India mein koi 5 minutes number Google kar le to doodh ka doodh paani ka paani ho jaye.
RBI surplus to Govt : ₹2.87 Lakh Crores (US$30 Bn)
Total listed bank profits : ₹4.11 Lakh Crores (US$42 Bn)
NPCI - which runs UPI pre tax ‘surplus’ : ₹ 1,888 crores (US$200 Mn)
To nuksaan kis ka ho raha hai UPI se aur kaunsi subsidy de rahi hai Govt UPI pe jo chubh rahi hai?
Cost of running ATMs and cash logistics in India is ₹30,500 crores (US$ 3.0 Bn). If you want to optimise shut ATMs and promote UPI instead.
Any levy on UPI is just tax collection. UPI is the one scientific achievement of India everyone acknowledges par ab tax ki bali chadhegi.
निशु, घबराने की ज़रूरत नहीं है। मैं तुम्हारे साथ हूँ।
साफ है कि तुम्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि तुम अपने समुदाय और छात्रों के हक़ की आवाज़ उठाती हो।
अमित शाह की दिल्ली पुलिस एक तरफ़ छात्रों के साथ अमानवीय बर्बरता करती है। दूसरी तरफ़ एक दलित लड़की के पिता का सिर फोड़ने वाला अपराधी खुलेआम घूम रहा है।
@narendramodi जी, @AmitShah जी - ऐसे अपराधी को आपका और आपकी पार्टी के लोगों का संरक्षण क्यों है? अब भी कार्रवाई होगी या किसी को बचाते रहेंगे?
निशु, तुम्हारी लड़ाई अकेली नहीं है। हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक न्याय नहीं मिल जाता।
जय भीम। जय संविधान।
@Shehzad_Ind@RahulGandhi तू अब वो कुकुर बन गया है जिसे मालिक रोटी नहीं दे रहा,और मोहल्ले वाले गाली दे रहे है.....तब तुझे अ��ी भी उम्मीद है कि मालिक रोटी देंगे,इसलिए अभी तक भौंकने में लगा है।
बार में डांसर न सही,शीशी उठाने का काम जरूर मिल जाएगा।
GOODBYE INDIA
अरुणाचल प्रदेश का यह युवा सरकार की चीनी घुसपैठ पर नाकामी और निकम्मेपन से निराश होकर भारत को अलविदा कहने को मजबूर है
🔺 मोदी की प्राथमिकता क्या होगी?
▪️इस वीडियो को रुकवाना
🔺 मोदी की प्राथमिकता होनी क्या चाहिए?
▪️चीन को बाहर खदेड़ना
कुछ नहीं संभल रहा इनसे
ये वीडियो सरकार डिलीट करवा रही है।
आलोचना से इतना डर? क्या यही लोकतंत्र है?
विडंबना देखिए—सत्ता पक्ष के लोग खुले��म गाली-गलौज और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करें तो कोई कार्रवाई नहीं, लेकिन सरकार की आलोचना करने वाली आवाज़ों पर रोक लगाने की कोशिश की जाती है।
लोकतंत्र की असल��� ताकत सवालों और आलोचना को सुनने में होती है, उन्हें दबाने में नहीं।
Mr. Modi, our students are demanding Dharmendra Pradhan’s resignation.
Don’t insult their intelligence with this pathetic midnight video.
1. Sack Pradhan.
2. Punish those who beat students.
3. Apologise
“चाहे हम हों या RSS, काम तो संविधान के दायरे में ही करना पड़ेगा !
RSS कर्नाटका में चाहे Social Work करना चाहता है या Political, Cultural, Economic Work…
पहले Registration करो भाई !
बताओ की कौन हो, पैसा कहॉं से आता है ?
After all donations पर काम चल रहा है ना आपका !”
