#HaldighatiVijay450
महाराणा प्रताप की युद्ध नीति 'गुरिल्ला युद्ध' (छापामार युद्ध) थी। मैदान से रणनीतिक रूप से पीछे हटना युद्ध कला का हिस्सा था, न कि कायरता या पराजय। इसके बाद अकबर स्वयं तीन बार विशाल सेना लेकर मेवाड़ आया,लेकिन महाराणा को झुका नहीं सका।
हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर उदयपुर में आयोजित राष्ट्र चेतना संकल्प सभा में आप सादर आमंत्रित हैं।
📍 चेतक सर्किल, उदयपुर
🎙 मुख्य वक्ता: डॉ मोहन भागवत जी
🏛 आयोजक: प्रताप गौरव केन्द्र
महाराणा प्रताप के अदम्य शौर्य,स्वाभिमान को नमन।
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जब मुगल सेना #मेवाड़ पर चढ़ आई, तब सरदार राणा पुंजा ने हजारों भील योद्धाओं के साथ #महाराणाप्रताप का साथ निभाया। यह मेवाड़ के नगर-ग्राम के वन-पहाड़ निवासियों में अटूट संबंध का प्रतीक है। #HaldighatiVijay450
जब उल्टे पांव भागे मुगल
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मुंतखब-उत-तवारीख में अब्दुल कादिर बदायूँनी ने लिखा जो स्वयं युद्ध में मुगल सेना के लिए लड़ रहा था- राजपूतों के पहले ही विनाशकारी घुड़सवार हमले ने मुगल सेना के अग्रिम दस्ते (Harawal) को छिन्न-भिन्न कर दिया और मुगल सैनिक कई मील दूर भाग गए
रक्षा मंत्री ने कहा कि किताबों में बच्चों को यह सिखाया गया कि अकबर महान था।
मां भारती के सच्चे सपूत महाराणा प्रताप को वह स्थान और सम्मान नहीं दिया गया. लेकिन महाराणा प्रताप का शौर्य किसी सरकार या इतिहास का मोहताज नहीं है।
#rajnathsingh#maharana_pratap
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महाराणा प्रताप की युद्ध नीति 'गुरिल्ला युद्ध' (छापामार युद्ध) थी। मैदान से रणनीतिक रूप से पीछे हटना युद्ध कला का हिस्सा था, न कि कायरता या पराजय। इसके बाद अकबर स्वयं तीन बार विशाल सेना लेकर मेवाड़ आया,लेकिन महाराणा को झुका नहीं सका। #vskmalwa
महाराणा प्रताप का संघर्ष केवल एक कुशल नेतृत्व के साथ संघर्ष में सहभागी हुए सभी उमराव योद्धा, मित्र राजा, स्थानीय किसान, व्यापारी, भील और सामान्य जन का एकजुटता का परिणाम था।#HaldighatiVijay450
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हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप को बंदी बनाने या मारने, मेवाड़ पर पूर्ण अधिकार करने में अकबर पूरी तरह विफल रहा था जो उनके हल्दीघाटी युद्ध में हार को दर्शाता है।
हल्दीघाटी युद्ध में अकबर की पराजय को लेकर निष्कर्ष का एक आधार यह है कि हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात मुगल सेना के सेनापति मानसिंह और आसफ खां से अकबर बुरी तरह से नाराज था और उन्हें 6 माह तक दरबार में नहीं आने की सजा दी थी। #HaldighatiVijay450
मां #पन्नाधाय में अपने पुत्र चंदन को उदय सिंह के स्थान पर रखकर अपने पुत्र का बलिदान दिया। अगर उदय सिंह नहीं बचते तो ना ही मेवाड़ होता ना ही महाराणा प्रताप। #HaldighatiVijay450
प्रताप ने भील जाति के लोगों को भी साथ में लिया और उनका विश्वास जीता। भीलों ने भी अपने प्रताप को कीका कहकर संबोधित करना प्रारंभ किया। प्रताप ने वीर योद्धाओं को अपनी सेना में सम्मिलित कर दिया। #HaldighatiVijay450#HaldighatiVijay450
रावत कृष्ण दास चुंडावत और जयमल राठौड़ ने प्रताप को शस्त्र विद्या सिखाई। मेवाड़ मुगल संघर्ष में महाराणा प्रताप के साथ साथ जनजाति समाज भी बलिदान देने में कहीं पीछे नहीं रहा।
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हिन्दुवा सूरज वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप महान के
हल्दीघाटी विजय दिवस के 450 वर्ष पूरे। डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा की कृति 'उदयपुर राज्य का इतिहास' के साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात सामरिक व रणनीतिक स्थिति पर प्रताप का नियंत्रण था।