समाज और व्यक्ति
एक सराय थी जिसमें रुकने वाला व्यक्ति कभी ज़िंदा वापस नही लौटा. क्योंकि सराय में रुकने की एक ही शर्त थी कि सराय में एक खाट थी और रुकने वाला व्यक्ति को उस खाट के समान/बराबर होना ज़रूरी था. यदि कोई व्यक्ति खाट से छोटा पड़ता था तो उसे खींच के तान के खाट के बराबर किया जाता था इस बराबर होने की कोशिश में वह व्यक्ति मारा जाता था. और यदि कोई व्यक्ति खाट से बड़ा पड़ता था तो उस व्यक्ति को काट के खाट के बराबर किया जाता था इस कोशिश में भी वह व्यक्ति मारा जाता था.क्योंकि बड़े या छोटे दोनों ही उस खाट के बराबर होने की कोशिश में जीवित रहना मुश्किल हो गया और मौत हो जाती थी
ऐसे ही देश, धर्म और समाज एक सराय है और व्यक्ति समाज, धर्म और देश के पैरामीटर(मानक/आदर्श) सराय की खाट है और व्यक्ति इनके मानकों पर खरा उतरने की कोशिश में व्यक्ति का व्यक्तित्व मर जाता है और स्वयं का वजूद ख़त्म हो जाता है क्योंकि व्यक्ति या तो मानक से बड़ा होता है या छोटा लेकिन मानक(आदर्श) के बराबर कभी नही होता न हो न हो पाता है और यही आदर्श होने की कोशिश ही उसकी ज़िंदगी/व्यक्तित्व की मौत का कारण होता है और समाज के मानक और आदर्श व्यक्ति के असली दुश्मन हैं.
की हिंदू बनने की कोशिश में है तो कोई कोई मुस्लिम, कोई जातीय गर्व से भरा है तो कोई क्षेत्रीय
इराक़ कोशिश में व्यक्ति का व्यक्तित्व ही छीन लिया गया और व्यक्ति को पता ही नही.
चलो यादव समुदाय टिल्लू यादव के सजा की माँग करता है क्या अन्य आरोपियों के समुदाय सजा की माँग कर रहे हैं या बचाव ???
ग़ैर यादव समाज अपने समुदाय के दोषियों के प्रति हमदर्द और बचाव में उतरा है
सारी खबरों का लब्बो लुआब यही है
शुभांकर मिश्रा जी का देख लीजिए।
जो महत्वपूर्ण नाम आ रहा है उसमें टिन्नू यादव मुख्य हैं।
अधिकारी चपरासी से कह रहा है कि बजट का घोटाला सब इसी के कलम से हुआ है।
आज गोदी मीडिया आरएसएस व बीजेपी के आगे यह वर्ग कभी झुका नहीं तो बदनाम करते रहते हैं।
इस वकील का नाम हैं निरंजन कुमार , जो अभी रौशन आनंद सर का केस देख रहा हैं ,
कल इसने बयान दिया था कि खान सर का ISI और अलकायदा से संबंध हैं !
2022 में इंटर्नशिप करने वाली एक Law की स्टूडेंट का बलात्कार करने की कोशिश में ये जेल जा चुका हैं ,
अपने चैंबर में लड़की का हाथ पकड़ कर शारीरिक संबंध बनाने की मांग की थी , मना करने पर कहा था कि इसे गुरु दक्षिणा समझ लो,
और ये सारा कारनामा इसने अपने चैंबर में किया था , लड़की ने जैसे तैसे भाग कर अपनी जान बचाई थी !
लड़की चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट थी , उसने हिम्मत दिखाए हुए FIR दर्ज करवाया था !
लॉ कॉलेज के छात्रों ने उस समय पटना में काफी हंगामा भी किया , लेकिन ऊंची पहुंच होने के कारण इसे जमानत मिल गई थी !
आज राहुल गांधी का जन्मदिन है लिखने को बहुत कुछ है लेकिन जैसे ही आज फेसुबक खोला तो सबसे पहले भाई Aseem Tiwari की पोस्ट सामने आ गई अब उसे पढ़कर लगा कि आज के दिन इससे बेहतर और कुछ नहीं लिखा जा सकता और हम भी यही लिखते और पढ़कर ये भी लगा कि राहुल गांधी उम्मीद हैं और उस उम्मीद का सुरक्षित रहना भी जरूरी है इसलिए वो स्वस्थ रहें और उनके आसपास के लोग उनकी सुरक्षा का ध्यान रखें। अब आप असीम भाई का लिखा हुआ पढ़िए...✍️
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आज राहुल गांधी छप्पन साल के हो रहे हैं.
यह बधाई किसी दरबारी की आरती नहीं है, यह किसी पार्टी दफ्तर की दीवार पर चिपका पोस्टर नहीं है, यह उस आदमी को याद करने की कोशिश है जिसे इस देश की राजनीति ने सबसे आसान मजाक समझा, और जिसने उसी मजाक को धीरे धीरे अपनी जिद, अपनी यात्रा, अपनी भाषा और अपने धैर्य से एक गंभीर सवाल में बदल दिया.
