In Malayalam film industry, Saying “I am Hindu” is career suicide.
Actors hide their faith, Actresses stay silent about their beliefs.. Temples are visited secretly.
And then.. Namitha Pramod posts photos from Kashi. Tilak on her forehead. Pride in her eyes.
Do you understand what this means?
The fear is breaking..The silence is ending…Kerala is changing.
The wind of change has reached Mollywood too.
In an industry where celebrities often avoid openly discussing their faith, she chose to wear her Hindu identity with pride and share it publicly.
That matters.
Because faith should never be something you have to hide to fit in.
We see you Namitha. We stand with you.
@AdityaRajKaul Ms Chaddha has forgotten that we all will reach that stage of life of “ buddhapa”hope she doesn’t have to experience such a time where the food is left at the corner of the road without engagement ..isolation is a curse in old age .
@hvgoenka Sir , normally bird guard and bird diverter is installed on transmission towers to prevent birds from perching and nesting ..a good sight emotionally but a challenge to the transmission line .
परिवार या कैरियर
मेरा नाम विवेक शर्मा है। उम्र 32 साल। लोग जब पूछते हैं, तुम क्या करते हो, तो मैं कहता हूँ, किराना दुकान चलाता हूँ। वे हँसते हैं, क्योंकि उन्हें पता है मैं आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट था, और मेरे पास सैन फ्रांसिस्को की एक कंपनी का ऑफर लेटर आज भी अलमारी में रखा है, जिस पर सैलरी लिखी है 2,40,000 डॉलर सालाना।
मैंने वह लेटर कभी फाड़ा नहीं, पर कभी इस्तेमाल भी नहीं किया।
कहानी 1998 से शुरू होती है, कानपुर के किदवई नगर में। दो कमरे का घर, ऊपर टीन। पापा रेलवे में क्लर्क, माँ ट्यूशन पढ़ातीं। मैं इकलौता बेटा। पापा की सैलरी 8,000 रुपये। माँ की ट्यूशन से 2,000। हम मिडिल क्लास भी नहीं थे, लोअर मिडिल।
पर पापा का एक सपना था, बेटा बड़ा आदमी बने। उन्होंने कभी मुझसे नहीं कहा डॉक्टर बन, इंजीनियर बन। वह सिर्फ कहते, बेटा, जितना पढ़ना है पढ़, पैसे की चिंता मत कर।
मैं पढ़ता गया। दसवीं में 95 प्रतिशत, बारहवीं में 97। कोचिंग की फीस 1 लाख थी। पापा ने पीएफ निकाला। माँ ने अपनी चूड़ियाँ बेचीं। मैं कोटा गया। दो साल पंखे के नीचे पढ़ा, मच्छर खाए। 2012 में रिजल्ट आया, AIR 147। आईआईटी बॉम्बे, कंप्यूटर साइंस।
जिस दिन लेटर आया, पापा मिठाई का डिब्बा ले कर पूरे मोहल्ले में बाँट आए। माँ रो पड़ी। बोली, अब मेरा बेटा अमेरिका जाएगा।
आईआईटी में मैं उड़ा। कोडिंग, हैकाथॉन, इंटर्नशिप। तीसरे साल में गूगल समर इंटर्न, 1 लाख स्टाइपेंड। मैंने पहली सैलरी से पापा को फोन दिलाया, माँ को वॉशिंग मशीन। पापा ने फोन पर कहा, बेटा, अब तो रिटायरमेंट में आराम करूँगा।
