अभी इन महिला पत्रकार के वीडियो को देखकर अपने दोस्त की बात याद हो आई पिछले साल उसकी वाइफ प्रेग्नेंट थी तो उसके डॉक्टर ने कहा था कि शुरु के तीन महीने बहुत ध्यान रखने की जरूरत होती है सीढ़ियां भी चढ़ने-उतरने को मना किया था। इसलिए उसने वाइफ का ध्यान रखने के लिए खुद ऑफिस जाना बंद करके घर से ही काम करना शुरू कर दिया और तीन महीने बाद घर पर मां के पास भेज दिया।
अब इन्हें सुनकर लग रहा है कि अगर ये सच बोल रही हैं कि ये प्रेग्नेंट हैं तो बहुत बड़ी लापरवाह हैं प्रेग्नेंट होते हुए फील्ड रिपोर्टिंग तो कोई नहीं करता और करता भी है तो इतनी भीड़ में जाने से तो बचता ही है।
कल वाकई बहुत भीड़ थी मेरा कंधा पहले दो बार डिस्लोकेट हो चुका है तो मैं खुद बहुत सावधानी बरत रहा था क्योंकि इतनी भीड़ में किधर से धक्का आ जाए कुछ नहीं पता।
एक और चीज समझ नहीं आ रही कि इन्हें मेडिकल हेल्प चाहिए थी तो बीजेपी नेताओं के पास जाने की क्या जरूरत थी❓
और फिर प्रदीप भंडारी जैसे नेता अस्पताल में पहुंचकर वीडियो बना रहे हैं ये सब देखकर बीजेपी का अपने सांसद प्रताप सांरगी से ड्रामा करवाना याद आ रहा है।
इन रिचा पारासर के पुराने वीडियो भी देखे हैं जिनमें ये हर प्रोटेस्ट में पहुंचकर उन्हें बदनाम करती हुई दिख रही हैं...खैर, वो सब तो अब कई लोग कर रहे हैं गोदी मीडिया सिर्फ टीवी वाला ही नहीं है डिजिटल चैनल और रिपोर्टर भी सरकार की गोद में बैठ गए हैं लेकिन राहुल गांधी पर महिलाओं से बदसलूकी के आरोप पर तो कोई विश्वास नहीं करेगा मुझे नहीं लगता कि पूरे देश में कोई भी महिला किसी और नेता के साथ इतनी सहजता से मिल सकती हो जितनी राहुल गांधी से...
ज्याँ द्रेज़, तुम कौन हाे? किस देश के वासी हो? तुम यहाँ क्या कर रहे हो? नहीं, नहीं, यह पूछिए कि पत्रकारिता क्या जानती है!
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दिल्ली के जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर, 2026 को एक अद्भुत दृश्य था। देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर प्रदर्शन हो रहा था। पुलिस का भारी बंदोबस्त था। लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर लोग सड़कों पर थे। इसी बीच एक पत्रकार ने एक दुबले-पतले, सफ़ेद दाढ़ी वाले व्यक्ति से पूछा, ‘भाई साहब, आप कौन हो? कहाँ से आए हो? हू आर यू एंड वेयर आर यू फ्रॉम?’
एक लंबी, दुबली देह, कुछ झुके कंधे, कानों तक उतरते बेतरतीब सफ़ेद-भूरे बाल। पतले फ्रेम के चश्मे के पीछे गहरी, चौकन्नी आँखें; ऊँचा माथा, उभरी नाक, झुर्रियों से रेखांकित गाल, हल्की मूँछें और ठोड़ी पर विरल सफ़ेद दाढ़ी। होंठों पर ऋषियों सी अधखिली मुस्कान। चेहरे पर अनुभवों से उपजा अनोखी सौम्य।
वह व्यक्ति ज्याँ द्रेज़ थे। जिन्होंने अप्रतिम लेख और ग्रंथ लिखे हैं। भारतीय रेलगाड़ियों से टंगी जिनकी साइकिल बहुत चर्चा में रहती है। वह ज्याँ द्रेज़ जो अमीर बाप का बेटा होकर भी भारत के ग़रीबों और ग़ुरबत की चिंता करता है। भारतीयों का यह फ़ुरसत नहीं है।
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आंदोलनकारियों के बीच एक 'अंगरेज़नुमा विदेशी' को देखकर भागते रिपोर्टर का प्रश्न सुनकर आप हँस सकते हैं। लेकिन यह हँसने का अवसर नहीं, भारतीय पत्रकारिता की बौद्धिक दरिद्रता पर शोक मनाने का क्षण है। एक ऐसा समाज, जिसमें संसार के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों में से एक व्यक्ति से माइक्रोफ़ोन लेकर उसकी पहचान पूछी जा रही हो और वह भी ऐसे लहजे में, मानो कोई संदिग्ध विदेशी प्रदर्शन में घुस आया हो, वहाँ समस्या किसी एक रिपोर्टर की जानकारी तक सीमित नहीं रह जाती।
और फिर इस तमाशे में एक दूसरी आवाज़ प्रवेश करती है। समाचार एजेंसी एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश सवाल उठाती हैं कि किसी युवा पत्रकार के लिए ज्याँ द्रेज़ को पहचानना क्यों ज़रूरी है? यदि वह नहीं जानता और पूछता है तो वह वही कर रहा है जो पत्रकार को करना चाहिए, सवाल पूछना। वरिष्ठों को इतना ज्ञान बघारने की आवश्यकता नहीं!
