युवा आईपीएस अधिकारी प्रणव जैन ने जो लिखा उसे सभी को पढ़ना समझना और सोचना चाहिए! अंग्रेजी में लिखा है उन्होंने! इसे हिंदी में भी पढ़ा जाना चाहिए! उनके लेख का हिंदी अनुवाद है! उनकी अनुमति के बिना और माफ़ी के साथ कुछ बाते जोड़ी है! पढ़ें और और फिर अतीत से वर्तमान का एक मुकम्मल सफर करें,ढेर सा���े ख्यालात के साथ! यकियें दिलाता हूँ! कुछ मिनट आपका जरूर इसे पढ़ने में जाएगा! लेकिन क्या दे जाएगा इसे आप खुद महसूस करेंगे! और आज के कटु सोशल मीडिया काल में इसे पढ़ना और भी जरुरी है!
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कुछ हफ्ते पहले, एक दोस्त ने मुझे रात 01:40 बजे फोन किया। मैसेज नहीं किया। फोन किया।
एक पल के लिए मैं बुरी खबर के लिए तैयार हो गया। इस वक़्त कॉल? भूल चूका था कि एक वक़्त कैसे जब रात के दो बजे भी दरवाजे से जोर से आवाज आती थी और खोलने पर सवाल होता था-सुट्टा मारना है क्या! और पुरे नींद में सामने वाले मैदान में चला जाता था! और फिर वहां उन सुट्टों में जीवन सफर के तरंगों को भी महसूस करता था!
लेकिन वह कल था!
आज जीवन ने हम फॉर्मेट कर दिया है कि देर रात के फोन सिर्फ़ तब आते हैं जब कोई मुसीबत हो। कोई अस्पताल में। कोई फँसा हुआ। कोई मर गया।
खैर बात कल की!
सामान्य कॉल थी! लंदन से एक दोस्त का फ़ोन था! वह वहां काम ख़त्म करके लंदन की लगभग खाली सड़कों पर घर जा रही थी, उसे एक गाना सुनाई दिया जिस पर हम दोनों कभी झूमते थे, और अचानक उसे मेरी याद आ गई। तो उसने फोन लगा दिया दिया। हमने फिर आधे घंटे तक ऐसी बातें कीं जो आज के सन्दर्भ में बेसिर वाली कह सकते हैं! कुछ भी तो नहीं था उस बात में! काम की! क्या बातें थी?
काम की थकान। बॉलीवुड की गॉसिप। वो अपनी शादीशुदा ज़िंदगी को कितना एंजॉय कर रही है। एक प्रोफेसर जिसे हम कभी नफ़रत करते थे उनका याद आना!
बताओ यह भी कोई बात थी? यही माइंडफॉर्मेट कि बात थी!
कॉल ख़त्म होने के बाद मैं देर तक बैठा रहा! अजीब सी कसक के साथ कि मैंने कुछ देर के लिए अपने कल से अरसे बाद मिला! यह "मी कालिंग मी" वाली स��� कुछ हालात थे! पल भर के जगजीत सिंह के उस गाने के साथ बहने लगा-वो कागज की बस्ती वह बारिश का पानी"!
रात के सन्नाटे में सब कुछ फ़्लैश बैक सा चलने लगा-
कल की तो बात थी!
जब दोस्ती के लिए बड़ी प्लानिंग नहीं चाहिए होती थी। हम घंटों बात करते थे बिना कैलेंडर देखे। होस्टल की छतों, चाय की टपरियों और बिना वजह की ��ंबी सैरों पर पूरी शामें निकल जाती थीं। तब ( जिसे हम जवानी के दिन कहते है) में दोस्ती के पास फालतू वक्त होता था – खुला, उद्देश्य यह की कोई उद्देशय नहीं का, और शानदार तरीके से बर्बाद करने वाला समय!
झटके में मैं ओटीटी सीरीज की तरग फ़्लैशबैक से आज वर्तमान में आ गया!
आज जब आपस में बिना किसी अजेंडे की मिलने की बात हो तो एक फॉर्मेट है उसे टालने का- "जल्दी मिलते हैं" और "सॉरी यार, ज़िंदगी बहुत बिज़ी है"!
इ�� दो बहानों के बिच आज की एडल्ट दोस्ती हमारे आधुनिक जीवन में सबसे भावनात्मक और सबसे कम चर्चा वाली जिंदगी की कमी और नुकसान बन गई। हमने कल की दोस्ती की कही किसी जेहन के कोने वाले कब्र में दफ़न कर दिया! और वह कमी चिढ में बदल गयी!
