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#Kedarnath #Tweevalogue #XValogue #Shravan2026
In that stillness of the night,where once there was only the whisper of the wind and the beat of one's own footsteps,today a thread of light lies stretched across the path.
It may look like nothing at all. Just a mountain trail, a few electric poles, streetlights, and by their grace a road that stays clearly visible even in the dark of night. And why should it look like anything? For most of us, light is so ordinary a thing that we cannot even imagine its absence.
But if these pictures stir not the slightest wonder in you -then pause for a moment and consider: you have truly been fortunate.
Because there was a time when, at these heights, light was not just a want - it was beyond imagination. Here, darkness was no shortcoming; it was simply a fact, one that every traveller quietly accepted and walked on with. The trembling beam of a torch in the black night, hands curled tight against the cold, and at every step that uncertainty-where does the next stone lie, and how deep is the drop below? Faith walked beside you, but light did not.
And today? Today those same forbidding, lonely trails are aglow with solar and alternative sources of energy. Without any noise, without any announcement,one by one, these little lamps have descended into the nights of the mountains.
And in this simple light, the most beautiful thing is not the electricity at all. It is the assurance that even at this deserted height, even in this fearsome dark, someone thought of you. Someone made sure that the weary traveller who reaches this bend at night meets not fear, but a path made clear.
The journey to Baba's abode has always been one of faith. But now it is becoming just as safe and gentle too - and that, perhaps, is the greatest thing about these glowing lights.
#Kedarnath #Tweevalogue #XValogue #Shravan2026
रात के उस सन्नाटे में, जहाँ कभी सिर्फ़ हवा की सरसराहट होती थी और अपने ही क़दमों की धड़कन,वहाँ आज रोशनी की एक लकीर बिछी हुई है।
देखने में शायद यह कुछ भी न लगे। बस एक पहाड़ी रास्ता, उस पर बिजली के खंभे,स्ट्रीटलाइट और उनके सहारे रात के अँधेरे में भी साफ़ दिखता एक मार्ग।और लगे भी क्यों? हममें से बहुतों के लिए तो रोशनी इतनी सहज है कि उसकी अनुपस्थिति की कल्पना ही नहीं होती।
पर अगर इन तस्वीरों को देखकर आपके मन में ज़रा-सा भी आश्चर्य नहीं होता,तो एक पल रुककर सोचिएगा, आप वाक़ई बहुत भाग्यशाली रहे हैं।
क्योंकि एक समय था, जब इन ऊँचाइयों पर रोशनी की ज़रूरत तो दूर, कल्पना तक नहीं होती थी। यहाँ अँधेरा कोई कमी नहीं, बस एक तथ्य था,जिसे हर यात्री चुपचाप स्वीकार करके चलता था।अंधेरे में टार्च की रौशनी, ठंड में सिकुड़े हाथ, और हर क़दम पर यह अनिश्चय कि अगला पत्थर कहाँ है और कितना गहरा है नीचे का ढाल। श्रद्धा तो साथ होती थी, पर उजाला नहीं।
और आज? आज वही दुर्गम, सुनसान रास्ते सौर और वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों से जगमगा रहे हैं। बिना किसी शोर के, बिना किसी घोषणा के-बस एक-एक करके ये दीये पहाड़ की रातों में उतर आए हैं।
और इस साधारण-सी रोशनी में जो बात सबसे सुंदर है, वह बिजली नहीं है। वह यह भरोसा है कि इस निर्जन ऊँचाई पर, इस भयावह अँधेरे में भी, किसी ने आपके बारे में सोचा। किसी ने यह ध्यान रखा कि जो थका-हारा यात्री रात को इस मोड़ पर पहुँचे, उसे डर नहीं, राह दिखे।
