हर नैतिकता घूम फिर कर महिलाओं के कपड़ों पर आकर ठहर जाती है। कभी कभी मुझे लगता है कि भले एक बार को पशुकुल नरेश वैशाखनंदन उर्फ गधा महाराज की ढेंचू ढेंचू में संगीत सम्राट बैजू बावरा सरीखा संगीत फिर भी निकल आए, पर एक आम भारतीय पुरुष की सोच महिलाओं के अंडरगार्मेंट्स से बाहर नहीं निकल सकती। अपने देश के इन मोरली इरेक्टिड सेंसिबली डिफेक्टिड अनमोल रत्नों की माने तो ग्लोबल वार्मिंग से लेकर परमाणु विस्फोट तक, और भ्रष्ट राजनीति से लेकर आर्थिक सामाजिक असमानता तक हर खुराफात का दोषी महिलाओं के अधखुले वक्ष, और अर्ध पारदर्शी अंग हैं।
हरिद्वार का बताया जा रहा एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक महिला अंतःवस्त्र पहने गंगा नदी में स्नान कर रही है।
वीडियो का लिंक कमेंट बॉक्स में है। लोग महिला को बुरा भला कह रहे हैं, धार्मिक स्थल पर अश्लीलता फैलाने के आरोप लगा रहे हैं। हालांकि इस वीडियो के एआई से बने होने की भी बात सामने आई है, और उससे जुड़ा एक और वीडियो भी वायरल है। पर दोहरे मापदंडों में उलझे नैतिकता के वर्तमान ठेकेदार एक बार भी उस लड़के के बारे में दो शब्द नहीं बोल पा रहे जो दोनों वीडियो में चड्ढी पहने नदी में नहाते साफ़ साफ देखा जा सकता है। यही तो विडंबना है कि महिलाओं पर मर्यादा का उपन्यास लिखने की कुव्वत रखने वाले सामाजिक पुरोधा, पुरुषों की खुलेआम नंगई पर चार लाइन की लघु कथा भी नहीं लिख पाते। अपने आस पास के किसी नदी तालाब चले जाइए, आपको केवल चड्ढी पहने ढेरों लड़के खुले वातावरण में नहाते मिल जाएंगे। किसी भी आम भारतीय के घर में चले जाइए, आपको पुरुष समाज सैंडो बनियान और जांघिया में घूमता मिल जाएगा, लेकिन मजाल है कि किसी जागरूक नागरिक को इससे आपत्ति हुई हो? आपको क्या लगता है, ऊपर बैठे हमारे आराध्य भगवान को सिर्फ़ महिलाओं के अंतर्वस्त्रों से आपत्ति है? क्या ईश्वर को आपने अपनी तरह लिंगभेदी समझ रखा है? किस मुंह से आप अपना अर्धनग्न नहाना, चौराहों पर अर्धनग्न कपड़ों में घूमना, सिनेमा वेब सीरीज में हीरो का शर्टलेस घूमना जस्टिफाई कर ले जाते हैं, जबकि ठीक यही स्थिति महिलाओं के साथ आए तो आपकी मर्यादा थर थर कांपने लगती है।
सार्वजनिक और धार्मिक स्थलों पर नग्नता यदि महिलाओं के लिए अश्लीलता है, तो पुरुषों के लिए सर्व स्वीकार्य कैसे हो सकती है। ये दोहरे मापदंड नहीं चलेंगे। पुरानी पीढ़ी करे तो उनका तो फिर भी समझ आता है, पर नई पीढ़ी के लोग करें तो उनके चिंतन की दुर्बलता पर हंसी आती है। नग्नता यदि अश्लीलता है, तो पुरुष के लिए भी है, और महिलाओं के लिए भी। नग्नता यदि स्वीकार्य है तो पुरुष के लिए भी, महिलाओं के लिए भी। किसी को सुधारने का ठेका ले रहे हैं तो पहले खुद सुधरिए। बदलाव लाने के लिए शुरुआत खुद से करनी पड़ती है।
पहले अपनी गिरेबान झांकनी पड़ती है।
