Catch sight of the 240-km Yaxi Expressway in southwest China's Sichuan Province. With each kilometer, the expressway ascends 7.5 meters, giving drivers the feeling of "riding in the clouds."
अगर मैं आपसे कहूँ कि उत्तर प्रदेश के किसी विधायक की कल्पना कीजिए, तो शायद आपके मन में सत्ता का वैभव उभरे—लंबा काफ़िला, महँगी गाड़ियाँ, सुरक्षा का घेरा, आलीशान बंगला और जनता की भीड़ से दूर खड़ा एक चमचमाता शख़्स।
मगर राजनीति की इसी भीड़ में एक ऐसा नाम भी था, जिसने इस पूरी तस्वीर को झुठला दिया। पाँच बार विधायक बनने के बाद भी सरकारी बसों में सफ़र करने वाला, वर्षों तक एक साधारण कीपैड वाला फ़ोन इस्तेमाल करने वाला, बिना किसी तामझाम के गाँव-गाँव घूमने वाला, और जहाँ विकास कार्य चल रहा हो वहाँ ख़ुद फ़ीता लेकर उसकी नाप-जोख करने वाला जनप्रतिनिधि। वे थे जनाब आलमबदी आज़मी साहब।
सत्ता उनके लिए सुविधा का नहीं, ज़िम्मेदारी का नाम थी। कई बार वे स्कूटर पर बैठकर ही विधानसभा पहुँच जाते थे। आज़मगढ़ में किसी चाय की साधारण-सी दुकान पर लकड़ी की बेंच पर बैठे, लोगों का हालचाल पूछते या उनकी समस्याएँ सुनते हुए उन्हें देख लेना कोई असामान्य बात नहीं थी। उनके और जनता के बीच न सुरक्षा का घेरा था, न औपचारिकताओं की दीवार; केवल विश्वास का रिश्ता था।
कहते हैं, सत्ता इंसान को बदल देती है। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सत्ता का चरित्र बदल देते हैं। आलमबदी साहब उन्हीं विरले लोगों में थे। विधायक बनने के बाद उनके घर के दरवाज़े ऊँचे नहीं हुए, बल्कि आम लोगों के लिए और अधिक खुले रहे। उनके पास पहुँचने के लिए किसी सिफ़ारिश, किसी परिचय या किसी औपचारिकता की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वे जनता से मिलने का समय नहीं निकालते थे, बल्कि जनता के बीच ही अपना समय बिताते थे।
उन्होंने समाजवाद को सत्ता के केंद्रों पर कम, अपने जीवन में अधिक जिया। उनके लिए राजनीति चुनाव जीतने की कला नहीं, बल्कि लोगों के दुख-दर्द को अपना मान लेने का संस्कार थी। वे जानते थे कि जनप्रतिनिधि की असली पहचान उसकी गाड़ी नहीं, उसके दरवाज़े पर आने वाले आख़िरी व्यक्ति के चेहरे पर लौटती उम्मीद होती है। शायद यही कारण था कि लोग उन्हें नेता कम, अपने घर का बड़ा मानते थे।
कहना भारी पड़ रहा है कि अब वे हमारे बीच नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद उनका इंतक़ाल हो गया। आज उनके जाने से केवल एक पाँच बार के विधायक का नहीं, बल्कि उस समाजवादी परंपरा का एक सशक्त अध्याय हमसे बिछड़ गया है, जिसमें सादगी प्रतिष्ठा थी, ईमानदारी पहचान थी और जनता ही सबसे बड़ा परिवार।
आलमबदी साहब का जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि समाजवाद केवल विचारधारा नहीं, बल्कि जीने का एक तरीका है; जहाँ पद से पहले इंसान और सत्ता से पहले समाज खड़ा होता है। आज़मगढ़ ही नहीं, समूचे प्रदेश की सियासत से आज जो एक अध्याय ख़ाली हो गया, उसे दुबारा लिखा जा पाना मुश्किल है।
विनम्र एवं भावभीनी श्रद्धांजलि।
@yadavakhilesh समाजवादी पार्टी के सम्मानित विधायक आलम बदी साहब के इंतिक़ाल की ख़बर बेहद दुखद है।
अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए।
إِنَّا لِلَّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
समाजवादी पार्टी के सम्मानित विधायक आलम बदी साहब के इंतिक़ाल की ख़बर बेहद दुखद है।
अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए।
अलविदा आलम बदी साहब....
