इंडिगो के पटना फ़्लाइट के क्रू भोजपुरी में ब्रीफ़ करत बाड़ें @IndiGo6E के इ पहल सराहे योग बा. गोरखपुर, पटना, बनारस, कुशीनगर के यात्री लोग ख़ातिर भी भोजपुरी में ब्रिफिंग होई तो बड़ा निमन रही. निहोरा बा इंडिगो से कि ऊ एकरा ख़ातिर ठोस पहल करे. @aakharbhojpuri
पर्यावरण दिवस प , लोक धुन प आधारित, सुप्रसिद्ध साहित्यकार गंगा प्रसाद अरुण जी के सम-सामयिक , गहिराह भाव ले ले एगो बेहतरीन रचना ।
पर्यावरण-गीत (लोक धुन पर)
— गंगा प्रसाद अरुण
नदिया के पनिया में घोरेल जहरीया हो
कहाँ जाई सोना रे मछरिया
आहो लोगे !
बनवाँ उजाड़ अपना लालच के मारल हो
कहाँ नाची मोरनी-हिरनिया
आहो लोगे!
उपरी अकसवा में उड़े गैस-धुआँ-माहुर
प्रान-वायु पाई का सँवरिया
आहो लोगे!
मटिया तेजाबी-रेह-रेत बने ऊसर हो
का खाई प्रान के पहरुआ
आहो लोगे!
अंगना के गछिया कटईह जनि बाबुल हो
कहाँ गायी मुनिया चिरइयाँ
आहो लोगे!
अबहुँ से चेतीं तनी सोचीं लोग-बाग सभे
फिर चली कवनो ना उपइया
आहो लोगे !
ग्राम गीत
- डॉ. जौहर शाफियाबादी
गउंआ के मटिया में सोनवा फूलाला कि शहर में धूरा बिकाला
तोहरा कइसे शहरिया सोहाला!!
गउंआ से बसिया शहरिया में जाला, बोलऽ ना टटका भेंटाला?
रहरी, मटरवा आ चनवा के कचरी, ताजा-ताजा अमृत बुझाला!
तोहरा कइसे...
सोन्हा-सोन्हा खूशबू, दवँरिया बघरिया के, सोना जस सरसो फूलाला
रून-झुन बाजेला सनई के खेतवा से मुरई के पगरी बन्हाला!
तोहरा कइसे...
टूटही पलनिया में फगुआ आ चइता तऽ, गछुली में बिरहा गवाला
बगिया में बोलेले कुंहुंकी कोइलिया कि बिरहा बसंत बुझाला
तोहरा कइसे...
अमवा, महुअवा से टपके मदन-रस, कोंचिआ, मोजरिया गोटाला
पापी, पपिहरा के बिरहा के धुन में गोरिया के रहिया भुलाला!
तोहरा कइसे...
पकवा इनरवा पऽ पकड़ी का छइयाँ में, गरमी में गउंआ बटोराला
जेठ-बइसखवा के तलफी भुभुरिया में, लड़िको नू पढ़े चलि जाला!
तोहरा कइसे...
गुल्ली-डन्टा, चकवा-चकइया के खेल जहां, संझा-पराती गवाला
चिकवा में चिकपार, रण में बा नीति जहां, लुका-छुपी चोरवा धराला!
तोहरा कइसे...
भोरे- भोरे झांके साफ ललकी किरिनिया जहां, रतिया के चान अगराला
मघवा में बघवा के धरे थरथरी जहां, भादो में कादो महाला!
तोहरा कइसे..
चकवा-चकइया के नेहिया के गीत जहां, सुगवा-सुगनिया पोसाला
मोरवा-मोरिनिया के नाँच देखी 'जौहर' के गउंए नू स्वर्ग बुझाला!
तोहरा कइसे शहरिया सोहाला...
निहोरा !
भोजपुरी भाषा में गद्य लेखन 2.0
रउरा लेख के बाट जोहाता !
हाल दे भेजीं, पुरहर लिखि के भेजीं।
भेजे के बेर ध्यान राखीं -
1. राउर लिखल होखे, पोस्टर भले AI में बा बाकिर राउर लेख AI के लिखल भा केहू दोसरा के लिखल ना होखे!
2. कम से कम 1000 शब्द के होखे, दू - अढाई हजार शब्द ले लिख सकेनी ।
3. भाषा भोजपुरी होखे, आ पहिले प्रकाशित ना भइल होखे। माने कहीं छपल ना होखे ।
4. भाषा के चयन संसदीय होखे, फुहर पातर ना भा जातिगत धार्मिक भेदभाव न फइलावत होखे ।
भेजे खातिर ईमेल करीं - [email protected]
दुनिया भर में लोग बाग से धरम-करम के रिश्ता बा
तोरा - हमरा बीच में पगली ! सात जनम के रिश्ता बा ।।
धरती पर जब आइल बानी,पाहुन जइसन हम - रउरा
माया-मोह, सवारथ-सपना , भाव-भरम के रिश्ता बा ।।
मन से मन के रिश्ता के सब , रेशम - धागा टूट गइल
अब त हमरा-उनका में बस कौल- कसम के रिश्ता बा ।।
पत्थर दिल भी पत्थर के पूजत - पूजत भगवान भइल
पत्थर से पत्थर के बीचे रूह-सनम के रिश्ता बा ।।
मन से मन मिलते नइखे , तब आपन - ग़ैर कहाला का
भाई भइला के बादो बस रीत - रसम के रिश्ता बा ।।
झूठ- सांच के एह नगरी में , पांच बरस पर याद परल
घूम - घूम के भूंक रहल बा , जात - धरम के रिश्ता बा ।।
तंग इनायतपूरी जी संसार में अदमी - आदमी के
अनचिन्हार भइला के बादो, कदम-कदम के रिश्ता बा ।।
- सुनील कुमार तंग 'तंग इनायतपुरी'
मन के माहुर बनवला से का फायदा
लोर अइसे बहवला से का फायदा
बात पर हमरा बिसवास ना जो रहल
अइसे किरिया धरवला से का फायदा
मन मे बइठल जो होखे मइल के परत
तन में साबुन लगवला से का फायदा
बात कइलो प जो बात बन ना सकल
बात अइसे बढ़वला से का फायदा
अब त कुछुए समय बा रहे के इहाँ
नेह नाता जोगवला से का फायदा
- पाण्डेय कपिल
(पाण्डेय कपिल जी के किताब 'परिन्दा उडान पर' से)
भोजपुरी के टटका लेखक लो से !
एह पोस्ट के संगे जवन फोटो देखत बानी, इ फोटो भोजपुरी के नामी पत्रिका जवना के नाव "भोजपुरी" रहे, के सन् 1954 में प्रकाशित एगो अंक से ह । एह पत्रिका में दूगो पंक्ति में भोजपुरी के लेखक समाज के कहानी बा ।
ओह दू पंक्ति के पहिला हिस्सा के क्रोनोलॉजी बुझीं -
" पहिले गाँहक बन के पाठक बनी, तब पाँच गो गाँहक बनाके आपन लेख भेजीं ।"
पहिले कींनीं
फेरु पढीं
लोगन के कीने खातिर जोड़ीं
फेरु लेख भेजीं भा लेखक बनीं !
जब रउवा कीनब त राउर गम्भीरता कीने वाला चीज से बनल रही, चुकि कीनले बानी त पढे के कोशिश रउरा करबे करब ! पढब त रउरा लागी कि भोजपुरी में का लिखा रहल बा । जब पढ के हो जाई त रउवा अउरी भोजपुरिया लो के कीने आ पढे खातिर जोड़ब ! जब इ हो जाई त फेरु रउवा लिखल शुरु करीं ।
एह से होई का की, भोजपुरी से जुड़ल किताब, पत्रिका के कीने, पढे आ लिखे के संख्या बढी आ बेहतर होई ।
अब ओह दुसरका पंक्ति के कहे के माने बुझीं -
" भोजपुरी के सस्ता मत बनाईं सभे, कविता से गद्य के जादे जरुरत बा । "
भोजपुरी भाषा में काव्य रचना (लिखित गीत भा कविता) लगभग हजार साल से बेसी बा । भोजपुरी के क्रिया पद के कहीं लिखाइल होखे के चर्चा सातवा शताब्दी ले जाला । यानि कि भोजपुरी में काव्य रचना बहुत पहिले से बा । गद्य भले संवाद में होखे बाकिर साहित्य में गद्य (भोजपुरी में) लगभग 700-800 के करीब आइल जब भोजपुरी के लोकगाथा के संकलन होखे लागल । भोजपुरी में प्रकाशित जदि पहिला किताब के बात होखे त उ नाटक ह जवन गद्य साहित्य से जुड़ल बा । बाकिर एह मय के बादो, इ मानल गइल बा कि गद्य में कवनो भाषा निखर के आवेले ओह भाषा के आकार, विचार आ गहिराई बढेला । गद्य लिखे के अउरी कारण हो सकेला, जइसे भोजपुरी में काव्य भा कविता भा गीत के तुलना में गद्य के संख्या कम बा ।
त एहि से पत्रिका के संपादक जी गद्य बेसी लिखे के कहत बानी आ दोसर का होला कि गद्य लेखन से लिखे वाला के भाषा में सुधार होला । त लिखे वाला के भाषा सुधार आ भोजपुरी में बेहतर गद्य लेखन के बढोत्तरी, एह पंक्ति के मूल सार बा ।
हम जब एह बात के लिखत बानी त एगो पाठक के नाते लिखत बानी । हम भोजपुरी के अधिकतर किताब कीन के पढेनी ! हमरा लगे भोजपुरी के कीन के धइल किताबिन के संख्या 200 के करीब के बा । हम साल भर में भोजपुरी के लगभग 20-25 गो किताब कीनेनी । एह में नया प्रकाशित आ पुरान किताब, दुनो शामिल बाड़ी स । खास बात कि हम किताबिन के खाली कीनबे ना करेनी, बलुक ओकनी के पढबो करेनी । हम अधिकतर भोजपुरी में गद्य लेखन से जुड़ल किताबिन के पढे के कोशिश करेनी । कविता-गीत संग्रह जदि बेजोड़ रही, आ ओह किताबिन के जदि बहुत चर्चा होला तबे कीन के पढेनी । काहें कि भोजपुरी कविता-गीत संग्रह में हिंदी के लमड़ाई के टेढ क के भोजपुरी में लोग छाप देला।
बाकिर गद्य लेखन से जुड़ल किताबिन के हम आंखि बन क के कीन के पढेनी । एहि से इ कुल्ह बात लिखत बानी ।
असल में भोजपुरी में लिखे वाला अधिकतर लेखक, हिंदी से प्रभावित बाड़े आ ढेर जाना हिंदिये के वाक्य शब्द के लमड़ाई के भोजपुरियावे के कोशिश क रहल बाड़े । चुकि साहित्यकार बने के बा एह से इ लो ना भोजपुरी के जरुरी किताबिन के पढत बा, ना एह लो के भोजपुरी में पहिले लिखा चुकल साहित्य के पढे के शवख बा । वायरल के बेमारी के नाव प आपन जरि के अबर-दुबर करत इ लो बस चलताउ लमड़ावल घींचल गीत-कविता लिख के लेखक बन रहल बा ।
करे के कुछ नइखे, लिखीं जइसे लिखत बानी, बाकिर कम से कम भोजपुरी के पुरान कुछ किताबिन के रउवा एगो तय सीमा बना लिहीं कि हमरा एह महीना में एह किताब भा पत्रिका के पढे के बा । कोशिश करीं कि आज से 20-25 साल पहिले भा ओह से पहिले के प्रकाशित किताब भा पत्रिका होखे । एह किताब पत्रिका स्बह के पढब त रउरा आइडिया लागी कि कइसे आ का करे के बा ।
कुछ ना त एह 'भोजपुरी' पत्रिका के अंक के पढीं जवन भोजपुरी साहित्यांगन प लागल बड़ुवे । एह पत्रिका के मय अंक पढ जाइब त राउर लेखन शैली निखर जाई ।
बस अतने कहे के रहल ह !