राहुल गांधी को पसंद करना ज़रूरी नहीं है, उनसे सहमत होना भी ज़रूरी नहीं है, राजनीति में किसी भी नेता को देवता बना देना वैसे भी लोकतंत्र का पहला आलस्य है, लेकिन यह मानना पड़ेगा कि इस आदमी ने उस दौर में चलना चुना जब बाकी लोग उड़ते हुए पोस्टर बनना चाहते थे, इसने उस समय सुनना चुना जब हर तरफ सिर्फ भाषणों का धुआं था, इसने उस समय सवाल पूछे जब सवाल पूछना देशद्रोह, नकारात्मकता, परिवारवाद, टुकड़े टुकड़े और न जाने कितनी सरकारी मुहरों के नीचे दबा दिया गया था.
छप्पन साल की उम्र अपने आप में कोई उपलब्धि नहीं होती, उम्र तो कैलेंडर भी पूरी कर लेता है, फर्क यह है कि इन छप्पन सालों में आदमी ने क्या बचाया, अपनी भाषा बचाई या सिर्फ अपना नारा बचाया, अपना विवेक बचाया या सिर्फ अपनी जयकार बचाई, अपने भीतर मनुष्य बचाया या सिर्फ माइक के सामने खड़ा एक विशाल आकार बचाया.
एक तरफ छप्पन इंच का दावा था, सीना नापकर राष्ट्रवाद बेचने का महान भारतीय स्टार्टअप, मानो देश कोई दर्जी की दुकान हो और देशभक्ति का बिल कपड़े के नाप से बनता हो, दूसरी तरफ छप्पन साल का एक आदमी, जिसने छाती नहीं नापी, सड़क नापी, भीड़ नहीं खरीदी, लोगों के बीच गया, शक्ति का अभिनय नहीं किया, कमजोरी स्वीकार की, और यही बात कई लोगों को सबसे ज्यादा चुभती है.
क्योंकि ताकत का अभिनय करने वालों को सबसे अधिक डर उस आदमी से लगता है जो अभिनय नहीं करता.
राहुल गांधी की राजनीति की सबसे बड़ी बात यह नहीं कि वह हमेशा सही हैं, सबसे बड़ी बात यह है कि वह गलती करने के बाद भी मनुष्य दिखते हैं, वे गुस्से में भी आदमी लगते हैं, हार में भी आदमी लगते हैं, हँसी में भी आदमी लगते हैं, और आज की राजनीति में आदमी लगना भी एक जोखिम भरा काम हो गया है, यहां तो नेता या तो अवतार है या विज्ञापन, या तो महामानव है या महामंच, सामान्य मनुष्य के लिए जगह बची ही कहां है.
उन पर जितना हँसा गया, उतना शायद किसी भारतीय नेता पर नहीं हँसा गया, उनकी टीशर्ट से लेकर दाढ़ी तक, उनकी हिंदी से लेकर चाल तक, उनकी छुट्टियों से लेकर चुप्पियों तक, सब पर व्यंग्य हुआ, और कई बार ठीक भी हुआ, सार्वजनिक जीवन में आलोचना कोई अन्याय नहीं है, मगर एक समय के बाद यह साफ दिखने लगा कि मजाक विचार का नहीं था, मजाक उस संभावना का था जिसमें सत्ता से डरना बंद हो जाए
मैं राहुल गांधी को मसीहा नहीं मानता, मुझे मसीहाओं से दिक्कत है, मसीहा आते ही नागरिकों को भक्त बना देते हैं, और इस देश ने भक्तों की लागत बहुत ज्यादा चुका दी है, मैं राहुल गांधी का इसलिए सम्मान करता हूं कि उन्होंने कम से कम नागरिक को नागरिक कहने की कोशिश की, बेरोजगार को आंकड़ा नहीं कहा, किसान को फोटो अवसर नहीं कहा, छात्र को भीड़ नहीं कहा, मजदूर को राष्ट्र निर्माण का बैकग्राउंड म्यूज़िक नहीं बनाया, उन्होंने ऐसे लोगों की तरफ देखा जिन्हें सत्ता अक्सर कैमरे के बाहर रखती है.
यहां राहुल गांधी की बधाई दरअसल एक आदमी की बधाई नहीं है, यह उस संभावना की बधाई है कि राजनीति में अभी भी करुणा बच सकती है, असहमति बच सकती है, सवाल बच सकते हैं, और सबसे ज़रूरी, शर्म बच सकती है.
शर्म, वही चीज जो आजकल सबसे कम मिलती है.
छप्पन इंच की राजनीति ने हमें सिखाया कि नेता जितना ऊंचा बोलेगा, उतना बड़ा होगा, राहुल गांधी की छप्पन साल की उम्र शायद यह याद दिलाती है कि नेता कभी कभी धीमे बोलकर भी बड़ा हो सकता है, कभी कभी ठहरकर भी बड़ा हो सकता है, कभी कभी हारकर भी बड़ा हो सकता है, और कभी कभी मजाक सहकर भी बड़ा हो सकता है.
