क्या बचपन सच में खत्म हो जाता है, या वह हमारे भीतर कहीं हमेशा जिंदा रहता है? आज के Book Cafe में चर्चा है गुलज़ार की कृति ‘बच्चों के गुलज़ार : पोटली बाबा की’ की, जिसका संकलन मोहित कटारिया { @hitm0 } ने किया है, जो बच्चों की मासूमियत, जिज्ञासा और कल्पनाओं से भरी उस दुनिया को सामने लाती है, जिसे हम बड़े होते-होते कहीं पीछे छोड़ देते हैं. यह किताब हमें सोचने पर मजबूर करती है… क्या हम अपने भीतर के उस बच्चे को अब भी महसूस कर पाते हैं, या वह समय के साथ धीरे-धीरे खो जाता है?
PaakhiRe से प्रकाशित पुस्तक पर वरिष्ठ पत्रकार @jai_shiven की राय.
पूरा वीडियो: https://t.co/in4p3LHcXc
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'बड़ा होने लगा था फिर ख़्याल आया
मैं पूछूँ तो सही कितना ज़रूरी है बड़ा होना’
इन दिनों गुलज़ार साब के बाल साहित्य और बाल सिनेमा को आधार बना कर मोहित कटारिया की लिखी किताबें पढ़ रही हूँ। ‘पोटली बाबा की’ और ‘एक था बचपन’।
@p1j | @hitm0 | @paakhire
इस घड़ी का लम्बे अरसे से ��ंतज़ार था। आख़िरकार अब ये किताबें सब के साथ साझा करने का समय आ गया है। बहुत से लोगों का हाथ लगा है, इसमें उनका एक-एक करके शुक्रिया करूंगा, लेकिन सबसे पहले गुलज़ार साहब का, @p1j , और @varungrover का शुक्रिया, जिन्होंने इन्हें यहाँ तक लाने में साथ दिया।
बच्चों के गुलज़ार : पोटली बाबा की / इक था बचपन
पाखीरे की नई किताब, @hitm0 ने लिखी,
Anu Verma ने अपने आर्ट से सजाई,
@varungrover की भूमिका के साथ
@paakhire प्रस्तुति
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गुलज़ार साब का रचा साहित्य और सिनेमा हम सब की ज़िंदगी का एक बेहद ख़ूबसूरत हिस्सा है। उनके गीतों, ग़ज़लों, नज़्मों ने न जाने कितनी शामों-रातों के पुल पार कराए ��ैं, सहर तक के रतजगों में साथ निभाया है। उनके रचे साहित्य और सिनेमा पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं, और कितने ही अख़बारों के पन्नों में उनके रचे साहित्य और सिनेमा का ज़िक्र हुआ है। उन्हें दादा साहब फ़ाल्के, साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, ग्रामी और ऑस्कर सम्मान तक मिल चुके हैं, लेकिन इतना सब होने के बावजूद, उनके जादुई रचना-संसार का एक इलाक़ा अब तक बहुत हद तक नज़र-अंदाज़ रहा है, और वो है, उनका रचा अद्भुत ब���ल-साहित्य और बाल-सिनेमा। ये किताबें उसी जादुई तिलिस्म में भटकते हुए लिखी गईं हैं।
वो इक्यानवे की उम्र में आज भी रोज़ लिखते हैं, शानदार लिखते हैं। उनके अल्फ़ाज़ आज भी बच्चों से सीधी-सच्ची-शरारत भरी भाषा में बात करते हैं। गुलज़ार साब हर रचना में साबित करते हैं कि बच्चों के लिए लिखने के लिए बचकाना लिखना ज़रूरी नहीं है। वो साठ साल से घुटनों पे, कोहनियों पे बच्चों के साथ ��ल-खेल रहे हैं, ताकि उनके अल्फ़ाज़ बच्चों के क़द की बराबरी कर सकें। आपने ’हमको मन की शक्ति देना’ स्कूल की प्रार्थना में गाया होगा, ’जंगल-जंगल बात चली है’ को टी.वी. के साथ गुनगुनाया होगा, ’लकड़ी की काठी’ वाले अरबी घोड़े की सवारी की होगी, लेकिन इन सब के परे भी गुलज़ार साब ने साठ साल में इक भरी-पूरी दुनिया रची है, ये किताबें उसी दुनिया की सैर करवाती है।