नमस्कार।
नौकरी को आठ साल हुए।
मेरी भर्ती* के सभी साथियों के लिए ये दिन स्वाभिमान, और आत्मसम्मान के जीवन की वर्षगांठ है। समाज में हैसियत बढ़ने की सालगिरह है आज। ये वो पुनीत दिन है जब हम सबने अपने माता पिता और शुभेच्छुओं की आंखों में निश्चिंतता का ठहराव देखा। सार्वजनिक जीवन में अपने पिता की संतान के रूप में पहचाने जाने वाले युवाओं के लिए अपनी पहली स्वतंत्र पहचान बनने की एनिवर्सरी है यह। हां, एक कष्ट हमेशा रहेगा कि शिक्षामित्रों की पद रिक्ति से हमारे लिए संभावनाएं बन पाईं। वो भी रहते, हम भी रहते तो खुशी में चार चांद लगते। फिर भी, आज उत्सव का दिन है, आनंद मनाइए।
शुभ जन्मदिन मास्साब/बहनजी 😊💐
*(यूपी 68500 प्राथमिक शिक्षक भर्ती)
जो लड़का खुले आम कह रहा हो कि उसने सर पर चोट मारी, टांके लगे, फिर भी मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, उसका समर्थन करके आप बस गड्ढा ही खोद रहे हैं। स्वतंत्र भारद्वाज खुद अपराध स्वीकार रहा है, उसके लिए ढाल मत बनिए। मूर्खता का बचाव नहीं किया जा सकता।
रही बात @Nishuazad11 द्वारा देवी देवताओं के उपमान की, या हिंदू धर्म पर अमर्यादित टिप्पणियों की, तो वो कोई आज की बात नहीं है। स्वतंत्र भारद्वाज फसने लगा तो बदले में निशु आजाद की कमियां ढूंढने लगना बेतुका है। वो तो बहुत पहले से ऐसे बोल रही है, पहले एफआईआर क्यों नहीं कराई?
आपत्ति निशु आजाद के धर्मविरोधी बयानों से है, या स्वतंत्र भारद्वाज पर कार्यवाही से?
एक गलत को दूसरे गलत से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये दोनों ही बड़बोले हैं, और दोनों पर ही अंकुश की जरूरत है। कार्यवाही दोनों पर हो, पर जैसे ही गलत करें, तुरंत कार्यवाही हो। राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि में, जब मन आए तब, एक से बदला लेने के लिए दूसरे को भी घसीटने की पद्धति न्याय को नहीं, बल्कि अराजकता को ही बढ़ावा देगी।
क्या नेपाल के लोगों को हम सबने मिलकर मारा है?
वरिष्ठ पत्रकार शेखर अय्यर 3 सितंबर 2026 को अमर उजाला में प्रकाशित अपने लेख में नेपाल त्रासदी के कारणों पर बात करते हैं। इस आपदा का एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन हो सकता है, और जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारण है कार्बन उत्सर्जन। दुनिया भर के उद्योग, ईंधन और खनन इतना प्रदूषण कर रहे हैं कि इससे पृथ्वी का पर्यावरणीय साम्य बिगड़ रहा है।नेपाल पूरी दुनिया के कार्बन उत्सर्जन में मात्र शून्य दशमलव शून्य पांच प्रतिशत है। अन्य पहाड़ी क्षेत्र भी अपनी विपुल वन्य संपदा और कम उत्सर्जन के कारण प्रदूषण के कम जिम्मेदार है, लेकिन अपनी अस्थिर भौगोलिक स्थिति के कारण त्रासदी सबसे ज्यादा झेलते है।
