वाह!
जिसके ह्रदय में सच्ची भक्ति होती है उसके विचार और भावना ऐसे होते हैं। जहाँ इनकी जगह द्वेष हो, घृणा हो, बल का दंभ, अहंकार हो वहाँ राम नहीं रावण होते हैं।
एक धोबी ने भरी सभा में सीता की पवित्रता पर सवाल उठाये, निंदा की. इसके बाद श्रीराम ने प्रजा को ध्यान में रखते हुए अपनी पत्नी सीता को महल से बाहर निकालकर जंगल में रहने का आदेश दिया. उस समय सीता गर्भवती थीं. उन्होंने वाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश को जन्म दिया. सीता की कोई गलती नहीं थी, लेकिन समाज ने उन्हें गलत साबित करने में उस समय कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी.
( आज अयोध्या में आकर अनायास ये क़िस्सा मन में आ गया )
इसके पहले हम जानते हैं कि लालच कैकेयी और मंथरा के मन में था. श्रीराम का कोई लेना देना नहीं था, वो तो पिता के आदेश का पालन कर रहे थे, लेकिन उन्हें बिना किसी गलती के 14 वर्ष का वनवास झेलना पड़ा. राम जी की कोई गलती नहीं थी फिर भी.
( अयोध्या में कुछ ऐसा है जो हमेशा मन को विचलित करता है )
सिया गोयल का मामला अदालत तय करेगी, लेकिन एक सवाल समाज को खुद से पूछना होगा—अगर अपने जीवन का सबसे निजी फैसला लेने की आज़ादी भी किसी युवा के पास नहीं है, तो हम उसे शिक्षित नागरिक बना रहे हैं या आज्ञाकारी उत्तराधिकारी?
@chetan_bhagat के नजरिए को समझना जरूरी है..।।
धर्म का बाज़ार भी बड़ा अद्भुत है।
ग्राहक भक्ति लेकर आता है और लौटते समय किसी "ब्रांड" का भक्त बन चुका होता है।
मंच जितना भव्य, LED जितनी बड़ी, सुरक्षा घेरा जितना कड़ा और फीस जितनी ऊँची—आध्यात्मिकता उतनी ही गहरी मानी जाती है।
कबीर आज होते तो शायद पूछते—"साधु खोजने निकला था, यह इवेंट मैनेजमेंट कंपनी कहाँ से आ गई?"
Ajay Rai has been put under house arrest by Yogi's police in Ayodhya. Read on to know the past story
@MohitPandey_
राम मंदिर विवाद पर कांग्रेस की खामोशी, क्या भाजपा को मिल रही राजनीतिक बढ़त? | Congress Rejigs UP Team Amid Ayodhya Temple Row and Poll Push https://t.co/OIjfmajHMV
मेरे सभी पत्रकारिता क्षेत्र के गुरुओं ने सब कुछ लिख दिया @romanaisarkhan मैं कुछ ज्यादा नही कहूंगा बस यही कहूंगा.. आप भी मेरे गुरुओं की श्रेणी में एक हैं.. ना दबेंगे ना दबाएंगे.. बस खबर को उसके मुकाम तक पहुंचाएंगे..!!
शाबाश रोमाना! गर्व है तुम पर। तुम उन गिनी-चुकीं मशालों में हो जो सच्ची पत्रकारिता को रोशनी और जीवन्तता की ऊष्मा दे रही हो।
अभिनन्दन!