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वाह! पत्रकारिता के इतिहास में अज्ञान के पक्ष में इससे अधिक आत्मविश्वासपूर्ण पैरवी दुर्लभ होगी, स्मिता प्रकाश।
अज्ञान जब पत्रकारिता की योग्यता और इतिहास की अशिक्षा राजनीतिक विशेषाधिकार बनने लगे, तब लोकतंत्र को ख़बरों से नहीं, ख़बर देने वालों से भी ख़तरा पैदा होता है।
सवाल पूछना पत्रकारिता है, निश्चय ही। लेकिन सवाल पूछने के लिए भी कुछ जानना पड़ता है। बिना अध्ययन का सवाल जिज्ञासा नहीं, तैयारी का अभाव है। और जब एक वरिष्ठ संपादक इस अभाव को पत्रकारिता का स्वाभाविक गुण बताने लगें, तब त्रासदी व्यक्तिगत नहीं रहती, संस्थागत हो जाती है।
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ज्याँ द्रेज़ कोई ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हें किसी समाचार चैनल ने पिछले सप्ताह प्रसिद्ध बनाया हो। वे दशकों से भारतीय समाज, ग़रीबी, भूख, पोषण, शिक्षा और सामाजिक न्याय पर काम कर रहे हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के बौद्धिक सहयोगी हैं। भारत की रोज़गार गारंटी व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक अधिकारों की बहसों में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। वे 2002 से भारतीय नागरिक हैं।
उन्होंने भारत को केवल विश्वविद्यालयों की वातानुकूलित कक्षाओं से नहीं पढ़ा। गाँवों, बस्तियों, श्रमिकों और भूखे लोगों के बीच रहकर समझा है। जिस व्यक्ति ने करोड़ों भारतीयों की जीवन-स्थितियों को समझने के लिए अपना जीवन लगाया, उससे भारतीय मीडिया पूछ रहा है कि आप किस देश से आए हैं!
दरअसल, हमारे समाचार कक्षों में एक नया जुगराफ़िया विकसित हुआ है। वहाँ देश उन लोगों से बनता है जो सत्ता के आसपास दिखाई देते हैं। जो सत्ता के बाहर, समाज की गहराइयों में काम करते हैं, वे अचानक विदेशी हो जाते हैं। कुछ चेहरों को पहचानना पत्रकारिता की अनिवार्यता है, लेकिन कुछ विचारकों को न पहचानना उसके लिए शर्म की बात भी नहीं!
स्मिता प्रकाश का तर्क इसी कु-बौद्धिक भूगोल का घोषणापत्र है।
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ज़रा सोचिए, यदि किसी पत्रकार को अमर्त्य सेन, रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, अरुणा रॉय, प्रभात पटनायक, मेधा पाटकर या ज्याँ द्रेज़ के बारे में कुछ मालूम नहीं तो वह भारत के सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक इतिहास की रिपोर्टिंग किस आधार पर करेगा? वह प्रश्न पूछ सकता है, लेकिन प्रश्न के भीतर छिपे उत्तरों, असत्य और छल को पहचानेगा कैसे?