यही कारण है की अब जब रॉकफोर्ड का गान " यारो दोस्ती बड़ी ही हसीं हैं" कहीं दूर भी सुनाई देता हो तो हम जल्दी दूर ��े भागने की कोश्शि करते हैं! एक गिल्ट उभरता हाउ और हम उसे तुरंत दबा देते हैं! या दोस्ती का एक ब्रेक अप ही है!
देखिये न रोमांटिक रिश्तों के ब्रेकअप का एक सिस्टम है! वह आपके साथ चलता है! अलग अलग रूप में! उसके लिए फिल्में हैं। गाने हैं। कविता, शरई है! रिवाज़, हमदर्दी, सलाह के कॉलम गए! यह आपको इस ब्रेक अप को बनाए रखने में मदद करता है! अगर आप नहीं भी चाह रहे हैं तब भी!
लेकिन दोस्ती के छूटने का ग़म अदृश्य रहता है। न यह कहीं अस्तितत्वा में है! कोई नहीं यह बताता है उस इंसान से धीरे-धीरे दूर हो जाना कितना तकलीफ़देह होता है जो कभी आपकी ज़िंदगी एक अटूट हिस्सा था जो आपको बारीकी से जानता था। वह आपकी ख़ामोशी की भाषा पर लॉन्ग एस्से लिख सकता तह! जो तुम्हारे "ठीक है" कहने के अंदाज़ से तुम्हारा मूड पहचान लेता था। ��ो तुम्हारे क्रश और छोटी-छोटी असुरक्षाओं के बारे में सब कुछ जानता था। आप गाली देकर भी उससे काम करवा सकते थे! कोई अपेक्षा नहीं! बस फ्रीक्वेंसी मैच है! इतना काफी था!
यहाँ यह और भी त्रासदी है की हर रिश्ते के टूटने या पीछे छूटने के पीछे वजह होती है!
यहाँ ऐसा कुछ तो नहीं था! बस छूट गया! छूट गया! बिना अलविदा कहे! टच में रहेंगे कहकर हम उस दोस्ती के स्पर्श को भूल गए! बस भूल गए !
रोमांटिस्म की तरह दोस्ती ड्राम���टिक इफ़ेक्ट के साथ ख़त्म नहीं होतीं। कोई आखिरी बातचीत नहीं। अलग दूर जाने की कोई साफ़ वजह नहीं। कोई सिनेमाई दी एन्ड नहीं। ज़्यादातर दोस्तियाँ अनदेखे जमा होते बोझ में घुल जाती हैं, अलमारी की उस किताब की तरह रख दी जाती है जिसके बारे में हम सोचते हैं की खाली वक़्त में पढ़ेंगे और बाद में पढ़ना तो दूर उस किताब तक को भूल जाते हैं!
टाली दी गली कॉल बैक, थका देने वाली नौकरियाँ, ओढ़ा हुआ ��िजिपन, जगह की दूरी, इमोशनल फटीग, जीवन की अलग प्राथमिकताएँ, और अलग रफ्तार से अलग अलग पटरी पर चलती ज़िंदगियाँ।
और फिर एक दिन अचानक अहसास होता है कि आज वह जो इंसान कभी हमारे हल कहे-अनकहे अल्फाज्ज को मुझसे बेहतर डिकोड कर सकता था आज वह हामरे में सिर्फ़ उतना ही जानता है हमारे इंस्टाग्राम स्टोरी पर बाकी जीवन में कभी न मिले ये "दोस्त" भी जानते हैं!
क्या इस पीड़ा को किसी ने महसूस किया है?
हम इस तरह जीने ���े लिए तो नहीं बने थे! स्कूल-कॉलेज वाली कल की दोस्तियाँ इसलिए चलती थीं क्योंकि संस्थान एक साथ हमें डोरी मेइब बाँध देता था! बार-बार मिलना दोस्ती को दिन दर दिन रिन्यूअल करते रहते था!
समाजशास्त्री कहते आए हैं कि मानवीय रिश्ते रिश्तों की तीव्रता या अतरंगता से बलिक नियमितता से टिकते हैं। एक ही लोगों से बार-बार मिलना धीरे-धीरे नज़दीकी बना देता है। जवानी की दोस्ती यह ��्वाभाविक रूप से देती थी! एडल्ट जीवन इस चेन को पूरी तरह तोड़ देता है। खासकर शहरी जीवन में।
आज के युवा प्रोफेशनल ऐसे सिस्टम में जी रहे हैं जो कनेक्शन का जश्न मनाने का दिखावा करते हुए दोस्ती को चुपचाप जेहन के कब्र में दगन कर रहा है! एडल्ट जीवन में वीकेंड जश्न भी एक "ड्यूटी" की तरह हो जाता है जो सोशल वेलिडेशन के लिए करना ही होता है!