फाइनल ईयर में प्लेसमेंट। मैं दिन रात तैयारी करता। दिसंबर 2015, मेरा इंटरव्यू हुआ एक कंपनी से, नाम था स्ट्राइप जैसी पेमेंट स्टार्टअप, बेस सैन फ्रांसिस्को। चार राउंड, आखिरी में सीटीओ ने कहा, वी वांट यू। ऑफर आया, 240k डॉलर, H1B, रीलोकेशन।
मैंने हॉस्टल में चिल्ला कर दोस्तों को बताया। रात को पापा को फोन किया। पापा चुप रहे, फिर बोले, बेटा, बहुत बड़ी बात है। माँ ने कहा, पासपोर्ट बनवा ले।
मैंने टिकट देखना शुरू किया, अगस्त 2016 जॉइनिंग।
मार्च 2016 में होली पर घर आया। पापा कमजोर लग रहे थे। खाँसी। मैंने कहा, डॉक्टर को दिखाओ। बोले, कुछ नहीं, ठंड लग गई। माँ भी थकी थकी। मैंने सोचा, उम्र है।
अप्रैल में फोन आया, माँ का। पापा गिर गए, अस्पताल में। मैं भागा। डॉक्टर ने कहा, लंग्स में इंफेक्शन, साथ में हार्ट की प्रॉब्लम। एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। खर्च, 3 लाख।
पापा के पास मेडिकल था, पर आधा ही कवर। मैंने अपनी इंटर्नशिप के पैसे, 2 लाख, निकाल कर दिए। ऑपरेशन हुआ। पापा बच गए।
मैं वापस बॉम्बे गया, फाइनल प्रोजेक्ट। मई में फिर फोन, माँ को चक्कर आए। जांच हुई, ब्रेस्ट कैंसर, स्टेज 2। डॉक्टर ने कहा, कीमो शुरू करो, 6 साइकल, हर साइकल 80 हजार। कुल 5 लाख, प्लस सर्जरी।
मैं सुन्न। पापा रिटायर हो चुके थे, पेंशन 12 हजार। घर में सेविंग खत्म। मैंने दोस्तों से उधार माँगा, 1 लाख मिला। बाकी।
जून में मैं घर बैठा था, ऑफर लेटर हाथ में। वीजा इंटरव्यू 15 जुलाई को था। फ्लाइट 10 अगस्त की। माँ की पहली कीमो 20 जून को।
मैंने पापा से कहा, मैं लोन लेता हूँ। पापा बोले, कौन देगा, घर गिरवी रखना पड़ेगा। मैंने कहा, रख देंगे। पापा ने मना किया, बोले, ये घर तेरी माँ की निशानी है।
उस रात मैं छत पर बैठा। आसमान में प्लेन जा रहा था। मैंने सोचा, यही प्लेन मुझे ले जाएगा। दूसरी तरफ माँ नीचे दर्द में।
मैंने अपने मेंटर को मेल किया, क्या जॉइनिंग डिफर हो सकती है, 6 महीने। रिप्लाई आया, सॉरी विवेक, वी नीड पीपल नाउ। यू कैन रीअप्लाई नेक्स्ट ईयर।
मैंने फिर मेल किया, रिमोट पॉसिबल? रिप्लाई आया, नो।
14 जुलाई की रात। वीजा इंटरव्यू कल। माँ की दूसरी कीमो परसों। पापा दवाई लेने गए थे, लौटे तो पर्ची गिर गई, झुक कर उठा नहीं पाए। मैंने उठाई। उस वक्त समझ आया, मैं अगर चला गया तो ये दोनों कैसे रहेंगे।
पापा रिटायर्ड, बीमार। माँ कीमो पर। कोई भाई बहन नहीं। रिश्तेदार मदद नहीं करते। कौन अस्पताल ले जाएगा, कौन दवाई लाएगा, कौन रात को पानी देगा।
मैंने सुबह वीजा इंटरव्यू कैंसिल किया। कंपनी को मेल लिखा, थैंक यू फॉर ऑफर, ड्यू टू फैमिली मेडिकल इमरजेंसी आई एम अनेबल टू जॉइन।
दोस्तों ने फोन किया, पागल है क्या, 1.6 करोड़ की जॉब छोड़ रहा है। मैंने कहा, हाँ।
माँ को नहीं बताया। पापा को बताया। वह चुप रहे, फिर बोले, बेटा तेरा करियर। मैंने कहा, करियर फिर बन जाएगा, आप फिर नहीं मिलोगे।
मैंने कानपुर में ही नौकरी ढूंढी। एक लोकल सॉफ्टवेयर कंपनी, सैलरी 35 हजार। मैंने जॉइन कर ली। सुबह 9 से शाम 6 ऑफिस, शाम को अस्पताल। कीमो में माँ के बाल गए, वह रोती।
पार्ट 2👇