वैश्विक स्तर पर बात करें तो आपको जानकर आश्चर्य होगा कि कार्बन उत्सर्जन में दुनिया भर का लीडर चीन अकेले कुल उत्सर्जन का एक तिहाई जिम्मेदार है। उसके बाद अमेरिका और फिर आते हैं हम यानि भारतीय। ये भी विडंबना जी है कि दुनिया के तीन देश अकेले पूरे वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के आधे जिम्मेदार हैं। इस प्रक्रिया की सबसे खतरनाक बात यही है कि ये हमारी बनाई देश राज्य की सीमा से नहीं बंधा है। चीन में हो रहे प्रदूषण आधिक्य का दुष्प्रभाव सुदूर अर्जेटीना में बैठे एक आम नागरिक पर भी लगभग उतना ही पड़ रहा है, जितना एक चीनी नागरिक पर। बल्कि कम अस्थिर और जलनिधि के निकर रह रहे लोग तो इसका दंड ज्यादा भोग रहे हैं।
समय आ गया है कि दुनिया के हर देश को अब वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना समझते हुए प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के प्रति दिखावटी प्रपंच करने और एक दूसरेबपर दोषारोपण करने के बजाय एक साझा रोड मैप तैयार करना होगा। विकास की अंधी दौड़ में इस तरह की आपदाओं में हुई मृत्युओं को कोलेटरल डैमेज मान कर इति श्री नहीं की जा सकती। समय आ गया है कि अब हमें विकास और पर्यावरण के बीच एक स्थाई सामंजस्य बनाना ही होगा, वरना आने वाली पीढ़ियों के लिए हम बस कंक्रीट के रेगिस्तान ही छोड़ जाएंगे। अब हमें अप्रत्यक्ष हत्यारा बनना बंद करना ही होगा।
#nepal #nepalflood
डॉ० अम्बेडकर अपनी किताब The Annihilation of Caste में पेशवा शासन में महादलितों की कमर में झाड़ू और गले में हांडी बांधने की बात करते हैं? कितना सही है ये जातिवाद से संबंधित दावा और आज के समय में क्या है इसके प्रचार का औचित्य?
#harshvimarsh
रक्षाबंधन पर रानी कर्णावती और हुमायूँ की कहानी तो आप सबने सुनी होंगीं, पर क्या आप जानते हैं रक्षाबंधन की परंपरा का सबसे पुराना स्रोत क्या है? आइए पढ़ते है पांच ऐसी कहानियां, जो हमें कराती हैं समय की यात्रा, और बताती हैं राखी का इतिहास।
सबसे पहले तो कहानी सन 1535ई0 मेवाड़ की रानी कर्णावती की। गुजरात के राजा बहादुर शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया, जहां उस समय रानी के बड़े बेटे विक्रमादित्य राज्य कर रहे थे और रानी उनकी संरक्षक की भूमिका में अप्रत्यक्ष रूप से शासन सम्हाल रही थीं। विक्रमादित्य बहादुरशाह के हाथों एक बार पहले भी युद्ध हार चुके थे इसलिए ऐसी जनश्रुति है कि रानी ने इस बार राखी भेज कर मुग़ल बादशाह हुमायूँ से मदद मांगी। हालांकि इस घटना के कोई लिखित साक्ष्य नहीं और यह केवल किंवदंतियों से प्रचलित हुई।
दूसरी कहानी है सिकंदर की पत्नी रोक्सेना की। कहते हैं कि 326 ईसा पूर्व में सिकंदर और राजा पोरस के युद्ध के दौरान रॉक्सेना ने पोरस को राखी भेजी थी, इस वादे के आग्रह के साथ कि पोरस उनके पति के प्राणों का हरण नहीं करेंगे। हालांकि इस घटना की ऐतिहासिकता भी न तो भारतीय और न ही यूनानी लेखन में सत्यापित है और यह भी किंवदंतियों से उपजी है।