अगर वीकंड में अच्छी तस्वीर वाली कोई "इवेंट" न किया तो अलग फोमो!
इनक��� बीच शहर दूरियाँ बेरहमी से बढ़ा देते हैं। वीकेंड सामाजिक जगहों की बजाय रिकवरी का समय बन गए हैं। महत्वाकांक्षा हर किसी को अपनी ज़िंदगी का प्रोजेक्ट मैनेजर बना देती है।
।त्रासदी यह है कि ये अकेलापन अक्सर लगातार डिजिटल संपर्क के साथ रहता है। हम शायद पहली पीढ़ी हैं जिसके पास एक-दूसरे तक बिना रुके पहुँच है, और साथ ही हम भावनात्मक रूप से सबसे ज़्यादा दुर्गम भी हो गए हैं। हम एक-दूसरे के अ��्तित्व की एंबिएंट जानकारी रखते हैं, पर एक-दूसरे की ज़िंदगी में सार्थक रूप से हिस्सा नहीं लेते। मैं जानता हूँ मेरे दोस्त क्या खाते हैं। कौन से कैफे जाते हैं। किस बात की शिकायत करते हैं। मुझे पता चल जाता है कि उन्हें प्रमोशन मिला क्योंकि लिंक्डइन मुझे उनके पहले बता देता है। और फिर भी कभी-कभी फोन करने से पहले हिचकता हूँ क्योंकि मुझे उनकी ज़िंदगी का भावनात्मक मौसम अब पता नहीं रहता। बस उतना पता ह��� जिनकी उनकी सोशल प्रोफइल हमारे सर्च में आई! यहाँ एक एल्गो का अलग इशू है!
खुद का सैनिटाइज़्ड वर्ज़न एडल्ट जीवन आत्म-नियंत्रण को इनाम देता है। हर कोई थका हुआ है। हर कोई खुद पर काम कर रहा है। हर कोई "बहुत कुछ झेल रहा है"।कुछ समय पहले, मैं अपने एक सबसे करीबी दोस्त से लगभग दो साल बाद मिला। हम दोनों ऐसे बदल गए थे दो अनजाने की तरह!
वो भाषा में ज़्यादा एफिशिएंट हो गया था, जैसे कॉरपोरेट जीवन ने उसके ख़्यालों को बुलेट पॉइंट में ढाल दिया हो। मैं एक अजीब तरह से हमेशा थका हुआ हो गया था, जहाँ थकान इतनी स्थायी लगती है कि शिकायत करने का मन भी नहीं करता। पहले बीस मिनट बातचीत अजीब तरह से एडल्ट अपडेट्स पर अटकी रही। नौकरी। माँ-बाप। सेहत। आपसी जान-पहचान वालों की डरावनी रफ्तार से सगाई। और फिर अचानक वो हँसा – पूरी तरह, ज़ोर से, सिर पीछे फेंककर बिलकुल वैसे ही जैसे पहले हँसता था – और एक पल के लिए समय सिमट गया। वो फिर सामने था।
वो भाई जो मेरे साथ कभ��� ऑटो का किराया नहीं बाँटता था। वो भाई जो लेक्चर में मेरे बगल बैठकर नोटबुक के किनारे बकवास स्केच बनाता था। वो भाई जो जानता था कि मैं कौन हूँ, इससे पहले कि एडल्ट जीवन हम सबको थोड़ा पॉलिश किया हुआ रिज्यूमे बना दे।आधुनिक जीवन की भावनात्मक अर्थव्यवस्था आधुनिक वयस्क जीवन लगभग हर क्षेत्र में ऑप्टिमाइज़ेशन को बढ़ावा देता है। प्रोडक्टिव बनो। एफिशिएंट बनो। खुद को हील करो। अपने शौक को मोनेटाइज़ करो। अपनी पहचान क्यूरेट करो।
कहीं न कहीं दोस्तियाँ भी मैनेजमें��� की भाषा में ढलने लगीं। अब हम भावनात्मक बैंडविड्थ की बात ऐसे करते हैं जैसे डेटा प्लान हो। कभी-कभी स्नेह भी अदृश्य कॉस्ट-बेनिफिट एनालिस से तौला जाता है: कौन पहले मैसेज करता है? कौन ज़्यादा मेहनत करता है? कौन भावनात्मक रूप से उपलब्ध है? कौन ऊर्जा चूसता है?लेकिन दोस्ती हमेशा एक तरह की गैर-तार्किक उदारता पर निर्भर रही है। साथ मिलकर समय को शानदार तरीके से बर्बाद करने की इच्छा। वही चिंता पाँचवीं बा��� सुनने की हिम्मत। चुप्पी में बैठना। बिना किसी एजेंडे के उपलब्ध रहना।और शायद इसीलिए अब यह दोस्ती अब ज़्यादा कट्टर लगती है। ये उस लेन-देन वाली सोच का विरोध करती है जिसे आधुनिक जीवन हर जगह इनाम देता है। क्योंकि एक सच्चा दोस्त कुछ बेहद दुर्लभ देता है: बिना ऑप्टिमाइज़ की गई उपस्थिति। परिवार खून से बंधा होता है। शादी संस्था से। काम के रिश्ते उपयोगिता से। दोस्ती सिर्फ़ आपसी चुनाव से ज़िंदा रहती ���ै। किसी को रुकना नहीं होता। फिर भी कुछ लोग रुकते हैं।