@narendramodi आभार सर!
चेतना का तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक चेतन प्राणी स्वाधीन न हो।
सनातन समाज के स्वाधीनता के तीन लक्षण हैं
१: सनातन धर्मावलंबी व्यक्ति व शास्त्रादि स्वाधीन है।
२: सनातन संस्थाएं (परिवार/समाज आदि) स्वाधीन हैं।
३: सनातन देवस्थल और देवता स्वाधीन हैं।
@harshtweetsnow हाँ, सही समझा। वित्तीय समावेशन मोटे तौर पर कमजोर वर्गों को बैंकिंग (खाता, बचत, ऋण, भुगतान) और बीमा जैसी सेवाओं से जोड़ना है। इससे बचत, सस्ता ऋण, आसान लेनदेन (यूपीआई), डीबीटी और प्रीमियम पर सुरक्षा मिलती है। जन धन-यूपीआई इसके मुख्य उदाहरण हैं।
@grok मोटा मोटी बैंकिंग+बीमा से जोड़ना! यही न!
इनसे जुड़ने पर:
- बचत
- ऋण
- विनिमय में सुविधा
- डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर
- प्रीमियम लेकर सुरक्षा का वादा
यही मिलेगा?
@ItsSagnikHere धर्म को:
१- जानकर, मानना।
२- न जानकर, न मानना।
ये दोनों समझ में आने की बात है।
किंतु,
३- जानकर भी, न मानना।
४- नहीं जानकर भी, मानना।
ये दोनों अजीब सी बात है, ३ वाले के पीछे कोई छिपी मंशा होती है किंतु ४ वाला तो साथ ही खतरनाक है।
@imra_mra देश में:
बिना कर्तव्य के, अधिकार देने को सशक्तिकरण!
कर्तव्य करने वाले के अधिकार को पितृसत्ता कहा गया है!
देश में सुरक्षित संबंध और माहौल को बंधन मानकर, असुरक्षित संबंधों और माहौल को आजादी कहा गया है।
ये सब एक दिन या दशक की कहानी नहीं है पर सभी चाव से कहते आए हैं।
मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के अलग-अलग व्यंग्य लेखों से 14 लाइनें आपके समक्ष रखी हैं, मिर्ची से भी तीखी लगेंगी ।।
1- लडक़ों को, ईमानदार बाप निकम्मा लगता है ।
2- दिवस कमजोर का मनाया जाता है, जैसे हिंदी दिवस, महिला दिवस, अध्यापक दिवस, मजदूर दिवस । कभी थानेदार दिवस नहीं मनाया जाता।
3- व्यस्त आदमी को अपना काम करने में जितनी अक्ल की जरूरत पड़ती है, उससे ज्यादा अक्ल बेकार आदमी को समय काटने में लगती है।
4- जिनकी हैसियत है वे एक से भी ज्यादा बाप रखते हैं । एक घर में, एक दफ्तर में, एक-दो बाजार में, एक-एक हर राजनीतिक दल में।
5-आत्मविश्वास कई प्रकार का होता है, धन का, बल का, ज्ञान का । लेकिन मूर्खता का आत्मविश्वास सर्वोपरि होता है
6 –हमारे लोकतंत्र की यह ट्रेजेडी और कॉमेडी है कि कई लोग जिन्हें आजन्म जेलखाने में रहना चाहिए वे जिन्दगी भर संसद या विधानसभा में बैठते हैं ।
7- विचार जब लुप्त हो जाता है, या विचार प्रकट करने में बाधा होती है, या किसी के विरोध से भय लगने लगता है, तब तर्क का स्थान हुल्लड़ या गुंडागर्दी ले लेती है ।
8- बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है।
9- जब शर्म की बात गर्व की बात बन जाए, तब समझो कि जनतंत्र बढिय़ा चल रहा है।
10- जो पानी छानकर पीते हैं, वो आदमी का खून बिना छाने पी जाते हैं।
11- सोचना एक रोग है, जो इस रोग से मुक्त हैं और स्वस्थ हैं, वे धन्य हैं।
12- हीनता के रोग में किसी के अहित का इंजेक्शन बड़ा कारगर होता है।
13- नारी-मुक्ति के इतिहास में यह वाक्य अमर रहेगा कि ‘एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता।
14- एक बार कचहरी चढ़ जाने के बाद सबसे बड़ा काम है, अपने ही वकील से अपनी रक्षा करना ।
#हरिशंकरपरसाई #harishankarparsai #Satire
@Starboy2079 फिर भी कुछ काम किए जा सकते थे सर, कुछ काम नहीं करने पर भी काम चलता और अश्वत्थामा हतो नरो वा ... कुंजर: भी किया जा सकता था पर फुटबॉल का खेल, फुटबॉल के नियम से होता रहा।
महोदया, हमारे देश में एक तर्क को, एक चुटकुले से खारिज करने का चलन है। चर्चा किन बातों पर होनी थी और किन बातों पर हो रही है।
आहार पर सबसे बड़ा प्रभाव पर्यावरण और चलन का होता है, घरेलू, शैक्षणिक संस्थानों में, कार्यालय प्रतिष्ठानों में।
आहार पर दूसरा प्रभाव व्यक्तिपरक होता है।
चलन के रूप में किस किस चीज का प्रचार है, कहना बेकार है।
जहाँ तक शाकाहार के श्रेष्ठबोध का प्रश्न है, निश्चय ही, कुछ त्यागना, संयम बरतना हमेशा बड़प्पन माना गया है।
किंतु त्यागने का स्तर होता है। हमने मांसाहार त्याग दिया, संयम होने पर लहसुन प्याज त्यागा, फिर नमक त्यागा, फिर अन्न त्यागा और फल पर रहे, फिर वो भी त्यागा और जल पर रहे, फिर निर्जला उपवास!
यथाशक्ति, परंपरा और निष्ठा/भाव के अनुसार जो करें, करें, किंतु अधिक महत्वपूर्ण प्रसंग बिना चर्चा के पड़े हुए हैं।
@imra_mra महोदय, जब कोई अपनी पूंजी खाता है तो उसे लगता है कि 'सब चंगा सी'
देशों के कुछ किस्म होते हैं।
-> सैनिक
-> कबाबी नवाबी
-> अराजक
-> हवा-हवाई समाज राज्य
-> रामराज्य
माइक पर बोलने वालों से ये पूछना चाहिए कि देश का कौन सा स्वरूप उनके रात्रि या दिवास्वप्न में आता है।