जो लोग छप्पन इंच पर फूल चढ़ाते रहे, उन्हें आज छप्पन साल के इस आदमी को देखकर थोड़ी बेचैनी होनी चाहिए, क्योंकि एक छप्पन शरीर का दावा था, दूसरा छप्पन समय की गवाही है, एक छप्पन ने डर पैदा किया, दूसरे छप्पन ने डर के बावजूद बोलना सीखा, एक छप्पन मंच पर गूंजता रहा, दूसरा छप्पन सड़क पर धूल खाता रहा, एक छप्पन ने भक्त पैदा किए, दूसरा छप्पन शायद नागरिकों को याद दिला रहा है कि झुकना कोई राष्ट्रीय कर्तव्य नहीं है.
जन्मदिन मुबारक राहुल गांधी.
कई बार आपसे असहमति रहेगी, सवाल रहेंगे, आलोचना भी रहेगी, लेकिन इस दौर में आपका होना ज़रूरी है, क्योंकि अंधेरे में हर दीया सूरज नहीं होता, पर हर दीया यह प्रमाण ज़रूर होता है कि अंधेरा अंतिम सत्य नहीं है.
छप्पन साल की उम्र में यह आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि है कि जिन्होंने आपको खत्म मान लिया था, वे आज भी आपको समझाने, छोटा करने, मिटाने और मजाक बनाने में अपनी पूरी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं.
राजनीति में आदमी की असली मौजूदगी वही होती है, जब उसके विरोधियों की नींद में भी उसका नाम आता रहे.
#HappyBirthdayRahulGandhi
आ गये RSS वाले अपने असली रूप में. यही लिखा था यहां कि इनकी परेशानी यही है कि एक दलित समाज से आने वाला मंत्री उनसे कह रहा कि काग़ज़ दिखाओं.
जो परेशानी RSS की है वही तमाम जातिवादी हिंदुओं की भी है. इस मनुवादी संगठन के बचाव में कौन कौन उतरता है देखते जाइये. मुझे तो नहीं होगा लेकिन बहुतों को ज़रूर बहुत आश्चर्य होगा.
रामचंद्र गुहा जैसों के लिये काम बढ़ गया है.
True - Marathi will vanish if they continue to speak in other Languages!!!
Do you know people and party like yours are termed as illiterate goons in the civilized world.
You people are so jobless that you have no other work other than this
You people bring shame and disgust to this Country globally
That’s your identity
महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतररार्ष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने आरती कुमारी के डॉक्टरेट थीसिस जमा करने के एक महीने बाद जुलाई 2018 में उन्हें और चार अन्य छात्रों को निलंबित कर दिया था. विश्वविद्यालय ने कहा कि यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि उन पर भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे, जिनमें स्वेच्छा से किसी महिला का गर्भपात कराना भी शामिल है.
आरती ने मुझे बताया, ‘उन्होंने हमारी बात तक नहीं सुनी. मेरी पीएचडी का मूल्यांकन रोक दिया गया, जबकि हमने बार-बार बताया कि यह एक झूठा मामला था. कुलपति ने हमसे मिलने से भी इनकार कर दिया.’ सितंबर तक मामला ख़ारिज कर दिया और निलंबन भी रद्द कर दिया गया. लेकिन आरती की मुश्किलें ख़त्म नहीं हुईं. उन्होंने बताया कि उनकी थीसिस दो बार बिना कोई कारण बताए विभाग को वापस भेज दी गई और उनकी डॉक्टरेट की उपाधि अधर में लटकी रही. उस समय तक आरती का विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ टकराव इतना बढ़ चुका था कि उन्हें प्रशासन की बात पर बहुत भरोसा नहीं रह गया था.
आरती ने मुझसे कहा, ‘जिस तरह से सामान्य वर्ग ने पूरे भारत में यूजीसी विधेयक का विरोध किया और सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाने के लिए जिस तेज़ी से काम किया, उसने मुझे विश्वविद्यालय में झेले गए उत्पीड़न की याद दिला दी.’
पढ़ें यूजीसी के समानता संबंधी नियम के विरोध के जरिए भारत के सामाजिक समीकरणों को समझती सुनील कश्यप की यह रिपोर्ट: https://t.co/2qWcTtNFT0
इस देश मे कुछ सवाल सिर्फ राहुल गांधी के लिए रिजर्व हैं।
जिनका दायरा, मोहम्मद गोरी लेकर खलजी, बाबर, औरंगजेब, अंग्रेज, नेहरू, इन्दिरा, मनमोहन तक फैला हो सकता है।
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राहुल की क्वालिफिकेशन के बारे मे रामचन्द्र गुहा का सवाल, ऐसा ही स्पेशल सवाल है। भारत के 99% नेता, नेता बनने के पहले क्या करते थे, इसकी जानकारी न तो आम लोगो है,
न वे इसकी परवाह करते हैं।
मसलन, बिना कोई अनुभव , बिना कोई चुनाव लड़े, डायरेक्ट शपथ लेकर अनिर्वाचित मुख्यमंत्री बनने के पहले, हमारे प्रधानमंत्री क्या करते थे??
