प्रधानमंत्री मोदी भारत के इतिहास के सबसे युवा-विरोधी प्रधानमंत्री हैं - इतने युवा विरोधी कि एक नाकाम शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी नहीं ले सकते।
152 पेपर लीक। 7.5 करोड़ छात्र पीड़ित। और सज़ा एक दोषी को भी नहीं। सजा किसे मिली? मेहनती युवाओं को।
और जब इन बच्चों ने शिक्षा के जायज़ सवाल उठाए - तो जवाब में मिली लाठी और हिरासत। लीक करने वाले अपराधी आज़ाद - और वाजिब मुद्दे उठाने वाले छात्र घसीटे जाते हैं, पीटे जाते हैं।
यह सरकार सिर्फ़ युवाओं को नाकाम नहीं कर रही - उन पर टूट पड़ी है।- श्री @RahulGandhi
@ashokgehlot51 आप माननीय ने पूर्व के आपके कार्यकाल में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर 05 जून 2013 को राज्य पक्षी गोडावण के ससमय संरक्षण हेतु प्रोजेक्ट गोडावण की शुरुआत के ऐतिहासिक कार्य था । इस प्रोजेक्ट के आगामी समय में प्रोजेक्ट टाइगर की तरह सकारात्मक परिणाम आयेंगे ।
आज मेरे जन्मदिवस पर एक हृदयस्पर्शी क्षण तब आया, जब बाड़मेर के 'हापो की ढाणी' की एक बच्ची लीला कंवर ने अपने पैरों से मेरा शानदार चित्र बनाकर मुझसे फोन पर बात की और शुभकामनाएँ दीं।
वर्ष 2013 में एक बिजली हादसे में दोनों हाथ खराब होने के बावजूद उसने जिस हिम्मत और जिंदादिली के साथ न केवल जीवन को स्वीकार किया, बल्कि अपनी शिक्षा भी पूरी की, वह सचमुच प्रेरणादायक है।
लीला कंवर आत्मविश्वास और संघर्ष की सजीव मिसाल है। मैं उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ और उसे आशीर्वाद देता हूँ कि वह ज़िंदगी में खूब कामयाब हो और आगे बढ़े।
ईरान-अमेरिका की पाकिस्तान में वार्ता होने के विषय तथा अन्य विषयों पर मेरी प्रतिक्रिया :
महात्मा गांधी के देश में शांति की अपील होनी चाहिए थी , ऐसा माहौल बनना चाहिए था कि यहां आकर के शांति की बात करते :
अब खाटूश्यामजी में क्या प्रार्थना की मुझे पता ही नहीं है। वो क्या क्या बोलते हैं, वो बोलते हैं, वो पूरा देश सुन रहा है। इतनी निम्न स्तर की भाषा कोई मुख्यमंत्री काम में नहीं लेता होगा जो वो ले रहे हैं। ये परंपरा अच्छी नहीं। लोकतंत्र के अंदर कुछ सीमाएं होनी चाहिए। सीमाएं टूट रही है, इस बात का मुझे दुख है। चाहे केंद्र सरकार हो NDA की, वो भी तोड़ रही है। उनके मुख्यमंत्री लोग तोड़ रहे हैं। ये उचित नहीं है। आज ये सत्ता में, कल हम सत्ता में आएंगे। पहले हम थे, ये आ गए तो हमने कोई एतराज थोड़ी किया। एक सेकेंड नहीं लगाया। इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देते हुए, राजीव गांधी ने इस्तीफा देते हुए, नरसिम्हा राव ने इस्तीफा देते हुए, मनमोहन सिंह ने इस्तीफा देते हुए एक सेकेंड नहीं लगाया और इनका जो तरीका है अभी वो डेमोक्रेसी को कमजोर कर रहे हैं। इसीलिए इस प्रकार की भाषा को रोक नहीं लग रही है। इनके मेंबर ऑफ पार्लियामेंट क्या बोलते हैं? कभी सुना आपने प्रधानमंत्री जी ने डांट लगाई किसी को या फटकार लगाई या डिस्प्लेजर कन्वे किया। डिस्प्लेजर कन्वे भी करते प्रधानमंत्री ये अच्छी बात नहीं बोली, ये तो आज तक हुआ नहीं। तो ये जो माहौल बन रहा है देश के अंदर इसीलिए हम पिछड़ रहे हैं और हमारी विदेशी नीति पिछड़ रही है। अब पाकिस्तान में जो आतंक को बढ़ावा देने वाला, आतंक को पनाह देने वाला, आतंकियों को भेजने वाला हमारे देश के अंदर, बार बार कश्मीर के अंदर, कितने लोग मारे गए हैं और जिसको दुनिया के मुल्कों में उन्होंने प्रयास किया कि आतंकवादी देश घोषित हो। टीमें गई थी यहां से ऑपरेशन सिंदूर के बाद में वो इसीलिए गई थी बताने के लिए भाई कि ये किस तरह के लोग हैं। कोई असर पड़ा नहीं। ऑपरेशन सिंदूर के अंदर कोई मुल्क हमारे साथ नहीं आया और किसी ने आरोप, किसी ने पाकिस्तान के ऊपर निंदा नहीं करी। पहलगाम की घटना पर भी नहीं करी। खाली फॉर्मेलिटी कर दी। ये जो तरीका ये क्यों हो रहा है? क्योंकि प्रधानमंत्री जी को कुछ भी बोल सकता है ट्रंप, कैसे बोल सकता है हमारे प्रधानमंत्री को कि मैं इनका पॉलिटिकल करियर खत्म कर दूंगा। ये मुझे मनाने में लगा हुआ है। क्या भाषा काम ले रहा है वो? फिर भी हम कुछ नहीं बोल रहे हैं। साठ सत्तर बार बोल चुके हैं वो कि मैंने युद्ध विराम करवाया। कोई जवाब नहीं। इसलिए उनके हौसले बढ़ गए हैं। वो पाकिस्तान की तरफ मुड़ गए हैं। हमारा मित्र राष्ट्र जो रशिया था, ट्रस्टेड मित्र था हमारा। जब दो टुकड़े हुए पाकिस्तान