सुनले बानी नू - अकुताई के बिआह कनपटी प सेनूर !
अइसे त लोग कनपटी प सेनूर लगा रहल बा, बाकिर तबो, एह लोकोक्ति के ध्यान में राखि के इहे बुझीं कि बिना पढले जनले बुझले साहित्यकार त रउवा बन जाइब बाकिर गहिराह, लाम-चाकर आ सबसे बड़ बेहतर आ मन के संतोष देबे वाला, पाठक के हरिअर कंचन बनावे वाला साहित्यकार बने खातिर, रउवा भोजपुरी के किताबिन के पत्रिका आदि के पढे के पड़ी ।
- नबीन कुमार
मन के झँवात आग दरदिया के खोर के ।
के चलि गइल अचके में करेजा खखोर के ॥
पानी सुखा चलल रहे अँखियन का कोर के ।
भरि गइल के बरसात बिना ओर-छोर के ॥
हथजोरी के ओकरा से बढ़ल अब के कदरदान ।
मुँह फेरि छोड़ि गइल जे बहियाँ ममोर के ॥
मत खोली मन के भेद चाहे लाख दिल मिले ।
दुनियाँ ह समझदार बहुत मन के चोर के ॥
कहि जाईं हाल राह में मिल जाय जबे यार ।
अइसन अबूझ के ह जे बइठी अगोर के ॥
- जगन्नाथ जी
रामजियावन दास 'बावला' : जयंती प विशेष
जयंती - 1 जून 1922
पुण्यतिथि - 1 मई 2012
भोजपुरी भाषा आ साहित्य के अदभुत रचनाकार, भोजपुरी काव्य साहित्य में अमर योगदान करे वाला, भोजपुरी के तुलसीदास रामजियावन दास ' बावला' जी के जयंती प आखर परिवार बेर बेर नमन क रहल बा।
बावला जी के जनम 1 जून 1922 के बनारस स्टेट के चकिया जिला के भीखमपुर गाँव में लोहार परिवार में भइल रहे । बाबुजी श्री रामदेव जी जातीय व्यवसाय के माध्यम से अपना 4 गो बेटा आ दू गो बेटी के पालन पोषण करत रहनी । बावला जी के माई के नाव सुदेश्वरी देवी रहे । खेत के एगो छोटहन टुकी में उपजे वाला अनाज से घर परिवार के जीवन बसर होत रहे ।
पढाई लिखाई के कुछ व्यवस्था ना रहला के वजह से पढाई खातिर ना गइनी आ बावला जी शुरुवे से जातीय व्यवसाय में लाग गइनी । बाकिर लोहा पीटल बावला जी के कबो जमल ना । 16 बरिस के उमिर में बावला जी , झलिया बाजार के निवासी श्री चुन्नीलाल जी के सुपुत्री मनराजी देवी से बिआह हो गइल । बिहाह के बाद गाई-भइंस चरावे के धंधा बावला जी शुरु कइनी आ इ काम अंत समय ले चलल । गाई-भइंस चरावे के दौरान ही बावला जी के रचना के संसार शुरु भइल । कुसुंभर, रमरैया, मुरलिया, डुगडुगवा पहाड़ियन प जाये के मोका मिलल , रामचरित मानस के पढे के जाने के मिलल । राजदरी के लगे धुसुरिया के कोलभील आ मुसहरन संगे समय बितावे के मोका मिलल । बावला जी कल्पनालोक में भगवान राम , लक्ष्मण, आ देवी सीता के आगमन भइल आ रचना लोग के शुरुवात भइल ।
एक हाली जब रचना सिरजना के शुरुवात भइल त फेरु बावला जी के कलम रुकल ना । गांव, समाज, देस के समस्या के संगे संगे देवी-देवता में आस्था के प्रभाव के रुप में भजन आदि सिरजना शुरु हो गइल । 1958 के आवत आवत , राम जियावन दास बावला जी कवि के रुप में प्रतिष्ठित होखे लागल रहनी आ एहि समय में इहाँ के आकासवाणी प काव्यपाठ करे के मोका मिलल । एह के बाद रामजियावन दास बावला के नाव आ इहां रचना संसार से भोजपुरी भाषा साहित्य में उत्तरोत्तर बढोत्तरी होखे लागल आ बावला जी भोजपुरी आ पुरब के क्षेत्र में हिन्दी कविता पाठ के मंच प आवे लगनी आ इहां के नाव सगरे फइले पसरे लागल । विद्यानिवास मिश्र आ पाण्डेय कपिल जी कहला समझवला के बाद इहां के किताब 'गीतलोक' प्रकाशित भइल । साहित्यकार लो रामजियावन दास 'बाव;आ' के कृतियन के देख के इहां के ' भोजपुरी के तुलसीदास' भी कहेला ।
भोजपुरी के तुलसीदास, गांव, परिवार, समाज आ देस के अपना रचना के आधार बनावे वाला, भोजपुरी में भगवान राम आ मानस के एगो नया आकार देबे वाला अदभुत रचनाकार 1 मई 2012 के एह लोक से अंतिम यात्रा प निकल गइनी ।
आखर परिवार अपना एह महान रचनाकार के जयंती प बेर बेर नमन क रहल बा
सतीश प्रसाद सिन्हा : जयंती विशेष
जन्मतिथि - 1 जून, 1938
पुण्यतिथि - 14 अप्रैल 2021
भोजपुरी भाषा आ साहित्य में श्रेष्ठ गजल, गीत-कविता, नाटक आ कथा-कहानी के माध्यम से निरंतर सेवा करे वाला भोजपुरी आ हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार सतीश प्रसाद सिन्हा जी के जयंती प आखर परिवार बेर बेर नमन क रहल बा।
सतीश प्रसाद सिन्हा जी के जन्म, 1 जून 1938 के आरा (भोजपुर) में भइल रहे । पटना विश्वविद्यालय से राजनिति विज्ञान में उच्च शिक्षा ग्रहण कइनी । पटना उच्च न्यायालय में सचिव के पद से इहां के रिटायर हो के पटना में रहत रहनी । 1954-55 से हिंदी आ भोजपुरी में नाटक, कहानी, काव्य (गीत-गजल), लघुकथा, व्यंग्या आ समीक्षा खातिर लेखनी अंतिम समय ले चलत रहे ।
इहां के लिखल किताब ' मन के अँगना में ' के भोजपुरी साहित्यांगन प पढ सकेनी ।
सतीश प्रसाद सिन्हा जी के लिखल कुछ रचना -
1-
जिन्दगी मे हम लुटाइल जात बानी
गाय बनि के हम दुहाइल जात बानी ।
हम त रहलीँ हs पुजारी रोशनी के
अब दिया होके बुताइल जात बानी ।
दर्द मे भी प्यार के बा रंग उनुकर
रंग मे उनुके रँगाइल जात बानी ।
धार हs ई वक्त के, ना रुक सकेला
पात जइसन हम दहाइल जात बानी ।
हो गइल बा शाम जिनिगी के, मगर हम
मोह मेँ आजो बन्हाइल जात बानी ।
2-
बीत गइल साल
मगर उहे बा हाल
लोग बाग पीयर
आ नेता जी लाल
ऊहे बा हाल !
नया-नया प्लान बा
कागज के शान बा
रोटी मोहाल बा
पेटवा वीरान बा
लोग गइल ताखा पर
भइलन बेहाल
ऊहे बा हाल !
जनहित के शोर बा
सत्ता के होड़ बा
थाना आ जेल बा
बचवन के खेल बा
कागज का नक्शा पर
भारत खुशहाल
ऊहे बा हाल !