बाबा के धाम तक का सफ़र हमेशा से आस्था का रहा है। पर अब वह उतना ही सुरक्षित और सहज भी होता जा रहा है - और यही, शायद, इन जलती लाइटों की सबसे बड़ी बात है।
#Kedarnath #Tweevalogue #XValogue #Shravan2026
रात के उस सन्नाटे में, जहाँ कभी सिर्फ़ हवा की सरसराहट होती थी और अपने ही क़दमों की धड़कन,वहाँ आज रोशनी की एक लकीर बिछी हुई है।
देखने में शायद यह कुछ भी न लगे। बस एक पहाड़ी रास्ता, उस पर बिजली के खंभे,स्ट्रीटलाइट और उनके सहारे रात के अँधेरे में भी साफ़ दिखता एक मार्ग।और लगे भी क्यों? हममें से बहुतों के लिए तो रोशनी इतनी सहज है कि उसकी अनुपस्थिति की कल्पना ही नहीं होती।
पर अगर इन तस्वीरों को देखकर आपके मन में ज़रा-सा भी आश्चर्य नहीं होता,तो एक पल रुककर सोचिएगा, आप वाक़ई बहुत भाग्यशाली रहे हैं।
क्योंकि एक समय था, जब इन ऊँचाइयों पर रोशनी की ज़रूरत तो दूर, कल्पना तक नहीं होती थी। यहाँ अँधेरा कोई कमी नहीं, बस एक तथ्य था,जिसे हर यात्री चुपचाप स्वीकार करके चलता था।अंधेरे में टार्च की रौशनी, ठंड में सिकुड़े हाथ, और हर क़दम पर यह अनिश्चय कि अगला पत्थर कहाँ है और कितना गहरा है नीचे का ढाल। श्रद्धा तो साथ होती थी, पर उजाला नहीं।
और आज? आज वही दुर्गम, सुनसान रास्ते सौर और वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों से जगमगा रहे हैं। बिना किसी शोर के, बिना किसी घोषणा के-बस एक-एक करके ये दीये पहाड़ की रातों में उतर आए हैं।
और इस साधारण-सी रोशनी में जो बात सबसे सुंदर है, वह बिजली नहीं है। वह यह भरोसा है कि इस निर्जन ऊँचाई पर, इस भयावह अँधेरे में भी, किसी ने आपके बारे में सोचा। किसी ने यह ध्यान रखा कि जो थका-हारा यात्री रात को इस मोड़ पर पहुँचे, उसे डर नहीं, राह दिखे।
बाबा के धाम तक का सफ़र हमेशा से आस्था का रहा है। पर अब वह उतना ही सुरक्षित और सहज भी होता जा रहा है - और यही, शायद, इन जलती लाइटों की सबसे बड़ी बात है।
#Kedarnath #Shravan2026 #HarHarMahadev #Xvalogue #Tweevalogue
24 अगस्त 2026, सोमवार
श्रावण का चतुर्थ सोमवार, शुक्ल पक्ष द्वादशी।
कुछ लोग तीर्थ करने आते हैं और लौट जाते हैं; कुछ रुक जाते हैं, और रुकते-रुकते तीर्थ ही उनका घर बन जाता है।
इस धाम में बीते इन दिनों ने मुझे बदल दिया है। वर्षों पूर्व जब पहली बार यहाँ क़दम रखे थे, तब मैं एक यात्री था- मार्ग पूछता, चेहरों में अपरिचय ढूँढता, हर सीढ़ी पर साँस सँभालता। और आज? आज न कोई मार्ग पूछना पड़ता है, न कोई चेहरा अनजाना लगता है। बाबा ने कब यात्री से अपना बना लिया, पता ही नहीं चला।
आज भोर में बाबा केदार के दर्शन से पहले बाबा मुकुंद भैरव के दर्शन प्राप्त हुए। जहाँ केदारनाथ साक्षात् करुणा हैं, वहीं क्षेत्रपाल भैरव इस भूमि के प्रहरी - जिनकी अनुमति के बिना न कोई इस धाम में ठहरता है, न टिकता है। यहाँ बीते ये दिन बाबा भैरव की ही कृपा का प्रमाण हैं। उनके द्वार पर मस्तक झुकाकर यही अनुभव हुआ कि यह ठहराव मेरा चुना हुआ नहीं, उनका दिया हुआ वरदान है।
जीवन के सबसे सुंदर दिन यही रहे। न भविष्य की चिंता, न अतीत का बोझ - केवल वर्तमान, केवल 'हर हर महादेव'। यहाँ सूर्य भी शंख की ध्वनि से उगता है और रात्रि भी आरती की लौ में सोती है।
और इस अपरिचित भूमि को 'घर' बनाने में जिन हाथों का योगदान है, उनमें एक हैं @himamshukedar !!आज का यह क्षण, यह वीडियो, यह झलक - सब उन्हीं की दृष्टि से सँजोई गई है। हिमांशु और उनकी पूरी टीम हर दिन इस बात का जतन करते हैं कि मुझ जैसा कोई भी यहाँ आकर स्वयं को अतिथि नहीं, अपना अनुभव करे। वे केवल मार्ग नहीं दिखाते - वे 'घर' का पता देते हैं।
केदारनाथ ने सिखाया कि घर वह नहीं जहाँ हम जन्म लेते हैं; घर वह है जहाँ पहुँचकर आत्मा कहती है - बस, अब कहीं और नहीं जाना।
बाबा केदार और क्षेत्रपाल भैरव की कृपा-छाया आप सब पर बनी रहे।
हर हर महादेव! जय केदार! जय भैरवनाथ!
