मुसलमानों के ख़िलाफ़ इस तरह कि बयानबाज़ी नई नहीं है, जहाँ मुसलमानों को उनके संवैधानिक अधिकारों से रोकने की बात की जा रही हो। लेकिन सवाल ये है कि ऐसे बयानों के बाद बहुसंख्यक समाज का एक बड़ा तबक़ा खामोश क्यों दिखता है? क्या ऐसे बयानों का वे समर्थन करते हैं?