दानवी दहेज बा
लेन-देन तेज बा
दुल्हन के मौत बा
सास बनल सौत बा
सुन्दर कानूनन के
अच्छा मिसाल
ऊहे बा हाल !
खिचड़ी सरकार बा
संसद में मार बा
गाली-गलौज बा
पार्टी में मौज बा
चमचन के टोली के
गोटी बा लाल
ऊहे बा हाल !
वोट बेयपार बा
सत्ता -बाजार बा
मनवा विदेशी बा
देखीं त देशी बा
हिन्दी के ढोलक पर
अंग्रेजी ताल
ऊहे बा हाल !
रेल-दुर्घटना बा
बेमौत मरना बा
हतिया बा, लूट बा
शासन में छूट बा
घर में आ बाहर में
सगरो भूचाल
ऊहे बा हाल !
वादा बरसात बा
मीठ-मीठ बात बा
चउमुखी विकास के
जात-पात हाथ बा
नारन के जाल बिछल
हाथ में मशाल
ऊहे बा हाल !
हारल ईमान बा
जीतल बइमान बा
जबरन के जीत बा
अबरा भयभीत बा
जगह-जगह दुर्योद्धन
भइल बा बहाल
ऊहे बा हाल !
3-
ना जिये दी, ना मरे दी, याद हमरा के
दम कबो नाहीं धरे दी, याद हमरा के
दिल घवाहिल हो गइल बा चोट खा-खा के
घाव दिल के ना भरे दी याद हमरा के
भुक-भुका के जरि रहल बा प्रान के बाती
ना बुते दी, ना बरे दी याद हमरा के
नाव जिनिगी का किनारा आ रहल बाटे
पार बाकिर ना करे दी याद हमरा के
का करी अब बूढ तन के पेड़ ई रह के
ना फरे दी, ना झरे दी याद हमरा के
दोष हमरे बा कि कइलीं याद से यारी
बेवफाई ना करे दी याद हमरा के
4-
आदमी से आदमी अब डर रहल बा
जानवर से दोस्ती अब कर रहल बा
सिर्फ शक करके पड़ोसी का नियत पर
खूब ऊ हथियार से घर भर रहल बा
फैसला ऊहे इहाँ अब दे रहल बा
कत्ल के धंधा इहाँ जे कर रहल बा
रात के दिन हम कबो नाहीँ कहीला
ई शिकायत आजु ले उनुकर रहल बा
का सुनी ऊ देश-सेवा के कहानी
भूख से जब पेट ओकर जर रहल बा
का भरोसा आजु के अब जिन्दगी के
मौत के जे नित निशाना पर रहल बा
5-
अब पीर लिखीं
बहुत लिखाइल गीत प्यार के
जन-मन के अब् पीर लिखीं ।
कुछ आम लिखी,कुछ ख़ास लिखीं
कुछ थाकल मन के आस लिखीं
माटी में अंटकल अझुराइल
बचवन के तक़दीर लिखीं ।
तन-हरन लिखीं,अपहरण लिखीं
कुछ भूख-पियास के जलन लिखीं
बोझ उठावत सिर पर भारी
निर्धन के तक़दीर लिखीं।
द्रुपद-सुता के कथा बिसारीं
अब लिखीं बुधिया दुखियारी।
तन की लाज बचावत ओकर
फाटल गुदरी चीर लिखीं ।
कुछ राम लिखीं ,रहमान लिखीं
कुछ हैं वानी पहचान लिखीं ।
जाति-धर्म के ठेकादारी
सत्ता के जागीर लिखीं ।
बहुत लिखाइल गीत प्यार के
जन-मन के अब पीर लिखीं ।
6-
मरियल के का मारब जी
सूखल के का गारब जी
अपने से जब बाज़ी बा
का जीतब का हारब जी
लालच के लुकवारी से
कब ले घर के जारब जी
महंगाई के आन्ही में
कइ से दीया बारब जी
छल के तोपा ढाँपी में
कतना गेरुआ धारब जी
नौवे में जब छेदा बा
कइसे पार उतारब जी
अपना करिया करनी से
कबले पल्ला झारब जी
आखर परिवार अपना महान साहित्यकार के जयंती प बेर बेर नमन क रहल बा ।
भोजपुरी में गद्य-लेखन के बढावा देबे खातिर : भोजपुरी गद्य लेखन 2:0
आखर के ओर से साल 2013 में "भोजपुरी भाषा में गद्य लेखन" नाव से एगो प्रयास भइल रहे जवना में भोजपुरी भाषा में कथा – कहानी, निबंध आ अलग अलग बहुत लेख लिखे खातिर ढेर लोग जुटल आ लिखबो कइल । बहुत लोग पहिला बेर भोजपुरी लिखे के शुरुआत 2013 में कइले रहे ।
कवनो भाषा के विकास में ओह भाषा में लिखाए वाला गद्य के चिन्हासी ठीक ओसहीं होला जइसे आदमी के देहिं में रीढ के हड्डी के होला । मुड़ी से ले के गोड़ तक के जुड़ाव रहेला आ संवसे देहिं के सही आकार आ तरिका से राखे में जइसे रीढ के हाड़ आपन भुमिका निभावे / निबाहे ला ओहिंग, कवनो भाषा खातिर गद्य के महत्व ह ।
गद्य लेखन से, लिखाए वाला भाषा के बल मिलेला, ज्ञान आ शिक्षा के राहि ओह भाषा में खुलेला, ओह भाषा में नया-नया शब्दन के रचाए आ गढाए भा आवग के संभावना बेसी रहेला । गद्य लेखन से ओह भाषा, भाषा वाला समाज के इतिहास आ संस्कृति सुरक्षित रहेले, नया-नया विचार आ तार्कीक बात-बतकही के आधार गद्य लेखन से मिलेला आ ओह भाषा के साहित्य के विस्तार होला ।
एहि कुल्हि के ध्यान में राखत, आखर फेरु से " भोजपुरी में गद्य" लिखे खातिर रउरा सभ से निहोरा क रहल बड़ुवे । असल में " भोजपुरी में गद्य लेखन" के माध्यम से हमनी के मिलि - जुलि के कुछ बेहतर क सकेनी जा अपना भाषा भोजपुरी खातिर, आ एहि से इ निहोरा बा ।
एह खातिर कुछ साधारण बाकिर जरुरी नियम / कानून बनल बा जवना से रउवा सभ के लिखे आ आपन लेख के भेजे में सुविधा रही ।
त कुछ जरुरी बात ध्यान रहे :
क) रउरा का करे के बा ?
1- लेख राउर लिखल होखे, यानि कि मौलिक होखे, AI के भा केहू अउरी के लिखलका के कॉपी पेस्ट ना होखे । कॉपी पेस्ट लेख भा AI के लिखल लेख जदि रहल त लेख आ लिखे वाला के फेरु कबो मोका ना मिली ।
2- भाषा भोजपुरी होखे के चाहीं । भोजपुरी के कवनो रुप (पछिमाहा, आदर्श, मधेसी आदि इत्यादि) में लेख हो सकेला। बाकिर लेख के भाषा भोजपुरी होखे के चाहीं।
3- लेख में असंसदीय शब्दन के प्रयोग ना होखे । फुहर-पातर ना होखे, गारी-गलौज ना होखे, धार्मिक, जातिवाद, क्षेत्रवाद के बढावा ना देत होखे ।
4- लेख में शब्दन के संख्या कम से कम 1000 होखे के चाहीं बाकिर 2000 से बेसी ना होखे के चाहीं ।
5- लेख के संगे संगे राउर आपन फोटो होखे के चाहीं जवना के प्रयोग पोस्टर आदि खातिर कइल जाई आ 50-100 शब्दन में राउर परिचय होखे के चाहीं ।
6- लेख अप्रकाशित होखे के चाहीं, यानि कि आखर के भेजे से पहिले राउर लेख कतहूँ प्रकाशित ना भइल होखे ।
7- फॉन्ट के साइज 10-12 के बीच में होखे के चाहीं आ फॉन्ट अइसन रहे कि ओह के फेसबुक / ट्वीटर (एक्स) प लगावल जा सके ।
8- वर्ड (word) फाइल में लेख के भेजी, ईमेल से लेख के अटैच क के भेजी, आखर के फेसबुक इनबाक्स में लेख भेज सकेनी । आखर के ईमेल आईडी ह - [email protected]
9- गद्य लेखन में, कथा, कहनी/कहानी, निबंध, आलोचना, समालोचना, लेख, संस्मरण, रिपोर्ट / रिपोर्ताज, भुमिका, समीक्षा, इतिहास, जीवनी आदि लिखा सकेला ।
10- एगो लेखक के एक हफ्ता में ढेर से ढेर दू गो लेख लाग सकेला।
ख) आखर का करी ?
1- राउर लेख, आखर के फेसबुक / ट्वीटर (एक्स) प राउर फोटो के संगे लागी ।
2- रउरा लेख के मुल्यांकन - विषय के समझ, प्रस्तुति, भाषा शैली, भाषाई समझ, लोकोक्ति मुहावरा के प्रयोग, लेखन शैली, विचार के गहिराई, लेख आ बात के परोसे वाला भाव आ ओकर गहराई जइसन चीजन के ध्यान में राखि के कइल जाई आ संगे संगे, ओह लेख प आइल पाठक लोगन के प्रतिक्रिया, शेअर कमेंट आदि के ध्यान में राखि के कइल जाई ।
3- जदि निकहा आ सैगर लेख भेटा जाई त आखर के ओर से एह कुल्ह चयनित लेख के किताब के आकार दिहल जाई आ किताब के प्रिंट वर्जन प्रकाशित कइल जाई । माने किताब ले आवल जाई ।
4- जवना-जवना लेख के चयन कइल जाई, ओह लेख के लिखे वाला लेखक लोगन के आखर के ओर से कुछ उपहार भेजल जाई जवना में भोजपुरी में लिखाइल कुछ खास किताब जरुर रही ।
ग) एह से का होई ?