पब्लिक डोमेन में इसकी सूचना शून्य है।
अब भले वे खुद स्वीकार करें, कि वे पढ़े लिख नही पाये, स्टेशन पर चाय बेची, 35 वर्ष भिक्षाटन करते रहे - तो भी इससे किसी को फर्क नही पड़ता।
मगर राहुल के बारे मे जानना है।
गहराई से, और तथ्यपरक जानना है।
और नकारना है।
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दरअसल राहुल से उसकी योग्यता नही पूछी जाती, उन्हें प्रच्छन्न रूप से निर्योग्य घोषित किया जाता है। और निर्योग्यता का एक ही कारण है- गांधी सरनेम के साथ पैदा होना..
और दरअसल यही गुहा जैसो का ऑब्जेक्शन है। वरना तो 5 बार का सांसद, 4 राज्य सरकारो का पॉवर सेंटर, केंद्रीय सरकार में 10 साल तक निर्णय बदलने की ताकत रखने वाला शख्स.
जिसे विभिन्न संसदीय समितियों में दो दशक का अनुभव हो,
पब्लिक पॉलिसी की पुख्ता समझ हो, कैम्ब्रिज मे पढ़ा हो और और अर्थव्यवस्था की दशा दिशा की बार बार सटीक पूर्वसूचना देता हो, अगर किसी और दल या देश में में 100 सांसद लेकर बैठा होता..
तो उससे यह सवाल करने की हिम्मत किसी मे न होती।
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लेकिन आप राहुल से पूछ सकते है।
क्योकि राहुल से डर नही लगता।
रामचन्द्र गुहा का वह वीडियो हमने देखा है, जिसमे सरकार के विरुद्ध तख्ती लेकर खड़े हो जाने भर से पुलिस उन्हें कुत्तो की तरह घसीटकर ले गई। इसके बाद वे दोबारा सरकार के नाम की तख्ती लेकर चौराहे पर नही गए।
राहुल के नाम की तख्ती सेफ है।
गुहा को पता है।
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और यही "सेफ" फीलिंग राहुल की उपलब्धि है। उसके 20 साल के पोलिटिकल करियर का एसेंस है।
रामचन्द्र गुहा इस देश मे भाजपा/ मोदी की हेजेमनी को राहुल पर थोपते है, तो उनके इतिहासकार होने की समझ पर शक होता है।दरअसल, जो वे स्वीकार करने से बच रहे है, वो यह कि आज देश की राजनीतिक हालात, एक आम चुनावी राजनीति नही, एक कंट्रोल्ड सामाजिक परिवर्तन है।
यह परिवर्तन, मीडिया, ज्युडिशयरी, चुनाव आयोग, ब्यूरोक्रेसी और एजेंसियों के शीर्ष पर कठपुतलियां बिठाकर थोपा गया है। जिसके नीचे जनाक्रोश उबल रहा है।
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इस आक्रोश की प्रतिक्रिया को विस्फोटक, और विध्वंसक होने से बचाने, और गृहयुद्ध समान हालात टालने के लिए किसी भी विपक्ष को बहुत धैर्यवान, सॉफ्ट होने की जरूरत है।
वरना जिस स्ट्रीट फाइट, सँगठनीकरण और आक्रामक राजनीति की अपेक्षा, राम गुहा आज राहुल गांधी से कर रहे है- उसका नतीजा पिछले 1 माह का बंगाल, और 3 साल से मणिपुर देखकर समझ लेना चाहिए।
आप पूरे देश मे ऐसा चाहते हैं???
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गम्भीर इतिहासकार जानता है, कि ऐसी सत्ता अपनी कब्र खुद बड़ी गहरी खोदती है।
मौजूदा दौर उन भावनाओ का एक्सप्रेशन है, जिसे हमारे समाज ने 70 साल तक ऐसे छिपा रखा था रखी थी, जैसे कोई बूढा अपने किशोर उम्र के कुटैव छिपाकर रखता है। बेहयाई को मान्यता मिलते ही वह धारा खुलकर खेल रही है।
लेकिन तमाम धन, ताकत, नंगई और मैनिपुलेशन के बावजूद 37-38% जनसमर्थन उसका पीक था। अब तो आगे सिर्फ ढलान है।
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गुहा हों, या उनकी तरह डेस्परेट दूसरे लोग, जान लें कि हिंदुस्तान की आत्मा इस तरह बहुत देर कुचली नही जा सकती।
इस झँजवात से बाहर निकलने का रास्ता, यह देश जल्द तय करेगा। पर उस उबाल का पथ प्रदर्शक कोई ईमानदार, दूरदर्शी, और नैतिक मूल्यों पर ठहराव रखने वाला ऐसा शख्स होना चाहिए। जो शांति, साहचर्य और मेल मिलाप का चेहरा हो।
इस वक्त, बिलाशक..