के इंदिरा गांधी के वक्त में, तभी सातवां बेड़ा आ गया था अमेरिका का। इंदिरा गांधी ने परवाह नहीं की। रशिया हमारे साथ था। वो हमारा जो मित्र था, उसको हमने खो दिया और वो चुप है। ना इधर है ना उधर है। बातें कई करने की है। सवाल ये है कि आज हिंदुस्तान का अधिकार बनता था क्योंकि गांधी का देश है। हिंसा के खिलाफ संघर्ष किया हम लोगों ने। अहिंसा वाला मुल्क है, अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाती है दुनिया गांधी की जन्म दिवस को। उस गांधी के देश में आज शांति की अपील होनी चाहिए थी यहां से। ऐसा माहौल बनना चाहिए था कि यहां आकर के शांति की बात करें लोग। जो पाकिस्तान में हो रहा है उसको तो हम लोग कुछ आलोचना नहीं कर सकते। अगर कहीं दुनिया में आग लगी हुई है। वर्ल्ड पीस नहीं है, अशांति है दुनिया के अंदर तो चाहे पाकिस्तान हो, चाहे वो बर्मा हो, चाहे नेपाल हो, चाहे कोई छोटा बड़ा मुल्क हो, कोई हो। चाहे हमारी बनती है या नहीं बनती है। अगर वो प्रयास करेगा तो दुनिया के मुल्क उसको वेलकम करेंगे। और हमारे विदेश मंत्री कह रहे हैं ये दलाली कर रहा है। अरे पंडित नेहरू ने कई मुल्कों में मध्यस्थता करी थी, कोरिया के अंदर और स्वेज नहर के अंदर कई जगह ,मुझे सब जानकारी भी नहीं मुझे। मोदी जी खुद कहते हैं यूक्रेन के अंदर वो भी यही कह रहे थे मैं स्थापना करने जा रहा हूं शांति की। तो दलाली शब्द क्यों काम लिया? मैंने पहले ही आपको कहा था मीडिया वालों को दलाली शब्द ठीक नहीं था। वो बात सिद्ध हुई। आखिर में वहां पर वहां से मैसेज गया और मिस्टर ट्रंप, ईरान के जो विदेश मंत्री थे, जो भी थे, सब ने बाय नेम पाकिस्तान की तारीफ करी और वो कहते हैं दलाल है। वो शब्द जो था वो मैसेज गलत छोड़ गया। मेरा यही कहना था।
भाजपा सरकार की अलोकतांत्रिक सोच के कारण राजस्थान में संवैधानिक संकट गहराता जा रहा है।
पंचायतों और नगरीय निकायों में एक वर्ष से अधिक समय से चुनाव नहीं कराए जाना, और उनकी जगह सरकारी प्रशासकों की नियुक्ति, यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार है।
संविधान का अनुच्छेद 243E स्पष्ट करता है कि पंचायतों का कार्यकाल पाँच वर्ष का होगा और समय पर चुनाव अनिवार्य हैं। इसी प्रकार अनुच्छेद 243U नगरीय निकायों के लिए भी यही बाध्यता तय करता है। वहीं अनुच्छेद 243K के तहत राज्य निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित किया गया है, जिसकी जिम्मेदारी चुनाव कराना है। यह किसी सरकार की इच्छा का विषय नहीं, बल्कि संविधान द्वारा निर्धारित अनिवार्य दायित्व है।
इसके बावजूद, राज्य सरकार ने परिसीमन, पुनर्गठन और तथाकथित “वन स्टेट, वन इलेक्शन” जैसे बहानों के पीछे छिपकर चुनावों को टालने का प्रयास किया। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने Vikas Kishanrao Gawali (2021) मामले में स्पष्ट रूप से कहा है कि इस प्रकार के कारण चुनाव टालने का वैध आधार नहीं हो सकते।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने फरवरी, मार्च और नवंबर 2025 में बार-बार निर्देश दिए, लेकिन सरकार ने हर बार इनकी अनदेखी की। अंततः 439 याचिकाओं पर एक साथ निर्णय देते हुए न्यायालय ने 15 अप्रैल 2026 की अंतिम समयसीमा निर्धारित की। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एसएलपी खारिज कर इस आदेश को बरकरार रखा जाना इस बात का प्रमाण है कि न्यायपालिका ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है लेकिन सरकार की ओर से अब तक गंभीरता का अभाव दिखाई देता है।
जब कोई सरकार संविधान के अनुच्छेद 243E, 243U और 243K का लगातार उल्लंघन करे, नागरिकों के मताधिकार को एक वर्ष से अधिक समय तक बाधित रखे, और न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना करे तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संवैधानिक विघटन (Constitutional Breakdown) की स्थिति है।
73वें और 74वें संविधान संशोधनों की मूल भावना विकेंद्रीकरण, स्थानीय स्वशासन और जनता की भागीदारी को इस प्रकार कुचलना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
भाजपा सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल सत्ता चलाने का माध्यम नहीं, बल्कि संविधान के प्रति जवाबदेही का दायित्व है। राजस्थान की जनता अपने अधिकारों के हनन को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी।