राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा पढ़ाने का निर्णय कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है। जब वर्षों से राजस्थान की जनता राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर उसे संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग कर रही है, तब प्राथमिकता राजस्थानी भाषा के अध्ययन, शोध और संवर्धन सहित संवैधानिक दर्जे की होनी चाहिए थी।
राजस्थान का गौरवशाली इतिहास, समृद्ध लोक साहित्य, लोक संस्कृति और असंख्य ऐतिहासिक ग्रंथ राजस्थानी भाषा में सुरक्षित हैं। यदि विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के अध्ययन एवं शोध केंद्र स्थापित किए जाएँ, तो यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक उसके प्रभावी हस्तांतरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि हमारा किसी भी भाषा के प्रति न तो विरोध है और न ही कोई पूर्वाग्रह। मराठी सहित भारत की सभी भाषाएँ समान रूप से सम्मान की पात्र हैं। किंतु राजस्थान में अपनी मातृभाषा की उपेक्षा कर किसी अन्य भाषा को प्राथमिकता देना उचित प्रतीत नहीं होता।
राजस्थान के जनप्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं को इस गंभीर विषय पर प्रदेश की भावनाओं के अनुरूप आवाज़ उठानी चाहिए, ताकि राजस्थानी भाषा को उसका उचित सम्मान और संस्थागत स्थान मिल सके।
@RajCMO@RajGovOfficial
कल से सोशल मीडिया पर जैसलमेर के एक डंपिंग यार्ड में गायों के खुले शव की तस्वीरें देखकर मन बेहद विचलित और व्यथित है।
जिस गाय को हम “गौ माता” कहकर सम्मान देने की बातें करते हैं, उसी के शव खुले में पड़े रहें और पूरा सिस्टम मौन है। सरकार नोटिस जारी कर अपना बचाव कर सकती है, जिम्मेदार विभाग औपचारिकताएं पूरी कर सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हम एक समाज के रूप में कहाँ खड़े हैं?
क्या हमारी संवेदनाएं केवल सोशल मीडिया पोस्ट और भाषणों तक सीमित रह गई हैं? क्या गौ सेवा केवल राजनीति और दिखावे का विषय बनकर रह गई है? यदि समय रहते उचित व्यवस्था, गौशालाओं की निगरानी, चिकित्सा सुविधा और जिम्मेदार प्रबंधन होता, तो शायद ऐसी भयावह तस्वीरें देखने को नहीं मिलतीं।
यह विषय राजनीति से ऊपर उठकर मानवता और संवेदनशीलता का है। प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और हम सभी नागरिकों की समान जिम्मेदारी बनती है कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
जैसलमेर की पहचान हमारी संस्कृति, परंपरा और संवेदनशील समाज से है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह पहचान ऐसी शर्मनाक घटनाओं से धूमिल न हो। अब ऐसे विषय पर केवल नोटिस नहीं, बल्कि जवाबदेही, ठोस कार्रवाई और स्थायी समाधान की आवश्यकता है। #Jaisalmer
@SawaleUtka65101@crsinghbhati इतिहास को गुलामी और राजनैतिक संधि के चश्मे से अलग-अलग देखना चाहिए। जैसलमेर ने हमेशा अपनी शर्तों पर राज किया है। नागौर दरबार की संधि एक कूटनीतिक फैसला था ताकि प्रजा सुरक्षित रहे, जबकि शौर्य और स्वाभिमान का प्रमाण हमारे साकों के गौरवशाली इतिहास में आज भी दर्ज है
@RajberaGhamanda अगर चरित्र हिन मेवा राम से इतनी परेशानी है तो महिपाल मदेरणा की तो पूरी 3 घंटे की सीडी उपलब्ध है पर वो अपनी जाति का है ना इसलिए उन पर नहीं टिप्पणी करेंगे
अगर इतना बुरा लगा है तो इस्तीफा देने में क्या दिक्कत है
@kshatriyalegacy एडमीन साहब आपसे निवेदन रहेगा आप अपनी सिमा मे रहे! ज़्यादा ज्ञान सेहत के लिए हानिकारक होता है ।ऐसी सस्ती राजनीति करने पर कुछ नही मिलेगा!
नाम -सम्राट मिहिर भोज
कुलवंश -प्रतिहार , श्री लक्ष्मण जी के वंशज
शासन - गुर्जरात्रा ( राजस्थान का पूर्वी हिस्सा गुजरात का उत्तरी हिस्सा .....
गुर्जर -एक स्थानवाचक शब्द ....
Note : महापुरुषों को आदर्श बनाओ बाप नहीं
जयपुर की आम जनता ने इनको रगड़ दिया था,पर आजकल टोपीदार कार्यकर्ता राजपूतों को अपने अधीन दिखाने की होड़ में लगे है इतिहास वीरों का होता है लुटेरों का नहीं।
#राजपूत_विरोधी_RSS
#Stop_History_Distortion
1751 मराठों ने जयपुर नगर के मंदिर व सौंदर्य दर्शन हेतु प्रवेश लिया पर लुटेरों की प्रवृति कहां छिपने वाली थी उन्होंने अभद्र व्यवहारों करना शुरू कर दिया इस पर जयपुर की जनता ने सभी द्वार बंद करवा कर मराठों पर टूट पड़ी,मराठों का क़त्ले आम किया था।
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