वह राहुल है।
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इस दौर का बुद्ध है।
जिसे महज राजघराने की पैदाइश की वजह से खारिज कर देना, और खास तरह की प्रतिक्रियाओं की आशा रखना, बौद्धिक नही- बायस्ड होने के लक्षण हैं।
जो राम गुहा कई बार प्रदर्शित कर चुके हैं। उनका फैन होने के नाते उन्हें सप्रेम सलाह है कि वे समाज मे अपनी उम्र औऱ अनुभव का आडम्बर बनाये रखें। भ्रम और खीज की शिकार जुबान को विराम दें।
और मौन की शक्ति महसूस करें।
पांडे जी अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे, इसलिए महान हुए।
पाठक जी अंग्रेजों की सेना में रहते हुए बहुत बहादुरी दिखा चुके थे, इसलिए महान हुए।
अवस्थी जी देश में स्वतंत्रता की अलख जगाकर महान हो गए।
चौबे जी ने अंग्रेजों की लिए मुखबिरी करके इनाम में इतना धन कमा लिया कि उनकी दौलत के आगे झुककर उन्हें महानता का खिताब दिया गया।
मिश्रा जी अंग्रेजों को हटाने से ज्यादा हिंदुओं को एकजुट करना जरूरी समझते थे, इसलिए महान हो गए।
त्रिवेदी जी इन सब झंझटों से दूर शांति पसंद जीवन जी रहे थे, और आदर्श नागरिक का किरदार अदा करके महान हो गए।
विश्वस्तर पर देश को आगे बढ़ाने के लिए अंग्रेजी को बढ़ावा देने के पक्षधर अग्निहोत्री जी, और अंग्रेजी को गुलामी का प्रतीक मानने वाले पौराणिक जी, दोनों महानता को प्राप्त भए।
झा साहब लाख अवसर मिलने पर भी विदेश नहीं गए, और हमेशा उन्होंने मातृभूमि में ही रहना पसंद किया, इसलिए महान कहे जाने लगे, लेकिन पड़ोस का व्यास जी का लड़का विदेश तक जाकर देश का झंडा गाड़ आया, इसलिए महान हो गया।
तिवारी जी अंग्रेजी में बहुत होशियार थे, इसलिए उनका डंका बज गया। और त्रिपाठी जी ने हमेशा संस्कृत का झंडा बुलंद किया, इसलिए महान हो गए।
गोस्वामी जी लिख-लिखकर महान हो गए, और शर्मा जी ने लेखन को म्लेच्छ कर्म मानकर तमाम योग्यताओं के बावजूद लेखन नहीं किया, इसलिए महान हो गए। ओझा साहब ने जाति लिखना बंद कर दिया, इसलिए महान हो गए, भारद्वाज जी जाति पर अद्भुत तरीके से गर्व करने के कारण महान हो गए।
चतुर्वेदी जी ने दलितों के लिए लड़ाई की, इसलिए महान होने ही थे, वशिष्ठ जी ने दलितों को उनकी औकात में रखकर संस्कृति की रक्षा में अमूल्य योगदान किया, इसलिए महान कहे गए।
जोशी जी ने समाजवाद का झंडा गाड़कर महानता हासिल की, शुक्ला जी ने वामपंथ का लाल झंडा उठाकर महानता झटकी, तो वाजपेयी जी आरएसएस के पुरोधा होते हुए महान जा बने, मालवीय जी से महानता कांग्रेस के रास्ते टकराई।
....और किसी की महानता का नंबर आ ही नहीं पा रहा है।
-Mahendra Yadav
भाजपा सरकार की घटनाओं पर जिक्र करें और पैटर्न समझे तो समझना कोई रॉकेट साइंस नही है
जैसे कि
हाथरस कांड में रात को ही पुलिस द्वारा शव जला देना बिना परिवार की सहमति के
BHU कांड में और चिन्मयानंद के केस में सबूत होने के बावजूद पीड़िता पर FIR और दोषियों का बचाव
माधवी बुच पर SIT
ips अनिरुद्ध सिंह पर SIT
तमाम उदाहरणों से पैटर्न समझना आसान है अगर कोई स्वाभाविक रूप से समझना चाहे तो
मतलब योगी चाहते हैं कि चोरी के इतने सबूत और खुलासों के बाद भी लोग मुँह बंद करके बैठे रहें ? जिनकी राजनीति बयानों से ही चलती है , वो चाहते हैं कि चंदा चोरी के खुलासों पर बाकी लोग मौन साधे रहें ?
राम मंदिर में चंदा चोरी के सबूत तो आ गए हैं . अब ये पता लगना बाकी है कि चंदा चोरों के गिरोह का सरगना कौन था ? कितने करोड़ की चोरी हुई ? कब से हो रही थी ? सीसीटीवी के फुटेज कौन डिलीट करवा रहा था ? अब तक FIR क्यों नहीं हुई ?
We all know about #2GScam
Why was it a #Scam?
Since allegations were that the “perceived” value of the spectrum auction could not be achieved!!!
हम सभी #2GScam के बारे में जानते हैं।
लेकिन यह #Scam क्यों था?
क्योंकि आरोप यह था कि स्पेक्ट्रम आवंटन का वह “अनुभूत” (Perceived) मूल्य हासिल नहीं हो सकी , जो नीलामी के जरिए प्राप्त हो सकता था!!!
So my dearest phreeendddd Dolaaand - Isn’t this a #Scam???
The “perceived” value of revenues which could’ve been generated through tourism and other auctions in the region couldn’t be achieved at all, eh!!!
तो मेरे प्यारे फ्रेंड डोलाआआंड…
क्या यह #Scam नहीं है???