देश के भीतर तीर्थों तक पहुँचना आज पहले से कहीं सहज हुआ है, और अपनी धरोहर के इन धामों के दर्शन की प्रेरणा माननीय @narendramodi जी से मिलती है। उन्हें सादर नमन।

#Kedarnath #Shravan2026 #NagPanchami #HarHarMahadev #Xvalogue #Tweevalogue
17 अगस्त 2026, सोमवार
कुछ यात्राएँ अकेले आरम्भ होती हैं, और परिवार बनकर पूर्ण होती हैं।
श्रावण का तृतीय सोमवार, शुक्ल पक्ष पंचमी और नागपंचमी,आज तीन पुण्य एक साथ प्राप्त हुए,और वह आँगन था पंचम ज्योतिर्लिंग श्री केदारनाथ धाम।
आज जिन चेहरों को पहली बार देखा, वे क्षण भर में अपने हो गए,किसी ने जल बढ़ाया,किसी ने थके क़दमों को कंधा दिया। यहाँ परिचय नहीं पूछा जाता, क्योंकि सबका एक ही गोत्र है, एक ही पुकार : 'हर हर महादेव'।
आज नागपंचमी पर यह भाव और गहरा हुआ।महादेव का परिवार कितना विलक्षण है, गले में वही सर्प जिससे संसार भय खाता है,और द्वार पर वही भैरव जो कपाट बंद होने पर छह मास इस सूने धाम की अकेले रखवाली करते हैं। शिव जी के कुटुम्ब में सबसे उग्र माने जाने वाले ही सबसे बड़े रक्षक हैं। श्रद्धा जिसे भय समझती थी, उसी को रक्षक बना देती है।
बाबा भैरव के दरबार में शीश नवाकर यही समझ आया,परिवार वही है, जो घर के सूने पड़ जाने पर भी उसे अकेला नहीं छोड़ता।
यदि आपके परिवार में किसी ने अब तक इस विराट कुटुम्ब का अंग बनना शेष रखा है,तो इस श्रावण उसे साथ ले आइए। कुछ रिश्ते रक्त से बनते हैं, कुछ 'हर हर महादेव' के उद्घोष से।
बाबा केदार और क्षेत्रपाल भैरव की कृपा-छाया आप सब पर बनी रहे।
हर हर महादेव! जय केदार! जय भैरवनाथ!
देश के कोने-कोने तक फैले इस आध्यात्मिक कुटुम्ब को जोड़ने की प्रेरणा माननीय @narendramodi जी से मिलती है। उन्हें सादर नमन।
#Kedarnath #Shravan2026 #NagPanchami #HarHarMahadev #Xvalogue #Tweevalogue
17 अगस्त 2026, सोमवार
कुछ यात्राएँ अकेले आरम्भ होती हैं, और परिवार बनकर पूर्ण होती हैं।
श्रावण का तृतीय सोमवार, शुक्ल पक्ष पंचमी और नागपंचमी,आज तीन पुण्य एक साथ प्राप्त हुए,और वह आँगन था पंचम ज्योतिर्लिंग श्री केदारनाथ धाम।
आज जिन चेहरों को पहली बार देखा, वे क्षण भर में अपने हो गए,किसी ने जल बढ़ाया,किसी ने थके क़दमों को कंधा दिया। यहाँ परिचय नहीं पूछा जाता, क्योंकि सबका एक ही गोत्र है, एक ही पुकार : 'हर हर महादेव'।
आज नागपंचमी पर यह भाव और गहरा हुआ।महादेव का परिवार कितना विलक्षण है, गले में वही सर्प जिससे संसार भय खाता है,और द्वार पर वही भैरव जो कपाट बंद होने पर छह मास इस सूने धाम की अकेले रखवाली करते हैं। शिव जी के कुटुम्ब में सबसे उग्र माने जाने वाले ही सबसे बड़े रक्षक हैं। श्रद्धा जिसे भय समझती थी, उसी को रक्षक बना देती है।
बाबा भैरव के दरबार में शीश नवाकर यही समझ आया,परिवार वही है, जो घर के सूने पड़ जाने पर भी उसे अकेला नहीं छोड़ता।
यदि आपके परिवार में किसी ने अब तक इस विराट कुटुम्ब का अंग बनना शेष रखा है,तो इस श्रावण उसे साथ ले आइए। कुछ रिश्ते रक्त से बनते हैं, कुछ 'हर हर महादेव' के उद्घोष से।
बाबा केदार और क्षेत्रपाल भैरव की कृपा-छाया आप सब पर बनी रहे।
हर हर महादेव! जय केदार! जय भैरवनाथ!
देश के कोने-कोने तक फैले इस आध्यात्मिक कुटुम्ब को जोड़ने की प्रेरणा माननीय @narendramodi जी से मिलती है। उन्हें सादर नमन।
#Kedarnath #Shravan2026 #Tweevalogue #Xvalogue
10 अगस्त 2026, सोमवार
तेईस किलोमीटर की चढ़ाई के बाद जब पहली बार वे हिमाच्छादित शिखर बादलों को चीरते हुए सामने आते हैं,और उनके बीच अडिग खड़ा दिखता है वह मंदिर, जो सहस्राब्दियों से यहाँ हिम, भूकंप और प्रलय झेलता आया है,तब समझ आता है कि केदारनाथ धाम तक पहुँचना केवल एक यात्रा नहीं, एक रूपांतरण है।
श्रावण के द्वितीय सोमवार एवं कृष्ण पक्ष द्वादशी के इस पावन दिन, पंचम ज्योतिर्लिंग श्री केदारनाथ धाम में बाबा केदार के दर्शन का सौभाग्य मिला। यह क्षण आप सबके स्नेह और भोलेनाथ की कृपा का ही प्रतिफल है।
गर्भगृह में खड़े होकर एक विचित्र बात अनुभव हुई,माँगने को कुछ शेष नहीं रहा। जहाँ महादेव स्वयं हर मन की भाषा पढ़ लेते हैं, वहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और केवल कृतज्ञता बचती है।
पर सबसे अद्भुत दृश्य मंदिर के भीतर नहीं, मार्ग पर तथा मन्दिर के आस पास तथा श्रद्धालुओं की कतारों में था - वृद्ध, युवा, बालक, सब वर्षा को अभिषेक और ठंड को तपस्या मानकर एक ही जयकारे में लीन। ऊँचाई जहाँ साँस रोकती है, वहीं आस्था उसे 'हर हर महादेव' बनाकर लौटा देती है। यही तो है भोले की फौज।
यदि मन में कहीं केदार जाने की इच्छा दबी बैठी है, तो उसे और मत टालिए। कुछ स्थान देखने के लिए नहीं, स्वयं को पाने के लिए होते हैं। बाबा का बुलावा आता नहीं, सुनना पड़ता है।
मेरी हार्दिक कामना है कि इन दर्शनों का पुण्यफल आप सब तक पहुँचे और महादेव की छत्रछाया सदैव आप पर बनी रहे।
हर हर महादेव! जय केदार!