1- रउरा सभ के लिखल देख, अउरी लोग, नवहा लोग आ नया नया लोग भोजपुरी में लिखे खातिर जुड़ी ।
2- भोजपुरी भाषा आ साहित्य के नेव अउरी बरिआर होई आ भोजपुरी भाषा साहित्य के अउरी परचार होई ।
3- अलग अलग लेख आ लेख के माध्यम से जानकारी, भोजपुरी भाषा के ले के एगो नया आ बेहतर माहौल / वातावरण के आकार दिही ।
4- भोजपुरी भाषा आ साहित्य में श्री-वृद्धि होई ।
रउवा सभ के लेख के इंतजार में बानी जा आ जदि एह से जुडल कुछ शंका-सुबहा होखे त आखर के ईमेल करीं आखर के फेसबुक भा ट्वीटर (एक्स) के इनबाक्स में लिखीं ।
राउर आपन
आखर परिवार !
नोट- इ कुछ साधारण नियम कानून बा, बाकिर एह नियमन में कुछ बदले जोडे घटावे हटावे के अधिकार आखर के जरी बा । ध्यान दिहीं, भोजपुरी भाषा आ साहित्य खातिर नीमन से नीमन लिखल बढिमा गद्य लिखल जरुरी बा हमनी के सब केहू के फोकस एहि प होखे के चाहीं ।
भरमतुनि के परम्परा वाला ग्रामीण कलाकार आ जेसी माथुर
जेसी माथुर जी के लेख " भरतमुनि की परम्परा में ग्रामीण कलाकार : भिखारी ठाकुर" हम बहुत पहिले पढले रहनी आ हमरा इहो मालूम रहे कि इ लेख, जेसी माथुर जी के किताब " जिन्होने जीना जाना " किताब में प्रकाशित भइल रहे ।
कुछ दिन पहिले इ किताब, हमरा एगो मित्र के लगे चहुंपल त हमार मित्र, कभर फोटो के संगे संगे एह लेख के हर पन्ना के फोटो घींच के भेजले । 1971 में राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित एह किताब में कुल 12 गो लेख बा । जवना में 2 गो राजनेता, 7 गो साहित्यकार , एक विचारक आ दू गो कलाकार प आधारित बा । कलाकार में भिखारी ठाकुर आ अपना समय के सुप्रसिद्ध अभिनेत्री देविका रानी प लेख बा ।
जेसी माथुर जी के एह बारहो लेख के नाव के चयन आ लेख के बारे में शुरुवाती बात एहि किताब के एगो पाना प लिखल बा ।
अब जब पिछला कुछ साल से भिखारी ठाकुर के ले के अलग अलग क्लेम / दावा अलग अलग लोगन के बा, त अइसना समय में बिहार के एगो बहुत बड़ अधिकारी, जे भिखारी ठाकुर के समय में बिहार शिक्षा आ कला संस्कृति के बहुत बड़ पद प रहले, आ बिहार के ना रहले, भोजपुरिया ना रहले, एह से उनुकर बात पढल जरुरी बा ।
जाहिर बा इ किताब अपना समय के सबसे चर्चित प्रकाशन से प्रकाशित रहे आ इ किताबियो बड़ा चर्चित रहे । 1954 से ले के आ भिखारी ठाकुर के निधन से पहिले तक, भिखारी ठाकुर से ऑफिस में मुलाकात, 1954 में पहिलका प्रस्तुति आ फेरु एह के बाद अउरी क गो मंचन के देखला के बाद जेसी माथुर जी एह 7-8 पन्ना के लेख के लिखले बानी ।
रउवा सभ के जानकारी खातिर बता दिहीं कि एह लेख / किताब के प्रकाशित होखे से पहिले, भिखारी ठाकुर प एगो किताब आ चुकल रहे जवना के लिखले रहनी "महेश्वर प्रसाद यानि महेश्वराचार्य जी" आ इहां के भिखारी ठाकुर प पहिला लेख 1934 में लिखले रहनी ।
चुकि एह लेख के हम एक हाली फेरु से पढि के खतम कइनी ह त सोचनी ह एह कुल्ह जानकारी के एक हाली फेरु से तनि अलग तरिका से रउवा सभ के सोझा राख दिहीं । काहें कि भिखारी ठाकुर के 8-10 गो गीत गा के भा एकाध दू गो नाटकन के मंचन क के लोगन के दिमाग में इ बात आ जाता कि उहे भिखारी ठाकुर के जानत बा आ ओकरे वजह से लोग भिखारी ठाकुर के जाने लागल बा।
इ चीज ओह व्यक्ति के ना बलुक हमनी के कमी के देखावत बा काहें कि हमनी के अपना नायकन के ना जाने के कोशिश कइनी जा आ ना कोशिश करत बानी जा । एकाध गो गीतन के पसन क के ओहि प आहि - वाह क के हमनी के " be Solid " हो जात बानी जबकि जानकारी सीखे बुझे के सबसे जरुरी state ह " be liquid" जवना से रउवा भीतरी आकार लेबे सीखे बुझे जाने के अवसर रही ।
हमरा से अक्सर लोग पुछे ला कि भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व आ कृतित्व के बारे में जाने खातिर जरुरी किताब कवन - कवन बाड़ी स त हम कहब कि -
भिखारी ठाकुर ग्रंथावली - भोजपुरी साहित्यांगन प मिल जाई, भिखारी ठाकुर आश्रम वाल अलो के पहल ह ।
भिखारी ठाकुर रचनावली - बिहार राष्ट्रभाषा परिषद
जनकवि भिखारी ठाकुर - महेश्वराचार्य
भिखारी - महेश्वराचार्य
तैयब हुसैन पिड़ीत जी के किताब (इहां के भिखारी ठाकुर प शोध वाली किताब, भोजपुरी भाषा में प्रकाशित दू गो किताब आ राजकमल से प्रकाशित अनगढ हीरा वाली किताब)
एह किताबिन के पढि के रउवा सभ भिखारी ठाकुर जी के व्यक्तित्व आ कृतित्व प ठोस राय बनावे के स्थिति में आ सकेनी ।
संजीव के सुत्रधार चुकि उपन्यास ह ड्रामेटिक बा त उ फैक्ट से भरल नइखे, बाकिर ड्रामेटिक अंदाज में बढिया लिखाइल बिआ, आ इ किताब रउवा के भिखारी ठाकुर के अउरी जरी ले, ले के जाई ।
बाकिर हं, इ कुल्ह खातिर रउवा पढे के परी, अकिल लगावे के परी, बुझे आ गुने के परी । खाली कान में सुना के मुह से आहि-आहि कहि के काम ना फरिआई ।
बाकि के रउवा बुझीं ।
- नबीन कुमार
देहिया धइले ना जानीं कि का केकर गति होई
- देवेंद्र नाथ तिवारी
जनार्दन पांडे ‘अनुरागी’ जी के नाम नयकी पीढ़ी ना सुनले होई। पुरनकी पीढ़ी भी उनका साथे न्याय नइखे कइले। साहित्य इतिहास के कवनो किताब में अनुरागी बाबा के जिकिर फुट नोट में भी ना मिली। इंटरनेट के दुनिया में उनकर कवनो तस्वीर नइखे। बस एगो रचना मिली, ‘रमराजी फूआ।’ आजु गैरखेमाबाज कवियन (अनुरागी जी के संदर्भ में अनचिन्हार शब्द उपयुक्त होई) के शृंखला के 17वीं कड़ी में ‘अनुरागी’ जी पऽ बात होई। पहिले तनिका उनका बारे में जान-बुझ लिहल जावऽ। अनुरागी जी के जनम देवरिया जिला के एगो गाँव—बलिया में भइल रहे। पारिवारिक-आर्थिक स्थिति अत्यन्त साधारण। इनके बपसी (पिता) के नाम पण्डित शिव वचन पाण्डेय रहे। परिवार संयुक्त। 1952-53 में इहाँ के बरहज के श्री कृष्ण इण्टरमीडिएट कालेज में विद्यार्थी रहनी। मोती बीए जी, एहिजे शिक्षक रहनी। उहें के क्लास रहे। अंग्रेजी के। कक्षा में अनुवाद के अभ्यास में सब विद्यार्थी लोग जुटल रहे। अनुवाद के बाद कापी जांचे खातिर मोती जी के लगे पहुँचल। अनुरागी जी के कापी मोती बीए जी देखत रहनी। फाटल-पुरान कापी। पीछे एगो कविता लिखल रहे— 'मेरी इस जीवन नइया को पार करो मोती बी० ए०..' मोती जी इ देख के हैरान। कविता में सहज प्रवाह । सरस अभिव्यक्ति आ सरल अभिव्यञ्जना। उहाँ के कहनी, 'कविता करोगे तो पढ़ोगे क्या? पहले कुछ पढ़ लिख लो फिर बाद में कविता करना...'