@PriyankKharge ji 🔥🔥🔥
🚨 एंकर अंजना ओम कश्यप सोच रही होगी यार किधर से इस कवि को 2 मिनट का टाइम दे दिया 😂
कवि "दमदार बनारसी" ने 2 मिनट में मीडिया द्वारा बनाया गुब्बारा फोड़ दिया🔥 👇
एंकर: आपने गया है “कहां छिपाकर ले जाओगी चोली के रसगुल्ला”
मनोज तिवारी: मैंने यह गाना नहीं गाया
एंकर: मेरे पास वीडियो है
मनोज तिवारी: वीडियो दिखाइए, मेरा गाना हो ही नहीं सकता
एंकर ने वीडियो चला दी -तिवारी जी चारों खाने चित्त
इन वाहियात शब्दों वाले महिला सम्मान की बात करते हैं
इस देश मे कुछ सवाल सिर्फ राहुल गांधी के लिए रिजर्व हैं।
जिनका दायरा, मोहम्मद गोरी लेकर खलजी, बाबर, औरंगजेब, अंग्रेज, नेहरू, इन्दिरा, मनमोहन तक फैला हो सकता है।
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राहुल की क्वालिफिकेशन के बारे मे रामचन्द्र गुहा का सवाल, ऐसा ही स्पेशल सवाल है। भारत के 99% नेता, नेता बनने के पहले क्या करते थे, इसकी जानकारी न तो आम लोगो है,
न वे इसकी परवाह करते हैं।
मसलन, बिना कोई अनुभव , बिना कोई चुनाव लड़े, डायरेक्ट शपथ लेकर अनिर्वाचित मुख्यमंत्री बनने के पहले, हमारे प्रधानमंत्री क्या करते थे??
पब्लिक डोमेन में इसकी सूचना शून्य है।
अब भले वे खुद स्वी���ार करें, कि वे पढ़े लिख नही पाये, स्टेशन पर चाय बेची, 35 वर्ष भिक्षाटन करते रहे - तो भी इससे किसी को फर्क नही पड़ता।
मगर राहुल के बारे मे जानना है।
गहराई से, और तथ्यपरक जानना है।
और नकारना है।
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दरअसल राहुल से उसकी योग्यता नही पूछी जाती, उन्हें प्रच्छन्न रूप से निर्योग्य घोषित किया जाता है। और निर्योग्यता का एक ही कारण है- गांधी सरनेम के साथ पैदा होना..
और दरअसल यही गुहा जैसो का ऑब्जेक्शन है। वरना तो 5 बार का सांसद, 4 राज्य सरकारो का पॉवर सेंटर, केंद्रीय सरकार में 10 साल तक निर्णय बदलने की ताकत रखने वाला शख्स.
जिसे विभिन्न संसदीय समितियों में दो दशक का अनुभव हो,
पब्लिक पॉलिसी की पुख्ता समझ हो, कैम्ब्रिज मे पढ़ा हो और और अर्थव्यवस्थ��� की दशा दिशा की बार बार सटीक पूर्वसूचना देता हो, अगर किसी और दल या देश में में 100 सांसद लेकर बैठा होता..
