जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक जी की भूख हड़ताल आज 19वें दिन में प्रवेश कर चुकी है।
19 दिन से एक समर्पित शिक्षक, पर्यावरणविद् और लद्दाख के सपूत पानी के सहारे अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष कर रहे हैं। NEET घोटाले पर जवाबदेही, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और छात्रों के भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं।
लेकिन सरकार चुप है। मुख्यधारा का मीडिया चुप है। लोकतंत्र का यह मूक प्रदर्शन देखकर दिल दहल जाता है।
एक व्यक्ति अपनी जान की बाजी लगाकर देश की शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के हक की लड़ाई लड़ रहा है, फिर भी सत्ता की आँखें बंद हैं?
सोनम वांगचुक जी को सलाम!
आपकी आवाज दब नहीं सकती।
अरे गडकरी जी वो तो अधिक पे कर ही रहे हैं जो कर सकते हैं… पर प्वाइंट की बात तो ये है कि आपने कहा था कि एथेनॉल वाला सस्ता मिलेगा! ग़ज़ब ग़ज़ब की बात करते हैं आप!
जब चुनाव होता है तो मोदी सफ़ाई कर्मियों का पैर धोता है।
जब नोटबंदी और करोना होता है तो मोदी ललिता पवार की तरह रोता है।
जब जंतर मंतर पर अनशन होता है, तो मोदी विदेशों की सैर करके, भरपेट ख़ाकर आराम से सोता है।
जानते हैं क्यों?
क्यूँकि मोदी जानता जब चुनाव आयेगा युवाओं को नफ़रत की पुड़िया बाँट दूँगा BJP का काम हो जायेगा।
युवाशक्ति तुम्हे समझना होगा मोदी तुम्हें एक वोट के सिवा कुछ नही समझता।
न मोदी बोलेगा न गोदी तुम कब तक खामोश रहोगे युवा शक्ति?
#I_support_sonam_wangchuk
मध्यप्रदेश के रायसेन में चोरी के शक मात्र पर 2 युवको को बेरहमी से पीटना और उन्हें बिजली का करंट देना कानून नहीं, बल्कि भीड़तंत्र और अमानवीय क्रूरता का भयावह उदाहरण है। मानवाधिकार आयोग आखिर कहाँ है? क्या उसकी संवेदनशीलता सिर्फ सत्ता के पोषित वर्चस्ववादी लोगों तक ही सीमित रह गई है?
आख़िर @nitin_gadkari ने ख़ुद चुनौती दी लेकिन अब इथेनॉल की वजह से ख़राब गाड़ी मालिकों से मिलने को तैयार नहीं हो रहे! जबकि @tehseenp ऐसे कई लोगों को लेकर साबित करना चाहते हैं कि इथेनॉल की वजह से वाहनों को नुकसान पहुँच रहा है!
नितिन गडकरी ये दोगलापन क्यों?
After successfully bringing ₹ 1000 Lakhs Crores of Black money from Swiss Bank and reducing Petrol to ₹35 / Ltr as promised before 2014 election, Lala @yogrishiramdev is now given a new task ahead of UP elections.
चलिए अच्छी बात है कि दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री @ArvindKejriwal सड़क पर उतर कर एथेनॉल मुद्दे को उठाना शुरु कर दिया है। ऐसा कर उन्होंने जनता के दर्द की नब्ज़ को पकड़ा है। पर ये लड़ाई किसी एक की नहीं है। बाक़ी विपक्षी दलों के बड़े नेताओं को भी ज़मीन पर उतरने की ज़रुरत है जो अभी तक बस ट्वीट से काम चला रहे हैं! लेकिन शायद वही बड़े नेता उतरेंगे जो सड़कों की राजनीति की अहमियत समझते हों... जिनका एथेनॉल बिज़नेस से अपना कोई लेना देना नहीं हो... और हां, जो वाहनधारी मध्यवर्ग से भी संवेदना रखते हों!