बाकिर समय के फेर देखीं। अनुरागी जी के मन पढ़ाई में कम, कविता में ज्यादा लागे। मोती जी अपना एगो संस्मरण में लिखले बानी कि इण्टरमीडियेट परीक्षा कवनो तरे उत्तीर्ण करे के बादे अनुरागी जी के आगे पढ़े के कवनो सवाल ना रहे। सन् 1954 में इंटर पास करके अनुरागी जी, बेकारी के जीनगी अपना लिहली। अनेरे एने-ओने घूमे-भटके लगले। मलीन धोती कुरता। कबो-कबो गमछा भी गले में लटकत रहे। पैर में चप्पल तब सौभाग्य के बात रहे। बिना चप्पल के ही उ मोती जी से मिले बरहज आवें। आपन कविता देखावें। ठीक करावें। शादी-बियाह हो गइल रहे। गिरहस्थी भी रहे। बाकिर मय जिम्मेदारी अनुरागी जी के धर्मपत्नी पऽ रहे। उ कुछ समय बाद गेरुआ बाना धारण कर लिहलें। पूरा जीवन संघर्ष में ही बीतल।
साधु होखे से करीब दस बरिस पहिले अनुरागी जी ‘रमराजी फूआ’ लिखलें।, ‘रमराजी’, जनार्दन पांडे ‘अनुरागी’ के रचना हऽ। प्रतिनिधि कविता। इ भोजपुरी रचना संसार के अनमोल मोती जस चमकत बा। इ कविता आपन कथ्य के गहराई से मन मोहत बा। एकर बनावट, बुनावट, भाव आ जीवन के ओर देखे वाली नजर भी खास बा। करुणा आ संवेदना एकरे मूल में बा। इ कविता के समझे-बुझे बदे महीन विश्लेषण भा विवेचना होखे के चाहीं। ताकि रचना के भीतरी आ बाहरी पहलू खुल के आवे। एह कविता के यथार्थ अनुभव के परखीं। एकर परिवेश के, जीवन के बड़हन संदर्भ में राख के देखीं। एकरे पीछे छिपल मानवीय दर्द, संवेदना, सामाजिक-पारिवारिक ढांचा आ सांस्कृतिक मूल्य के बारीक धागा के भी पकड़ल जरूरी बा। जवन एह कविता के कालजयी बनावत बा। फिलहाल रचना के देखीं—
‘अनुरागी के देखि बिरागी काहे दुनिया रोई
देहिया धइले ना जानीं कि का केकर गति होई
हमरे घर के पीछे रहली ह बुढ़िया रमराजी
जिनिगी भर विधवापन खेयली खइली सतुआ-भाजी
जनमे उनके बपसी मरलें गवना होते माई
सेजिया चढ़ते पिया गुजरलें एइसन करम कमाई
ससुरे उनुका कोइला बरिसल नइहर भरल अन्हरिया
बोझा भइल जवानी दिन-दिन बैरिन भइल उमिरिया
सोना जेकर खाक हो गइल हीरा हो गइल माटी
ऊ कइसे डोली दुनिया में कइसे जिनिगी काटी
रमराजी नइहर में आके कइलिन दर-दर फेरा
जेकर टुकड़ा खइली ओ दिन ओही के घर डेरा
ईंटा उनके रहल सिर्हानी गुदरा भइल रजाई
माथे पर सेवार छितराइल आँखिन गंगा माई
राखी में आगी के अइसन लुगरी में सुघराई
देखि-देखि के फटल करेजा केतना ईं दुख गाईं
जवने रात के चान हेराइल ओकर कवन अँजोरिया
जवने नदिया सूखल पानी ओकर कवन लहरिया
जिनिगी जेकर रेत हो गइल ओकर कइसन धारा
ओकर कइसन उद्गम-संगम ओकर कवन किनारा
रमराजी कवने अरार पर सुधि के दियना बारें
केकरे खातिर हँसि-हँसि आपन मातल रूप सँवारें
केकर रहिया जोहि-जोहि के सँझिया रोज बोलावें
केसे मन के बतिया कहि-कहि रतिया के भरमावें
होत बिहाने हाथ जोर के केकर सगुन मनावें
मुँह पर जोति जगावे खातिर केके रोज जगावें
कोंढ़ी जवन किरिन ना देखलस ओकर कवन कहानी
बेइल जवन अलम ना धइलस ओकर कवन जवानी
असन अधमारल जिनिगी पर के ना आँसु बहाई
केकर कठिन करेजा जे रमराजी के दुख गाई
दुनिया अपने रंग में मातल आपन साज सँवारे
रमराजी मुँह में अँचरा दे हरदम सुसुकी मारें
हाय गोसइँया! दुख का जनलऽ, कइलऽ तू मनमानी
रमराजी के आगी दिहलऽ अवरू सबके पानी
जेकर साज बिगड़बऽ ऊहे दर-दर ठोकर खाई
अपनी मुँअले छाती पर ऊहे कोदो दरवाई
रमराजी के सखी सहेलरि हँसि-हँसि ताना मारें
माई-बहिनी टुकड़ा दें त झइहावें दुतकारें
केहू कहे पिसाचिन अबहीं केके-केके खाई
केहू कहे अभागिन अबसे हमरे घर जनि आई
दइबे के जे जारल जिनिगी, दुनिया नून लगावे
ओकर के दाही दुनिया में जेके राम सतावें
दहकल जिनिगी रमराजी के, के ना खाक रमाई
रमराजी के मरजादा पर के ना माथ नवाई
अनुरागी के देख बिरागी काहे दुनिया रोई
देहिया धइले ना जानी कि, केकर का गति होई’
‘रमराजी’ के कहानी एक अइसन औरत के बा, जेकर जिनिगी मुसमात (बेवा) के दुख से शुरू होला। दर-दर के ठोकर खात-खात खतम। अनुरागी जी के एह रचना के केंद्र में ‘रमराजी फूआ’ बाड़ी। गाँव के विधवा औरत। जे आपन दुख के गीत बना लिहले बाड़ी। बाकिर इ गीत खाली कारुणिक नइखे। पूरहर जीवन-दर्शन के प्रतीक बा। रमराजी फूआ के चरित्र आ व्यक्तित्व गाँव के संस्कार के आधार बा। परिवार के जोड़त बा। सामाजिक मेलजोल के मजबूत करऽता। कविता के पहिलका पंक्ति के ही देखीं—
‘अनुरागी के देखि बिरागी काहे दुनिया रोई,
देहिया धइले ना जानीं कि का केकर गति होई’
एहिजा एगो गहिराह सवाल उठऽता। इ सवाल खाली रमराजी के जिनिगी तक सीमित नइखे। मय मानव-जाति के नियति-चक्र के ओर इशारा करऽता। एहिजा अनुरागी जी बहुते सहजता से जिनिगी के अनिश्चितता के उकेरले बाड़न। आपन धर्मपत्नी के हाथ में नाव खेवे के लग्गी, देत अनुरागी पर का गुजरल होई एकर मर्म इ दूनो पंक्ति बता सकेले। ‘रमराजी फूआ' कविता के अनुरागी जी खुदे एह तरे आत्मसात कर लिहले रहनी कि उनकर पूरा जीवन विपन्नता, अभाव, सन्ताप के जिनिगी हो गइल। अनुरागी, वैरागी होके ही एह संसार से विदा लिहलें।
रमराजी के जिनिगी अपने आप में दुखद कहानी बा। त्रासदी से भरल। अब एही पंक्ति के देखीं—
‘हमरे घर के पीछे रहली ह बुढ़िया रमराजी,
जिनिगी भर बेवापन खेयली खइली सतुआ-भाजी’
एह लाइन में रमराजी फूआ के गरीबी, अकेलापन के चित्रण भा वर्णन बा। ‘सतुआ-भाजी’ उनका सामाजिक-आर्थिक स्थिति आ जीवन संघर्ष के बारे में बतावऽता। रमराजी के जिनिगी के परिभाषित करऽता। कवि आगे कहत बाड़न—
‘जनमे उनके बपसी मरलें गवना होते माई,
सेजिया चढ़ते पिया गुजरलें एइसन करम कमाई’
एहिजा नियति के क्रूरता पूरजोर तरीका से सोझा आवऽता। इ चित्रण खाली निजी नइखे, बलुक सामाजिक भी बा। गँवई समाज में बेवा के जिनिगी कतना सख्त आ उपेक्षित होला, इ रमराजी के जरिए महसूसल जा सकऽता। उनकर जीनव-संघर्ष साफ-साफ एही पंक्ति के माध्यम से दिखऽता। अनुरागी जी, इहाँ कवनो मेहरारु के ओही चिरकालिक दुख के उजागर कइले बाड़न, जे सामाजिक व्यवस्था के देन बा। इहाँ सवाल उठत बा कि का रमराजी के दुख खाली ओकर बा भा ऊ समाज के दुख भी बा, जवन उनका के दर-दर भटकावे बदे मजबूर करऽता?
