हमारे देश की टेंडर प्रक्रिया और भ्रष्टाचार को देखते हुए…
नई नई सड़कों के टूटने बिखरने के विडियो देखते हुए…
खट्टा मीठा फ़िल्म का अक्षय कुमार का वो सीन याद आता है…
जिसमें वो म्युनिसिपल कमिश्नर से कहता हैं….
ढाई लाख रुपये का टेंडर अकाउंट था…
40% नेताजी खा गए…
20% चीफ़ इंजीनियर साहब खा गए…
15% बड़े बाबू की जेब में गया…
10% छोटे बाबुओं में बंट गया…
मेरे हाथ में 25,000 रुपये आए…
आप चाहते हो कि उस 25,000 के अंदर मैं एक मजबूत पुलिया बनाऊं और देश का विकास करूं…
और मुझे क्या मिलेगा…?
मां का मंगलसूत्र, पिताजी की घड़ी गिरवी रख के पुलिया बनाकर देश का विकास नहीं करना है मुझे…!!
ये आजकल के ठेकेदारों के वास्तविक हालात है…
ढाई लाख का काम पच्चीस हज़ार में पूरा करने के बाद…
जब घटिया निर्माण की इन्क्वायरी होती है… जाँच बैठती है…
तो पूरी गाज गिरती है ठेकेदारों पर…!!!
अरुण जेटली मुझे पसंद नहीं करते थे । उनकी प्रेस कांफ्रेंस में तरह तरह के बहाने बनाए जाते - कमरा फुल है वगैरा वगैरा और इंश्योर किया जाता कि मैं न जा पाऊं अंदर ।
कारण बस इतना था कि किसी प्रेस कांफ्रेंस में जेटली ने कहा - सुविधाएं चाहिए तो पैसा तो देना पड़ेगा ।
मैंने उसी पर कह दिया था कि ये बात किसी ढाबे का मालिक कहे तो बात समझ आती है , भारत का वित्त मंत्री कहे तो समझ नहीं आती ।
आप इंडायरेक्टली ये कह रहे हैं न कि जिसके पास पैसा नहीं होगा, उसे सुविधा नहीं मिलेगी ? लोक कल्याणकारी राज्य का क्या होगा फिर ।
अब मैं देख रहा हूं कि जेटली तो भले आदमी थे । पैसे के बदले मैं सुविधा तो देने की बात कहते थे ।
पर अब तो पैसे लेकर ठगने का माहौल चल रहा है । सड़कों पर आप चल नहीं सकते, इतना हैव्वी टोल है। गाड़ियां आपकी खराब हो रहीं।
और ऊपर से सरकार को आपका सोना चाहिए ।
ईश्वर मालिक है इस देश का ..
इनका नाम अतुल सुभाष था।
34 साल। बेंगलुरु में प्राइवेट कंपनी में डिप्टी जनरल मैनेजर। एक बेटे के पिता व्योम।
उन्होंने सिस्टम से उम्मीद नहीं की कि कोई उनकी बात सुनेगा।
उन्होंने हर चीज़ खुद रिकॉर्ड की।
उन पर एक साथ 9 केस दर्ज हुए 498A, घरेलू हिंसा, मेंटेनेंस, कस्टडी।
हर सुनवाई के लिए उन्हें बेंगलुरु से जौनपुर तक 1700 किलोमीटर का सफर करना पड़ता था।
4 साल में 40 बार वही सफर।
120 कोर्ट हियरिंग्स।
उन्होंने आरोप लगाया कि केस वापस लेने के लिए 3 करोड़ रुपये मांगे गए।
अपने ही बेटे से मिलने के लिए 30 लाख रुपये अलग से।
अपने वीडियो में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक फैमिली कोर्ट जज ने अनुकूल आदेश के लिए 5 लाख रुपये मांगे।
9 दिसंबर 2024 को उन्होंने बेंगलुरु के फ्लैट में आत्महत्या कर ली।
पीछे छोड़ा — 24 पन्नों का नोट और 81 मिनट का वीडियो।
हर तारीख। हर केस नंबर। हर यात्रा। हर रकम।
सब कुछ रिकॉर्ड किया हुआ।
मरने से पहले उन्होंने अपने परिवार से सिर्फ एक बात कही:
“मेरी अस्थियाँ गंगा में तब तक विसर्जित मत करना, जब तक न्याय न मिले।”
उनकी मां सुप्रीम कोर्ट गईं, अपने पोते से मिलने की अनुमति मांगने।
उन्हें कहा गया — “आप बच्चे के लिए stranger हैं।”
फिर सुनवाई आई।
जज छुट्टी पर थे।
एक साल की तारीख मिल गई।
इसी बीच, ट्विशा शर्मा केस में सिर्फ 11 दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया।
बार काउंसिल ने घंटों में कार्रवाई कर दी।
AIIMS की मेडिकल टीम चार्टर्ड प्लेन से भेजी गई।
11 दिन में पूरा सिस्टम दौड़ पड़ा।
अतुल सुभाष 81 मिनट का रिकॉर्डेड सबूत छोड़ गए थे।
उन्हें मिला एक साल का इंतज़ार।
उनकी अस्थियाँ आज भी गंगा का इंतज़ार कर रही हैं।
उनका बेटा व्योम अब 6 साल का है।
अतुल सुभाष को न्याय मिलना चाहिए।
अगर रिकॉर्डेड सबूत, दस्तावेज़ और एक इंसान की आखिरी पुकार भी सिस्टम को नहीं जगा सकती, तो फिर आम आदमी आखिर जाए कहाँ?
