हा हम मानते हैं हम थक रहे है, कमजोर पड़ रहे हैं, एक दुसरे पर विश्वास की कमी भी आई है!
पर हारे नही है और हम हार सकते भी नहीं हमको जीतना ही होगा क्यू की हम हैं #CHA_परिवार नर्सिंग इतिहास का सबसे बड़ा परिवार!
संघर्ष ही जीत दिलायेगा चाहे वह किसी भी रूप में करना पड़े ✊
#CHA_परिवार
आज हमारे #CHA साथी पूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी से मिले आप उस समय सेवा बहाली कर नहीं पाये
आपके द्वारा बजट घोषणा 2022-23 MHVF अभी तक क्रियान्वित नहीं हुई है आप भी विधानसभा मैं पुनः अवगत कराए
हम पिछले 3 साल से संघर्षरत है
@ashokgehlot51@sampatsingh05
@_lokeshsharma भाई सच काहू तेरे time में हटाया ता तो उस टाईम तेरी सीएमओ में अच्छी post ती तो क्यों 1भी ट्विटर पर post की ओर आज कर रो bjp वाले फिर job na दे u सच कु अशोक गहलोत ओर कांग्रेस वाले के Covid health assistant (CHA) कि हाय लगी na चिकित्सा मंत्री परसादीलालजीत पायो na मुख्यमंत्री को बेटा
एक बार फिर से CHAs को जयपुर के शहीद स्मारक पर आंदोलन करना पड़ रहा है। विपक्ष में रहते हुए BJP नेताओं ने सरकार आने के बाद सेवा बहाली का जो वादा किया उसको आज तक क्यों नहीं निभाया?
कोरोना में सेवा देने वाले योद्धाओं की पीड़ा किसी ने नहीं सुनी ना उसका कोई समाधान निकाला गया।
#CHA_महाआंदोलन_26अगस्त
सरकार की अनुकरणीय पहल।
सुझाव एवं निवेदन
कोरोना रोकथाम में महत्वपूर्ण योगदान निभाने वाले #CHA_नर्सेज उक्त मॉनिटरिंग के लिए उपयुक्त रहेंगे,विगत राजस्थान सरकार द्वारा उपेक्षित कर बेरोजगार किए गए #CHA_नर्सेज को रोजगार भी मिल सकेगा।
@BhajanlalBjp@GajendraKhimsar@RajCMO
रेलवे को गतिशील और सुरक्षित बनाए रखने वाले ट्रैकमैन भाइयों के लिए सिस्टम में ‘न कोई प्रमोशन है, न ही इमोशन’।
भारतीय रेल कर्मचारियों में ट्रैकमैन सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं, उनसे मिल कर उनकी समस्याओं और चुनौतियों को समझने का मौका मिला।
ट्रैकमैन 35 किलो औजार उठाकर रोज 8-10 कि.मी. पैदल चलते हैं। उनकी नौकरी ट्रैक पर ही शुरू होती है और वो ट्रैक से ही रिटायर हो जाते हैं । जिस विभागीय परीक्षा को पास कर दूसरे कर्मचारी बेहतर पदों पर जाते हैं, उस परीक्षा में ट्रैकमैन को बैठने भी नहीं दिया जाता।
ट्रैकमैन भाइयों ने बताया कि हर साल करीब 550 ट्रैकमैन काम के दौरान दुर्घटना का शिकार होकर जान गंवा देते हैं, क्योंकि उनकी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं।
विपरीत परिस्थितियों में बिना बुनियादी सुविधाओं के दिन-रात कड़ी मेहनत करने वाले ट्रैकमैन भाइयों की इन प्रमुख मांगों को हर हाल में सुना जाना चाहिए।
1. काम के दौरान हर ट्रैकमैन को ‘रक्षक यंत्र’ मिले, जिससे ट्रैक पर ट्रेन आने की सूचना उन्हें समय से मिल सके।
2. ट्रैकमैन को विभागीय परीक्षा (LDCE)के जरिए तरक्की का अवसर मिले।
ट्रैकमैन की तपस्या से ही करोड़ों देशवासियों की सुरक्षित रेल यात्रा पूरी होती है, हमें उनकी सुरक्षा और तरक्की दोनो सुनिश्चित करनी ही होगी।
कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक सुखद बस यात्रा के अनुभव के साथ DTC कर्मचारियों से संवाद कर उनके दिनचर्या और समस्याओं की जानकारी ली।
न सामाजिक सुरक्षा, न स्थिर आय और न की स्थाई नौकरी - Contractual मजदूरी ने एक बड़ी ज़िम्मेदारी के काम को मजबूरी के मुकाम पर पहुंचा दिया है।
जहां drivers और conductors अनिश्चितताओं के अंधेरों में जीने पर विवश हैं, वहीं यात्रियों की सुरक्षा में निरंतर तैनात होमगार्ड्स 6 महीनों से वेतनहीन हैं।
इस उपेक्षा से त्रस्त, देश भर के सरकारी कर्मचारियों की तरह DTC वर्कर्स भी लगातार निजीकरण के डर के साए में जी रहे हैं।
ये वो लोग हैं जो भारत को चलाते हैं, प्रतिदिन लाखों यात्रियों के सफर को सुगम बनाते हैं - मगर समर्पण के बदले उन्हें कुछ मिला है तो सिर्फ अन्याय।
मांगें स्पष्ट हैं - समान काम, समान वेतन, पूरा न्याय!