देवभूमि से देश के अनगिनत तीर्थों तक चलती इस यायावरी के मूल में माननीय @narendramodi जी की प्रेरणा रही है - भारत को जानने, जीने और उसकी आध्यात्मिक चेतना से जुड़ने की यह अनवरत यात्रा जिनसे प्रेरित है, उन्हें सादर नमन।

#Kedarnath #Shravan2026 #Tweevalogue #Xvalogue
10 अगस्त 2026, सोमवार
तेईस किलोमीटर की चढ़ाई के बाद जब पहली बार वे हिमाच्छादित शिखर बादलों को चीरते हुए सामने आते हैं,और उनके बीच अडिग खड़ा दिखता है वह मंदिर, जो सहस्राब्दियों से यहाँ हिम, भूकंप और प्रलय झेलता आया है,तब समझ आता है कि केदारनाथ धाम तक पहुँचना केवल एक यात्रा नहीं, एक रूपांतरण है।
श्रावण के द्वितीय सोमवार एवं कृष्ण पक्ष द्वादशी के इस पावन दिन, पंचम ज्योतिर्लिंग श्री केदारनाथ धाम में बाबा केदार के दर्शन का सौभाग्य मिला। यह क्षण आप सबके स्नेह और भोलेनाथ की कृपा का ही प्रतिफल है।
गर्भगृह में खड़े होकर एक विचित्र बात अनुभव हुई,माँगने को कुछ शेष नहीं रहा। जहाँ महादेव स्वयं हर मन की भाषा पढ़ लेते हैं, वहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और केवल कृतज्ञता बचती है।
पर सबसे अद्भुत दृश्य मंदिर के भीतर नहीं, मार्ग पर तथा मन्दिर के आस पास तथा श्रद्धालुओं की कतारों में था - वृद्ध, युवा, बालक, सब वर्षा को अभिषेक और ठंड को तपस्या मानकर एक ही जयकारे में लीन। ऊँचाई जहाँ साँस रोकती है, वहीं आस्था उसे 'हर हर महादेव' बनाकर लौटा देती है। यही तो है भोले की फौज।
यदि मन में कहीं केदार जाने की इच्छा दबी बैठी है, तो उसे और मत टालिए। कुछ स्थान देखने के लिए नहीं, स्वयं को पाने के लिए होते हैं। बाबा का बुलावा आता नहीं, सुनना पड़ता है।
मेरी हार्दिक कामना है कि इन दर्शनों का पुण्यफल आप सब तक पहुँचे और महादेव की छत्रछाया सदैव आप पर बनी रहे।
हर हर महादेव! जय केदार!
देवभूमि से देश के अनगिनत तीर्थों तक चलती इस यायावरी के मूल में माननीय @narendramodi जी की प्रेरणा रही है - भारत को जानने, जीने और उसकी आध्यात्मिक चेतना से जुड़ने की यह अनवरत यात्रा जिनसे प्रेरित है, उन्हें सादर नमन।

#Kedarnath #Shravan2026 #Tweevalogue #Xvalogue
03 अगस्त 2026, सोमवार
श्रावण मास 2026 के प्रथम सोमवार एवं श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी के पावन अवसर पर पंचम ज्योतिर्लिंग श्री केदारनाथ धाम में बाबा केदार के दिव्य दर्शन का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह अद्भुत अवसर आप सभी की शुभकामनाओं, स्नेह तथा भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा से संभव हो सका।
बाबा केदार के समक्ष पहुँचकर मन पूर्णतः श्रद्धा और भक्ति से भर गया। उस दिव्य क्षण में मन में कोई विशेष कामना या प्रार्थना नहीं थी-क्योंकि अपने भक्तों के मन की हर भावना को महादेव से अधिक भला कौन जान सकता है।
मेरी हार्दिक कामना है कि इन पावन दर्शनों का पुण्यफल आप सभी को प्राप्त हो तथा भगवान शिव की कृपा, आशीर्वाद और संरक्षण सदैव आप सब पर बना रहे।
हर हर महादेव!
