मुझे महससू हुआ है कि मैं जितना कम अखबार पढ़ता हूँ, जितना कम न्यूज चैनल देखता हूँ, जितना कम ट्विटर यूज करता हूँ, दुनिया उतनी ज्यादा सुंदर नजर आती है।
- अनुराग कश्यप
#anuragkashyap#hindicinema
सगन बिन फूल रही सरसों।
सगन बिन फूल रही सरसों।
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार-डार,
और गोरी करत सिंगार,
मलनियाँ गेंदवा ले आईं कर सों,
सगन बिन फूल रही सरसों।
- अमीर खुसरो
#HindiKavita#poetry
कहैंगे सबै ही नैन नीर भरि भरि पाछे प्यारे हरिचंद की कहानी रहि जायगी
(भारतेंदु हरिश्चंद्र लिखित नाटक 'सत्य हरिश्चंद्र' का एक संवाद)
आज (9 सितम्बर) भारतेंदु हरिश्चंद्र की जयंती है। आधुनिक हिन्दी साहित्य के उन्नायक को सादर नमन 🙏🙏
जब अपनी छाती में हम ने
इस देश के घाव देखे थे
था वैद्यों पर विश्वास बहुत
और याद बहुत से नुस्खे थे
यूँ लगता था बस कुछ दिन में
सारी बिपदा कट जाएगी
और सभी घाव भर जाएँगे
वैद्य इनकी टोह को पा न सके
और टोटके सब बेकार गए
अब जो भी चाहो छान करो
- फैज अहमद फैज
देह के भीतर इसीलिए आत्मा रखी गयी है कि देह उसकी रक्षा करे। इसलिए नहीं कि उसका सर्वनाश कर दे।
- प्रेमचन्द के उपन्यास गबन का एक संवाद
कथासम्राट प्रेमचंद की जयंती (31 जुलाई) पर उन्हें हार्दिक नमन 🙏
आज गायिका गीता दत्त की पुण्यतिथि है। उनका गाया कौन सा गीत आपका पसन्दीदा है? मेरा फेवरेट गीत है,
वक्त ने किया, क्या हसीं सितम
तुम रहे न तुम, हम रहे न हम
गीतकार- कैफी आजमी, संगीतकार- सचिन देव बर्मन
महानायक @SrBachchan ने आज 18 जुलाई को 1987 में लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था। बिग बी ने UP के Ex CM हेमवतीनन्दन बहुगुणा को 1984 के चुनाव में इलाहाबाद से रिकॉर्ड अन्तर से हराया था। अमित जी ने 1.87 लाख वोटों से चुनाव जीता जो इस सीट से हार-जीत का अब तक का सबसे बड़ा अन्तर है।
कहाँ तक ये मन को अँधेरे छलेंगे
उदासी भरे दिन कभी तो ढलेंगे
कभी सुख कभी दुख यही जिंदगी है
ये पतझड़ का मौसम घड़ी दो घड़ी है
नये फूल कल फिर डगर में खिलेंगे
उदासी भरे दिन कभी तो ढलेंगे
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गीतकार- योगेश
फिल्म - बातों बातों में (1979)
Parody: बंगाल हिंसा पर इरफान खान का एक बंगाली फैन -
जनता के सामने उन तृणमूल वालों ने भाजपा वालों को मारा और अमित शाह ने कुछ नहीं किया तो जनता यही समझेगी अमित शाह वोट तो माँगता है लेकिन सुरक्षा नहीं दे सकता...
ले दे के अपने पास फकत इक नजर तो है
क्यों देखें जिन्दगी को किसी की नजर से हम
माना कि इस जमीं को न गुलजार कर सके
कुछ खार कम तो कर गये गुजरे जिधर से हम
- साहिर लुधियानवी