नामुम��िन शेड्यूल और भावनात्मक थकान के बावजूद, कुछ दोस्त लौटते रहते हैं। वो मीटिंग के बीच मीम भेजते हैं। तुम्हारी अहम तारीखें याद रखते हैं। बिना वजह फोन करते हैं। सुविधा के लिए नहीं। बल्कि इसलिए कि थकान के नीचे कहीं न कहीं, वो आज भी तुम्हारी अंदरूनी ज़िंदगी को अहम मानते हैं। कभी-कभी ये बस एक ज़िद होती है – दुनिया के हर चीज़ को प्राथमिकता देने के दबाव के बावजूद, लोगों के पास बार-बार लौटने की ज़िद।
पटना स्मार्ट सिटी में सड़कों पे स्टार्ट की गई वाटर राइड्स,
पर्यटन को ध्यान में रखते हुए उठाया गया सराहन��य कदम।
अगर ऐसे ही पानी भरा रहा तो इसमें लेज़र शो भी स्टार्ट करने की बातचीत चल रही है।
@VijayGajeraO@vijaygajera@OnlyFactIndia इसलिये कहता हूँ, हिंदुओं को किसी एक पार्टी से मत जोड़ो, अपना ख़ुद का इकोसिस्टम बनाओ, कोई बचाने ���हीं आयेगा।
BJP में मलाई खाने वाले लोग ज़्यादा है, वो किसी के सगे नहीं है। 🤷🏻♂️
Entire Facebook has turned anti-modi in the last 6-8 months
Whenever I open facebook I just see anti-modi posts with 50k likes. Even my long term modi supporting friends are sharing anti-modi posts
I don't ask what changed because everyone has different reasons. BJP leadership is living in a bubble that everything is fine because BJP wins elections on welfare schemes
मर्द समुंदर के तलहटी में केबल बिछा के दुनिया जोड़ने से लेकर उड़ती चिड़िया के नितंब में GPS फिट करके पारिस्थितिकी संरक्षण करने के अभियान में लगा हुआ है ,फिर भी कभी उसके श्रम पे कोई डिबेट नहीं होती।
औरत घर में बैठे कर मर्द द्वारा सप��लाइड गेंहू-चावल को मर्द द्वारा जुगाड़ किए गए आग पर भून ले रही हैं , इस बात के लिए बरसों से कविता-कहानी और फ़िल्मों में उनका रुदन-क्रन्दन रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
फिर मेरे कुछ म्यूचुअल्स का कहना है कि मैं स्त्री को पुरुष के बराबर मान लूँ।
A conspiracy to sabotage railway signal boxes and infrastructure at Charbagh Railway Station, Lucknow has been successfully foiled by the UP Anti-Terrorist Squad (UP ATS). Four accused — operating under directions of a Pakistan-based handler via social media and encrypted apps — were arrested from the station premises. Flammable substances and electronic equipment were recovered from their possession. Indian Railways commends the U.P ATS for their swift action and assures the public that passenger safety remains our highest priority. Security at all stations has been further strengthened: Indian Railways
आइटम नंबर सॉन्ग करने लिए तमन्ना भाटिया 5 करोड़ रुपए चार्ज करती हैं.
नोरा फतेही 2 करोड़.
जैकलीन फर्नांडिस 3 करोड़.
कृति सैनन 4 करोड़.
सामंथा रुथ प्रभु 5 करोड़.
आइटम नंबर सॉन्ग में हर एक्ट्रेस कमर, नाभि, पेट और जांघ दिखाती है.
अगर यही सब चीज दिखाने के लिए कोई कंटेंट क्रिएटर यूट्यूब चैनल पर 390 रुपए मासिक ले रहा तो क्या गलत कर रहा है.