आजमगढ़ के निजामाबाद विधानसभा क्षेत्र से पांच बार के सपा विधायक आलम बदी आजमी की मौत एक युग का अंत है।
आलम बदी साहब मेकैनिकल इंजीनियर । उत्तर प्रदेश के सियासत में सबसे ईमानदार नेताओं में उनकी गिनती होती थी। विधानसभा भी जाते थे तो स्कूटर या पैदल ही चले जाते थे।
20 रुपए मीटर वाले टांडे के कपड़े का कुर्ता पायजामा पहनते थे मामूली चप्पल, कान में छोटी सी सुनने की मशीनऔर हाथ में महज 1200 रूपये का मोबाइल रखते थे
सड़क पर भी दिखे… संसद में भी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं… @yadavakhilesh से उन विपक्षी नेताओं को सीखना चाहिए जो प्रदर्शन की अलग अलग खिचड़ी पकाने की कोशिश कर रहे हैं।
किसी को भला लगे या बुरा, फिर कह रहा हूँ विपक्षी पार्टियां एक हो जाओ।
"यह मुद्दा समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी का नहीं है, यह मुद्दा युवाओं छात्र और नौजवानों का है। क्या बेटियों के कपड़े फाड़ेंगे आप? युवाओं के लिए सदन में क्यों नहीं बोल सकते हैं।"
- माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी
दिल्ली पुलिस ने अखिलेश यादव जी को जिस छत्रसाल स्टेडियम में रखा है... उस स्टेडियम के बाहर सपा सांसद धर्मेंद्र यादव जी के साथ हजारों समाजवादी साथी तैनात हैं!
आज़म ख़ान के ड्रीम प्रोजेक्ट मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के लिए छात्र-छात्राएं 3 दिन से मुख्य द्वार पर डंटे हुए हैं और प्रशासन से यूनिवर्सिटी को ध्वस्त करने वाले आदेश को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
इन छात्र-छात्राओं के हौंसलों को सलाम किया जाना चाहिए कि धूप और बारिश ही नहीं बल्कि रात में भी यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए धरनारत हैं, धूप और बारिश सिर से गुज़र रही हैं और रात को अपनी चादर बना सिर्फ़ एक ही मांग कर रहे हैं कि इस यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर नहीं चलने देंगे, शिक्षा के इस मंदिर को बचाना इस देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी बनती हैं इसलिए सभी लिखना और बोलना चाहिए कि #StandWithJauharUniversity
मरीज़ गया था इलाज के लिए दिल्ली के सरकारी अस्पताल (गुरु तेगबहादुर अस्पताल)।
उसके ऊपर पंखा गिर गया और जान चली गई।
डबल इंजन की सरकार के बारे में और क्या कहें!
राम के नाम डॉक्यूमेंट्री में एक बहुत साधारण आदमी दिखाई देता है। शायद किसी गाँव का। उससे राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद पर राय पूछी जाती है।
मैं उसके शब्द नहीं, उसका मूल भाव लिख रहा हूँ।
वह कहता है, "मंदिर बनाना है तो बना लो। उसमें झगड़े की क्या बात है? लेकिन किसी की मस्जिद गिराकर मंदिर बनाना ठीक नहीं। अपना मंदिर बनाना हो तो पास में बना लो, दूसरा बना लो, बड़ा बना लो। बनी हुई चीज़ क्यों गिरानी?"
यही हम थे, आज से लगभग 35 साल पहले। जिसके बारे में भाजपा कहती है कि हिन्दू तब सो रहा था।
आज वही "जागा हुआ हिन्दू", संघ परिवार की नज़र में, हर असहमति और हर बनी हुई चीज़ को गिराने को तैयार दिखाई देता है।
इसी सिलसिले में अब आज़म ख़ान की बनवाई हुई मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को गिराने का आदेश दिया गया है।
मुझे फिर उसी आदमी की बात याद आती है। बनी हुई चीज़ गिराना ठीक नहीं।
यह इतनी सी समझ हमने कब और कैसे खो दी? और क्या यह हमें कभी वापस मिलेगी?
जौहर यूनिवर्सिटी को गिरा कर वहां एक भव्य मंदिर बनवाना चाहिए।
चम्पत राय जी को उसका कार्यभार दे देना चाहिए।
वैसे भी पढ़लिख के बच्चे क्या ही करेंगे। या तो बेरोजगार घूमेंगे या सवाल पूछेंगे।
यूनिवर्सिटी कॉलेज ढहाने से सारी समस्या ही खत्म हो जाएगी।