तो उससे यह सवाल करने की हिम्मत किसी मे न होती।
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लेकिन आप राहुल से पूछ सकते है।
क्योकि राहुल से डर नही लगता।
रामचन्द्र गुहा का वह वीडियो हमने देखा है, जिसमे सरकार के विरुद्ध तख्ती लेकर खड़े हो ��ाने भर से पुलिस उन्हें कुत्तो की तरह घसीटकर ले गई। इसके बाद वे दोबारा सरकार के नाम की तख्ती लेकर चौराहे पर नही गए।
राहुल के नाम की तख्ती सेफ है।
गुहा को पता है।
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और यही "सेफ" फीलिंग राहुल की उपलब्धि है। उसके 20 साल के पोलिटिकल करियर का एसेंस है।
रामचन्द्र गुहा इस देश मे भाजपा/ मोदी की हेजेमनी को राहुल पर थोपते है, तो उनके इतिहासकार होने की समझ पर शक होता है।दरअसल, जो वे स्वीकार करने से बच रहे है, वो यह कि आज देश की राजनीतिक हालात, एक आम चुनावी राजनीति नही, एक कंट्रोल्ड सामाजिक परिवर्तन है।
यह परिवर्तन, मीडिया, ज्युडिशयरी, चुनाव आयोग, ब्यूरोक्रेसी और एजेंसियों के शीर्ष पर कठपुतलियां बिठाकर थोपा गया है। जिसके नीचे जनाक्रोश उबल रहा है।
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इस आक्रोश की प्रतिक्रिया को विस्फोटक, और विध्वंसक होने से बचाने, और गृहयुद्ध समान हालात टालने के लिए किसी भी विपक्ष को बहुत धैर्यवान, सॉफ्ट होने की जरूरत है।
वरना जिस स्ट्रीट फाइट, सँगठनीकरण और आक्रामक राजनीति की अपेक्षा, राम गुहा आज राहुल गांधी से कर रहे है- उसका नतीजा पिछले 1 माह का बंगाल, और 3 साल से मणिपुर देखकर समझ लेना चाहिए।
आप पूरे देश मे ऐसा चाहते हैं???
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गम्भीर इतिहासकार जानता है, कि ऐसी सत्ता अपनी कब्र खुद बड़ी गहरी खोदती है।
मौजूदा दौर उन भावनाओ का ए��्सप्रेशन है, जिसे हमारे समाज ने 70 साल तक ऐसे छिपा रखा था रखी थी, जैसे कोई बूढा अपने किशोर उम्र के कुटैव छिपाकर रखता है। बेहयाई को मान्यता मिलते ही वह धारा खुलकर खेल रही है।
लेकिन तमाम धन, ताकत, नंगई और मैनिपुलेशन के बावजूद 37-38% जनसमर्थन उसका पीक था। अब तो आगे सिर्फ ��लान है।
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गुहा हों, या उनकी तरह डेस्परेट दूसरे लोग, जान लें कि हिंदुस्तान की आत्मा इस तरह बहुत देर कुचली नही जा सकती।
इस झँजवात से बाहर निकलने का रास्ता, यह देश जल्द तय करेगा। पर उस उबाल का पथ प्रदर्शक कोई ईमानदार, दूरदर्शी, और नैतिक मूल्यों पर ठहराव रखने वाला ऐसा शख्स होना चाहिए। जो शांति, साहचर्य और मेल मिलाप का चेहरा हो।
इस वक्त, बिलाशक..
वह राहुल है।
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इस दौर का बुद्ध है।
जिसे महज राज��राने की पैदाइश की वजह से खारिज कर देना, और खास तरह की प्रतिक्रियाओं की आशा रखना, बौद्धिक नही- बायस्ड होने के लक्षण हैं।
जो राम गुहा कई बार प्रदर्शित कर चुके हैं। उनका फैन होने के नाते उन्हें सप्रेम सलाह है कि वे समाज मे अपनी उम्र औऱ अनुभव का आडम्बर बनाये रखें। भ्रम और खीज की शिकार जुबान को विराम दें।
और मौन की शक्ति महसूस करें।
इससे यह पता चलता है कि सावरकर 1966 तक जिंदा थे। लेकिन न तो RSS ने अपना अध्यक्ष बनाया, न जनसंघ ने।
फ्यूनरल में न गुरु गोलवरकर (RSS head) मौजूद थे, न बलराज मधोक (जनसंघ अध्यक्ष) न दीनदयाल उपाध्याय, न अटल बिहारी। सबने उन्हें 1948 से 1966 तक चार हाथ दूर रखा। न मिलने जाते, न किसी मंच या कार्यक्रम मे बुलाते।
जब आप खुदे अपने बाप इज्जत नही देते, तो पड़ोसी काहे देगा भई?