तीसरी कहानी है माता लक्ष्मी की। कहते हैं कि राजा बाली द्वारा भगवान विष्णु को दान में सब कुछ दे देने के पश्चात खुश हो कर भगवान ने बाली से कुछ मांगने को कहा। राजा बाली ने भगवान विष्णु को सदा के लिए अपने पाताल लोक का द्वारपाल बन अपनी आँखों के सामने रहने का वरदान ले लिया। इस वरदान से बंधे भगवान विष्णु पाताल में ही फंस गए और बहुत लंबे समय तक विष्णुलोक नहीं जा पाए। फिर नारद जी की सलाह पर माता लक्ष्मी ने राजा बाली को रक्षासूत्र बांध कर बदले में भगवान विष्णु को विष्णुलोक जाने का आश्वासन प्राप्त किया और ऐसे विष्णु जी अपने ही वरदान के जाल से मुक्त हुए।
चौथी कहानी है द्रौपदी की। कथाएं कहतीं हैं कि एक बार श्रीकृष्ण को अपने ही सुदर्शन चक्र से उंगली में चोट लग गयी। कुछ कथाएं इस प्रसंग को शिशुपाल वध से जुड़ा कहती हैं तो कुछ किसी अन्य युद्ध से। खैर, द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा श्रीकृष्ण को चोट के स्थान पर बांध दिया। श्रीकृष्ण ने इसे रक्षासूत्र की तरह स्वीकार किया और द्रौपदी को उनकी रक्षा का वचन दिया।
पांचवीं और सबसे प्राचीन कहानी है, इन्द्रदेव की पत्नी शची की। ऋग्वेक में उल्लिखित देवासुर संग्राम, जिसमें त्वष्टा ऋषि के पुत्र वृत्रासुर, जिसकी उत्पत्ति ऋषि ने इंद्र द्वारा अपने पुत्र विश्वरूप के वध का प्रतिशोध लेने के लिए की थी, इस युद्ध में देवताओं की पराजय को समीप जान देवी शची ने देवगुरु बृहस्पति के सुझाव पर एक अभिमंत्रित धागा अर्थात रक्षा सूत्र अपने पति इंद्र के हाथ में बांधा था। इसके प्रभाव और महर्षि दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र के कारण ही वृत्रासुर का वध हुआ।
ये पांच कहानियां, भले ऐतिहासिक हो या न हो, पर पौराणिक और लौकिक जनश्रुतियों का अंग हमेशा से रही है, और बताती हैं रक्षाबंधन और राखी के महत्व का हजारों वर्षों का इतिहास।
नमस्कार।
दलित बंधुओं के साथ हुए उत्पीड़न के विरोध में आपको अधिकांश सवर्ण बोलते दिख जाएंगे। स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर तक असंख्य ऐसे साथी हैं जो जाति/पंथ आधारित दुर्व्यवहार पर अपना विरोध दर्ज कराते हैं। लेकिन खुले आम सवर्ण की बहन बेटी मांग रहे गुंडा प्रवृत्ति तथाकथित दलितों के विरोध में खड़ा हुआ कोई खास दलित चिंतक/विचारक/हितैषी मुझे नज़र नहीं आता। यहां तक कि जो साथी दिन भर केवल जाति शोषण का दुख गान करते हैं, सवर्ण अत्याचार के ढेरों वीडियो प्रचारित करते हैं, इस प्रतिदुर्व्यवहार को लेकर उनके हाथ और जिह्वा भी कुंद पड़ जाती हैं।