जय बाबा केदार!
देवभूमि से लेकर देश के विविध तीर्थों और सांस्कृतिक स्थलों तक वर्षों से चल रही इस यायावरी के पीछे माननीय @narendramodi जी की प्रेरणा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत को जानने, भारत को जीने और भारत की आध्यात्मिक चेतना से जुड़ने की इस यात्रा के प्रेरणास्रोत को सादर नमन।
#Kedarnath #Shravan2026 #Tweevalogue #Xvalogue
03 अगस्त 2026, सोमवार
श्रावण मास 2026 के प्रथम सोमवार एवं श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी के पावन अवसर पर पंचम ज्योतिर्लिंग श्री केदारनाथ धाम में बाबा केदार के दिव्य दर्शन का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह अद्भुत अवसर आप सभी की शुभकामनाओं, स्नेह तथा भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा से संभव हो सका।
बाबा केदार के समक्ष पहुँचकर मन पूर्णतः श्रद्धा और भक्ति से भर गया। उस दिव्य क्षण में मन में कोई विशेष कामना या प्रार्थना नहीं थी-क्योंकि अपने भक्तों के मन की हर भावना को महादेव से अधिक भला कौन जान सकता है।
मेरी हार्दिक कामना है कि इन पावन दर्शनों का पुण्यफल आप सभी को प्राप्त हो तथा भगवान शिव की कृपा, आशीर्वाद और संरक्षण सदैव आप सब पर बना रहे।
हर हर महादेव!
जय बाबा केदार!
देवभूमि से लेकर देश के विविध तीर्थों और सांस्कृतिक स्थलों तक वर्षों से चल रही इस यायावरी के पीछे माननीय @narendramodi जी की प्रेरणा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत को जानने, भारत को जीने और भारत की आध्यात्मिक चेतना से जुड़ने की इस यात्रा के प्रेरणास्रोत को सादर नमन।
#Shravan2025 के चौथे सोमवार को श्रावण शुक्ल पक्ष दशमी को नागालैंड के मोकोकचुंग जिले के गोरखा मंदिर में महादेव तथा माता पार्वती जी के अद्भुत दर्शन आप सबकी शुभेच्छाओं तथा महादेव की कृपा से संभव हुए।
मेरे दर्शनों का लाभ व पुण्य आप सभी को प्राप्त हो।
महादेव की कृपा सबपर हो।
प्रेरणा-यायावर @narendramodi जी!
महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा!
#अयोध्या #Ayodhya
एक एक अनुभूति श्रीराममय, सर्वत्र मानो यही आवाज आ रही हो -
"सिय राम मय सब जग जानी,
करहु प्रणाम जोरी जुग पानी॥
यहाँ जो कार्य हुआ है उसकी तुलना नहीं हो सकती।
#Xvalogue #Tweevalogue
#MereRam
#Tweevalogue
#Sarayu Ji
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ।
नित नव नेह राम पद होऊ॥
जो इच्छा करिहहु मन माहीं।
हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥" https://t.co/rULuScyPDP
राम धामदा पुरी सुहावनि,
लोक समस्त बिदित अति पावनि
#Ayodhya #अयोध्या #Xvalogue #Tweevalogue https://t.co/KSU0MDLczH
कुछ बातों को समझना शक्ति से परे होता है,समझ से परे।
नहीं समझ पाया मैं की आँखें क्यों भीग गई! शायद भाव ही आँसू बन कर नमन कर रहे थे उन रामभक्तों को जिनके रक्त ने यहाँ का कायाकल्प कर डाला।
आभार @narendramodi जी, @myogiadityanath जी!ये आपके हाथों ही लिखा था।
#Tweevalogue #Ayodhya
बुलावा!!
इति से ही जहाँ प्रारम्भ हो!!
