गोलवलकर अपनी किताब “विचार नवनीत” में लिखते हैं-
“हम अपने देश के संविधान से सांघिक ढांचे की संपूर्ण चर्चा को सदैव के लिए समाप्त कर दें।”
“एक राज्य के, अर्थात् भारत के अंतर्गत अनेक स्वायत्त अथवा अर्द्धस्वायत्त राज्यों के अस्तित्व को मिटा दें तथा एक देश, एक राज्य, एक विधानमंडल, एक कार्यपालिका घोषित करें।”
“इसमें खण्डात्मक, क्षेत्रीय, सांप्रदायिक, भाषायी अथवा अन्य प्रकार के गर्व का चिह्न भी नहीं होना चाहिए।”
“इन भावनाओं को हमारे एकत्व के सामंजस्य को उद्ध्वंस करने का अवकाश नहीं मिलना चाहिए। संविधान का पुनः परीक्षण एवं पुनर्लेखन हो।”
हजारों फीट की ऊंचाई और नीचे समुद्र की अनंत गहराई...😨
जैसे जैसे समुद्र पास आता जाएगा आपकी सांसे अटकती सी महसूस होंगी आपको...
लेकिन ये इंसान इस स्लाइड पर फिसलना शुरू करता है बिना यह समझे कि यह कितना खतरनाक हो सकता है...
और फिर जो हुआ वह आपने कभी भी नहीं सोचा होगा....
क्या हो जब कोई अनजाना जीव आपके शरीर से चिपक जाए और उसे छुड़ाना ऐसा ही जो जैसे शरीर का अंग अलग करना....😨 ????
आज सुबह सुबह हमारे चाचा जी अपने छोटे से बगीचे में निराई गुड़ाई का काम कर रहे थे।
जब वे अपना काम खत्म करके आए और मिट्टी कीचड़ से सने अपने हाथ पैर धोए तो एक बेहद ही डरावना और अजीब सा कीड़ा उनके पैर से चिपका हुआ था।
उन्होंने उसे नॉर्मल सा जीव समझ कर छुड़ाया लेकिन यह क्या....😨 वो कीड़ा उनके पैर से इस तरह चिपक गया था जैसे इन्हीं के पैर में पैदा हुआ था।
बहुत खींचने के बाद वह लगभग रबर की तरह खिंचता और वापस चिपक जाता।
आप बताइए क्या करेंगे आप जब आपका सामना इस तरह के कीड़े से हो जाए... और क्या आप बता सकते हैं कि यह क्या आफत है...?
ऐसा जीव जो आपसे चिपकने का बाद कहे भई मैं तो तेरे ही शरीर का हिस्सा हूं....��
हाल ही में लड़कियों द्वारा मर्दों की तरह गलियों को समाज जो बर्दाश्त नहीं कर पाया उसके कारण में भी है अगर लड़कियां इस तरह गाली नहीं देती तो इसका असर नहीं दिखता वह सब मजाक में उड़ जाता। लेकिन जैसे की मर्द एक दूसरे की मां-बहन करते हैं... जब उन मर्दों को इस अंदाज में उनकी मां-बहन की गई तो खलबली मची है।
भारतीय राजनीति में महिलाओं को लेकर जो राजनीति चालू हुई है वह नीतीश कुमार के चलाकी पूर्ण वोट की राजनीति फिर इनको देखकर मोदी जी के कथित"बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ" से आगे बढ़ते हुए खुलकर महिलाओं की समस्या के कारण रहे पितृसत्तात्मक, मनुवाद और पाखंडी व्यवस्था पर सीधे प्रहार तक पहुंचा है। जिसका इस्तेमाल अब के समय में राहुल गांधी ���ी ने शुरू किया है।
एक समय में राहुल गांधी या अन्य विपक्ष द्वारा संभावित मान लिया गया कि धर्म ही राजनीति की बुनियाद होगी, से अलग कम से कम महिलाओं के मामले में उचित राजनीति की शुरुआत हुई है।
पितृसत्ता, मनुवाद व पाखंड से लड़ने की जो बात की जा रही है वही मूल राजनीति है-इस नारीवाद की। अब यह देखते हैं कि यह कितना काम आप आती है।
संभावित है कि यह सिर्फ पढ़े-लिखे ��क ही पहुंचे लेकिन वहां भी संभावना है कि पढ़े-लिखे लोग भी ढकोसलों में बने गढ़े हुए हैं तो क्या यह वहां काम करेगी?
