गोदी चैनलों को कवरेज सुधारने का फ़रमान !!
सूत्र ने एक बहुत ही दिलचस्प बात बतायी है। वो ये कि अंदर इस बात का आंकलन है कि टीवी चैनलों ने जिस तरह की कवरेज की है उससे असंतोष और बढ़ा है।
सूत्र ने दावा यहाँ तक किया है कि उनको ज़रूरी निर्देश दिए जा चुके हैं और कवरेज ‘सुधारने’ को कहा गया है।
‘अधिक से अधिक धर्मेंद्र प्रधान तक बात रुक जाए’ इस हिसाब से चलने को कहा गया है
सूत्र का दावा है कि ‘जिन चैनलों को आप लोग गोदी चैनल कहते हैं, उनकी कवरेज में आ रहे बदलाव को नोट कीजिएगा’
इसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ युवाओं को जाता है। वे बड़ी संख्या में आगे आए, अपने सवालों के साथ आगे आए ,जवाब मांगने आगे आए।
युवाओं का आज का प्रदर्शन इतिहास में दर्ज होगा।
@Cockroachisback
हृदयविदारक।दर्दनाक।💔💔💔
चाहे घायल छात्र हुए हों या पुलिसकर्मी- हर घायल इंसान इस देश का नागरिक है।
ऐसी स्थिति तक बात पहुँचना ही सरकार की बड़ी विफलता है।
हार पूरे लोकतंत्र की हुई है।
जब संवाद की जगह टकराव और संवेदनशीलता की जगह अहंकार ले ले, तो सवाल राजनीतिक जिम्मेदारी पे है।
“तुमने बोला घंटी बजाओ कोरोना भागेगा, हमने अंधभक्त की तरह घंटी बजाया… अब तुम कहां हो मोदी”
पुलिस हिरासत में ली गई इस युवा प्रदर्शनकारी को सुनिए। बहुत कुछ समझ में आ जाएगा।
Video : @JtrahulSaini
जिस दिन तुम समझोगे तुमने कुछ किया ही नहीं
जो हो रहा है, हो रहा है...
तुम सिर्फ देखने वाले हो उस दिन
ना पापा है, ना पुण्य है, ना योग है, ना भोग है....
~अष्टावक्र
सोनम वांगचुक, जिसने कभी अपने लिए नहीं माँगा, कुछ कि पद चाहिए, सत्ता चाहिए।
अपनी ज़िंदगी देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए लड़ते रहे है और 15-16 दिनों से अनशन पर बैठे हैं!
अपने लिए नहीं, देश के लिए। देश के बच्चों के भविष्य के लिए! उसके बाद भी देश के नेताओं की सोई हुई संवेदनाएँ नहीं जाग पा रही।
सत्ता की ख़ामोशी बरकरार है।
भूख हड़ताल और अनशन भी अगर व्यवस्था को सुनाई नहीं दे रहा, तो एक आम नागरिक की आवाज़ की कीमत क्या ही होगी?
अब दर्द सिर्फ़ यह नहीं कि एक व्यक्ति अनशन पर है, बड़ा दर्द यह है कि देश धीरे-धीरे उस मुकाम पर पहुँच रहा है जहाँ जनता की पीड़ा का महत्व खत्म है और उस पर सत्ता हावी है।
सोचिए, आज अगर एक ऐसे व्यक्ति की आवाज़ अनसुनी की जा सकती है, जिसने अपना जीवन देश के लिए लगा दिया, तो कल बेरोज़गार युवा, न्याय की गुहार लगाता परिवार, किसान, छात्र या कोई भी आम नागरिक किस उम्मीद से अपनी तकलीफ़ के लिए लड़ पाएगा और कौन उसकी सुनेगा?
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ़ चुनाव है क्या? अगर सत्ता अपने शांत नागरिक की आवाज़ नहीं सुन रही, तो ये लोकतंत्र पर सवाल नहीं है?
और अगर वह आवाज़ भी अनसुनी होने लगे! तो यह चिंता सिर्फ़ पूरे देश को होनी चाहिए।
Be stand with Sonam Wangchuk
बहुत अंदरूनी खबर लीक हुई :
महागठबंधन के कार्यकर्ताओं और नेताओं के ऊपर मनोवैज्ञानिक दबाव डालकर हताश करने के लिए गोदी मिडिया ने एक्जिट पोल में एनडीए की सरकार बनवा रहे हैं ताकि महागठबंधन का कार्यकर्ता नेता मतगणना के दिन से पहले ही मैदान छोड़ दे,
जबकि असल में सच्चाई यह है कि बिहार में महागठबंधन की सरकार पूर्ण बहुमत से बनने जा रही है,