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ।
नित नव नेह राम पद होऊ॥
जो इच्छा करिहहु मन माहीं।
हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥
अयोध्या ... Ayodhya ... #Xvalogue #Tweevalogue

#Shravan2025
#Tweevalogue
#XValogue
पिछले वर्ष की श्री केदारनाथ धाम यात्रा का वृत्तांत इन नौ भागों में शेयर करने का प्रयास किया है,लिंक इस पोस्ट में नीचे है।कुछ दिन रहने का सौभाग्य मिला जिनमें श्रावण का दूसरा सोमवार और शिवरात्रि भी थे।अगर आप गए नहीं हैं तो शायद यात्रा का अनुभव कर पाएं और गए भी है तो इससे जुड़ाव का अनुभव करेंगे।
विशेष रूप से भाग 5 की पहली क्लिप ध्यान से देखें और सुनें, जो भाग्यशाली हैं वो उस चमत्कार का अनुभव कर पाएंगे जो मैने किया।
जो इस वर्ष जाने की योजना बना रहे हैं उनके लिए जानकारी -:
दिल्ली से हरिद्वार का बस किराया - 443 रुपए
हरिद्वार से ऋषिकेश का बस किराया- 55 रुपए
ऋषिकेश से सोनप्रयाग बस किराया(प्राइवेट बस) - 500 रुपए
सोनप्रयाग से गौरीकुंड शटल - 50 रुपए
गौरीकुंड से केदारनाथ चढ़ाई - निःशुल्क
केदारनाथ में रहना - 700 से 1200 रुपए प्रतिव्यक्ति,स्लीपिंग बैग हो तो ये भी नहीं लगेगा।
केदारनाथ में भोजन - भंडारे में निःशुल्क या जैसा सही लगे।
यानि 5000 के प्रति व्यक्ति व्यय में यह यात्रा की जा सकती है।
सभी नौ पोस्ट के लिंक नीचे हैं ---
भाग 1/9
https://t.co/CuGniVcvak
भाग 2/9
https://t.co/oAVJKkuT5d
भाग 3/9
https://t.co/qZm2oV01ku
भाग 4/9
https://t.co/jY7hlQ74hi
भाग 5/9
https://t.co/gZhZg5LKHc
भाग 6/9
https://t.co/qNpeAsdiew
भाग 7/9
https://t.co/ns76AYVR9B
भाग 8/9
https://t.co/vfihan3gPA
भाग 9/9
https://t.co/SQjhZ0EEk5
#Tweevalogue
#Xvalogue
#MaghMela
#Prayagraj
Akshayavat, Prayagraj -
This reflection is born from the lived experience of that sacred space. The photographs and clips you see are of the same Akshayavat, located within the Prayagraj Fort alongside Patalpuri Temple-a place that is not merely meant to be visited, but felt. It stands as a living symbol of memory, continuity, and the unbroken flow of Sanatan consciousness.
At times, history smiles with such restraint that the smile itself becomes satire. Some truths, when spoken in solemn tones, make people uncomfortable; they find their true force when conveyed with gentle humour and pointed clarity.
Today, I find myself filled with a rather unusual sense of gratitude-from the Nehru era through the UPA years and the so-called socialist experiments. Not because everything was done right, but because those very decades made one thing unmistakably clear: "what all went wrong". Had there not been such a prolonged cultural dusk, we might never have understood the true value of the light we witness today. And had there not been such carefully channelled energy devoted to weakening Sanatan, its present resurgence would not appear so radiant and resolute.
The earlier dispensations possessed a peculiar kind of expertise. Whenever the strengthening of Sanatan was discussed, files went missing, rules grew labyrinthine, and intentions turned opaque. But the moment an opportunity arose to curtail it, the system sprang into sudden efficiency. Temples became “administrative challenges,” pilgrimage sites “management issues,” and faith itself an object in need of “reform.” Yet, when electoral arithmetic entered the picture, the same faith was conveniently declared relevant or regressive, as required.
Since 2009, I had visited the direction of the #Prayagraj fort many times. While crossing the #Sangam by boat, I would fold my hands in reverence to the trees visible from afar, quietly assuming that one of them must surely be the #Akshayavat. Entering the precincts for darshan was not effortless then-neither the arrangements nor the permissions felt natural. It often seemed as though devotion itself was asking for a favour.
That pattern broke for me just a few days ago, during the Magh Mela. As I approached the fort, I noticed people walking in freely-no noise, no barriers, no needless formality. I simply followed that natural flow.
And there it was: Patalpuri, the Akshayavat Temple, and the Akshayavat itself-darshan during the sacred month of Magh. In that moment, it became evident that this was not merely a tree, but a living testament to thousands of years of civilisational memory and continuity. Even more meaningful was the sight of it receiving the dignity, order, and respect it has always deserved-without spectacle, without a sense of obligation being granted.
It is here that a thought inevitably arises for the younger generation, especially Gen Z. They have no lived memory of a time when such spaces were neglected or restricted. They will see only the present-open, orderly, and honoured-and that is only natural. Yet, without memory, evaluation becomes shallow. It becomes easy to criticise today’s leadership, while the very systems that pushed us into cultural depths over decades are retrospectively glorified. Hence, remembrance is essential-not for resentment, but for "discernment".
It must also be said, with a touch of humour and directness, that the weakening of Sanatan was not an accident or a lapse. It was the outcome of "policy, intent, and an enabling apparatus". And its revival today is not a coincidence-it is the result of a conscious change in vision and direction.
Images and videos will convey much, but they cannot fully express this truth: when governance changes its gaze, it is not just pathways that open- civilisation itself begins to breathe again.