@tippanikarr दस पन्द्रह साल पहले रसड़ा एक बरात में गया था तभी कहा जाता था कि उमाशंकर सिंह जी ने रसड़ा की सड़कों को लखनऊ जैसे बनवा दिया है चुकी क्षेत्र में लखनऊ के विकास की प्रशंसा होती थी तो उसी से तुलना की जाती थी।
सिपाही बता, मैं तुम्हें भी
इतना खतरनाक लगता हूं?
भाई सच बता, तुम्हें
मेरे छिली हुई चमड़ी
और मेरे मुंह से बहते लहू में,
कुछ अपना नहीं लगता?
तुम लाख दुश्मन-कतारों में
बढ़-चढ़कर शेखियां बघार लो
तुम्हारे निद्रा-प्यासे नयन
और पथराया माथा
तुम्��ारी फटी हुई निक्कर
और उसकी जेब में
तम्बाकू की रच गयी ज़हरीली गन्ध
तुम्हारी चुगली कर रहे हैं
'गर नहीं साझी तो बस अपनी
यह वर्दी ही नहीं साझी
लेकिन तुम्हारे परिवार के दुःख
आज भी मेरे साथ साझे हैं।
पाश की कविता "पुलिस के सिपाही से" की पंक्तियां 🌱
#HindiPoetry #mudera
सिपाही बता, मैं तुम्हें भी
इतना खतरनाक लगता हूं?
भाई सच बता, तुम्हें
मेरे छिली ��ुई चमड़ी
और मेरे मुंह से बहते लहू में,
कुछ अपना नहीं लगता?
तुम लाख दुश्मन-कतारों में
बढ़-चढ़कर शेखियां बघार लो
तुम्हारे निद्रा-प्यासे नयन
और पथराया माथा
तुम्हारी फटी हुई निक्कर
और उसकी जेब में
तम्बाकू की रच गयी ज़हरीली गन्ध
तुम्हारी चुगली कर रहे हैं
'गर नहीं साझी तो बस अपनी
यह वर्दी ही नहीं साझी
लेकिन तुम्हारे परिवार के दुःख
आज भी मेरे साथ साझे हैं।
पाश की कविता "पुलिस के सिपाही से" की पंक्तियां 🌱
#HindiPoetry #mudera
इज्जत दो, सिलेक्शन लो......
भरतपुर क्रिकेट एसोसिएशन से एक बेहद शर्मनाक मामला सामने आया है। महिला क्रिकेटरों ने पूर्व सचिव शत्रुघ्न तिवारी पर यौन शोषण और टीम ��ें सिलेक्शन के बदले अनुचित मांगें करने के संगीन आरोप लगाए हैं।।।
महिला खिलाड़ियों ने अपनी बात के समर्थन में व्हाट्सएप चैट के सबूत भी पेश किए हैं।
इन व्हाट्सएप चैट्स में कथित तौर पर महिला क्रिकेटरों पर अनैतिक दबाव बनाने और बात न मानने पर करियर खत्म करने की धमकी देने की बात सामने आई है।।।
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ... पर किस-किस से बचाओ???
