महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी टूटी।पंजाब में अकाली दल टूटा।बिहार में चिराग पासवान की पार्टी टूटी।गोवा में महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी टूटी।दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी टूटी।बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी टूटी।
इन सभी राजनीति दलों में टूट वंशवादी राजनीति,
विचारधारा से समझौता,परिवारिक कलह या पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के अहंकारी रवैये के कारण हुई है।
समाजवादी पार्टी का मामला थोड़ा अलग है।
समाजवादी पार्टी में पहले बेटे ने पिता को पार्टी से बेदखल किया,फिर चाचा को।पिता स्वर्ग चले गए, चाचा पार्टी में लौट आए।
उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट होने वाली है।साबुत बची सपा भी आने वाले दिनों में साफ़ होगी।
कर्नाटक में बीजेपी हो या कांग्रेस,दोनों दलों के केंद्रीय नेतृत्व ने स्थानीय नेताओं के दबदबे को स्वीकार किया है।
कर्नाटक में कांग्रेस के सिद्धारमैया सबसे बड़े नेता है,जैसे कर्नाटक बीजेपी में येदियुरप्पा सबसे बड़े नेता है।सिद्धारमैया ने ओबीसी,अल्पसंख्यक और दलितों का वोट बैक बनाया और ओबीसी की राजनीति करते रहे।वही बीजेपी के येदियुरप्पा लिंगायत वोट बैक की राजनीति करते रहे।
बीजेपी ने येदियुरप्पा का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा लिया तो सर्वाच्च बॉडी संसदीय बोर्ड का सदस्य बना दिया।कांग्रेस ने भी सिद्धारमैया का इस्तीफा लिया तो सिद्धारमैया को भी कांग्रेस की सर्वाच्च बाडी सीडब्लूसी का सदस्य बना दिया।
बीजेपी के येदियुरप्पा ने अपने बेटे का राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने के लिए छोटे बेटे विजयेंन्द्र को कर्नाटक बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष और शिकारीपुरा सीट से विधायक बनवाया।बडे बेटे राघवेन्द्र को शिमोगा संसदीय क्षेत्र से सांसद बनवाया।कांग्रेस के सिद्धारमैया ने भी मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी तो बेटे यतीन्द्र को डीके शिवकुमार सरकार में मंत्री बनवाया।
सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बनने के लिए जनता दल छोड़कर कांग्रेस में आए और मुख्यमंत्री बने।वही बीजेपी के येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद से हटाने पर बीजेपी छोड़कर अपनी पार्टी बनाई और बीजेपी को धुल चटाई।फिर बीजेपी में वापसी की और फिर मुख्यमंत्री बने।
येदियुरप्पा को भले ही बीजेपी ने सर्वोच संसदीय बोर्ड का सदस्य बना दिया हो, लेकिन येदियुरप्पा अपने विधायक और प्रदेश अध्यक्ष बेटे को सामने कर कर्नाटक की राजनीति में पूरा दखल रखते हैं, वैसे ही भले कांग्रेस ने सिद्धारमैया को सर्वोच्च कांग्रेस वर्किंग कमेटी का सदस्य बना दिया हो,लेकिन सिद्धारमैया ने राज्यसभा ठुकराकर, विधायक रहकर और अपने मंत्री बेटे को सामने कर प्रदेश की राजनीति में पूरा दखल रखने के संकेत दिए हैं।
बीजेपी के येदियुरप्पा अपने बेटे विजयेन्द्र को भविष्य में कर्नाटक का मुख्यमंत्री देखना चाहते है,वैसे ही कांग्रेस के सिद्धारमैया अपने बेटे यतीन्द्र को भविष्य में कर्नाटक का मुख्यमंत्री देखना चाहते है।
कर्नाटक में बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों दल अपने स्थानीय नेताओं के सामने नतमस्तक रहे है और दोनों दलों के दमदार नेताओं ने अपने अपने शीर्ष नेतृत्व को समय समय पर शीर्षासन करवाया है।
कर्नाटक में आज डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं।इस शपथ ग्रहण के साथ ही कांग्रेस के शासन वाले चार राज्यों में से किसी भी राज्य में ओबीसी मुख्यमंत्री नहीं होगा।सिद्धारमैया कांग्रेस के अकेले ओबीसी मुख्यमंत्री थे।
राहुल गांधी ने अपनी राजनीति ओबीसी और आरक्षण के इर्दगिर्द केन्द्रित रखी है।ऐसे में कांग्रेस के एकमात्र ओबीसी मुख्यमंत्री को हटाने से राहुल की ओबीसी आधारित राजनीति की धार कुंद होना तय है।
कांग्रेस और राहुल गांधी को ओबीसी को लेकर बीजेपी के सवालों का जवाब देना मुश्किल होगा कि उनका एक भी मुख्यमंत्री ओबीसी क्यो नहीं है और एक था,उसे क्यो हटाया गया? बीजेपी यह नैरेटिव बना सकती है कि कांग्रेस पिछड़ों की विरोधी है और कांग्रेस ने कर्नाटक में अपने एकमात्र ओबीसी मुख्यमंत्री को हटाकर पार्टी के लिए पैसा उगाने वाले नेता को कुर्सी सौप दी।
बीजेपी के पास हरियाणा में नायब सिंह सैनी,एमपी में मोहन यादव,बिहार में सम्राट चौधरी ओबीसी मुख्यमंत्री है।प्रधानमंत्री मोदी खुद ओबीसी समुदाय से आते है।
मोदी कैबिनेट में इस समय सबसे ज्यादा 27 मंत्री ओबीसी समुदाय से हैं,जो कुल कैबिनेट मंत्रियों का 38 प्रतिशत है।अनुसूचित जाति(एससी) के 10 मंत्री है जो मोदी कैबिनेट का 14 प्रतिशत है,अनुसूचित जनजाति(एसटी) के 5 मंत्री है,जो मोदी कैबिनेट का 7 प्रतिशत है।
राहुल गांधी अगर लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद छोड़कर किसी ओबीसी नेता को विपक्ष का नेता बना देते है,तो ऐसे में वह ओबीसी के सच्चे हितेषी के रूप में अपनी छवि बना सकते है और यह बीजेपी के तमाम आरोपों का यह सबसे शानदार जवाब होगा।
राहुल को ओबीसी के हित में ऐसा करने की हिम्मत जुटानी चाहिए।