पत्रकारिता केवल माइक्रोफ़ोन पकड़ने की कला नहीं। वह ज्ञान का अनुशासन है। उसमें जिज्ञासा आवश्यक है, लेकिन जिज्ञासा के पीछे अध्ययन, संदर्भबोध और स्मृति भी चाहिए।
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और ज्याँ द्रेज बेल्जियम मूल वाले कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्होंने भारत को अपनी प्रतिभा और श्रम से समृद्ध किया।
ज्याँ द्रेज उसी बेल्जियम से हैं, जिन्होंने हमें फ़ादर कामिल बुल्के जैसे विद्वान् दिए, जिन्होंने हिन्दी को अपना अप्रतिम अंगरेज़ी–हिन्दी कोश और रामकथा का विलक्षण अनुसंधान दिया। रॉबर्ट अंत्वान ने संस्कृत, पियेर फ़ालों ने बंगाली, रिचर्ड द स्मेत ने भारतीय दर्शन और कॉन्स्टेंट लीवेंस ने आदिवासियों के भूमि-अधिकारों की लड़ाई में अपना जीवन लगाया। अब उसी परंपरा में ज्याँ द्रेज़ ने भारत की भूख, ग़रीबी और असमानता को अपना बौद्धिक सरोकार बनाया है। इन लोगों की जन्मभूमि बेल्जियम थी, लेकिन इनकी प्रतिभा की सीमाएँ राष्ट्रीय नहीं थीं। इन्होंने भारत को केवल अपना निवास नहीं बनाया; भारत की भाषाओं, ज्ञान और मनुष्यता को अपनी जीवन-साधना बनाया। इनकी प्रतिभा की कोई सीमा नहीं है, लेकिन मूर्खता की भी कोई सीमा नहीं होती।
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सबसे ख़तरनाक स्थिति आती है, जब अज्ञान केवल न्यूज़रूम तक सीमित नहीं रहता। वह मीडिया और राजनीति के नेतृत्व की भाषा में प्रवेश कर जाता है।
आज समाचार चैनलों में प्रश्नों की कमी नहीं है। कमी है प्रश्नों के पीछे विचार की। हर शाम अनेक एंकर देश का इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, अंतरराष्ट्रीय संबंध, धर्म, दर्शन और संविधान समझाते दिखाई देते हैं। लेकिन उनके आत्मविश्वास और उनकी जानकारी के बीच की दूरी कभी-कभी भयावह लगती है।
सबसे ख़तरनाक पत्रकार वह नहीं है जो कुछ नहीं जानता। सबसे ख़तरनाक वह है जो कुछ नहीं जानता, यह भी नहीं जानता कि वह कुछ नहीं जानता और फिर अपनी इस अनभिज्ञता को निर्भीक पत्रकारिता घोषित कर देता है।
ज्याँ द्रेज़ से पूछा गया प्रश्न था, आप कौन हैं? लेकिन इस घटना का वास्तविक प्रश्न कुछ और है।
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हमने ऐसे समाचार कक्ष क्यों बना लिए हैं जहाँ सत्ता के चेहरे पहचानना अनिवार्य है, लेकिन समाज को बदलने वाले विचारकों को पहचानना ऐच्छिक? जहाँ राजनीतिक आरोपों की भाषा तत्काल सीख ली जाती है, लेकिन ग़रीबी, असमानता और नागरिक अधिकारों का बौद्धिक इतिहास अपरिचित बना रहता है?
स्मिता प्रकाश को पत्रकारों का बचाव अवश्य करना चाहिए। लेकिन उनके अज्ञान का नहीं। पत्रकारिता में पहला प्रश्न पूछने से पहले पहली पुस्तक पढ़ने की भी ज़रूरत होती है।
क्योंकि पत्रकारिता की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि उसने ज्याँ द्रेज़ को नहीं पहचाना। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अब उसके कुछ संरक्षक यह समझाने में लगे हैं कि उन्हें पहचानना ज़रूरी ही क्यों था।
और यही वह क्षण है जब अज्ञान एक साधारण मानवीय कमी नहीं रह जाता। वह संस्थागत अहंकार बन जाता है। कभी पत्रकारिता सत्ता से पूछती थी, तुम कौन होते हो? अब वह ज्ञान से पूछ रही है, तुम कौन हो? यह भारतीय पत्रकारिता के लिए अत्यंत अपमानजनक प्रश्न है। और उससे भी अधिक अपमानजनक है इस प्रश्न पर गर्व करना।
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लेकिन इस पूरे प्रसंग में एक और विलक्षण विडंबना है। जिस वीडियो ने भारतीय पत्रकारिता की बौद्धिक तैयारी पर प्रश्न खड़े किए, उसे सोशल मीडिया पर उठाने वालों में एक नाम है सोमू आनंद। एनडीटीवी के लिए रिपोर्टिंग करने वाला युवा पत्रकार। दिल्ली से कोई 1250 किलोमीटर दूर उस कोसी अंचल का व्यक्ति, जिसे महानगरों की पत्रकारिता अक्सर हाशिये का भूगोल समझती है।
सोमू ने एक्स पर लिखा, ‘एक पत्रकार ज्यां द्रेज से पूछ रहा, आप हो कौन, कहाँ से आये हो?’ इस टिप्पणी में छिपा क्षोभ उस पूरी घटना की आलोचना बन गया।
यहाँ भूगोल का उलटाव बड़ा दिलचस्प है। देश की राजधानी में, ज्याँ द्रेज़ के सामने खड़े होकर एक व्यक्ति उनकी पहचान पूछ रहा था, जबकि सुदूर बिहार के एक नए रिपोर्टर ने दूर रहकर भी उस प्रश्न की विडंबना पहचान ली।
पत्रकारिता की दृष्टि महानगरों में नहीं जन्मती। वह अध्ययन, अनुभव और सामाजिक चेतना से विकसित होती है। दिल्ली में बैठना किसी को बड़ा पत्रकार नहीं बनाता, जैसे सहरसा में रहना किसी को छोटा पत्रकार नहीं बनाता।
बौद्धिकता का कोई पिनकोड नहीं होता और अज्ञान को राष्ट्रीय राजधानी का पता मिल जाने से वह ज्ञान नहीं हो जाता!