इस क्षेत्र में पर्यटन और अन्य नीलामियों के माध्यम से जो राजस्व उत्पन्न हो सकता था, उसका “अनुभूत” (Perceived) मूल्य हासिल ही नहीं हो सका… है ना!!!
#PoK #पाक_अधिकृत_कश्मीर
प्रभु राम मेरे सपने में आए
डीबीटी स्कीम लागू कीजिए प्रभो!
कल रात प्रभु राम मेरे सपने में फिर आए। इस बार काफी अरसे बाद आए। जब भी वे व्यथित या क्रोधित होते हैं, मेरे सपने में आ जाते हैं। पता नहीं वे मेरे ही सपने में क्यों आते हैं, जबकि वे जानते है कि मैं पक्का नास्तिक हूँ और उनका भक्त तो कतई नहीं हूँ। भक्त न होने के कई कारण हैं मगर बताऊँगा नहीं क्योंकि भक्त नाराज़ हो जाएंगे। शायद इसलिए आ जाते होंगे क्योंकि मैंने उनसे कभी कुछ मांगा नहीं। या फिर उस जन्म में शंबूक रहा होऊंगा और शंबूक हत्या का अपराधबोध उन्हें मेरे सपनों में खींच लाता हो।
बहरहाल, वे आए और दुखी मन से मेरे सामने बैठ गए।
कुछ देर मैं उनके बोलने का इंतज़ार करता रहा, मगर जब वे चुप ही रहे तो मैंने पूछा- क्या हुआ प्रभो...क्या ग़ज़ा पट्टी से आ रहे हैं जो इतने दुखी हैं। लेकिन इस्राइल से आप और अपेक्षा भी क्या कर सकते हैं। वह तो 75 साल से यही ख़ूनी होली खेल रहा है।
उन्होंने मेरी ओर देखा और सिर झुका लिया। उनकी इस क्रिया का मतलब था कि वे न तो ग़ज़ा पट्टी गए थे और न ही उसकी वज़ह से नाराज़ थे।
वैसे भी वे गज़ा पट्टी क्यों जाते। वो दूसरे भगवानों की टेरिटरी है। अब वे अपने इलाक़े का ध्यान रखें जो कि उनकी ज़िम्मेदारी है कि ग़ज़ा पट्टी और वेनेज़ुएला के चक्कर में पड़ें।
मैंने एक और कयास लगाया। अरे जाने दीजिए मोदी जी को। अगर वे राजधर्म भूल गए हैं या उसके पाठ उन्होंने पढ़े ही नहीं तो आप क्या कर सकते हैं। गुजरात से लेकर दिल्ली तक वे यही करते आए हैं- हिंदू-मुसलमान। आप भी कुछ दख़ल देते नहीं इसलिए वे सुधरते नहीं। ऐसे में चीज़ें तो ऐसे ही चलेंगी न....
प्रभु राम के चेहरे पर खिन्नता के भाव और गहरे हो गए। माथे की सलवटें गाढ़ी हो गईँ। उन्होंने गहरी साँस भरी और सिर से मुकुट उतारकर बगल में रख दिया।
कुछ क्षण उनके चेहरे पर भाव आते-जाते रहे। फिर वे थकी हुई आवाज़ में बोले- ये क्या हो रहा है वत्स...राम के नाम को कितना बदनाम किया जाएगा....राम के नाम पर कितनी लूट मचाई जाएगी।
मेरी समझ में नहीं आया कि प्रभु राम क्या कह रहे हैं....राम के नाम पर लूट तो सैकड़ों सालों से चली आ रही है। पंडे-पुराहित तो जाने कब से लूट रहे हैं। इसमें नई बात क्या है।
मैं जब प्रश्नाकुल मुद्रा में उनकी ओर देख रहा था तो वे समझ गए। उन्होंने तुरंत कहा- मैं अयोध्या मंदिर में दान चोरी की बात कर रहा हूँ।
बात तुरंत मेरी समझ में आ गई, पर मैं चुप रहा।
वे आगे बोले- देखो वत्स, मुझे ये जानकर बहुत धक्का पहुँचा है कि मेरे नाम पर एक ग़लत आंदोलन चलाकर मेरे भक्तों को भ्रमित किया गया। फिर मेरे नाम पर छल-छद्म से मंदिर बनाया गया और मेरे नाम पर ही वहाँ ऐसे लोगों को बैठाया गया जो अब इस तरह के पाप कर्मों में लिप्त हैं।
मैंने कहा- देखिए भगवन्....आपको इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहिए। करने दीजिए घोटाला....रौरव नरक में सड़ेंगे सब। आप तो आराम से वहाँ बिराजो। श्रद्धालुओं की बातें सुनो, उनके लिए कुछ कर सकते हो तो करो, बाक़ी सब भूल जाओ।
प्रभु राम ने मेरी ओर क्रोधित नज़रों से देखा और बोले- क्या तुमने मुझे अपनी सरकार समझ रखा है कि वोट ले लो, सरकार बनाकर मौज़ करो, विदेश यात्राएं करो और जनता को भूल जाओ।
नहीं भगवन, मैं तो ये कह रहा था कि ज़्यादा टेंशन मत लो.....