जातिगत भेदभाव ऐसे समाप्त होगा? क्या एक पक्ष चुन के आप स्वयं जातिवाद को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं? कोई अनपढ़ ज़ाहिल ऐसा करे तो समझ में भी आता है, अपने आप को बुद्धिजीवी कहने वाले लोगों को भी जानबूझ कर ऐसी चतुराई करने में लज्जा नहीं आती? न्याय की बात कहिए। हर बुरे को बुरा कहिए। मेरा बुरा या आपका बुरा अलग अलग नहीं है। जातिवाद का उत्तर प्रतिजातिवाद नहीं है। ये विषय इतने गंभीर हो चुके हैं कि अब भी यदि आप राजनीति या व्यक्तिगत स्वार्थ के चक्कर में इस प्रोपोगेंडा को बढ़ावा दे रहे हैं, तो आप पूरे समाज के लिए एक गड्ढा खोद रहे हैं। समरसता की बात करिए, द्विपक्षीय बात करिए। आग में घी डालने का काम मत करिए, अन्यथा अपने आप को पढ़ा लिखा कहना, मानना और प्रचारित करना बंद कर दीजिए।
मारना पीटना ठीक नहीं। आदमी अपना ईंधन पैसा खर्च कर के स्कूल का निरीक्षण करने जगह जगह जा रहा है। आपको स्कूल नहीं दिखाना, मना कर दीजिए। हाथ वगैरह नहीं उठाना चाहिए। गाँव देहात की परम्परा तो अतिथि सत्कार की रही है, गाँव वाले ही अतिथि के साथ हिंसा करेंगे तो कैसे चलेगा। राजस्थान में आशुतोष रांका के साथ मारपीट का दुःख है।
मुझे लगता है कि वास्तविक और संभ्रांत स्थानीय पत्रकारों को भी अब सौ पाँच सौ रुपए वाले स्कूल केंद्रित स्वघोषित पत्रकारों का विरोध करना चाहिए। ज्ञान और शब्द से जुड़े इस पवित्र और महान व्यवसाय की प्रतिष्ठा में कुछ अल्पशिक्षित स्तरहीन लोग आघात पहुँचा रहे हैं। जैसे एक ग़लत शिक्षक पूरे शिक्षक समाज को कलंकित करता है, वैसे ही एक क्षद्म पत्रकार पूरे मीडिया समुदाय के प्रति भरोसे पर चोट पहुंचाता है। पत्रकार भाइयों के लिए भी अब अपने घर की सफ़ाई करने का समय आ गया है। इस कठिन कार्य का बीड़ा अब आपको स्वयं और प्रथम उठाना होगा।
किसी को गाना ही नहीं है, धर्म मना कर रहा है
किसी को गाना तो है पर दो पद ही गाने हैं
किसी को पूरा गाना है पर याद नहीं हो रहा
किसी को ख़ुद तो गाना ही है, दूसरे से भी गबाना है
राष्ट्रगीत न हुआ, होटल का मेन्यू हो गया। सुविधानुसार ऑर्डर हो रहा है। वंदे मातरम् पर भी सब एकमत नहीं। विलक्षण भूमि है आर्यावर्त की, भयंकर पुरोधा जनती है। 😄
#vandemataram
सीजेपी के स्कूल ठीक करो अभियान ने कई फुंकी हुयी फुलझड़ियों में फिर से पोटाश भर दिया है। राजनेता और समाजसेवी की स्वघोषित पदवियों के बीच दोलन कर रहे कई बेरोज़गार युवा इस समय माथे पे आईएएस-पीसीएस वाली फ्यूज सरकारी बत्ती लगाए और छाती पर प्रदेश सरकार वाली अदृश्य तख्ती टांगे जिला विद्यालय निरीक्षक बने स्कूलों की जाँच करते घूम रहे हैं। भाँति भाँति के वीडियो आ रहे है। किसी में वाक़ई स्कूल की दुर्दशा दिखाई जा रही है, तो किसी में चंद युवा झुंड बना मस्साब लोगों को घेरकर मौखिक सबक सिखा रहे हैं। वैसे सच कहूँ तो किसी भी नागरिक के लिए विद्यालय जा कर उसकी व्यवस्था जांचने में कोई बुराई नहीं है। हमारे पुरखे तो पुलिस थाने, संसद भवन, अदालत, ज़िलाधिकारी