वो भारी मन और दुखी दिल से सरकार से पूछ रहे हैं, "हम नागरिक पक्के तो नौकरी कच्ची क्यों!"
ये सबको झूठा झांसा देते हैं,वोटों के बाद आपसे मिलेंगे ही नहीं,राजस्थान कांग्रेस ने 2023में इन्होंने 28000 कॉविड में काम करने वालों कॉविड स्वास्थ्य सहायकों को नौकरी से निकाल दिया,राहुल गांधी ने उनसे भी ऐसे ही बात की थी।
कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक सुखद बस यात्रा के अनुभव के साथ DTC कर्मचारियों से संवाद कर उनके दिनचर्या और समस्याओं की जानकारी ली।
न सामाजिक सुरक्षा, न स्थिर आय और न की स्थाई नौकरी - Contractual मजदूरी ने एक बड़ी ज़िम्मेदारी के काम को मजबूरी के मुकाम पर पहुंचा दिया है।
जहां drivers और conductors अनिश्चितताओं के अंधेरों में जीने पर विवश हैं, वहीं यात्रियों की सुरक्षा में निरंतर तैनात होमगार्ड्स 6 महीनों से वेतनहीन हैं।
इस उपेक्षा से त्रस्त, देश भर के सरकारी कर्मचारियों की तरह DTC वर्कर्स भी लगातार निजीकरण के डर के साए में जी रहे हैं।
ये वो लोग हैं जो भारत को चलाते हैं, प्रतिदिन लाखों यात्रियों के सफर को सुगम बनाते हैं - मगर समर्पण के बदले उन्हें कुछ मिला है तो सिर्फ अन्याय।
मांगें स्पष्ट हैं - समान काम, समान वेतन, पूरा न्याय!
वो भारी मन और दुखी दिल से सरकार से पूछ रहे हैं, "हम नागरिक पक्के तो नौकरी कच्ची क्यों!"
@RahulGandhi ये सबको झूठा झांसा देते हैं,वोटों के बाद आपसे मिलेंगे ही नहीं,राजस्थान कांग्रेस ने 2023में इन्होंने 28000 कॉविड में काम करने वालों कॉविड स्वास्थ्य सहायकों को नौकरी से निकाल दिया,राहुल गांधी ने उनसे भी ऐसे ही बात की थी।
@RahulGandhi ये सबको झूठा झांसा देते हैं,वोटों के बाद आपसे मिलेंगे ही नहीं,राजस्थान कांग्रेस ने 2023में इन्होंने 28000 कॉविड में काम करने वालों कॉविड स्वास्थ्य सहायकों को नौकरी से निकाल दिया,राहुल गांधी ने उनसे भी ऐसे ही बात की थी।
ये सबको झूठा झांसा देते हैं,वोटों के बाद आपसे मिलेंगे ही नहीं,राजस्थान कांग्रेस ने 2023में इन्होंने 28000 कॉविड में काम करने वालों कॉविड स्वास्थ्य सहायकों को नौकरी से निकाल दिया,राहुल गांधी ने उनसे भी ऐसे ही बात की थी।
रेलवे को गतिशील और सुरक्षित बनाए रखने वाले ट्रैकमैन भाइयों के लिए सिस्टम में ‘न कोई प्रमोशन है, न ही इमोशन’।
भारतीय रेल कर्मचारियों में ट्रैकमैन सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं, उनसे मिल कर उनकी समस्याओं और चुनौतियों को समझने का मौका मिला।
ट्रैकमैन 35 किलो औजार उठाकर रोज 8-10 कि.मी. पैदल चलते हैं। उनकी नौकरी ट्रैक पर ही शुरू होती है और वो ट्रैक से ही रिटायर हो जाते हैं । जिस विभागीय परीक्षा को पास कर दूसरे कर्मचारी बेहतर पदों पर जाते हैं, उस परीक्षा में ट्रैकमैन को बैठने भी नहीं दिया जाता।
ट्रैकमैन भाइयों ने बताया कि हर साल करीब 550 ट्रैकमैन काम के दौरान दुर्घटना का शिकार होकर जान गंवा देते हैं, क्योंकि उनकी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं।
विपरीत परिस्थितियों में बिना बुनियादी सुविधाओं के दिन-रात कड़ी मेहनत करने वाले ट्रैकमैन भाइयों की इन प्रमुख मांगों को हर हाल में सुना जाना चाहिए।
1. काम के दौरान हर ट्रैकमैन को ‘रक्षक यंत्र’ मिले, जिससे ट्रैक पर ट्रेन आने की सूचना उन्हें समय से मिल सके।
2. ट्रैकमैन को विभागीय परीक्षा (LDCE)के जरिए तरक्की का अवसर मिले।
ट्रैकमैन की तपस्या से ही करोड़ों देशवासियों की सुरक्षित रेल यात्रा पूरी होती है, हमें उनकी सुरक्षा और तरक्की दोनो सुनिश्चित करनी ही होगी।