जब एक लड़की अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर खेल के मैदान में उतरती है, तो उसका सपना देश का नाम रोशन करना होता है। लेकिन जब मार्गदर्शक ही भक्षक बन जाएं, तो यह न केवल उस खिलाड़ी के सपनों की हत्या है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक बड़ा सवाल है।।।
सिलेक्शन का आधार केवल मेहनत और योग्यता होनी चाहिए, न कि ��िसी का शोषण।।।
जब खेल अकादमियों में ही बेटियां सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी, तो माता-पिता उन्हें आगे भेजने से डरेंगे।।।
समाज को ऐसे मामलों में खुलकर बोलने और पीड़ितों का साथ देने की सख्त जरूरत है।।।
यह मामला केवल एक व्यक्ति या संघ का नहीं है, यह पूरी खेल व्यवस्था की साख का सवाल है।।।
राजस्थान राज्य महिला आयोग और खेल प्रशासन को मामले की निष्पक्ष और त��वरित जांच कर दोषी पर कठोरतम कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।।।
सभी खेल संघों और अकादमियों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम (POSH) समिति को पूरी तरह सक्रिय किया जाए, ताकि खिलाड़ी बिना किसी डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें।।।
ऐसे लोगों को तुरंत प्रभाव से खेल प्रशासन के सभी पदों से बर्खास्त किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी पद का गलत फायदा उठाने की हिम्मत न करे।।।
अपनी राय स्पष्ट करें।।।
क्या पता मोदी ही पाकिस्तान का एजेंट है???
ये सवाल इस वायरल वीडियो में ये मोहतरमा पूछ रही है।।
ये सरासर गलत है और मैं इसकी कड़ी निंदा करता हूं।।
पर देश के प्रधानमंत्री ने अपने दोस्तों और अंधभक्तों
को खुश करने क�� बजाए अपने वादों पे अमल किया
होता तो आज ऐसे बेइज्जती न होती।।
पत्रकारिता या चाटुकारिता
पहले मुझे भी लगा गलत हुआ, लेकिन जब पूरा सच देखा तो मेरे होश उड़ गए होश उड़ गए।।।
शुरुआत में जब उस पत्रकार के पिटने, चश्मा टूटने और कपड़े फटने का वीडियो वायरल हुआ, तो मुझे भी बहुत बुरा लगा। मुझे लगा कि यार यह तो बिल्कुल गलत है! स्टूडियो में बैठकर नफरत कोई और फैला रहा है, और सड़क पर रिपोर्टिंग कर रहे रिपोर्टर के साथ लोग गलत कर रहे हैं। हिंसा का समर्थन तो कोई भी नहीं कर सकता।।।
यहाँ तक कि जब हमारे स्पेस भाईचारा 2.0 में @MohitPandey_ और पूछने लगे कि छात्रों की इस अराजकता पर कुछ बोलिए, तो मुझे भी लगा कि इस प�� लिखना चाहिए।।।
लेकिन फिर मैंने स्क्रॉल करते हुए यह वीडियो देखा...
वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि पुलिस द्वारा डिटेन किए जा रहे छात्रों में से जब एक बच्चा अपनी जान बचाकर भागने की कोशिश करता है, तो यह गोदी मीडिया वाला पत्रकार रिपोर्टिंग छोड़कर खुद पुलिसकर्मी बन जाता है! वह उस बच्चे को घसीटकर वापस पुलिस के हवाले करने की कोशिश करता है।।।
अब सवाल यह उठता है
क्या वह छात्र कोई चोर, डाकू या आतंकी था???
पत्रकार का काम रिपोर्टिंग करना है या पुलिस की मुखबरी/दलाली करना???
क्या यह साफ़ नहीं दिखाता कि यह मीडिया पूर्वाग्रह (Bias) से पीड़ित था और घर से ही मन बनाकर आया था कि छात्रों को गलत ही साबित करना है???
मेरा सीधा सवाल
जब पत्रकार निष्पक्षता का मुखौटा उतारकर खुद एक पक्ष की तरफ से गुंडागर्दी या पुलिसगिरी करने लगेगा, तो सड़कों पर उतरे गुस्साए युवाओं से आप किस मर्यादा की उम्मीद करते हैं???
