राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद के अधीन समग्र शिक्षा कार्यालय बाड़मेर में विद्यालयों को सामग्री आपूर्ति के नाम पर करीब ₹60 लाख के कथित फर्जी भुगतान और राजकीय धनराशि के गबन का मामला सामने आया है। सूत्रों के अनुसार फर्जी भुगतान स्वीकृतियां तैयार कर निजी फर्मों के नाम पर राशि जारी किए जाने की शिकायत परिषद मुख्यालय तक पहुंची है। एक कनिष्ठ लेखाकार ने पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच, दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई और धनराशि की वसूली की मांग की है। @BarmerDm@rajeduofficial@RajGovOfficial
इस वीडियो ने मुझे झकझोर दिया।
ये उस भारत के लाचार युवा हैं - जिसकी सरकार अपने अरबपति दोस्तों पर लाखों करोड़ लुटा देती है, पर अपने ही छात्रों को एक सुरक्षित सफ़र तक नहीं दे सकती।
चुनाव के वक़्त यही सरकार पूरी-पूरी ट्रेनों का इंतज़ाम कर लेती है। और परीक्षा देने जा रहे छात्रों के हिस्से में आती है - भीड़, घुटन, और बेबसी।
इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि मोदी सरकार छात्रों की गूंज सुनना ही नहीं चाहती।
पर मैं वादा करता हूँ - हम यह आवाज़ उन बहरे कानों तक पहुँचाएँगे। हर छात्र को उसका हक़ मिलेगा, उसका न्याय मिलेगा।
17 जून, कोटा। यही गूंज, अब हुंकार बनेगी।
#ChhatronKiGoonj
देश के हर युवा से मेरी एक बात - आज इस देश में मेहनत का फल नहीं, सपने देखने की सज़ा मिलती है।
हर पेपर लीक, हर रद्द परीक्षा, हर अधूरी भर्ती - सिर्फ़ सिस्टम की विफलता नहीं, लाखों सपनों पर प्रहार है।
मैं जानता हूँ आप थक चुके हैं। ग़ुस्से में हैं। पर याद रखिए - जब सरकार सुनने को तैयार न हो, तब आवाज़ ऊँची करनी पड़ती है।
इसलिए मैं आप सबको बुला रहा हूँ - 17 जून, कोटा। छात्रों की गूंज।
आइए, मिलकर एक ऐसी हुंकार बनें जिसे अनसुना करना नामुमकिन हो। कोटा से शुरुआत - फिर देश के हर कोने तक।
ये आपके भविष्य की लड़ाई है। और मैं आपके साथ हूँ।
🗓️ 17 जून | छात्रों की गूंज | कोटा महारैली
#ChhatronKiGoonj
अमरीका ने चार दिन में हिंदुस्तान के तीन जहाज़ों पर हमला किया, बिना चेतावनी दिए, और हमारे कई नागरिकों को मार दिया। फिर भी मोदी सरकार चुप्पी साधे हुए हैं!