कार्यालय, पंचायत भवन और बैंक वगैरह में घुस घुस कर आज़ादी के बाद से ही औचक निरीक्षण करते रहे हैं। यूँ ही थोड़े ये सब कार्यालय बिना भ्रष्टाचार और अनैतिकता के चल रहे हैं। बड़े निरीक्षण लगे हैं इस विशाल व्यवस्था को उत्तरदायी बनाने में। मैं तो इसे देश का गंभीर दुर्भाग्य मानता हूँ कि चप्पा चप्पा छापा अभियान के महान पैरोकारों की सामाजिक अतिव्यस्तता के कारण स्कूलों का नंबर देर में आया। खैर जब जागो , तब भागो।
मैं अध्यापक साथियों से भी कहना चाहूँगा कि हर ग्रामीण का अधिकार है अपने विद्यालय की स्थिति जांचना। पर कुछ चीज़ों का ध्यान रखिए। यदि कोई नागरिक या ग्रामीण हमारे विद्यालय का हाल लेने आए, तो उन्हें स्थानीय शिक्षा अधिकारी महोदय का विद्यालय में अनाधिकृत प्रवेश संबंधी आदेश दिखा दीजिए। फिर भी न मानें तो उन्हें अपना काम करने दीजिए। स्कूल आए व्यक्ति यदि आपसे नम्रता से पेश आ रहे हैं, तो आप भी नम्र ही रहिए। वो कोई अपराधी नहीं, हमारी तरह ही जागरूक नागरिक हैं। इसे एक अवसर की तरह मानिए। विद्यालय की कई ऐसी समस्याएं है जो राजनैतिक या प्रशासनिक मजबूरियों के कारण हम स्वयं उजागर नहीं कर सकते, उन्हें क्रांति के इन झंडाबरदारों के सहारे उजागर होने दीजिए। क्या पता, इनकी पब्लिसिटी से विद्यालय की समस्या समाधान हो जाए। पर यदि आपको जरा भी सुरक्षा का खतरा लगे, या लगे कि राजनीति से प्रेरित लोग झुंड बना कर स्कूल में घुस आए हैं, या आपसे जरा भी भाषायी या शारीरिक अभद्रता कर रहे हैं, या विद्यालय के दैनिक क्रियाकलापों में बाधा डाल रहे हैं, या वायरल होने के चलकर में अनावश्यक अनौचित्यपूर्ण बातों का बतंगड़ बना रहे हैं, तो तत्काल पुलिस बुलाइये और बाकी काम खाकी को करने दीजिए। मैं ग्रामीणों और नागरिकों से भी कहना चाहूँगा कि हर गुज़रते साल के साथ स्कूलों में बहुत सुधार हो रहा है। बेशक गड़बड़ियाँ भी हैं, पर उनकी संख्या धीरे धीरे कम हो रही है। आप निस्संदेह अपने गाँव शहर के स्कूल में भ्रमण करिए, पर स्वस्थ मानसिकता ले साथ। स्कूल में घुसते समय आपके अंतर्मन में वास्तव में ज़मीनी सुधार की भावना हो, विद्यालय या शिक्षक की गरिमा ख़राब करने की नहीं। आप स्वस्थ मानसिकता से आइए, शिक्षक आपका दिल से स्वागत करेंगे। पर अभद्रता का उत्तर शालीनता से मिलने की अपेक्षा मत रखिए।
#CJP
सीजेपी के स्कूल ठीक करो अभियान ने कई फुंकी हुयी फुलझड़ियों में फिर से पोटाश भर दिया है। राजनेता और समाजसेवी की स्वघोषित पदवियों के बीच दोलन कर रहे कई बेरोज़गार युवा इस समय माथे पे आईएएस-पीसीएस वाली फ्यूज सरकारी बत्ती लगाए और छाती पर प्रदेश सरकार वाली अदृश्य तख्ती टांगे जिला विद्यालय निरीक्षक बने स्कूलों की जाँच करते घूम रहे हैं। भाँति भाँति के वीडियो आ रहे है। किसी में वाक़ई स्कूल की दुर्दशा दिखाई जा रही है, तो किसी में चंद