वे बोले- टेंशन क्यों न लूँ.....मेरा तो काम ही यही है.....मैं जगत का पालनहार अगर अपने ही भक्तों से मुँह मोड़ लूंगा तो कैसे चलेगा.....इन लोगों ने मेरे भक्तों के साथ विश्वासघात किया है.....उनके चंदे की चोरी की है....उनके दान को लूटा है.....मेरे मंदिर के निर्माण के लिए जो स्वर्ण आभूषण और शिलाएं दी गई थीं, वे तक ग़ायब कर दी हैं।
लेकिन आपके भक्तों को छलने का काम तो ये लोग बरसों से कर रहे हैं। आख़िर राम मंदिर की लूटपाट से ही आप इतने उद्वेलित क्यों हैं....
तुम्हारी बात ठीक है वत्स मगर मैं थोड़ा लोभ में पड़ गया था। मुझे लगा था कि मेरी जन्मस्थली में मेरा एक आवास है, वहाँ तो शुचिता और पवित्रता होगी ही।
आप बेकार में एक ऐसे मंदिर का मोह पाल रहे हैं, जिसके अभियान में, निर्माण में ही अपवित्रता भरी हुई है। आप बताइए कि क्या सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला न्याय करने वाला था? सब जानते हैं कि उसने तथ्यों को दरकिनार करके मंदिर-पक्ष के हक़ में फ़ैसला सुनाया था, जो कि दूसरे पक्ष के साथ अन्याय था।
तुम्हारा कहना सही है, मगर मैंने सोचा था कि चलो मामला सुलट रहा है, सुलट जाने दो।
ये तो कोई बात नहीं हुई। आपने जानते-बूझते अन्याय को स्वीकार कर लिया।
तुम सही कह रहे हो। तुमको याद है कि मैं उस समय तुम्हारे सपनों में आया था और कितना उद्विग्न था। मैं तो अयोध्या त्यागने के लिए ही तैयार था। मगर मैंने मन मसोसकर फ़ैसले को मान लिय़ा था। मुझे लगा था कि इस पूरे मामले का यहीँ पटाक्षेप हो जाएगा।
चलिए मान लिया। मगर उसके बाद मंदिर के नाम पर ज़मीन का घोटाला भी किया गया। दो करोड़ की ज़मीन 18 करोड़ में खरीदी गई।
अरे ये तो मानवीय स्वभाव है, माया सबको लुभाती है। थोड़ा हेरफ़ेर तो ये करेंगे ही, ये मानकर मैं चुप रह गया।
लेकिन आपने तो तब भी कुछ नहीं किया था जब चुनाव में फ़ायदा उठाने के मक़सद से आधे-अधूरे राम मंदिर का उद्घाटन किया गया था। पूरे कार्यक्रम में आपसे ज़्यादा प्रधानमंत्री दिखलाई दिए थे।
हाँ, ये तो बहुत अखरने वाली बात थी। ऐसा लग रहा था कि मेरा नहीं, प्रधानमंत्री का मंदिर बना है और उसी की पूजा हो रही है।
चुनाव में यहाँ तक कहा गया था कि जो राम को लाए हैं उनको सत्ता में लाना है। बड़े-बड़े बैनरों में प्रधानमंत्री आपको उँगली पकड़कर लाते दिखाए गए थे।
हाँ, इसी निर्लज्ज अभियान से कुपित होकर मैंने इन्हें बहुमत से पीछे धकेल दिया था। इनकी अक्ल ठिकाने लगाने के लिए ही मैंने यूपी में इनका सफ़ाया करवा दिया था। मेरे कान में फुसफुसाते हुए वे बोले-तुम्हें बता दूँ कि इन्होंने मुझसे चार सौ सीटें मांगी थीं, मगर मैंने दंडित करने के लिए 150 सीटें ही दी थीं। लेकिन बाक़ी की सीटें इन्होंने छल-कपट से जीत लीं।
और अब जीतने के बाद मंदिर को लूटा जा रहा है। करोड़ों रुपए का घपला किया जा रहा है।
हाँ, यही मेरे वर्तमान दुख का कारण है।
मैंने सहानुभूति के साथ कहा-दुखी मत होइए, बल्कि ऐसे मंदिर के मोह से मुक्त होइए प्रभो। आप ये देखिए कि पूरे देश में आपकी जय जयकार हो रही है। आपके भक्त उन विधर्मियों से भी जय श्रीराम बुलवा रहे हैं जो बोलना नहीं चाहते। जो नहीं बोलते, वे उनकी खाल खींच लेते हैं, उनकी जान तक ले लेते हैं।
तुम मेरे ऊपर व्यंग्य कर रहे हो....
नहीं भगवन्, मेरी इतनी औकात कहाँ है....मैं तो बस आपसे कह रहा था कि राम मंदिर ही आपकी अयोध्या नहीं है। पूरे भारत पर ग़ौर कीजिए, कैसी-कैसी लूट मची हुई है। धन्ना सेठ दिन रात लूट रहे हैं, अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं और ग़रीब जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। लेकिन आप उनका आर्तनाद सुन ही नहीं रहे हैं इसलिए उनका विश्वास भी आप पर कमज़ोर होता जा रहा है।
तुम ठीक कहते हो वत्स। पृथ्वीलोक ही जब मेरा निवास है तो एक मंदिर का मोह क्या करना। लेकिन लाखों-लाख भक्त वहाँ आ रहे हैं उनको कैसे निराश करूँ।
ये कोई बड़ी समस्या नहीं है। इसका भी समाधान निकाला जा सकता है।
कैसे...