कई साथियों ने INDIA गठबंधन की बैठक में मेरे भाषण का हिंदी अनुवाद मांगा था - यह रहा, ज़रूर सुनें।
8 जून को INDIA गठबंधन की बैठक में 20 से भी ज़्यादा नेताओं के भाषणों और बातों को सुनने के बाद आखिर में मैंने इस भाषण से उन्हें संबोधित किया।
जब भारत की सोच, देश की आत्मा पर संकट हो... जब संस्थाओं पर कब्ज़ा हो... जब जनता की आवाज़ दबाई जाए...तब सिर्फ़ एकता के साथ प्रतिरोध काम आता है।
मैं फिर से कह रहा हूँ - 2024 का चुनाव हम हारे नहीं थे और 2029 का चुनाव हम जीत चुके हैं।
हम एकजुट रहेंगे, जन-जन को संगठित करेंगे और प्रतिरोध की ताकत से BJP और उसके भारत के संस्थानों पर कब्ज़े को हराएंगे।
https://t.co/JkKgow6pi7
माननीय श्री अशोक गहलोत जी @ashokgehlot51 का हार्दिक आभार।
व्यावसायिक प्रशिक्षक संघर्ष समिति, के पत्र पर संज्ञान लेकर व्याव. प्रशिक्षकों की समस्याओं को सरकार के समक्ष रखने हेतु आपके प्रयास सराहनीय हैं।
हमें आशा है कि प्रशिक्षकों को स्थाई जॉब नीति, व सेवा सुरक्षा का न्याय मिलेगा।
राजेश पायलट: मिट्टी से उठकर राजनीति के आकाश में चमका एक नक्षत्र
राजेश पायलट।
कल्पना कीजिए, सफ़ेद बालों, उसी दृढ़ चेहरे और किसान-जवान के प्रश्नों पर गरजती हुई आवाज़ के साथ वे आज की राजनीति को किस निगाह से देख रहे होते! उस राजनीति को, जिसमें साधनहीन प्रतिभाओं के लिए दरवाज़े संकरे और धन, वंश तथा चाटुकारिता के लिए राजमार्ग चौड़े होते जा रहे हैं।
राजेश पायलट का मूल नाम राजेश्वर प्रसाद था। अत्यंत साधारण और अभावग्रस्त पशुपालक परिवार में पले इस मेधावी युवक ने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज तक अपनी राह बनाई। वह कॉलेज, जहाँ से निर्मल वर्मा, सुचेता कृपलानी, गोपालकृष्ण गांधी, राजमोहन गांधी, गोपीचंद नारंग, अमिताव घोष और रामचंद्र गुहा जैसी विलक्षण प्रतिभाएँ निकलीं। राजेश्वर प्रसाद का वहाँ पहुँचना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था; वह उस ग्रामीण भारत की विजय थी, जिसके बच्चों के पाँव में धूल अधिक और अवसर बहुत कम होते हैं।
उन्होंने भारतीय वायुसेना में पायलट की प्रतिष्ठित नौकरी प्राप्त की, लेकिन आकाश में उड़ते हुए भी उनकी दृष्टि नीचे खेतों पर टिकी रही। किसानों की बदहाली ने उनके भीतर यह प्रश्न जगाया कि इस जीवन में ही इन परिस्थितियों को बदलने का रास्ता क्या है। उन्हें उत्तर राजनीति में दिखाई दिया। उन्होंने सुरक्षित और सम्मानजनक नौकरी छोड़कर उस अनिश्चित संसार में प्रवेश किया, जहाँ प्रतिभा से अधिक खेमे, षड्यंत्र और विरासतें काम करती हैं।
वे बागपत से चौधरी चरणसिंह के विरुद्ध चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन टिकट नहीं मिला। निराशा के उसी क्षण संजय गांधी ने उन्हें भरतपुर से चुनाव लड़ने भेजा। भरतपुर उनके लिए अपरिचित था। जयपुर में प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया; उनके नामांकन में त्रुटियाँ छोड़कर रास्ता रोकने तक के प्रयास हुए। लेकिन आम कार्यकर्ताओं और जनता ने उस अनजान युवक में अपना भविष्य देखा। राजेश्वर प्रसाद, राजेश पायलट बनकर उभरे और राजस्थान की राजनीति में एक नई धारा प्रवाहित हुई।
भरतपुर से शुरू हुई उनकी यात्रा दौसा पहुँची। वे 1991, 1996, 1998 और 1999 में लगातार लोकसभा पहुँचे। तूफ़ानों से लड़ते, गिरते और फिर उठते हुए उन्होंने स्वयं को मिट्टी से सोना निकालने और इस्पात मोड़ने वाली शख़्सियत सिद्ध किया। उनमें किसान की सरलता, सैनिक का अनुशासन और लोकतांत्रिक नेता का साहस था।
राजेश पायलट को किसान और जवान से गहरा प्रेम था। वे उस संस्कृति से निकले थे, जिसमें गाय केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, परिवार की सदस्य होती है; जिसमें गोधूलि कोई काव्यात्मक शब्द नहीं, श्रम, पशुधन और ग्रामीण जीवन की साँस होती है। इसीलिए उनकी राजनीति में खेत की गंध और साधारण मनुष्य की पीड़ा थी।
11 जून 2000 को एक सड़क दुर्घटना ने उस यात्रा को अचानक रोक दिया। वे अपनी राजनीति को उसके अंतिम गंतव्य तक पहुँचाने से पहले चले गए। राजस्थान की लोकतांत्रिक राजनीति को मिले श्रेष्ठ नेताओं में राजेश पायलट का स्थान सदैव विशिष्ट रहेगा।
केदारनाथ अग्रवाल की पंक्तियों के साथ उस दमकते नक्षत्र को असीम प्रणाम :
“हम जिएँ न जिएँ दोस्त, तुम जियो
एक नौजवान की तरह,
खेत में झूम रहे धान की तरह,
मौत को मार रहे बाण की तरह।”
#RajeshPilot #SachinPilot
व्यवसायिक शिक्षा का मखोल उड़ाती पर्ची सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था
शिक्षको की रोजी रोटी पर संकट के साथ विद्यार्थियों का भविष्य भी अँधेरे में
आखिर कौन हैं इस लापरवाही का जिम्मेदार??