तुम्हें और तुम्हारे चैनल को भी। 💐💐💐
राजनीति में जवाब देना कठिन हो तो विषय बदल दो, विपक्ष मजबूत हो तो सांसद तोड़ लो, और सवाल ज्यादा हों तो राष्ट्रवाद की आवाज़ तेज़ कर दो।
लेकिन राम मंदिर के चंदे पर उठे सवाल और बार-बार होने वाले परीक्षा घोटाले ऐसे मुद्दे हैं जिनका जवाब न टीवी डिबेट दे सकती है, न सोशल मीडिया ट्रेंड।
आस्था और युवाओं का भविष्य—दोनों पर सवाल हों तो जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए।
हमने विकास को कंक्रीट, कारों और एयर कंडीशनरों में मापा, लेकिन पेड़ों, जलस्रोतों और स्वच्छ हवा की कीमत नहीं समझी।
आज हर साल नए तापमान रिकॉर्ड टूट रहे हैं। सवाल यह नहीं कि गर्मी कितनी बढ़ेगी, सवाल यह है कि हमारे शहर और समाज इसे कितनी देर झेल पाएंगे।
जलवायु संकट अब किसी एक पीढ़ी की नहीं, पूरे देश की चुनौती है।
@semeerc भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी उसका मजबूत संगठन है। यदि संसदीय बोर्ड और संगठन में बड़े बदलाव केवल सत्ता संतुलन साधने के लिए किए गए, तो इसका असर बूथ तक दिखाई दे सकता है।
विपक्ष की कमजोरी से चुनाव जीते जा सकते हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं की नाराज़गी के साथ नहीं।
राम मंदिर दान घोटाला भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक संकट बन सकता था, लेकिन कांग्रेस की धीमी, असंगत और असमंजसपूर्ण प्रतिक्रिया के कारण वह इस अवसर का पूरा लाभ नहीं उठा सकी : @abidshahjourno
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निर्भया (2012) मामले में दोषियों को फाँसी 2020 में हुई—करीब 7 वर्ष बाद।
इसके बाद उन्नाव, कठुआ, हाथरस, हैदराबाद की पशु चिकित्सक, कोलकाता आर.जी. कर जैसी घटनाओं ने पूरे देश को झकझोरा, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया के अंत में फाँसी का कोई नया उदाहरण सामने नहीं आया।
हर घटना के बाद नेताओं के बयान, फास्ट ट्रैक कोर्ट के वादे और "कड़ी से कड़ी सज़ा" की घोषणाएँ ज़रूर सुनाई देती हैं। लेकिन यदि फाँसी की सज़ा दशकों तक अपीलों में अटकी रहे, बदल जाए या क्रियान्वित ही न हो, तो उसका भय अपराधियों पर कितना पड़ता है, यह एक वैध प्रश्न है।
समस्या कानून की कठोरता की नहीं, न्याय की निश्चितता और समयबद्धता की है। न्याय तब प्रभावी होता है जब वह केवल कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर भी दिखाई दे।
@nistula बार एसोसिएशनों से अपेक्षा होती है कि वे न्याय और विधि के सिद्धांतों के साथ खड़ी हों, न कि जनभावनाओं या राजनीतिक दबावों के साथ।
अयोध्या बार एसोसिएशन का हालिया रुख देखकर लगता है कि कानून से अधिक राजनीति प्रभावी हो रही है। यह प्रवृत्ति न्याय व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है।
भरोसा किसी भी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी होता है।
करों से खजाना भरा जा सकता है, योजनाओं से आंकड़े सुधारे जा सकते हैं, लेकिन जनता का विश्वास खो जाए तो सबसे बड़ी उपलब्धियां भी सवालों के घेरे में आ जाती हैं।
भरोसा टूटने में सचमुच एक दिन लगता है, पर उसे वापस अर्जित करने में वर्षों की पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदार प्रयास लगते हैं।
समस्या सिर्फ किसी एक कॉमेडियन या कंटेंट क्रिएटर की नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब महिलाओं का अपमान, संवेदनहीनता या रिश्तों के प्रति गैर-जिम्मेदार व्यवहार "डार्क ह्यूमर" और "जोक" के नाम पर सामान्य बना दिया जाता है। और जब बड़े प्लेटफॉर्म ऐसे कंटेंट को बढ़ावा देते हैं, तो उसका प्रभाव लाखों दर्शकों तक पहुँचता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ज़रूरी है, लेकिन आलोचना की स्वतंत्रता भी उतनी ही ज़रूरी है।
उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए 2027 का चुनाव सिर्फ विपक्ष के खिलाफ नहीं होगा।
अगर टिकट वितरण, चुनावी रणनीति और संगठन संचालन का नियंत्रण दिल्ली से होगा, जबकि चुनावी चेहरा और सरकार लखनऊ से चलेगी, तो स्वाभाविक रूप से खींचतान की स्थिति बन सकती है।
किसी भी बड़े चुनाव में दो सत्ता केंद्र जितने मजबूत होते हैं, समन्वय की चुनौती भी उतनी ही बड़ी हो जाती है। असली परीक्षा यही होगी कि भाजपा यूपी में सामंजस्य का मॉडल पेश करती है या शक्ति संतुलन का संघर्ष सामने आता है।
2G, कोयला, कॉमनवेल्थ के दौर में मीडिया, विपक्ष और संस्थाएं लगातार सवाल पूछती थीं। आज राम मंदिर दान विवाद हो या भूमि सौदों पर आरोप—सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि असहज सवालों का जवाब देने में होती है। सत्ता चाहे किसी की भी हो, जवाबदेही से छूट नहीं मिलनी चाहिए।