हिंसा का समर्थन ��ोई नहीं करता, लेकिन जब मीडिया खुद पुलिस की लाठी और सत्ता का औजार बन जाए, तो जनता का भरोसा और सब्र दोनों टूट जाता है।।।
मीडिया को पीड़ित बनने से पहले अपने अंदर झांककर आत्ममंथन करने की सख्त जरूरत है।।।
कौन गलत कौन सही फैसला आपका???हिट
If you’re a student or protester facing an FIR or detention in connection with the ongoing protests, don’t panic.
These lawyers are offering free legal assistance to help those affected.
Please save these numbers, share them widely, and reach out if you or someone you know needs legal help.
Justice should never depend on your ability to pay.
"पार्टनर, वह आपकी कलम छीन लेंगी। आपके गले को दबाकर आपको बोलने नहीं देगी। वे स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर देंगे..
वे किसी दिन आपकी सारी प्रजातांत्रिक संस्थाओं को नष्ट कर देंगे और देश में फासिस्ट तंत्र को स्थापित कर देगी।"
यह हरिशंकर परसाई जी से मुक्तिबोध जी कह रहे हैं। जिसके बारे में 1965 में "राष्ट्रवादी" पत्रिका के संस्मरण "वह तेजवती पीड़ा" नामक शिर्षक मे लिखते हैं। वे आग�� बताते हैं कि-
वे घंटों देश की राजनीतिक आर्थिक परिस्थितियों का विश्लेषण करते और बताते की ऐसी स्थितियों में फास्टेस्ट प्रवृत्ति किस तरह से उभर रही है।
बोलते बोलते उनकी दम फुल उठती और वह बिस्तर पर लुढ़क कर थोड़ी देर चुपचाप पड़े रहते। घोर मानसिक त्राश में दिन गुजर रहे थे। उन्हीं दिनों उनकी वह सबसे लंबी और सबसे ताकतवर कविता "अंधेरे में" पूरी की थी।
यह कविता उनकी बेचैनी थी और यह बेचैनी इसलिए थी की आजादी के बाद तुरंत उन्होंने देखा था कि कुछ चीज ऐसी उत्पन्न हो रही है जिसके लिए समाज अगर तैयार नहीं हुआ तो लोगों के दुश्वारी के दिन चालूं हो जाएंगे।
हरिशंकर परसाई उस स्थिति में मुक्तिबोध जी को देखकर कहते हैं कि इस आदमी ने अपने को निचोड़ दिया अपना सर्वस्व दे दिया अपनी सारी प्राण शक्ति इस परिस्थिति को उजागर करने में लगा दी है।
#Muktibodh #mudera
https://t.co/uOVZo4M8Q7
फिर एक बार नमाज़ पढ़ने पर आपत्ति... और जाग उठी कुछ लोगों की मॉरल पुलिसिंग।।।
आजकल देश में एक अजीब सी प्रवृत्ति देखने को मिल रही है नैतिक पहरेदारी (Moral Policing)।।।
कुछ लोग अचानक खुद को इतना ज़िम्मेदार समझने लगे हैं कि रास्ते में कोई टोपी पहने या इबादत करता दिख जाए, तो उनके अंदर का कानून-रक्षक तुरंत जाग जात�� है। वे तुरंत पहुँच जाते हैं पहचान पत्र और [Aadhaar Redacted] की मांग करने।।।
मेरा इन सभी स्वघोषित जांचकर्ताओं से एक सीधा सवाल है।।।
दूसरों से नागरिकता का प्रमाण मांगने से पहले, क्या आपने कभी ��ुद के दस्तावेज़ों की जांच की है? आपके पास कोई ऐसा दस्तावेज़ है जिससे साबित हो कि आप भारतीय नागरिक है???