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#Tweevalogue #Xvalogue #MaghMela #Prayagraj
"अक्षयवट, प्रयागराज",
यह लेख उसी पवित्र स्थल की अनुभूति से जन्मा है। इसमें तस्वीरें और वीडियो उसी अक्षयवट के हैं, जो प्रयागराज किले के भीतर पातालपुरी के साथ स्थित है-एक ऐसा स्थान, जो केवल दर्शन का विषय नहीं, बल्कि स्मृति, निरंतरता और सनातन चेतना का जीवित प्रतीक है।
कभी–कभी इतिहास इतनी शालीनता से मुस्कुराता है कि उसकी मुस्कान स्वयं व्यंग्य बन जाती है। कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें गंभीर स्वर में कहो तो लोग असहज हो जाते हैं-इसलिए उन्हें हल्के हास्य और तीखे संकेतों के साथ कहना अधिक प्रभावी होता है।
आज मन एक अनोखी कृतज्ञता से भरा है। नेहरू युग से लेकर यूपीए और तथाकथित समाजवादी प्रयोगों तक-सबका आभार। इसलिए नहीं कि इन दौरों में सब कुछ सही हुआ, बल्कि इसलिए कि इन्हीं वर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया कि "क्या-क्या गलत था"। यदि यह लंबा सांस्कृतिक अंधकार न होता, तो आज के उजाले की कीमत शायद हम समझ ही नहीं पाते।
और यदि सनातन को कमजोर करने में इतनी योजनाबद्ध ऊर्जा न लगाई गई होती, तो उसके पुनर्जागरण का यह दृश्य भी इतना उज्ज्वल न होता।
पिछली व्यवस्थाओं की एक विचित्र विशेषज्ञता थी-सनातन को सशक्त करने की बात आए तो फाइलें गुम, नियम जटिल और मंशा धुंधली। पर उसे हानि पहुँचाने का अवसर मिले तो तंत्र में अचानक सक्रियता आ जाती थी। मंदिर “प्रशासनिक समस्या” बन जाते थे, तीर्थ “प्रबंधन का विषय”, और आस्था “सुधार की वस्तु”। किंतु वोट बैंक का प्रश्न आते ही वही आस्था सुविधानुसार प्रासंगिक या अप्रासंगिक घोषित कर दी जाती थी।
2009 से मैं कई बार प्रयागराज किले की ओर गया। संगम पर नाव से गुजरते हुए ऊपर दिखाई देते वृक्षों को प्रणाम कर लेता और मन ही मन मान लेता कि इन्हीं में कहीं वह "अक्षयवट" होगा। तब भीतर जाकर दर्शन करना सहज नहीं था-न व्यवस्था स्पष्ट थी, न अनुमति स्वाभाविक। ऐसा लगता था मानो आस्था नहीं, कोई उपकार माँग रहे हों।
फिर कुछ दिन पहले, माघ मेले में-यह क्रम टूट गया। किले की दिशा में देखा तो लोग सहजता से भीतर जा रहे थे। न शोर, न अवरोध, न अनावश्यक औपचारिकता। मैं भी उसी स्वाभाविक प्रवाह के साथ चल पड़ा।
और वहाँ-पातालपुरी, श्री अक्षयवट मंदिर, और स्वयं अक्षयवट के दर्शन-माघ मास में। उस क्षण यह स्पष्ट हुआ कि यह केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि हज़ारों वर्षों की स्मृति और निरंतरता का जीवित प्रतीक- है। उससे भी अधिक अर्थपूर्ण यह था कि उसे आज वैसा ही सम्मान, व्यवस्था और गरिमा मिल रही है, जिसका वह अधिकारी है-बिना दिखावे के, बिना एहसान-भाव के।
यहीं एक विचार मन में उभरता है-नई पीढ़ी, विशेषकर GEN Z, के लिए। वे उस अतीत को नहीं जानते जिसमें यह सब उपेक्षित और बाधित था। वे केवल वर्तमान देखेंगे-खुला, सुसज्जित, सम्मानित। यह स्वाभाविक है। पर स्मृति के बिना मूल्यांकन होता है, और तब वर्तमान नेतृत्व को कोसना आसान हो जाता है, जबकि वे व्यवस्थाएँ, जिन्होंने दशकों तक हमें सांस्कृतिक गहराइयों में धकेला, इतिहास के पन्नों में महिमामंडित कर दी जाती हैं। इसलिए स्मरण आवश्यक है-द्वेष के लिए नहीं, "विवेक के लिए"।
यह कहना भी आवश्यक है-थोड़े हास्य और सीधे संकेत के साथ-कि सनातन को कमजोर करना किसी भूल का परिणाम नहीं था। वह "नीति, नीयत और तंत्र" का परिणाम था। और आज उसका पुनर्स्थापन किसी संयोग से नहीं, बल्कि दृष्टि और दिशा बदलने से संभव हुआ है।
तस्वीरें और वीडियो बहुत कुछ कह देंगे, पर वे यह नहीं कह पाएँगे कि जब शासन की दृष्टि बदलती है, तब केवल रास्ते नहीं खुलते-सभ्यता फिर से साँस लेने लगती है।
शायद यही वास्तविक प्रगति है-जहाँ सड़कें हमें गंतव्य तक पहुँचाती हैं, और तीर्थ हमें स्वयं तक।
और अंत में, पुराने दौर के प्रति यह कृतज्ञता बनी रहे। क्योंकि उसी ने हमें यह सिखाया कि क्या नहीं करना चाहिए, ताकि आज जो हो रहा है, उसकी कीमत हम पूरे मन से समझ सकें और हल्के में न लें।
शाम हो गई है.. थोड़ी देर में रात हो जाएगी!