जित��ा सम्मान एक एक्ट्रेस का है उतना ही सम्मान हर यूट्यूब कंटेंट क्रिएटर का है. लेकिन कुछ लोग अपना सामंती मानसिकता ��ा डंडा आम कंटेंट क्रिएटर पर चला रहे हैं.
सभी साथियों तैयार रहे
देश में फ्री स्पीच को दबाया जा रहा है, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का हनन हो रहा है। विरोधी विचारधारा के अकाउंट को सस्पेंड किया जा रहे हैं। देश के महान देशभक्त whistleblower पर FIR किए जा रहे हैं।
लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए
📢 Hashtag: #SaveFreeSpeech
आज सुबह 10 बजे से ट्वीट करके ट्रेंड को सफल बनायें।
Today it is Khurpench, tomorrow it will be you! Khurpench raised a voice, raised a voice for us. He tried to make the system accountable. Now the system is trying to silence him through FIRs.
Raise your voice, ask for establishment of free speech.
#SaveFreeSpeech
Unless you're earning good money from Twitter, there's no point in going after the government or bureaucrats. No point in fking up your mental health for $50.
Enjoy sports, do well in life. This country & system are beyond repair.
इस ट्वीट के कारण खुरपेंच पर FIR हुई है।
फिलहाल खुरपेंच भाई अभी मस्त पहाड़ों पर अदरक वाली चाय का आनंद ले रहे हैं
आने के बाद और रिपोर्ट्स जारी की जाएंगी।
तुम्हे जितना fir करना हो करो, अभी तो यह ट्रेलर है।
पूरी मूवी आना रिलीज होना बाँकी है।
सीट बेल्ट बांधकर रख लो।।
#I_Stand_With_Khurpenchh
अपने घर के पास नौकरी करने वाले,
नौकरी करते हैं,
शादी-ब्याह में जाते हैं, घर-परिवार संभालते हैं,
और जिंदगी से लगभग खुश रहते हैं..
पर अपना घर छोड़कर कहीं और
नौकरी करने वाले सिर्फ "नौकरी" ही कर पाते हैं।
- देवेश उपाध्याय
खुरपेंच इन 2024
•एक्सपोज्ड कोचिंग माफियाज
•एक्सपोज्ड माल प्रैक्टिसेज इन कोचिंग इंडस्ट्री
•UPSC फेक सर्टिफिकेट केसेज
•एक्सपोज्ड ब्यूरोक्रेटिक करप्शन
•एक्सपोज्ड गवर्नमेंट स्कीम्स
•एक्सपोज्ड हेल्थ एंड एजुकेशन सिस्टम
• एक्सपोज्ड फेक PR ऑफ ब्यूरोक्रेट्स
खुरपेंच इन 2025
• एक्सपोज्ड ब्यूरोक्रेटिक करप्शन
• एक्सपोज्ड गवर्नमेंट स्कीम्स
• एक्सपोज्ड इन्फ्रास्ट्रक्चर ऑफ कंट्री
• एक्सपोज्ड फेक अवार्ड्स
• एक्सपोज्ड फेक PR
• एक्सपोज्ड बेटिंग स्कैम्स
• एक्सपोज्ड MPLADS
• एक्सपोज्ड बहुत सारे छोटे मोटे इश्यूज
• एक्सपोज्ड इंडियन मीडिया
खुरपेंच इन 2026
• MPLADS
• हम FSSAI को एक्सपोज करेंगे रिपोर्ट बन रही
• टैक्स के पैसों का हिसाब लेंगे , पूरे देश में हमने 550 से ज्यादा RTI डाल रखी हैं,
• IAS,IPS और IRS लॉबी को एक्सपोज क���ेंगे
• इस साल करीब 50 फेक सर्टिफिकेट के केसेज को एक्सपोज करेंगे , हम लगातार काम कर रहे ,
• फेक ड्रग मैन्युफैक्चरिंग के नेक्सेस को एक्सपोज करेंगे ,
• फेक PR ऑफ लीडर्स एंड ब्यूरोक्रेट्स को एक्सपोज करेंगे,
• 5 गवर्नमेंट की स्कीम्स को एक्सपोज करेंगे , रिपोर्ट बन रही ,
• CSR फंडिंग को चा��ों खाने चित्त करेंगे,
• कुछ NGO हमारे निशाने पर हैं ,जो देश विरोधी और विकास विरोधी काम कर रहे ,
• इस साल हम कुछ बिजनेसस और बिजनेसमैन को एक्सपोज करेंगे,
• कुछ छोटे छोटे इश्यूज है जिनपर आप लगातार रिपोर्ट देखते रहेंगे ।
आप सभी का साथ बने रहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।