अनुरागी जी के एह रचना के बनावट ओकर एकर दोसर खासियत बा। भोजपुरी लोक-धारा में रचल-बसल इ रचना अपने बहाव में सहज बा। बाकिर एह सहजता में भी एगो गहिर काव्य-चेतना छिपल बा। अब एही लाइन के तनिका देखीं—
‘सोना जेकर खाक हो गइल हीरा हो गइल माटी,
ऊ कइसे डोली दुनिया में कइसे जिनिगी काटी’
इहवाँ जवन बिम्ब इस्तेमाल भइल बा, ऊ बहुते प्रभावशाली बा। सोना के खाक हो गइल आ हीरा के माटी में बदल गइल महज रमराजी के जिनिगी के बयान भर नइखे, इ बतावऽता कि उनका जिनिगी में कवनो अलम नइखे। पति के ‘सोना’ मानल गइल बा, लोक परंपरा में। अब उ नइखे। अइसना में हीरा हीरा रूपी जिनिगी के फेर का मतलब बा। का पर करि सिंगार पिया मोर आन्हर वाली स्थिति बा। सामाजिक उपेक्षा के चलते नष्ट हो जाला। इहाँ कवि प्रकृति आ जिनिगी के बिम्ब के जे संनाद रचले बाड़न, उ एह रचना के एगो दार्शनिक ऊँचाई देता। दास कबीर के भी कहनाम बा—'मोरा हीरा हेराय गया कचरे में...' कबीर के मालुम बा कि हमरे लगे हीरा बा। पर, हीरा हेराय गइल बा। कचरे में हेरायल बा। सबसे कीमती थाती बिला गइल बा।
‘जवने नदिया सूखल पानी ओकर कवन लहरिया,
जिनिगी जेकर रेत हो गइल ओकर कइसन धारा’
ओहिजे एह में पंक्ति में जिनिगी के खालीपन के देखल जा सकऽता। नदी के सूख गइल आ रेत में बदल गइल एगो अइसन चित्र बा, जे रमराजी के जिनिगी के सूखल, खाली परिदृश्य में बदलऽ देता। अनुरागी जी, एहिजा कवनो प्रयोगधर्मिता के चमत्कार नइखन देखावऽत, बलुक लोक-जिनिगी के सहज आ साँच अभिव्यक्ति के रख दिहले बाड़न। मसलन जिनिगी एकदमे रूढ़ हो गइल बिया, जहाँ कवनो परिवर्तन भा बदलाव के संभावना नइखे। इ दृश्य कविता के मौलिक बनावऽता।
रमराजी के चरित्र खाली एगो बेवा के चित्रण नइखे। बल्कि ऊ नमूना भा बानगी बा— हर ओइसन मेहरारू के, जे आपन दुख सहत भी दोसरा के संस्कारित करेले। दोसरा के जीवन में खुशी के आधार बन जाले। रउआ तनिका अपने आस-पास नजरी दौड़ाइब, तो ‘रमराजी’ फूआ जइसन कवनो चेहरा जरूर नजर आई। मसलन हम अपने गाँव आ परिवार के देखऽतानी। ‘दुल्हिनिया’ चाची के चेहरा आँखी के सोझा आवऽता। ‘दुल्हिनिया’ चाची हमरे बाबू जी के मामी रहली। बियाहे के कुछ साल बाद ही उनका पति के निधन हो गइल। उ अपने नइहर ना गइली। ससुरे में रहि गइली। जीवन भर। हमरे पिता जी के अपने संतान जस पलली-पोसली। पढ़वली-लिखवली। काबिल बनवली। पूरा गाँव के उ ‘दुल्हनिया चाची’ रहली। धरम-करम के बचावत, घर-गृहस्थी के सहेजत-जोगावत आपन पूरा जिनिगी जीयली। फिर एह संसार विदा भइली। आदर्श जिनिगी रहे। उ सभे के रहऽली। ममता-करूणा के मूरत। सबके एक नजरी से देखे वाली। उनका खातिर केहु आन ना रहे। उनका पऽ फुरसत में लमहर बात हो सकऽता। बाकिर एहिजा विषयांतर होई।
‘केकर रहिया जोहि-जोहि के सँझिया रोज बोलावें,
केसे मन के बतिया कहि-कहि रतिया के भरमावें’
आखिर केकर राहि निहरिहें। केहु के आवे के कवनो उम्मीद नइखे। उनका जिनिगी के हीरा ओहिजा हेराइल बा, जहाँ से कवनो वापसी ना होखेला। बहुत दूर चल गइल बा। आखिर उ अपने मन के बात केकरे से कहिहें भा बतिइहें? इ लाइन बहुत कारूणिक बा। भाव से भरल। पर, अइसना मुश्किल हालत में भी रमराजी फूआ सरेंडर नइखी करऽत। जीजीवीषा से भरल बाड़ी। इ जिनिगी के संभाले के ताकत देता। एहिजा लोक-संस्कृति के ऊहे ताकत सामने आवऽता, जे निजी दुख के सामूहिक भावना में बदल देला। रमराजी फूआ गाँव के आत्मा बाड़ी। आपन वजूद से संस्कार-मर्यादा के जिंदा रखले बाड़ी। अनुरागी जी, ओही सामाजिक मेलजोल के भी रेखांकित कइले बाड़न, जे गाँव के जिनिगी के खासियत बा।
कविता के भीतरी पहलू ओकर भावनात्मक गहराई में बा। ‘रमराजी मुँह में अँचरा दे हरदम सुसुकी मारें...’ में एह के महसूस कइल जा सकऽता। रमराजी फूआ आपन दुख के बयान नइखी करऽत। भीतरे-भीतरे सुसुकी मारताड़ी। रहीम दास भी दुख के सार्वजनिक प्रदर्शन से बरजले बाड़न। ‘रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय...’ ओही तरे रमराजी फूआ, आपन दुख-तकलीफ केहु से कहत भा बतावत नइखी। भीतरे-भीतरे जब्ज कर लेत बाड़ी। कवनो शोर नइखे, ना कवनो दिखावा। बाकिर सहनशीलता। अनुरागी जी एही मूक भा मौन रहे उनकर आदत के संवेदनशीलता से उकेरले बाड़न। इ पाठक भा श्रोता के दिल के छूअता।
‘हाय गोसइँया! दुख का जनलऽ, कइलऽ तू मनमानी...’ पर केहु से तो कहे के पड़ी, आपन तकलीफ बतावे के होई। अइसना में लोक मन सीधे भगवान (गोसाई) से शिकायत दर्ज करावऽता। इ शिकायत खाली रमराजी के नइखे, बलुक मय मेहरारून के बा, जे नियति के हाथ ठगायल बा। इहाँ कविता के बाहरी पहलू भी उजागर होता। अनुरागी जी ओह सामाजिक ढांचा पऽ प्रहार कइले बाड़े। जे औरत के दोयम दर्जे में राखऽता, उपेक्षा आ तिरस्कार के पात्र बनावऽता।
‘रमराजी के सखी सहेलरि हँसि-हँसि ताना मारें,
माई-बहिनी टुकड़ा दें त झइहावें दुतकारें’
एहिजा समाज के क्रूर चेहरा सोझा आवऽता। रमराजी फूआ के सखी-सलेहरि ताना मारताड़ी। अगर केहु रमराजी फूआ के दीन-हीन दशा देख के कुछ देता, तो देवे आला के ही झइहाँवल-दुत्कारल जाता। इ सब देख के रमराजी फूआ के दुख के अउर गहिराता।
असल में रउआ जब एह रचना से गुजरऽब तऽ महसूस होई कि एहिजा करुणा के बहाव हर शब्द में बा। असीम दुख। कवनो सीमा नइखे। देखवइया के करेजा फाटि जाता—‘देखि-देखि के फटल करेजा केतना ईं दुख गाईं...’ जवन रमराजी के हाल बा उहे अनुरागी जी के भी हाल बा। एहिजा कवि आपन मनोभाव आ हाल-हालात के भी बयान करऽता। एक लिहाज से देखल जावऽ तऽ रमराजी के दुख के सहभागी बनऽता। इहे सहभागिता कविता के एगो मानवीय ऊँचाई देता। एहिजा अनुरागी जी, लोक-जिनिगी के ओही भावना के पकड़ले बाड़न, जेकरा के परदुखकातरता कहल गइल बा। क्रौंच वध के देख के वाल्मीकि के करुणा जाग उठऽल। उहाँ के पहिला श्लोक लिखनी। एही तरे करूणा के तीव्रता अनुरागी जी के एह कविता में महसूस होई। करूणा, भारतीय साहित्य के मूल धारा हऽ। एहिजा अनुरागी जी के भावना बनावटी नइखे, सहज आ स्वाभाविक बा। कवनो अलंकार के प्रदर्शन नइखे, कवनो शब्द के जाल नइखे, खाली जिनिगी के साँच बा। इ अपने सहजता में ही प्रभावशाली बा।
रमराजी खाली एगो गाँव के फूआ के कहानी नइखे। बलुक हर ओ औरत के कहानी बा, जे तमाम दुख सहे के बादो परिवार-समाज खातिर आधार बन जाले। ‘रमराजी के मरजादा पर के ना माथ नवाई...’ एहिजा उहे गरिमा रेखांकित होता। इ गरिमा खाली निजी नइखे, बलुक सांस्कृतिक भी बा। रमराजी फूआ ओही संस्कृति के वाहक बाड़ी, जे गाँव में जिनिगी-संस्कार-मर्यादा के जिंदा रखले बा। अनुरागी जी, एहिजा उहे सामाजिक मूल्य के उजागर कइले बाड़न। बाकिर आधुनिकता के दौर में इ अब गायब हो रहल बा।
ओहिजे कविता के बिम्बन में भी एगो अनोखा बहाव बा। मौलिकता भी। भोजपुरी लोक-ध्वनि इहाँ पूरा जोर से गूँजत बा। ‘ईंटा उनके रहल सिर्हानी गुदरा भइल रजाई...’ ईंटा मसनद भा तकिया बन गइल बा। गुदरा, रजाई बन गइल बा। रमराजी फूआ निखहरे, भुइँआ सुतऽताड़ी। एह के माध्यम से उनका दारूण दशा-जीवन संघर्ष के महसूसल जा सकऽता। उनका जिनिगी के प्रतिबिंब दिखऽता। अनुरागी जी, अपना एह रचना में बिम्ब चयन बहुत कुशलता से कइले बाड़न। इ तारीफ के काबिल बा। ना कवनो बनावटीपन, ना कवनो कृत्रिम सजावट, खाली सहज बहत धारा बा, जे पाठक के आपन साथ बहा ले जाता।
‘रमराजी’ जइसन रचना में प्रयोगधर्मिता के उम्मीद नाहिए करे के चांही। काहेंकि इहाँ कवि लोक के सहजता के ही आपन ताकत बनवले बाड़न। सहजता ही उनकर मौलिकता बा। कविता के कथ्य, ओकर बनावट, ओकर अनुभूति—सब कछु एक-दोसरा में अइसन गूँथल बा कि एगो सजीव छवि देखावत बा। लाइव स्केच खिंचाइल बा। पर, इ छवि खाली रमराजी के नइखे, बलुक ओह समाज के बा, जे अपना भीतर करुणा आ क्रूरता के एक्के साथे समेटले बा। एह तरे इ कविता एगो सामाजिक तहरीर बनऽतिया। औरत के दुख के तऽ बयान करते बा, साथे-साथ ओकर संघर्ष आ गरिमा के भी उजागर करऽतिया।
एह कविता के विशिष्टिता पऽ बहुत बात हो सकऽता। बाकिर आखिर में बस इहे जानी कि ‘रमराजी’ एगो अइसन कविता बा, जे आपन समय आ परिवेश से आगे बढ़ के मानव-जिनिगी के चिरकालिक सवाल के छूअतिया। इ महज भोजपुरी साहित्य के रचना भर नइखे, बलुक भारतीय साहित्य के धरोहर बा। भोजपुरी के अमर काव्य। इ हम नइखी कहत, मोती बीए जी के कहनाम बा। मोती जी, अनुरागी जी के इयाद करत एगो लेख में लिखले बाड़न, सीवान में कवनो कवि सम्मेलन आयोजित भइल रहे। अनुरागी जी, ओहिजे एगो सोहर सुनवनी। उषा काल से जुड़ल, दृश्य केंद्र में रहे। 'अंगना में भइल अँजोर' सभा मण्डप में राति के 12 बजे अइसन लगल कि उषाकाल हो गइल। मोती बीए जी खुद प्रत्यक्षदर्शी रहनी, एह कवि सम्मेलन के। अनुरागी जी अपना जीवन के अल्पकाल में भोजपुरी खातिर जवन रचनी, कइनी उ स्तुत्य बा।
अनुरागी जी, रमराजी के बहाने एगो अइसन औरत के चित्रण कइले बाड़न, जे आपन तमाम दुख आ बिडंबना के बादो दोसरा खातिर उजाला बन जाले। इ कविता हमनी के सोचे खातिर मजबूर करऽतिया। का समाज रमराजी जइसन चरित्र के प्रति आपन जिम्मेदारी के समझऽता? इ सवाल एह कविता के एगो साहित्यिक रचना से आगे ले जाके, सामाजिक बहस के रूप देता। आखिर में बस इहे कहे के बा कि एह तरे, ‘रमराजी’ काव्य-सौंदर्य के नजरिया से शानदार बा। बाकिर मानवीय भावना आ सामाजिक चेतना के नजर से भी एगो अनुपम रचना बा। एह अमर निधियन के सहेजेल जरूरी बा।
डॉ राजेंद्र प्रसाद जी के लिखल पाती भोजपुरी में
भारत के पहिला राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी के लिखल भोजपुरी पत्र !