युवा झुंड बना मस्साब लोगों को घेरकर मौखिक सबक सिखा रहे हैं। वैसे सच कहूँ तो किसी भी नागरिक के लिए विद्यालय जा कर उसकी व्यवस्था जांचने में कोई बुराई नहीं है। हमारे पुरखे तो पुलिस थाने, संसद भवन, अदालत, ज़िलाधिकारी कार्यालय, पंचायत भवन और बैंक वगैरह में घुस घुस कर आज़ादी के बाद से ही औचक निरीक्षण करते रहे हैं। यूँ ही थोड़े ये सब कार्यालय बिना भ्रष्टाचार और अनैतिकता के चल रहे हैं। बड़े निरीक्षण लगे हैं इस विशाल व्यवस्था को उत्तरदायी बनाने में। मैं तो इसे देश का गंभीर दुर्भाग्य मानता हूँ कि चप्पा चप्पा छापा अभियान के महान पैरोकारों की सामाजिक अतिव्यस्तता के कारण स्कूलों का नंबर देर में आया। खैर जब जागो , तब भागो।
मैं अध्यापक साथियों से भी कहना चाहूँगा कि हर ग्रामीण का अधिकार है अपने विद्यालय की स्थिति जांचना। पर कुछ चीज़ों का ध्यान रखिए। यदि कोई नागरिक या ग्रामीण हमारे विद्यालय का हाल लेने आए, तो उन्हें स्थानीय शिक्षा अधिकारी महोदय का विद्यालय में अनाधिकृत प्रवेश संबंधी आदेश दिखा दीजिए। फिर भी न मानें तो उन्हें अपना काम करने दीजिए। स्कूल आए व्यक्ति यदि आपसे नम्रता से पेश आ रहे हैं, तो आप भी नम्र ही रहिए। वो कोई अपराधी नहीं, हमारी तरह ही जागरूक नागरिक हैं। इसे एक अवसर की तरह मानिए। विद्यालय की कई ऐसी समस्याएं है जो राजनैतिक या प्रशासनिक मजबूरियों के कारण हम स्वयं उजागर नहीं कर सकते, उन्हें क्रांति के इन झंडाबरदारों के सहारे उजागर होने दीजिए। क्या पता, इनकी पब्लिसिटी से विद्यालय की समस्या समाधान हो जाए। पर यदि आपको जरा भी सुरक्षा का खतरा लगे, या लगे कि राजनीति से प्रेरित लोग झुंड बना कर स्कूल में घुस आए हैं, या आपसे जरा भी भाषायी या शारीरिक अभद्रता कर रहे हैं, या विद्यालय के दैनिक क्रियाकलापों में बाधा डाल रहे हैं, या वायरल होने के चलकर में अनावश्यक अनौचित्यपूर्ण बातों का बतंगड़ बना रहे हैं, तो तत्काल पुलिस बुलाइये और बाकी काम खाकी को करने दीजिए। मैं ग्रामीणों और नागरिकों से भी कहना चाहूँगा कि हर गुज़रते साल के साथ स्कूलों में बहुत सुधार हो रहा है। बेशक गड़बड़ियाँ भी हैं, पर उनकी संख्या धीरे धीरे कम हो रही है। आप निस्संदेह अपने गाँव शहर के स्कूल में भ्रमण करिए, पर स्वस्थ मानसिकता ले साथ। स्कूल में घुसते समय आपके अंतर्मन में वास्तव में ज़मीनी सुधार की भावना हो, विद्यालय या शिक्षक की गरिमा ख़राब करने की नहीं। आप स्वस्थ मानसिकता से आइए, शिक्षक आपका दिल से स्वागत करेंगे। पर अभद्रता का उत्तर शालीनता से मिलने की अपेक्षा मत रखिए।
#CJP