बांग्ला नामों को हिन्दी में लिखते समय अक्सर वही ग़लती होती है, जो शुभेंदु को सुवेंदु, सौरभ को सौरव, अभिजीत को अभिजित या ओभिजीत लिखने में होती है।
कारण यह है कि बांग्ला में कुछ ध्वनियाँ हिन्दी जैसी दिखती हैं; लेकिन बोली में उनका उच्चारण अलग है।
1. शुभेंदु अधिकारी या सुवेंदु अधिकारी?
बांग्ला में नाम लिखा जाता है:
শুভেন্দু অধিকারী
इसका संस्कृतनिष्ठ हिन्दी रूप होगा:
शुभेंदु अधिकारी।
लेकिन बांग्ला उच्चारण में ভ यानी “भ” बहुत बार “व या ब” के करीब सुनाई देता है। इसलिए শুভেন্দু का उच्चारण बंगाल में कई लोग शुवेंदु या सुवेंदु जैसा करते हैं।
यानी:
लिखित संस्कृतनिष्ठ रूप: शुभेंदु
बांग्ला उच्चारण के निकट रूप: शुवेंदु या सुवेंदु
राजनीतिक तौर पर या मीडिया में प्रचलित हिन्दी रूप: सुवेंदु अधिकारी।
अलबत्ता, “शुभेंदु” अधिक शुद्ध है।
इसलिए “सुवेंदु अधिकारी” ग़लत नहीं है, अपितु यह बांग्ला उच्चारण के निकट है। यह ऐसा ही है, जैसे बोलचाल में लक्ष्मण लखन हो गए। ऐसे असंख्य शब्द हैं।
अगर बंगाली की तरह पंजाबी पर हिन्दी के नियम लागू किए तो क्या होगा? क्या हम अमरिंदर गिल को अमरेंद्र लिख पाएंगे? जसकीरत का क्या करेंगे? यशकीर्ति? आसासिंह मस्ताना को क्या आशासिंह मस्ताना लिख पाएंगे? गुरदास मान, सतिंदर सरताज, हरभजनसिंह, गुरनामसिंह, जसविंदर, जसनपरीत जैसे अनेक नाम हैं। तो बांग्ला परंपरा में जो भी हो या शुभेंदु अधिकारी स्वयं बाँग्ला में अपना नाम जिस तरह लिखते हों, उसे मानना चाहिए।
2. सौरभ गांगुली या सौरव गांगुली?
बांग्ला में नाम है: সৌরভ গাঙ্গুলী
यहाँ अंतिम अक्षर ভ है, जो देवनागरी में भ के बराबर है। संस्कृत या हिन्दी रूप से यह साफ़-साफ़ सौरभ है। लेकिन बांग्ला उच्चारण में वही ভ अक्सर व की तरह सुनाई देता है। इसलिए बंगाली बोलचाल में यह नाम सौरव जैसा सुनाई देता है।
इसी कारण अंगरेज़ी में भी उनका नाम Sourav Ganguly लिखा जाता है, न कि Saurabh Ganguly। यानी सौरभ को तो हम सौरव लिखेंगे; लेकिन शुभेंदु को ही शुभेंदु ही।
ऐसा लगता है कि शुद्धतावाद की बात हमें शुभेंदु पर तो याद आई, लेकिन हम सौरभ के मामले में भूल गए। दोनों में एक जैसा होना चाहिए। चाहे व मानें या भ। लेकिन आधिकारिक वर्तनी वही रहे, जो व्यक्ति ख़ुद लिखे।
तो:
संस्कृतनिष्ठ हिन्दी : सौरभ गांगुली
बांग्ला उच्चारण या आधिकारिक अंगरेज़ी रूप: सौरव गांगुली
मीडिया में प्रचलित रूप: सौरव गांगुली
यहाँ “सौरव” इसलिए चलता है; क्योंकि व्यक्ति स्वयं और सार्वजनिक अभिलेखों में वही रूप इस्तेमाल होता है।
3. दरअसल मामला ये है कि बांग्ला में ‘व’ अक्षर है ही नहीं।
बांग्ला लिपि में हिन्दी जैसा अलग व नहीं है। वहाँ ব और ভ से ही “ब”, “भ”, “व” जैसी ध्वनियाँ कई संदर्भों में निकलती हैं।
जैसे :
বঙ্গ : बंग
বিশ্ব : बिश्व या विश्व
বিবেকানন্দ : बिबेकानंद या विवेकानंद
ভবানী : भवानी, पर बोलचाल में भोबानी या भवानी के बीच
সৌরভ : सौरभ, पर उच्चारण सौरव
यही कारण है कि बंगाली नामों में हिन्दी पाठक को “ब”, “भ” और “व” का फ़र्क़ उलझा देता है।
नोट : नीचे वाले हिस्से को छोड़ दें। नहीं पढ़ें। अनावश्यक है।
और बॉर्डर पर बांग्ला