इ पत्र उहां के भोजपुरी के नामी पत्रिका "भोजपुरी" के संपादक रघुवंश नारायण सिंह जी के दिसम्बर 1953 में लिखले रहनी । इ पत्र आखर के " भोजपुरी" पत्रिका के जनवरी, 1954 के अंक से मिलल ह । रउवा सभ एह पत्रिका के " भोजपुरी साहित्यांगन" प पढ सकेनी ।
डॉ राजेंद्र प्रसाद जी, भोजपुरी से जुड़ल संवाद भोजपुरी में करत रहनी चाहें उ मौखिक होखे भा लिखित । जयप्रकाश जी के पत्नी, प्रभावती देवी जी से पारिवारिक संबंध आ रिश्तेदारी रहे, त अइसन क गो पाती मिलल बा जवना में राजेंद्र बाबू आ प्रभावती जी के पाती के माध्यम से संवाद, भोजपुरी में भइल बा ।
एह कुल्ह इतिहास के बात बहुत पुरान नइखे भइल ! एक दू पीढी के बात ह, यानि कि भोजपुरी में लिखल आ संवाद, लगातार संवाद बहुत पुरान चीज ना ह ! हमनी के अपना मातृभाषा भोजपुरी में लिखित आ मौखिक संवाद लगातार करे के चाहीं ।
भोजपुरी भाषा खातिर कुछ बहुत जरुरी किताब जवनन के रउवा अमेजन से कीन सकेनी :
भोजपुरी संस्कार गीत
भोजपुरी के पारम्परिक / सांस्कारिक गीतन के बड़ा सुनर आ व्यापक संकलन । भोजपुरी के लोकगीतन के सहज आ गोट संकलन के रुप में इ किताब बड़ा मशहूर ह ।
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भोजपुरी संस्कार गीत और प्रसार माध्यम
भोजपुरी गीतन के राग लय सुर ताल के बात एह किताब में भइल बा । किताब के शुरुवाती समय में किताब के संगे सीडी आवत रहे, बाकिर अब के मालूम ना । संगीत के छात्र-छात्रा लो खातिर बढिमा किताब ।
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भोजपुरी भाषा और साहित्य
भोजपुरी भाषा के इतिहास, व्याकरण आ भोजपुरी भाषा के हिंदी, बंगला, मगही, मैथिली, अवधी संगे तुलनात्मक अध्ययन के संगे संगे भोजपुरी के व्याकरण के बारे में विस्तार से । एह किताब में भोजपुरी के भाषा-विज्ञान के हिसाब से एक एक चीज के रचि-रचि बतावल गइल बा ।
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भोजपुरी के कवि और काव्य
भोजपुरी भाषा के साहित्य के बारे में शुरु से ले के 1950 तक के लगभग हर कवि /रचनाकार के बारे में जानकारी । इ किताब भोजपुरी साहित्य के छठवा-सातवा शताब्दी से ले के चल रहल बड़ुवे आ 1940-1950 तक के संकलन एह किताब में बा । भोजपुरी काव्य साहित्य के बड़ा गोट आ पोढ किताब ।
अमेजन लिंक - https://t.co/HIHKDQ28ql
प्रतिनिधि कविता : भोजपुरी
समकालीन साहित्यकार लो के रचनन के केंद्र में राखि के रचाइल इ किताब, असल में दू गो बेजोड़ साहित्यकार (डॉ बलभद्र आ प्रकाश उदय जी) के संपादन में निखर के सोझा आ गइल बड़ुवे ।
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(नोट – इ किताब हाल दे आनलाइन मिलेली स ना एहि से एकनी के बारे में विशेष रुप से बतावल जा रहल बा)
ध्यान दिहीं - अमेजन प भोजपुरी के एक से बढि के एक किताब बाड़ी स, रउवा सभ ओह किताबिन के कीन सकेनी । एह के अलावा, सर्व भाषा ट्रस्ट दिल्ली, विश्वविद्यालय प्रकाशन बनारस, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना, भोजपुरी साहित्यांगन पटना, सारव प्रकाशन छपरा, राजकमल प्रकाशन दिल्ली आदि से भोजपुरी भाषा में आ भोजपुरी भाषा से जुड़ल किताबिन के रउवा सभ कीन के पढि सकेनी ।
कहाँ लगाईं खोता
- देवेंद्र नाथ तिवारी
रामसुमेर सिंह ‘काका’, भोजपुरी साहित्य के असाधारण साधक के नाम हऽ। जब तक जिनिगी रहल, भोजपुरी खातिर रहल। एगो टूटही साइकिल रहे। ओही से ‘काका’, सउसें सारण से धइले चंपारण तक घूमऽस। कहीं कवनो कवि सम्मेलन होखे भा आंदोलन होखे, भोजपुरी खातिर कवनो जुटान होखे, ‘काका’ जरूर ओहिजा हाजिर रहऽस। आंदोलनकारी भावना से भरल रहलन। कहीं कवनो अनेत, हकमारी होखे, तो सीधे आपन बिरोध दर्ज करावें। मसलन एक बेर कहीं कवनो पुरनिया के वृद्धा पेंशन ना मिलत रहे। ‘काका’ ओकरे साथे ब्लॉक (प्रखंड कार्यालय) में गइलन। बीडीओ साहब से सीधे पूछ दिहलन कि अब का खइबऽ, आगी कि भउर? ओहिजा एगो कविता गढ़ने। इ कविता बहुत मशहूर भइल। पर, आजु दोसर रचना— ‘चिरई के ओरहन’ पऽ बात होई। कलुहें ‘काका’ के पुण्यतिथि रहे। एही से गैरखेमाबाज कवियन के शृंखला के 16 वाँ कड़ी में ‘काका’ के कविताई पऽ तनिका बात होई। फिलहाल रउआ रचना देखीं—
‘बाग बगइचा झाड़ी-झुरमुट, सगरो आज कटाइल
एकरे ओरहन के ले के चिरई, तोहरे दुअरा आइल
चिरई में चतुर एक तोता,
पुछलस काहें जुलुम हमनी पर होता?
घरवाली के देह दोसर बा,
कहाँ लगाईं खोता?
काट-कूट बहुते तू कइल,
सोचऽ अपना मन में
तोहरे डर से काँप उठल बा,
जे प्राणी बा वन में
हो! पेट के पाछा परती कोड़ल,
शौक में पर के कटल गाछी।
चिरई चुरूंग सब रोवत बाड़े,
बिलखत बाछा-बाछी।
हाय! गाय जे दूध पियावल,
ओकरो पर आज आफत आइल।
एक ओर के मामला सुलझल,
दोसरा ओर अझुराइल...’
