'स्वतंत्र विचारक'
मानवता के चार दुश्मन जात,धर्म,लोभ और परंपराएं..
वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाएं,अंधविश्वास को दूर भगाएं..भारत में जातिवाद सबसे बड़ा आतंकवाद है.
@INCIndia जिसकी जितनी population उसका उतना हिस्सा..SC,ST,obc, Minorities,ब्राह्मण,बनिया, क्षत्रीय 7 वर्गों को को population के अनुपात में national resources में हिस्सेदारी दी जाए..सब अपने अपने वर्ग में merit के आधार पर आयेंगे..अल्पसंख्यक उच्च जातियों का कब्जा बहुसंख्यक के साथ अन्याय है..
MP के धार में 35 छात्राएं रात में हॉस्टल से निकलकर थाने पहुंची: बोलीं- 50 बेड हैं, हम 140 लड़कियां रह रहीं; खराब खाना देते और चुप रहने को कहते हैं
#MPNews#Dhar#HindiNews
https://t.co/n8W8VZGZSD
जहाँ भी आपको कोई बेघर बच्चा दिखे, उसकी लोकेशन और फोटो हमें सीधे DM करें या हमारे दिए गए नंबर पर WhatsApp करें, +919871119188
ध्यान रहे इसे किसी भी तरह सोशल मीडिया पर साझा न करें,ताकि उनकी सुरक्षा बनी रहे।
Wherever you see a homeless child, please send us the location and a photo via DM or to our provided WhatsApp number. +919871119188
Do not share these images or locations publicly on social media, so that their safety is not compromised.
दिल्ली, शुक्रवार, दोपहर करीब 12 बजे
मुंडका Industrial Area में एक फैक्ट्री के सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से तीन मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई.
शुरूआती जांच में पता चला कि एक मजदूर चांद, 42, सेप्टिक टैंक में उतरा था. जहरीली गैस की चपेट में आने के बाद वो बेहोश होने लगा तो अरुण, 38, उसे बचाने के लिए नीचे उतरा लेकिन जहरीली गैस ने उसे भी संभलने का मौका नहीं दिया. इसके बाद संदीप, 32, ने दोनों को बचाने के चक्कर में दम तोड़ दिया.
चाँद की ढाई साल की बेटी और आठ महीने का मासूम है. संदीप की एक 12 साल की बेटी है. ��रुण के तीन छोटे-छोटे बेटे हैं... सब के सिर से पिता का साया छीन लिया गया.
तीनों बिना दस्ताने, gumboot, फुल बॉडी PPE kit, हेलमेट, harness और गैस डिटेक्टर के टैंक में उतरे. वहां ऑक्सीजन level की जांच भी नहीं हुई. कानून के मुताबिक बिना सुरक्षा इंतजाम के सीवर या सेप्टिक टैंक में उतरने पर रोक है. #SupremeCourt ने इस पर कई बार साफ़ निर्देश दिए हैं.
केंद्र सरकार ने भी माना कि 2017 से मार्च 2026 तक देश में 622 मजदूरों और दिल्ली 62 मजदूर ऐसे हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं.
मैं पिछले पच्चीस साल से लगातार इस मुद्दे बोलता और लिखता रहा हूँ. कई रिपोर्टस भी कीं. भारत में सिर पर या हाथ से मैला उठाने को रोकने के लिए 2013 से देश में #ManualScavenging है. कानून बना तो उम्मीद जगी कि अब ये प्रथा ख़त्म होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
दो साल पहले इस विभाग के केंद्रीय मंत्री से इंटरव्यू किया और उनसे इस बारे में कई सवाल पूछे. मैन्युअल स्केवेंजिंग को मशीनीकृत करने पर बात की उनको देश और विदेश में इस्तेमाल की जानेवाली मशीनों के बारे में बातचीत के बाद बताया. लिखित नोट भी दिया, पर हुआ कुछ नहीं.
इस पर जोर से आवाज़ उठनी चाहिए. ये प्रथा ख़त्म होनी चाहिए.
EWS फर्जीवाडा
Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार UPSC 2025 में EWS कोटे से 104 उम्मीदवार चयनित हुए। इनमें से 67 उम्मीदवार ऐसे कोचिंग संस्थानों में पढ़े जिनकी वार्षिक फीस ₹2.65 लाख तक थी। 28 उम्मीदवारों के माता-पिता व्यवसाय चलाते थे। 10 उम्मीदवार पहले से निजी कंपनियों और MNCs में कार्यरत थे। 14 उम्मीदवार IIT और NIT जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़े थे।
अब सवाल यह है कि भारत क�� वास्तविक गरीब कहाँ हैं?
जिस छात्र के पिता खेतिहर मजदूर हैं, जो सरकारी स्कूल में पढ़ा है, जिसने कभी कोचिंग का दरवाज़ा तक नहीं देखा, जो किताबें खरीदने के लिए संघर्ष करता है, वह और लाखों रुपये की कोचिंग लेने वाला छात्र एक ही श्रेणी में कैसे रखे जा सकते हैं?
EWS का सबसे बड़ा विरोधाभास ₹8 लाख वार्षिक आय सीमा है। भारत में अधिकांश परिवार इससे काफी कम आय पर जीवन यापन करते हैं। इसके बावजूद यह सीमा इतनी ऊ��ची रखी गई है कि अपेक्षाकृत संपन्न परिवार भी स्वयं को "आर्थिक रूप से कमजोर" घोषित कर सकते हैं। परिणाम यह हुआ कि गरीबी की परिभाषा वास्तविक अभाव से हटकर कागज़ी प्रमाणपत्र तक सीमित हो गई।
आरक्षण का उद्देश्य कभी गरीबी हटाना नहीं था। संविधान निर्माताओं ने इसे उन स��ुदायों के प्रतिनिधित्व के लिए बनाया था जिन्हें सदियों तक सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर रखा गया। लेकिन EWS ने आरक्षण की अवधारणा को ही बदल दिया। अब वह वर्ग भी आरक्षण का लाभ ले रहा है जो ऐतिहासिक रूप से सत्ता, संसाधनों और संस्थागत प्रतिनिधित्व में मजबूत स्थिति रखता रहा है।
UPSC 2025 के आँकड़े दिखाते हैं कि EWS का लाभ बड़ी संख्या में उन लोगों तक पहुँच रहा है जिनके पास पहले से शिक्षा, संसाधन और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मौजूद है। यदि 104 में से 67 उम्मीदवार महंगी कोचिंग ले सकते हैं, 14 IIT-NIT तक पहुँच सकते हैं और कई व्यवसायी परिवारों से आते हैं, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि इस व्यवस्था में सबसे गरीब व्यक्ति की जगह कहाँ है।
समस्या उस नीति की है जिसने विशेषाधिकार और वंचना के बीच की रेखा धुंधली कर दी है। जब संसाधनों से संपन्न लोग भी "कमज़ोर वर्ग" का प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेते हैं, तब वास्तविक गरीबों के हिस्से के अवसर और भी सीमित हो जाते हैं।
UPSC 2025 की EWS सूची केवल आँकड़ों का संग्रह नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें गरीबी के नाम पर विशेषाधिकार भी आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहा है। और जब विशेषाधिकार को वंचना घोषित कर दिया जाए, तब सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं लोगों का होता है जिनके लिए सामाजिक न्याय की आवश्यकता है
EWS असंवैधानिक है इसे खत्म किया जाना चाहिए