मैं बॉर्डर के जिले गंगानगर में अपने गाँव चक 25 एमएल में छठी कक्षा से नियमित बीबीसी सुनता था तो वहाँ हिन्दी से पहले बाँग्ला भाषा में कार्यक्रम आया करते थे। बीबीसी हिन्दी सुनने की भारी तलब के कारण रेडियो जल्दी खोलकर बैठ जाता और बाँग्ला सुनता था। बांग्ला पढ़ना तो मुझे आज भी नहीं आता। लेकिन उससे बांग्ला में रुचि ऐसी हुई कि मैंने काज़ी नज़रुल इस्लाम, माइकेल मधुसूदन दत्त, महाश्वेता देवी, जीवनानंददास, शंख घोष, सुकांत उपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय आदि को स्कूल पास करते-करते पढ़ डाला। शरच्चंद्र चट्टोपाध्याय और विमत्र मित्र जैसे उपन्यासकारों का तो बाद में नशा ही रहा। विमल मित्र का ख़रीदी कौड़ियों के मोल महाकाय उपन्यास है। मुझे हैरानी है, मैंने उसे दसवीं कक्षा में पढ़ा था। माइकेल मधुसूदन दत्त की पुस्तकें मेरे पास आज भी बाँग्ला, हिन्दी और इंग्लिश में हैं। उनके "दॅ स्लेयिंग ऑव मेघनाद" यानी "मेघनाद वध" का मैथिलीशरण गुप्त का किया अनुवाद भी है। इसकी मूल इंग्लिश ऑक्सफ़ोर्ड ने पब्लिश की है, जो भारत में नगण्य है। स्कूली दिनों में मैंने अनुवाद पढ़े थे। हमारे डीएवी स्कूल का और श्रीगंगानगर का सार्वजनिक जिला पुस्तकालय बहुत ही समृद्ध था।
@akhileshsharma1
In the year 1998, I was a probationer in the IAS Academy (@LBSNAA_Official ).
The then Director, Shri. B.S. Baswan, IAS (retd), hosted a farewell for us and I got a chance to have few words with him.
I asked him, ‘What would be your one single advice to me, sir?’
He said, ‘Behave with everyone around as you will behave the day after you retire.’
At that age, 27, and having more than 30 years ahead, I didn’t immediately understand its importance. But, over the years, it is his advice that has consistently helped me to be humble and deflate my arrogance that used to rear its head now and then.
Thank you, Baswan sir! You are a very rare gem. You taught so much to me in few words.
Humility, humanity and compassion are the three pillars of public service. Everything else comes after.
I lived in Germany for 6 years.
> Clean roads
> Better work-life balance
> Peaceful life
> Predictable systems
But I still returned to India.
> Yes, India has traffic
> Pollution
> Noise
> Chaos
> Endless crowds
> & n number of other problems
And I won’t deny, sometimes I still feel like going back.
But India also has something hard to explain:
> energy
> emotions
> family
> festivals
> spontaneity
> and a feeling that life is happening around you
Sometimes comfort is not enough
You also want to feel alive
सुवेन्दु अधिकारी बंगाल में बीजेपी के पहले सीएम बने , 2020 में टीएमसी छोड़ कर आए .. मानिक साहा 2016 में कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में आए.. त्रिपुरा के 2022 में सीएम बने .. हिमंता 2015 में कांग्रेस छोडकर बीजेपी में आए ,2021 में असम सीएम बने .. सम्राट चौधरी 2017 में जेडीयू छोडकर बीजेपी में आए .2026 में बिहार के सीएम बने ..और इस तरह पश्चिम और उत्तर भारत के बाद पूरा पूरब बीजेपी का हुआ
7 Purchases That Save You Years of Stress:
1. A reliable car
2. A good mattress
3. Quality healthcare
4. Useful software/tools
5. Financial education
6. Hiring experts when needed
7. Emergency savings
₹2 lakh per month maintenance demand?
A Delhi man’s reaction during an ongoing marital dispute has gone viral after he claimed, “Itni toh judge ki bhi salary nahi hoti.”
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