मज़े-मज़े में बच्चों को समझदारी के सबक़ सिखाना ���ोई उनसे सीखे, क्योंकि वो जानते हैं कि बच्चों की परवरिश उपदेशों से नहीं, सही बर्ताव और अल्फ़ाज़ से होती है। वो सीधे हमारे अंदर मौजूद बच्चे से बात करते हैं, क्योंकि वो बच्चों की भाषा जानते हैं। वो जानते हैं कि बच्चों को संजीदगी नहीं, शरारत चाहिए। वो बच्चों के साथ उन्हीं जैसे शरारती बने रहते हैं और मज़े की बात यह है कि उनकी इस शरारत का मज़ा हम सब बड़े, उम्र में बड़े, भी बहुत आराम से ले सकते हैं|
इन क���ताबों के ज़रिए बच���चों, पैरेंट्स, टीचर्स की गुलज़ार साब के ख़ालिस हुनर से गहरी मुलाक़ात होगी, क्योंकि यह बच्चों का कंटेंट नहीं है, यह साहित्य है। इसमें गुलज़ार हैं, बच्चों के गुलज़ार
पाखीरे की नई प्रस्तुति - ख़ुद भी पढ़िए, और बच्चों को भी पढ़ कर सुनाईए, दोहरा मज़ा आएगा।
अमेजान (https://t.co/5pirO3dQq8) और https://t.co/1gHpjYVMKc पे उपलब्ध #gulzar #गुलज़ार #children #literature
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी... एक खिड़की खुली है, जिसके दोनों ओर के कई मंज़र @yv_post बेधड़क होकर दिखा रहे हैं... और उनके हाथ में इशारा द���ने वाली छड़ी नहीं, उनकी प्रिय तेज़ धार वाली क़लम ही है! पढ़िए...
पत्थर उबालती रही इक मां तमाम रात / बच्चे फरेब खाके चटाई पे सो गए।Curious case of the author's royalties. उस किताब में एक रॉयल्टी रहती थी। @thealokputul@KaulManav
Happy Birthday Gulzar saab!
You are our strength, our lighthouse..
Here is a birthday gift for you, as a thank you note too..
with lots of love and respect..
- Anu, Mohit, Pavan @hitm0#August18#HappyBirthday#Gulzar
Absolutely delighted with the first flight of #Paakhire with #Begum_Iqbal_Bano_Foundation, लिखत Poetica - 'क'!
Available now at https://t.co/PKd1ubdnyH
कुछ मुसाफ़िर मंज़िल तलाशते उम्र सफ़र में बिता देते हैं। कई बार लम्बे सफ़र के बाद पता चलता है कि मंज़िल कोई है ही नहीं। बस सफ़र है, जो अस्ल में हासिल है। ये शुरुआत भी ऎसी ही है। कोई मंज़िल नहीं, बस सफ़र है!
पर तौल, #PaakhiRe पहली परवाज़ को तैयार है!
हमसफ़र अनु और @p1j के साथ!
Last few shows of my standup solo NOTHING MAKES SENSE.
Aa jaao if you haven’t seen it yet.
Bengaluru: 24th Jan
Goa: 8th Feb
Delhi: 14th Feb
Gurgaon: 15th Feb
Mumbai: last two-three shows to be added in Feb.
All tickets here: https://t.co/dot7pSSHYK
‘Creative thought is influenced by the environment around you. Poetry, especially, is time captured in a capsule.’
The legendary #Gulzar graces the stage at the inaugural session of @litlivefest, engaging in an enriching conversation with @PavanK_Varma about #BaalOPar, his definitive collection of poetry, launched alongside @SubhashGhai1 and @Udayanmitra65. Experience the magic as he recites some of his captivating verses.
#READWithHarperCollins #LiteratureLive2024 #MumbaiLitFest2024
शारदा जी हम ग़ैर-बिहारियों के जीवन में “कहे तोहसे सजना” की आवाज़ के रूप में आयीं और फिर यहीं रह गई। जब लोक-संगीत की समझ बनी तो उनका असली दर्ज़ा हम पर खुला। बड़ा सौभाग्य रहा कि उनके साथ एक गीत बनाने का मौक़ा मिला। चाय, ठहाकों, क़िस्सों, और पान के दौर चलते रहे, गीत बनता रहा।
नमन! आपकी आवाज़ हर छठ पर्व का पार्श्व संगीत है और रहेगी।
https://t.co/A5dXsVHTMx