हाल ए बदहाल राजस्थान
@IYC
वंश सुविधा दे सकता है, इतिहास नहीं
रजत शर्मा जी का तर्क यदि यह है कि जवाहरलाल नेहरू किसी बड़े, संपन्न और प्रभावशाली परिवार से आए थे, इसलिए उनका बड़ा नेता बन जाना कोई असाधारण बात नहीं थी तो यह इतिहास को उसके परिणाम से पढ़ने की बहुत सुविधाजनक; लेकिन अत्यंत सतही पद्धति है।
उस समय देश में बड़े परिवारों की कोई कमी नहीं थी। राजे-महाराजे थे, विशाल जागीरों के स्वामी थे, नामी वकीलों और उद्योगपतियों के बेटे थे, अंगरेज़ सरकार से उपाधियाँ, पद और सम्मान प्राप्त प्रतिष्ठित घराने थे। लेकिन उन सबमें से कितने लोगों ने अपना सुख, अपना पेशा, अपनी स्वतंत्रता और अपने जीवन के सर्वोत्तम वर्ष उस संघर्ष में लगा दिए, जिसमें परिणाम निश्चित नहीं था। केवल जेल, लाठी, अपमान और संभवतः मृत्यु निश्चित थी? इसलिए यहाँ तक के वर्तमान के राष्ट्रवादियों के पुरखे भी उस समय आज़ादी के आंदोलन में कूदन के बजाय चरित्र निर्माण और धर्मभक्ति के अभियानों में जुटे थे। यहाँ तक कि सावरकर के बार-बार सक्रिय राजनीति में उतरने के पत्र लिखने के बावजूद।
विशेषाधिकार यह समझा सकता है कि नेहरू को हैरो, कैम्ब्रिज और इनर टेंपल तक पहुँचने का अवसर कैसे मिला; लेकिन वह यह नहीं समझा सकता कि इंग्लैंड से लौटा हुआ एक संपन्न बैरिस्टर अदालतों और क्लबों की सुरक्षित दुनिया छोड़कर किसानों, आंदोलनों, गिरफ्तारियों और औपनिवेशिक जेलों के बीच क्यों चला गया? पिता की संपत्ति पुत्र को आराम दे सकती है; वह उसके भीतर इतिहास से भिड़ने की बेचैनी पैदा नहीं कर सकती।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू की शुरुआती राजनीतिक दृष्टियाँ एक जैसी नहीं थीं। मोतीलाल नहीं चाहते थे कि उनका इकलौता बेटा गांधी के सत्याग्रह और आंदोलन की अनिश्चित, टकरावपूर्ण राजनीति में उतर जाए। वे जवाहरलाल को एक सफल वकील, व्यवस्थित गृहस्थ और सुरक्षित सार्वजनिक व्यक्ति के रूप में देखना चाहते थे। उन्हें लगता था कि उनका बेटा अपना सुस्थापित भविष्य बिगाड़ रहा है। पिता-पुत्र के बीच यह केवल पीढ़ियों का तनाव नहीं था; यह दो जीवन-दृष्टियों का संघर्ष था। एक ओर अर्जित वैभव की सुरक्षा थी, दूसरी ओर पराधीन देश की बेचैनी।
लंबे समय से राजपरिवारों के यहाँ काम करते आए पुरखों के बेटे मोतीलाल नेहरू ने अपने बेटे जवाहरलाल को राजनीतिक जोखिम से बचाने की कोशिश की। वे गांधीजी के पास भी इसी आशा से पहुँचे कि शायद पुत्र को आंदोलन की इस आग से कुछ पीछे खींचा जा सके। लेकिन वहाँ भी बेटे की जिद, तर्क और नैतिक आग्रह पिता की सावधान व्यावहारिकता पर भारी पड़े। इतिहास ने फिर एक विलक्षण उलटफेर किया और वह यह कि पुत्र पिता की सुरक्षित दुनिया में वापस नहीं लौटा; पिता ही विवश होकर पुत्र की जोखिमभरी राह पर आ गया। यह इतिहास का एक विरल उदाहरण है।
