
अब मानस कि पत्नी दिव्या मिश्रा, मानस कि बहन के साथ नहीं रहना चाहती थी...😐
अब मानस क्या करें ?
माता - पिता के निधन के बाद मानस ही अपनी बहन का सहारा था, आखिर अपनी बहन को कहां और किसके भरोसे छोड़े....?
मानस अपनी बहन कि जिम्मेदारियों से नहीं भागा, बल्कि बहन के राखी कि लाज रखा और बहन के साथ ही रहने का निर्णय लिया...
आपकी नजर में क्या मानस ने गलत किया ..?
क्या बीबी के लिए मानसिक बिमारी बहन को दर दर कि धक्के खाने के लिए छोड़ देता...?
खैर, पड़ोसियों कि जानकारी दिए जानकारी अनुसार मानस कि बहन पहले ठीक थी....
मानस वाजपेई कि शादी के 10 वर्ष हो गये,
5-6 वर्षों से शादी के बाद कलह शुरु हुआ...विवाद काफी बढ़ गया....
इन्हीं सब कलह व पारिवारिक विवाद के बीच मानस कि माता जी को देहा़ंत हो गया, और माता जी के निधन व घर में आपसी कलह के बीच मानस कि बहन का भी मानसिक संतुलन खराब हो गया...😭
इन्हीं सब के बीच मानस वाजपेई भी बिल्कुल टूट गया, और बहन कि दवा व घर कि जिम्मैदरियों में उलझ कर रहा गया ।
इन सबके बीच 1.5 करोड़ रुपये कहां से दिव्या मिश्रा को देता...?
खैर, इस समाज में हमेशा पुरुष ही गलत माने गये है, भले ही पुरूष नीले ड्रम में पैक हो जाए, या पहाड़ीयों पर से धक्के से चले जाएं...
पुरुष कि मजबूरियों को आखिर कौन समझता है,
आज कल आए दिन पत्नी के धोखे, हाई एलुमनी, आशिक या नये चक्कर व फर्जी दहेज उत्पीड़न व ससुराल पक्ष कि मनमानी के कारण कई पुरुष बर्बाद हो रहे हैं, कितने सु’साइड कर लें रहे हैं, और कितनो पत्नी खुद म’ रवा दे रही...
फिर भी दोषी सिर्फ पुरुष ......😐
आपको समाज को हिंदू बनाने की जरूरत नहीं है। आप सिर्फअपने परिवार को हिंदू बनाए, समाज और राष्ट्र अपने आप हिंदू हो जाएगा।
धर्म परिवर्तन या हिंदू धर्म के दुश्मनो के टारगेट आप नहीं है आपके बच्चे हैं।
आपके बच्चे ही आगे चलकर वोटर बनेंगे। वहीं भारत के भविष्य का निर्माण करेंगे। अगर आपके बच्चे सनातन से दूर हो गए तो सनातन धर्म को खत्म होने से कोई नहीं रोक सकता।
1858 में पहली बार राम ने जन्मभूमि के लिए किसी मुसलमान ने याचिका दायर की थी। 160 साल के लंबे मुकदमे बाजी के बाद हिंदुओं को राम जन्म भूमि मिली थी।
जानते हैं क्यों?
क्योंकि हिंदुओं ने अपनी रक्षा की जिम्मेदारी हिंदू विरोधियों को दे दी थी।
हिंदुओं को जितना खतरा बाहरी ताकतों से है उससे ज्यादा खतरा भीतर के गद्दारों से है।
एक धर्म स्थल वापस लेने में भारत के 80% हिंदुओं को 160 साल लगे।
जरा सोचिए ज्ञानवापी और श्री कृष्ण जन्म भूमि को वापस लेने में और कितने साल लगेंगे, अगर इसी तरह से हिंदू बिखरे रहेंगे। हजारों मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। उन्हें लेने में सदियां गुजर जाएगी।
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ या नहीं है कि सारे मंदिर मस्जिद में बदल दिए जाएं, हिंदुओं की संपत्ति मुस्लिम वक्फ बोर्ड को चली जाए, मंदिरों के आसपास मजार बना दिए जाएं, मंदिरों में दीपक जलाने के लिए सरकार और न्यायालय से परमिशन लेनी पड़े। आस्था और परंपरा को चलाने के लिए न्यायालय के शरण में जाना पड़े।
सनातन का भविष्य हमारे नहीं हमारे बच्चों के हाथ में हैm उन्हें हिंदू बनाएं। उन्हें सनातनी बनाएं।
दिमाग़ी नक्सल के बारे में जानना है तो मेरी इस किताब को पढ़िए । सब शीशे की तरह साफ हो जाएगा। हार्ड बाउंड और पेपरबैक दोनों में उपलब्ध है ।
@Vani_Prakashan
अमेजन का लिंक -
https://t.co/0J3ONzrIkr
@ashutosh83B राहुल गांधी की मुग़ल-इस्लाम नीति-
मुसलमानों ने जब भारत पर आक्रमण किया।तब शाम को मुस्लिम आक्रमणकारी गाँव वालो से दुध छीन लेते थे। और अगले दिन सुबह गाँव वालों को दही मांगते थे।नहीं मिलने पर पिटाई करते थे।
राहुल अब संसद के मामले में यही कर रहा है।
राहुल गांधी जी @RahulGandhi यह बर्बरता,हेमंत सोरेन जी @HemantSorenJMM जी मेरी बात लिखकर रख लीजिए यही अधिकारी @mbhajantri आपको दुमका के घर से निकालेगा ।यह धरती बिरसा मुंडा जी की है जब अंग्रेजों से हम नहीं डरे तो लोकतांत्रिक सरकार से कैसा डर ?