नोएडा के दलालों से हमदर्दी रखने वाले कुछ खुफिय��� दलाल बोल रहे हैं कि इसमें इनका क्या कसूर है, मीडिया मालिकों को बोलो।
ये तो वही बात हो गई कि आतंकी का क्या कसूर है, उसके संगठन के मुखिया को बोलो।
नोएडा मीडिया में काम करने वाला हर छोटा बड़ा दलाल भारत का दुश्मन है।
No Mercy !
दुनिया के सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी Messi के साथ अमृता फ़डनविस का व्यवहार देखिए,
CM की पत्नी होने के घमंड से चूर
बिना Hello किए
Chewing gum चबाते हुए
धृष्टता से सेल्फ़ी लेना
फिर
जुगाली करते हुए चेक करना
और उतनी ही बदतमीज़ी से
दोबारा सेल्फ़ी लेना
शर्म आनी चाहिए
Messi के patience की दाद देनी पड़ेगी !
डॉक्टरों को सिर्फ सैलरी नहीं , टारगेट भी दिए जाते हैं – कितने ऑपरेशन , कितनी सर्जरी ,
मतलब जिस मरीज को ऑपरेशन की जरूरत ही नहीं , उसका भी ऑपरेशन किया जाता है ताकि बिल बने।
जिस महिला का नॉर्मल डिलीवरी से सुरक्षित प्रसव हो सकता है, उसे भी जबरन सी-सेक्शन करवाया जाता है क्योंकि उसमें ज़्यादा पैसा है।
अब सवाल ये है 👇
क्या डॉक्टर अब हीलर नहीं, सेल्समैन बन चुके हैं?
मरीज की जान कम और रेवेन्यू ज़्यादा जरूरी हो गया है?
मेडिकल एथिक्स कहां गई?
हेल्थ डिपार्टमेंट और मेडिकल काउंसिल इन सब पर चुप क्यों हैं?
प्राइवेट हॉस्पिटल्स पर कोई ऑडिट और निगरानी क्यों नहीं?
कैंसर बीमारी नहीं , सिस्टम की मार बन चुका है।
कैंसर ने सिर्फ मरीज नहीं तोड़े, पूरे परिवारों को बर्बादी के कगार पर ला दिया है। इलाज से पहले ही लोग दवाइयों के खर्च में टूट जाते हैं।
अब हकीकत सुनिए 👇
डॉ. अनुज के मुताबिक Paclitaxel जैसी जीवन रक्षक दवा , जिसकी कीमत रिटेलर को ₹600 पड़ती है , उसकी MRP ₹12,000 तय की जाती है!
एक मरीज को कई बार 20–30 वायल की जरूरत होती है। यानी इलाज नहीं, सीधा आर्थिक कत्ल।
और ये सिर्फ एक दवा की कहानी नहीं —> ज्यादातर कीमोथेरेपी दवाओं का यही हाल है।
200% मुनाफा भी समझ आता है, लेकिन 1900% मार्जिन? वो भी कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी में?
अब सवाल सीधे सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय से 🔥
दवाओं की कीमत पर कोई सख्त नियंत्रण क्यों नहीं?
NPPA और ड्रग कंट्रोलर क्या सिर्फ कागजों में हैं?
क्या गरीब का इलाज सिर्फ अमीरों के लिए छोड़ दिया गया है?
क्या ��ुनाफा इंसान की जान से बड़ा हो गया है?
इलाज से पहले दवा खरीदने में ही लोग मर जाएं — यही नीति है?
कैंसर से कम और “दवा माफिया” से ज्यादा लोग मर रहे हैं।
ये बीमारी का इलाज नहीं, मरीज की लूट है।
कब लगेगी इस पर लगाम? और जिम्मेदारी कौन लेगा?
कैंसर एक ऐसी बीमारी ने जिसने करोड़ो घर तबाह किए हैं ।
सिर्फ मरीज ही नहीं बल्कि मरीज के परिवारों को ।
दवाइयों का खर्च वहन करते करते लोग टूट जाते हैं ।
और कैसे नहीं टूटेंगे अगर 600 रुपये की दवाई पर सरकार ने छूट दे ��खी है 12000 रुपये MRP रखने की ।
जी हाँ ।
दवाई है Paclitaxel ।
रिटेलर खरीदते हैं 600 में और MRP है 12000.
एक मरीज को कई बार 20-30 vial की ज़रूरत पड़ती है ।
और ये कोई एक दवाई की बात नहीं ।
कीमोथेरेपी की ज़्यादातर दवाइयों का यही हाल है ।
200% मार्जिन भी समझ में आता है लेकिन 1900% margin??
वो कैंसर जैसी बीमारी में , जिसका इलाज वैसे भी काफ़ी लंबा चलता है??
ग़रीब तो मर ही जाएगा ना?
ये तो ठीक नहीं हैं ना साहब ?
@PMOIndia