जलियांवाला बाग के बाद मोतीलाल नेहरू की राजनीति में निर्णायक परिवर्तन आया। वे गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े, अपनी चमकती वकालत छोड़ी, पश्चिमी जीवनशैली से दूरी बनाई और उस राष्ट्रीय संघर्ष में उतर गए, जिससे वे पहले अपने पुत्र को बचाना चाहते थे। 1921 में पिता और पुत्र दोनों जेल गए। यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह नेहरू परिवार को किसी सहज राजनीतिक वंश की तरह नहीं, भीतर से परिवर्तित हुए एक परिवार की तरह दिखाता है। एक संपन्न पिता अपने विद्रोही पुत्र को रोकते-रोकते अंततः उसी के साथ कारावास की ओर चला गया।
नेहरू का जन्म निस्संदेह अत्यंत संपन्न और प्रभावशाली परिवार में हुआ था। इसे छिपाने या छोटा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन उतना ही अभिलेखित तथ्य यह भी है कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में लंबी सक्रियता दिखाई, बार-बार गिरफ्तार हुए और अपने जीवन के कई वर्ष जेलों में बिताए। वे केवल सभाओं के मंचों पर खड़े नेता नहीं थे; उन्होंने औपनिवेशिक राज्य की दमनकारी मशीन को अपने शरीर, स्वतंत्रता और समय पर झेला था। लेकिन देश में उन जैसे लाखों नहीं तो हज़ारों परिवार तो थे ही। वे सब तो अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ नहीं उतरे।
नेहरू की आलोचना अवश्य होनी चाहिए। हम लोग तो छात्र जीवन से नेहरू नीतियों के विरोधी ही रहे हैं। लेकिन इतिहास के सच भी तो होते ही हैं। नेहरू की आर्थिक नीतियों, चीन संबंधी आकलन, कश्मीर नीति, अत्यधिक केंद्रीकरण अथवा समाजवाद की उनकी व्याख्या पर गंभीर असहमति संभव है। लेकिन नीतियों से असहमति और इतिहास से बेईमानी दो अलग बातें हैं। नेहरू की ग़लतियों पर प्रहार कीजिए, उनके निर्णयों की जांच कीजिए, उनके मॉडल को अस्वीकार कीजिए; लेकिन उनका संघर्ष मत चुराइए।उसे थोड़ृा अपने दिल में जगह दीजिए। वे भारत का इतिहास हैं। उनके योगदान को भूलना भारत के योगदान को भी भूलना है।
नेहरू केवल मोतीलाल नेहरू के पुत्र होने से नेहरू नहीं बने। वे स्वतंत्रता आंदोलन के कठिन मैदानों, किसान यात्राओं, कांग्रेस के वैचारिक संघर्षों, बार-बार की गिरफ्तारियों और वर्षों के कारावास से होकर उस ऊँचाई तक पहुँचे थे। उन्हें विरासत में एक बड़ा घर मिला था; लेकिन राष्ट्रीय कद उन्होंने स्वयं अर्जित किया।
परिवार दरवाज़ा खोल सकता है, पर उस दरवाज़े से इतिहास में प्रवेश करने के लिए व्यक्ति को स्वयं चलना पड़ता है। उस समय बड़े घरों में पैदा हुए लोग अनेक थे; सत्ता, संपत्ति और अंगरेज़ी शिक्षा पाने वाले भी अनेक थे। लेकिन जवाहरलाल नेहरू की तरह किसने अपना जीवन उस संघर्ष में झोंका, जिसने अंततः उसके पिता को भी बदल दिया? रजत जी, वंश नेहरू को सुविधा दे सकता था, पर नेहरू का संघर्ष, कारावास, बौद्धिक निर्माण और राष्ट्रीय हैसियत किसी वंश की देन नहीं थी।