सीजेपी के स्कूल ठीक करो अभियान ने कई फुंकी हुयी फुलझड़ियों में फिर से पोटाश भर दिया है। राजनेता और समाजसेवी की स्वघोषित पदवियों के बीच दोलन कर रहे कई बेरोज़गार युवा इस समय माथे पे आईएएस-पीसीएस वाली फ्यूज सरकारी बत्ती लगाए और छाती पर प्रदेश सरकार वाली अदृश्य तख्ती टांगे जिला विद्यालय निरीक्षक बने स्कूलों की जाँच करते घूम रहे हैं। भाँति भाँति के वीडियो आ रहे है। किसी में वाक़ई स्कूल की दुर्दशा दिखाई जा रही है, तो किसी में चंद युवा झुंड बना मस्साब लोगों को घेरकर मौखिक सबक सिखा रहे हैं। वैसे सच कहूँ तो किसी भी नागरिक के लिए विद्यालय जा कर उसकी व्यवस्था जांचने में कोई बुराई नहीं है। हमारे पुरखे तो पुलिस थाने, संसद भवन, अदालत, ज़िलाधिकारी कार्यालय, पंचायत भवन और बैंक वगैरह में घुस घुस कर आज़ादी के बाद से ही औचक निरीक्षण करते रहे हैं। यूँ ही थोड़े ये सब कार्यालय बिना भ्रष्टाचार और अनैतिकता के चल रहे हैं। बड़े निरीक्षण लगे हैं इस विशाल व्यवस्था को उत्तरदायी बनाने में। मैं तो इसे देश का गंभीर दुर्भाग्य मानता हूँ कि चप्पा चप्पा छापा अभियान के महान पैरोकारों की सामाजिक अतिव्यस्तता के कारण स्कूलों का नंबर देर में आया। खैर जब जागो , तब भागो।
मैं अध्यापक साथियों से भी कहना चाहूँगा कि हर ग्रामीण का अधिकार है अपने विद्यालय की स्थिति जांचना। पर कुछ चीज़ों का ध्यान रखिए। यदि कोई नागरिक या ग्रामीण हमारे विद्यालय का हाल लेने आए, तो उन्हें स्थानीय शिक्षा अधिकारी महोदय का विद्यालय में अनाधिकृत प्रवेश संबंधी आदेश दिखा दीजिए। फिर भी न मानें तो उन्हें अपना काम करने दीजिए। स्कूल आए व्यक्ति यदि आपसे नम्रता से पेश आ रहे हैं, तो आप भी नम्र ही रहिए। वो कोई अपराधी नहीं, हमारी तरह ही जागरूक नागरिक हैं। इसे एक अवसर की तरह मानिए। विद्यालय की कई ऐसी समस्याएं है जो राजनैतिक या प्रशासनिक मजबूरियों के कारण हम स्वयं उजागर नहीं कर सकते, उन्हें क्रांति के इन झंडाबरदारों के सहारे उजागर होने दीजिए। क्या पता, इनकी पब्लिसिटी से विद्यालय की समस्या समाधान हो जाए। पर यदि आपको जरा भी सुरक्षा का खतरा लगे, या लगे कि राजनीति से प्रेरित लोग झुंड बना कर स्कूल में घुस आए हैं, या आपसे जरा भी भाषायी या शारीरिक अभद्रता कर रहे हैं, या विद्यालय के दैनिक क्रियाकलापों में बाधा डाल रहे हैं, या वायरल होने के चलकर में अनावश्यक अनौचित्यपूर्ण बातों का बतंगड़ बना रहे हैं, तो तत्काल पुलिस बुलाइये और बाकी काम खाकी को करने दीजिए। मैं ग्रामीणों और नागरिकों से भी कहना चाहूँगा कि हर गुज़रते साल के साथ स्कूलों में बहुत सुधार हो रहा है। बेशक गड़बड़ियाँ भी हैं, पर उनकी संख्या धीरे धीरे कम हो रही है। आप निस्संदेह अपने गाँव शहर के स्कूल में भ्रमण करिए, पर स्वस्थ मानसिकता ले साथ। स्कूल में घुसते समय आपके अंतर्मन में वास्तव में ज़मीनी सुधार की भावना हो, विद्यालय या शिक्षक की गरिमा ख़राब करने की नहीं। आप स्वस्थ मानसिकता से आइए, शिक्षक आपका दिल से स्वागत करेंगे। पर अभद्रता का उत्तर शालीनता से मिलने की अपेक्षा मत रखिए।
#CJP