कानूनन किसी भी आम नागरिक को यह अधिकार नहीं है कि वह सड़क पर चलते किसी अन्य व्यक्ति को रोककर उसकी Identity चेक करे।।।
आखिर कानून की किस धारा के तहत आपको यह अधिकार मिला है???
बिना किसी अधिकार के कानून हाथ में लेना और किसी को प्रताड़ित करना पूरी तरह से अवैध है। और अगर आपकी आपत्ति सिर्फ एक विशेष समुद��य से है, तो खुलकर कहिए। व्यवस्था से मांग कीजिए कि ऐसा कोई नियम ही बना दिया जाए, ताकि हकीकत सबके सामने आ सके कि कानून और संविधान की क्या अहमियत है।।।
विडंबना देखिए... जब समाज में गंभीर अपराधी और असामाजिक तत्व खुलेआम घूमते हैं, तब तो ऐसी सक्रियता कहीं दिखाई नहीं देती।।।
लेकिन जैसे ही कोई शांति से अपनी आस्था का पालन करता ह��आ दिख जाता है, तो कुछ लोगों का तथाकथित राष्ट्रवाद और पुरुषार्थ अचानक जाग जाता है।।।
दूसरों को परेशान करने और समाज में बेवजह का तनाव पैदा करने के बजाय, यदि यही ऊर्जा देश की वास्तविक समस्याओं को सुलझाने और सकारात्मक कार्यों में लगाई जाए, तो समाज और राष्ट्र दोनों का भला होगा।।।
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कड़वा सच हम मूरतों को इसलिए पूजते हैं क्योंकि वो हमसे कुछ मांगती नहीं।।।
इस वीडियो को देखिए और खुद से पूछिए क्या कोई भी ईश्वर इस ढोंग से खुश होगा???
ज़िंदा जीवों को तड़पाकर पत्थरों को सजाना आस्था नहीं, इंसानियत का जनाज़ा है।।।
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।।।
अहंकार और चाटुकारिता का महामिलन
जंतर-मंतर पर चल रहे ड्रामे का एक बेहद मनोरंजक वीडियो सामने आया है।।।
नज़ारा कुछ ऐसा है कि एक तरफ GODI MEDIA का माइक थामे एक महोदया खड़ी हैं, जिन्हें अपने आकाओं को खुश करने की इतनी जल्दी है कि अब उन्हें इंकलाब जिंदाबाद के नारे से भी करंट लगने लगा है। देश क�� इतिहास में जिस नारे ने इंकलाब लाया, वो आज की पत्रकारिता के लिए मुद्दे से भटकना हो गया है।।।
दूसरी तरफ हमारे सोशल मीडिया के SUPERSTAR अभिजीत दीपके भाई साहब हैं।।।
शुरुआत में जब ट्विटर और इंस्टाग्राम पर लाखों लोगों ने फॉलो कर लिया, तो इन्हें लगा कि जंतर-मंतर पहुंचते ही जनता इनके स्वागत में पलकें बिछा देगी। इसी हवा-हवाई घमंड में आकर पहले तो बड़े चौड़े होकर बोले हमें किसी विपक्ष का समर्थन नहीं चाहि���।।।
लेकिन जैसे ही डिजिटल समर्थकों का गुब्बारा फूटा और ज़मीन पर हवा निकली, तो भाईसाहब को अपनी असलियत समझ आ गई। अब अपनी ढहती हुई राजनीति की दुकान को चमकाने के लिए ये बेचारे आदरणीय सोनम वांगचुक सर के पीछे छिपकर खुद को कोई बड़ा सेलिब्रिटी समझ रहे हैं।।।
सच तो यह ��ै कि जब कैमरा और अहंकार आमने-सामने आते हैं, तो देश की गंभीर समस्याएँ तो गायब हो जाती हैं, बस दो लोगों की नौटंकी और बेवकूफ़ी सरेआम नीलाम होती है।।।
जनता सब देख रही है।।।🔥🤡