@crosschat_wala Rymp लोकेश शर्मा ही सम्भाल रहा था,बड़ा प्रोजेक्ट था, हजारों लड़को को नोकरी दी गई थी गहलोत के प्रचार प्रसार के लिए, जबकि डिपार्टमेंट चाँदना जी का था,पर गहलोत ने लोकेश को सम्भला रखा था यह प्रोजेक्ट, करोड़ो का खेल हुआ था इसमे भी
Congress General Secretary (Org.) Shri @kcvenugopalmp-
We have to believe in the legal system.
This is a basic matter of democracy.
We will sit here until they allow us to go inside. We are very responsible people. Former CMs, Deputy CMs and MPs are here.
कांग्रेस महासचिव श्री @SachinPilot-
देश के लोकतंत्र में आज तक ऐसा नहीं हुआ।
कांग्रेस उम्मीदवार का नॉमिनेशन बिना कारण बताए रद्द कर दिया गया। हमारे उम्मीदवार के ऊपर कोई मुक़दमा नहीं है, फिर भी जानबूझकर लोकतंत्र की हत्या की जा रही है।
हम इसी विषय पर आवेदन देने के लिए निर्वाचन आयोग आए थे, जिसकी जानकारी हमने दो घंटे पहले दे दी थी, लेकिन फिर भी हमें अंदर जाने नहीं दिया जा रहा।
जिस सीट को हम जीत रहे थे, उसे बिना कारण रद्द कर दिया गया है, ऐसे में हम किससे शिकायत करेंगे।
पूरा देश देख रहा है.. BJP चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।
इसके साथ ही चुनाव आयोग को भी अपने गिरेबान में झांकना चाहिए कि वे लोकतंत्र को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं।
---------------------
चुनाव आयोग ने बिना किसी कारण कांग्रेस की राज्यसभा सांसद उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन जी का नामांकन रद्द कर दिया।
इसके ख़िलाफ़ कांग्रेस का दल आवेदन लेकर चुनाव आयोग पहुंचा, लेकिन उन्हें बाहर ही रोक दिया गया।
सचिन पायलट का मीडिया बयान सामने रखकर अशोक गहलोत के ओएसडी ने एक नई “लंबी लकीर” खींचने की कोशिश की है। दिलचस्प यह है कि अशोक गहलोत लंबे समय से दूसरों की लकीर काटने के बजाय अपनी लकीर बड़ी करने की बात करते रहे हैं, लेकिन हाल के दिनों में वे स्वयं पुरानी घटनाओं और विवादों को दोहराकर प्रतिद्वंद्वी की लकीर छोटी करने वाली राजनीति को बल देते नज़र आए हैं।
देश में इससे पहले कभी इस प्रकार के नोटिस के आधार पर कोई नामांकन रद्द नहीं किया। भाजपा ने अपनी हार के डर से सुनियोजित रणनीति के तहत यह नामांकन रद्द किया है। हमारा शीर्ष नेतृत्व दिल्ली में और हम यहाँ भोपाल में चुनाव आयोग के सामने मज़बूती से डटे हुए।
: प्रदेश कांग्रेस प्रभारी श्री हरीश चौधरी जी.
📍चुनाव आयोग, भोपाल.