समय 5 बज रहे हैं। #Nagaland #Tweevalogue https://t.co/CA94EWqjJc
#Shravan2025
#Tweevalogue
#XValogue
इस वर्ष की श्री केदारनाथ धाम यात्रा का वृत्तांत इन नौ भागों में शेयर करने का प्रयास किया है,लिंक इस पोस्ट में नीचे है।कुछ दिन रहने का सौभाग्य मिला जिनमें श्रावण का दूसरा सोमवार और शिवरात्रि भी थे।अगर आप गए नहीं हैं तो शायद यात्रा का अनुभव कर पाएं और गए भी है तो इससे जुड़ाव का अनुभव करेंगे।
विशेष रूप से भाग 5 की पहली क्लिप ध्यान से देखें और सुनें, जो भाग्यशाली हैं वो उस चमत्कार का अनुभव कर पाएंगे जो मैने किया।
जो जाने की योजना बना रहे हैं उनके लिए जानकारी -:
दिल्ली से हरिद्वार का बस किराया - 443 रुपए
हरिद्वार से ऋषिकेश का बस किराया- 55 रुपए
ऋषिकेश से सोनप्रयाग बस किराया(प्राइवेट बस) - 500 रुपए
सोनप्रयाग से गौरीकुंड शटल - 50 रुपए
गौरीकुंड से केदारनाथ चढ़ाई - निःशुल्क
केदारनाथ में रहना - 700 से 1200 रुपए प्रतिव्यक्ति,स्लीपिंग बैग हो तो ये भी नहीं लगेगा।
केदारनाथ में भोजन - भंडारे में निःशुल्क या जैसा सही लगे।
यानि 5000 के प्रति व्यक्ति व्यय में यह यात्रा की जा सकती है।
सभी नौ पोस्ट के लिंक नीचे हैं ---
भाग 1/9
https://t.co/CuGniVbXkM
भाग 2/9
https://t.co/oAVJKkulfF
भाग 3/9
https://t.co/qZm2oUZtuW
भाग 4/9
https://t.co/jY7hlQ6wrK
भाग 5/9
https://t.co/gZhZg5LcRE
भाग 6/9
https://t.co/qNpeAscKoY
भाग 7/9
https://t.co/ns76AYVjk3
भाग 8/9
https://t.co/vfihan2J02
भाग 9/9
https://t.co/SQjhZ0E6ux
#Tweevalogue #XValogue #Shravan2025
This #Shravan2025 blessed us with four sacred Somvars-and while destiny had originally aligned for me and #Prangshi to seek darshan at #ShriSomnathJyotirling, @shaileshkpandey had already slipped into his signature Vagabond mode.
From the snow-clad serenity of Shri Kedarnath, to the eternal glow of Shri Kashi Vishwanath, and finally, joining us at a Shiv temple in the misty hills of Mokokchung, Nagaland-he walked the path not just of pilgrimage, but of inner awakening.
This time, he’s promised not to keep it all to himself.
He’s penned down the soul of his journey-his Kedarnath experience-in words that stir, visuals that move, and moments that stay.
Do take the time to read, see, and feel it.
Because every second you spend with his story will not just be worth it… it might just call you to your own.
#Tweevalogue #XValogue #Shravan2025
“Where Every Breath Becomes Mahadev - The Tale of My Kedarnath Journey”
Some journeys aren’t planned. They are summoned.
And when it’s a journey to Kedarnath, calling it a “divine invitation” is not a poetic exaggeration-it is the lived truth.
My heart had been whispering-"let’s go to Kedarnath".
But comfort, the conveniences of modern life, and an unnameable inertia kept clouding that desire.
Until one day… a short video clip shook me to my core.
An elderly man, with no legs below the knees, was climbing the steep path to Kedarnath. He had tied cloth around his stumps, wrapped them in plastic-
and was walking his way up the mountain.
No complaints. No stopping.
It was as if even the mountain bowed before his will.
In that moment, something within me stirred-If he can go, what excuse do I have?
"Rishikesh - The Gentle Embrace of Maa Ganga!"
My journey began on a humble Uttar Pradesh Transport bus heading to #Haridwar.
Every seat was filled with Shiv Bhakts-pilgrims from different corners of the land.
Some silent, lost in their own prayers.
Some chanting "Har Har Mahadev" with eyes closed and hearts wide open.
But on every single face, there was one shared fire-the longing to see "Baba Bholenath".
Perhaps this is what true devotion to #Mahadev feels like-where logic is left behind and only faith speaks.
From #Haridwar, I reached #Rishikesh. And the moment I stepped onto that sacred soil,
it felt as if an invisible divine force had pulled me into a warm embrace.
#Ganga ji flowed by-soft and serene-but in the stillness of the night, her currents sang a song that shook me from within.
It wasn’t just water-it was Maa’s unconditional love, flowing with a purity that touched every corner of my soul.
In that sacred stillness, I stood by her banks and realized-
this was not the beginning of a trek.
It was the beginning of a transformation!!
1/n
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