आप एक काम कीजिए। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम लागू कीजिए। ये बीच के दलालों को हटाइए। भक्तों के घर जाकर दर्शन दीजिए और उनकी समस्याएं सुनकर हाथों-हाथ निवारण कीजिए। इससे भक्त इन पाखंडियों और सत्तालोलुपों से छले भी नहीं जाएंगे और उनका आप पर भरोसा भी बना रहेगा।
फिर तो सारे मंदिर खाली हो जाएंगे। ये पंडे-पुरोहित मेरे ख़िलाफ़ अभियान छेड़ देंगे। कहीं ऐसा न हो कि साज़िश करके कोई नया भगवान ही खड़ा कर दें और उसे मेरे से ज़्यादा ताक़तवर घोषित कर दें।
आपकी आशंका सौ फ़ीसदी सही है प्रभो। ये यही करते आए हैं और करेंगे। लेकिन आप तो सर्वशक्तिमान हैं। आपको इससे क्यों घबराना चाहिए....आप तो अपने तीरों से इनके शरीर छलनी कर सकते हो.....इनकी मति फेर सकते हो।
ठीक है। मैं अब ऐसा ही करूँगा। मैं अब अयोध्या के मंदिर में रहूँगा ही नहीं। अब मैं भक्तों के मन में वास करूँगा।
मैं प्रभो राम को प्रणाम करता इसके पहले ही वे अंतर्ध्यान हो गए। मैं उनसे ये निवेदन भी करना चाहता था कि बड़ा दिल दिखाइए और जो आपके भक्त नहीं हैं उनको भी डीबीटी स्कीम का लाभ दीजिए, मगर तब तक वे जा चुके थे। ख़ैर अगली बार आएंगे तो कहूँगा।
बहरहाल, नींद खुलने के बाद से सोच रहा हूँ कि अगर भगवान राम ने सचमुच ऐसा कर दिया तो हमारा ये महान भारत कितना सुखी और संपन्न हो जाएगा। लेकिन मन में खटका बना हुआ है कि क्या राम मंदिर का मोह छोड़ पाएंगे, क्या वे पंडे-पुरोहितों और नेताओं के चंगुल से निकल पाएंगे?
-मुकेश कुमार
ओपन एक्सेस | कुछ ही दिन पहले, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिल्ली के लाल किला से कहा था कि, 'आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है.' मोदी के बयान ने वही बात साफ़ कर दी जिसे भागवत उलझा कर पेश कर रहे थे. सच यह है कि आरएसएस से जुड़े कई संगठन समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में फैले हुए हैं और यही विस्तृत नेटवर्क संघ की शक्ति का असली आधार है.
अब यह सवाल उठता है कि यह नेटवर्क कितना बड़ा है, कैसा है और कैसे काम करता है? इसकी कोई ठोस जांच आज तक क्यों नहीं हुई? इसकी वजह साफ़ है कि संघ ख़ुद इसे यूं ही धुंधला रखना चाहता है.
संघ आधिकारिक तौर पर किसी भी रूप में दर्ज नहीं है, न ही किसी एनजीओ के रूप में, न किसी धार्मिक ट्रस्ट के तौर पर और न ही किसी अन्य क़ानूनी संस्था के रूप में. कागज़ों पर ‘ग़ायब’ रहने की यह रणनीति उसे सुविधा देती है कि वह देश की राजधानी में अपना मुख्यालय बना ले बिना यह बताए कि उसका फंड कहां से आता है और उसके सदस्य कौन हैं. सबसे अहम बात यह है कि संघ अलग-अलग संगठनों और लोगों के ज़रिए काम करता है, लेकिन जब भी उससे ‘माध्यम’ या ‘प्रॉक्सी’ के बारे में पूछा गया कि वह कौन हैं और उनसे उसका संबंध कैसे चलता है, वह इस सवाल को नज़र अंदाज़ कर देता है.
'सीइंग द संघ' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध उन संगठनों का विश्व का पहला मानचित्र है, जो मिलकर विश्व का सबसे बड़ा धुर दक्षिणपंथी नेटवर्क बनाते हैं।
यह इंटरैक्टिव डेटासेट 'साइंस पो' के अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र (सीईआरआई) में स्थित एक भंडार में संग्रहीत है. इसमें वर्तमान में ढाई हज़ार से अधिक संगठनों का व्यापक गुणात्मक और मात्रात्मक डेटा शामिल है और इसकी फैक्ट चेकिंग करके इसे द कारवां द्वारा प्रकाशित किया गया है।
नेटवर्क मानचित्र यहां देखें: https://t.co/dnRTIFsaWF
इस प्रोजेक्ट पर विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें फेलिक्स पाल का लेख: https://t.co/G3aM1bILVX