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लेकिन मुझे यहाँ ब्रिटिश कवयित्री एडिथ सिटवेल की वह बात याद आ रही है, जो उन्होंने कही थी :
"I am patient with stupidity, but not with those who are proud of it.?"
[The Last Years of a Rebel: A Memoir of Edith Sitwell By Elizabeth Salter]
@SomuAnand_ #JeanDreze #FatherCamilleBulcke #Journalism #JantarMantar
“सड़क पर आज फिर से उतर गई हो दिल्ली,
आज़ाद ख़ुशबुओं से महक रही हो दिल्ली,
नारों की गूँज लेकर चहक रही हो दिल्ली,
बड़ी ख़ूबसूरत तुम दिख रही हो दिल्ली”
-भारतीय गीतकार स्वानंद किरकिरे
चाहे तुम संसार के
अंतिम पुरुष ही क्यों न हो
स्त्री को उसके देवी स्वरूप में
तभी देख पाओगे
जब स्त्रीहृदय हो जाओगे
तब तक तुम मोहित रहोगे
मात्र उसके सौंदर्य पर
पुरुष हृदय बने अटके रहोगे
देहयष्टि पर या फिर उसके नेत्रों पर...
~kavyakshra🖊️
#India: We are concerned by reports of mass detentions of demonstrators, protest leaders, members of civil society organisations, lawyers and journalists, before and during today’s large-scale demonstrations in Delhi.
We call on the authorities to ensure that the right to peaceful assembly is fully respected and fulfilled.
https://t.co/tqrQyZoXBJ
दुनिया की खूबसूरत तस्वीरों में से एक ये तस्वीर है।
Some pictures capture a moment. This one captures the courage to stand against power.
@priyankagandhi
इस वीडियो में महिला पुलिसकर्मी और प्रियंका गांधी के बीच जो हुआ है, उसे गौर से देखिए...
(पूरे मामले को समझकर, और भी वीडियोज देखकर सही/गलत का फैसला खुद कीजिए... वैसे आज के बहुत से ऐसे वीडियो हैं, जिनके आधार पर अलग-अलग राय बन सकती हैं.)
उत्तरप्रदेश के भदोही से बहुत ही दिल दहला देने वाली खबर आ रही है।
जहाँ एक व्यक्ति ने अपनी 20 वर्षीय को बेटी को 2 महीने से बंधक बनाकर रखा था।
लड़की सुखकर हड्डियों का ढांचा बची है उसके नीचे का मांस और हड्डियां गल चुकी है।
लड़की के 15 वर्षीय नाबालिक भाई ने बताया कि पिता बहन के साथ.
जिसके अंदर दर्द ना हो वो जानवर हैवान है,
राहुल गांधी को दिल्ली पुलिस वालों ने डिटेन कर रखा है, डिटेन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ता राहुल गांधी के पीने के लिए पानी कि Waters Bottles लाए?
राहुल गांधी पुलिस वालों को अपनी Water bottles देते हुए पानी पी लीजिए आप अपना काम कर रहे हैं अपनी ड्यूटी कर रहे हैं?
इतना हम दर्द नेता मिलना इस गोल पर फिलहाल अभी तो नामुमकिन है।
हिरासत में लिए जाने के बाद राहुल गाँधी ने पुलिसकर्मियों को पानी देते हुए कहा 👇
पानी पी लो, गुस्सा नहीं करते..
ऑर्डर गलत मिला है, लेकिन आप तो अपना काम कर रहे हो. 🙃