स्कूल के बाद सरकारी अस्पतालों का भी नंबर आना चाहिए। ज़रूरी है कि इस पर बात हो। भारत के पास पैसे की कमी नहीं है। फिर स्कूल क्यों ख़राब हालत में रहें। टीचर को पचास सरकारी काम में लगा दिया जाता है। उनकी भी बात हो ताकि वे पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा सकें। मंत्री जी बता दें कि किस स्कूल में जाना चाहिए । उनकी पसंद का एक दो स्कूल तो होगा ही।
लगातार 12 साल से सत्ता में रहने के बाद भी अगर आपके पास सिर्फ इस तरह के मुद्दे हैं,
तो इसका मतलब ये कि आप लोग विकास की राजनीति से बुरी तरह भटक चुके हैं।
सरकार मान रही है कि उसके स्कूलों की हालत ख़राब है। दिखाने लायक नहीं है। सरकार को अगर एक स्कूल पर भी भरोसा होता तो इसी आदेश में लिखती कि केवल दस स्कूलों में कोई भी आ सकता है, देख सकता है और वीडियो बना सकता है। वो काफी शानदार हैं। मतलब दस स्कूल भी नहीं है। पब्लिक स्कूल में मीडिया को जाने से कैसे रोक सकते हैं? सरकार को अब डर लगने लगा है। एंटी मुस्लिम टॉपिक छोड़ कर लोग स्कूल की बात करने लगे हैं। सरकार स्कूलों की बात नहीं चाहती है। दिमाग़ी रूप से सरकार बीमार हो गई है।
एकदम सरकारी स्कूलों के छात्रों को एक दिन भी बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। कितने साल से रिपोर्ट आ रही है कि दसवीं में पहुंच गए, छठी का गणित नहीं बना सकते। इन छात्रों को जल्दी ही अच्छे शिक्षक और निरंतर पढ़ाई की मांग करनी होगी। बच्चे रोज़ स्कूल जाते हैं, मेहनत करते हैं मगर स्कूल उन्हें ख़राब कर देता है।