कोई यह काम नहीं करता है मगर मैं कर रहा हूँ। बहस हो सकती है तो हो। लेकिन इंटरव्यू का फ़ोन आपदा का रूप ले चुका है। इसके लिए अलग तैयारी और समय की ज़रूरत होती है। इंटरव्यू को ऐसे बना दिया गया है जैसे मॉल से शर्ट लेने जाना है। ऐसे किसी का इंटरव्यू नहीं होता और न करना चाहिए।
पहले रिपोर्टिंग की विधा ख़त्म कर दी गई फिर ऐंकरिंग की। डिबेट के नाम पर भ्रम फैलाया गया कि पत्रकारिता हो रही है। अब उसकी भी साख समाप्त हो गई तो इंटरव्यू के नाम पर पत्रकारिता का भ्रम रखा जा रहा है। सवाल से लेकर इंटरव्यू करने वाले पत्रकार का चयन और बहिष्कार होने लगा। पत्रकारिता को ख़त्म कर देने के बाद इंटरव्यू झाँसा हो गया है कि अभी पत्रकार हैं और पूछ रहे हैं। सूचनाओं का संग्रह समाप्त हो चुका है। बिना ख़बरों के सवाल भी वही होते हैं जो नेता एक दूसरे के लिए पैदा करते हैं। जिनकी जवाबदेही है वे इंटरव्यू के नाम पर रस्सी कूद रहे हैं और पुश अप लगा रहे हैं।
खैर बहुत बातें लिखीं जा सकती हैं। लिखने का उतना समय और मन नहीं है। यह विषय बहुत विशाल है। जो कर रहे हैं उन्हें शुभकामनाएँ। मुझे करना होगा तो ख़ुद फ़ोन करूंगा। फ़िलहाल इस सार्वजनिक सूचना समझें और मुझे राहत दें।
"कहना होता है, बताना होता है...
बोलना होता है, जताना होता है...
बंद लबों से कभी इज़हार नही होते...
चुप रहने से कभी इकरार नही होते..."
#ManKahtiHai#BasEkKhayal#इज़हार#इकरार#इश्क