@SanjayAzadSln युवाओं के सपनों का मूल्य राजनीति से बड़ा है, और इतिहास गवाह है कि अवसरों पर पहरा लगाने वाली व्यवस्थाओं से अधिक दीर्घायु युवाओं की आकांक्षाएँ होती हैं।
@upadhyayabhii यदि छात्रों के भविष्य की कीमत पर सत्ता अपनी छवि का श्रृंगार करेगी, तो इतिहास गवाह है कि ऐसे दर्प के महल अधिक दिन खड़े नहीं रहते।अन्याय की हर दीवार में दरार पड़ती है, हर इमारत ढहती है, और हर अहंकार का अंत होता है।
@aajtak@anjanaomkashyap@bainjal आजकल एक नया चलन चल पड़ा है जो तारीफ़ करे वह जागरूक नागरिक, जो सवाल पूछे वह ट्रोल; और जो अधिक सवाल पूछे, वह 'पेड ट्रोल'। यदि पैसे खर्च हो रहे हैं तो सबूत भी सामने रखिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि असहमति सुनने की आदत ही छूट गई है?
@upadhyayabhii परीक्षा से एक अभ्यर्थी को रोककर शायद एक दिन की जीत मिल जाए, लेकिन लाखों युवाओं के मन में उठे प्रश्नों को गिरफ्तार करने की कोई जेल आज तक नहीं बनी।
@upadhyayabhii सत्ता के पास पुलिस हो सकती है, प्रशासन हो सकता है, आदेश हो सकते हैं; लेकिन इतिहास के पास स्मृति होती है। वह दर्ज करता है कि किसने अन्याय किया, किसने चुप्पी साधी और किसने विरोध का साहस दिखाया।
कलम से रोशनी बाँटने वालों को ‘दो कौड़ी का’ कहने से पहले यह याद रखना चाहिए कि सत्ता, मीडिया और मंच सब समय के साथ बदल जाते हैं,लेकिन एक सच्चे शिक्षक का प्रभाव पीढ़ियों तक जीवित रहता है।
@askshivanisahu आज मन असाधारण पीड़ा से भरा है। एक शिक्षक की आँखों में आँसू देखना वैसा ही है, जैसे किसी पुस्तकालय में सन्नाटा रो रहा हो, जैसे दीपक अपने ही प्रकाश की नियति पर प्रश्न कर रहा हो।
@askshivanisahu शिक्षक की भीगी हुई आँखें यह स्मरण करा जाती हैं कि संस्थाएँ केवल भवनों से नहीं, भावनाओं, परिश्रम और असंख्य आकांक्षाओं से बनती हैं। आज वही आकांक्षाएँ मानो मौन होकर पूछ रही हैं क्या सचमुच इतना आसान होता है किसी स्वप्न के उजड़ जाने का दृश्य देखना?
@anjanaomkashyap शिक्षकों को 'लुटेरा' बताने वाले स्वयं कैमरे, व्यूज़ और वायरल क्लिप्स की मंडी में खड़े होकर नैतिकता का प्रवचन दे रहे हैं। विडंबना देखिए जो लोग हर मुद्दे को अपने मंच की टीआरपी में बदल देते हैं, वे दूसरों पर धंधा करने का आरोप लगा रहे हैं।