काका के ‘ओरहन’ देखे में बहुत छोट भा सधारण हो सकेले। पर, इ बहुत संवेदनशील रचना बा। व्यंग्यात्मक शैली, सामाजिक चेतना आ पर्यावरणीय संवेदना के सशक्त उदाहरण। काव्यात्मक संवेदना आ सामाजिक सरोकार के संगम। रचना के परिवेश, गवँई संवेदना से अनुभूत भइल बा। प्रकृति आ मानव के बीच बदलत संबंधन एह में दिखायी पड़ी। ग्रामीण भारत में लालच, स्वार्थ, खेती खातिर अउर जमीन, आधुनिकीकरण के प्रक्रिया पर्यावरण के नष्ट करत बा। उदारीकरण के बाद के दौर में एह में बहुत तेजी आइल बा। गाँव के मय बारी-बाग-बगइचा कट गइल बा। कट रहल बा। गाँव भी अब पेड़ विहिन हो रहल बा। बँसवारी खत्म हो गइल बा। आम-महुआ के बगइचा भी। ‘काका’ के इ रचना एही सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के रेखांकित करऽतिया। कइसे विकास के नाम पर जंगल, बाग-बगीचा आ प्राकृतिक संसाधन के दोहन हो रहल बा? प्राकृतिक संसाधन के विनाश आ एकर गवँई जीवन पर प्रभाव एह रचना के केंद्रीय विषय बा। रचना के शुरुआते ‘बाग बगइचा झाड़ी-झुरमुट, सगरो आज कटाइल’ से होता। एगो त्रासद दृश्य प्रस्तुत करऽता। एहिजा खाली भौतिक विनाश के ओर संकेत नइखे बलुक सांस्कृतिक आ भावनात्मक क्षति के भी एहिजा जाहिर होता। ‘काका’ एही परिवेश के अपना रचना में उभरले बाड़न। इ स्थानीय होखे के बाद भी सार्वभौमिक संदेश देता। एह परिवेश के एगो अउर महत्वपूर्ण पहलू बा। चिरई, तोता, गाय आ दोसरा जीव-जंतु के उल्लेख। इ गँवई जीवन के सहजीविता के देखावता।
‘काका’ के रचना के अनुभूति में करुणा आ व्यंग्य के अनूठा समन्वय बा। एक ओर जहवाँ प्राकृतिक विनाश पर गहिर पीड़ा महसूस होई, तऽ दूसर ओर मानवीय लिप्सा आ पर तीखड़ व्यंग्य भी मिली। ‘बाग बगइचा झाड़ी-झुरमुट, सगरो आज कटाइल’ में करुणा के स्वर अउर साफ-साफ महसूस होई। इ करुणा महज मनई भर सीमित नइखे। बल्कि चिरइया, गाय आ दोसरा जीव के प्रति भी विस्तारित होता। कारण मानवीय लालच-लोभ के असल विनाश के शिकार उहे बा। रचना में इ स्वर तब अउर मुखरित होता, जब चिरइया (तोता) मनई से सवाल कर ऽता-‘पुछलस काहें जुलुम हमनी पर होता?’ इ सवाल खाली एगो चिरइया के ना, बलुक समस्त प्रकृति के मानव से सवाल बा। ‘काका’ इहाँ मानव के स्वार्थी प्रवृत्ति पर तंज कसले बाड़न, जे अपने ‘पेट के पाछा’ (स्वार्थ खातिर) आ ‘शौक’ खातिर प्रकृति के विनाश करऽला। इ रचना के भीतर छिपल सामाजिक यथार्थ के उजागर करऽता। ओहिजे एह रचना में प्रतिरोध के भाव भी अंतर्निहित बा। चिरई के रोना, बाछा-बाछी के बिलखल आ गाय के आफत में पड़ल खाली पीड़ा के चित्रण नइखे। प्रकृति के संगे हो रहल अन्याय के खिलाफ एगो मूक विद्रोह भी बा। ‘काका’, एहिजा गँवई समाज के ओही चेतना के आवाज दे रहल बाड़न, जे पर्यावरणीय विनाश के खिलाफ खड़ा होखे के क्षमता रखऽता। साँच कहीं तऽ इ अनुभूति रचना के महज भावनात्मक स्तर तक सीमित नइखे, बलुक एकरा एगो वैचारिक आ सामाजिक मंच भी देता।
ओहिजे ‘काका’ के रचना में बिम्बन के उपयोग उनकर काव्यात्मक प्रतिभा के उत्कृष्ट उदाहरण बा। मौलिक बिम्ब गढ़ले बाड़न। लोकजीवन से एकर सीधा जुड़ाव बा। संगे-संग पर्यावरणीय संकट भी प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत होखऽता। पहिला प्रमुख बिम्ब बा, ‘बाग बगइचा झाड़ी-झुरमुट’। गँवई जीवन के समृद्धि आ प्रकृति के उदारता के प्रतीक बा। एकर ‘कटाइल’ खाली भौतिक विनाश नइखे। सांस्कृतिक आ सामाजिक ढांचा के टूटल भी बा। जवन एह हरियाली पर निर्भर रहे। चिरई आ तोता रचना के केंद्रीय बिम्ब बा। जब तोता सवाल करऽता, ‘काहें जुलुम हमनी पर होता?’, इ बहुत गहिराह बिम्ब बा। आखिर खोता कइसे लागी, घर वाली के देह दोसर बा। फिर भी अत्याचार हो रहल बा। सोचीं मनई केतना निर्दयी भा निर्मम हो गइल बा? आखिर कांहे केहु के घर-गृहस्थी उजाड़त बा? तोता मनई जवाब मांगऽता। गाय आ बछड़ा-बछिया के बिम्ब ग्रामीण अर्थव्यवस्था आ सामाजिक जीवन के आधार के देखावेला। गाय, जे ‘दूध पियावल’, ओकरे ऊपर ‘आफत’ आइल बा। ओकरे जीव अफरा में पड़ल बा। ओहिजे ‘बिलखत बाछा-बाछी’ के बिम्ब भावनात्मक गहराई देता। पाठक के प्रकृति आ जीव के प्रति सहानुभूति से जोड़ऽता। ‘पेट के पाछा परती कोड़ल’ आ ‘शौक में पर के कटल गाछी’ जइसन बिम्ब मानव के स्वार्थी आ विलासिता के प्रवृत्ति के ओर इशारा करऽता। इहाँ ‘पेट’ आ ‘शौक’ मानव के दोहरी प्रकृति के देखावऽता। एक ओर जरूरत, दूसर ओर लालच। इ बिम्ब सामाजिक यथार्थ के प्रतीकन के माध्यम से उजागर करे के कला के प्रतिबिंबित करऽता।
रचना के शिल्प भोजपुरी के सहज, बोलचाल के भाषा आ लोकगीतन के लय पर आधारित बा। इ रचना मुक्त छंद में बा, जे भोजपुरी काव्य के परंपरा के अनुरूप बा। एकरा में लय आ तुक के समन्वय बा। संभवत: इहे कारण बा इ रचना काव्य-गोष्ठी आ लोक मंच पऽ खूब लोकप्रिय रहे। उदाहरण खातिर, ‘कटाइल’, ‘आइल’, ‘होता’, ‘खोता’ जइसन शब्दन के तुक रचना के संगीतमय बनाऽता। जे भोजपुरी के मौखिक परंपरा से जुड़ऽता। रचना में संवाद शैली के उपयोग (‘पुछलस काहें जुलुम हमनी पर होता?) एके नाटकीय प्रभाव देता। इ शैली ‘काका’ के व्यंग्यकारिता के अउर तीक्ष्ण बनावऽता। काहेकि इ पाठक के सीधे रचना के मूल सवालन से जोड़ऽता। संवाद के इ शैली रचना के सामाजिक संदर्भ के उजागर करे के एगो प्रभावी उपकरण बा। भाषा के सहजता एह रचना के सबसे बड़ ताकत बा। ‘चिरई चुरूंग’, ‘बिलखत बाछा-बाछी’, ‘परती कोड़ल’ जइसन शब्द आ वाक्यांश भोजपुरी लोकजीवन के जीवंतता के देखावऽता। ‘काका’ एहिजा साहित्यिक भाषा के बजाय लोकभाषा से सहज शब्द चुनले बाड़न। इ शिल्प ना खाली रचना के प्रामाणिक बनावऽता। सामाजिक आंदोलन के हिस्सा बने के ताकत भी देता।
रचना के कथ्य पर्यावरणीय विनाश, सामाजिक असंतुलन आ मानव स्वभाव के स्वार्थी प्रवृत्ति पर केंद्रित बा। इ रचना महज प्राकृतिक विनाश के कहानी भर नइखे कहऽत। सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पऽ सवाल भी उठावऽता। जे इ विनाश के बढ़ावा देता। रचना के कथ्य सामाजिक असमानता के भी रेखांकित करऽता। ‘घरवाली के देह दोसर बा, कहाँ लगाईं खोता?’ जइसन पंक्ति इहे संकेत देता। पर्यावरणीय विनाश के प्रभाव समाज के कमजोर वर्ग, खासकर ग्रामीण औरत आ गरीबन पऽ बेसी पड़ऽता। इहाँ ‘घरवाली’ ओही सामाजिक वर्ग के प्रतीक बा, जे इ संकट के शिकार बा। रचना के एगो दोसर महत्वपूर्ण कथ्य बा प्रकृति आ मानव के बीच संवाद के जरूरत। तोता के सवाल, इ देखावऽता कि प्रकृति के पास भी आपन आवाज बा। मुखर आवाज। बाकि ओके महसूस करे के होई। मनई के सुनल आ बुझल जरूरी बा। असल में इ कथ्य पर्यावरणीय चेतना के बढ़ावा देता। मनई के प्रकृति के साथे सहजीवन के ओर प्रेरित करऽता।
‘काका’ के इ रचना आज के संदर्भ में अउर प्रासंगिक बा। जलवायु परिवर्तन, जंगल के कटाई आ जैव-विविधता के ह्रास वैश्विक चुनौती बन गइल बा। ग्रामीण परिदृश्य तेजी से बदलता। अइसना में इ रचना एगो चेतावनी जइसन बा। याद दिलावऽता कि प्राकृतिक संसाधन के अंधाधुँध विनाश खाली पर्यावरणीय ना, बलुक सांस्कृतिक आ सामाजिक क्षति भी बा। रचना के प्रासंगिकता एहु में बा कि इ अनबोलता के आवाज के मंच देता। आजु जब पर्यावरणीय आंदोलन अक्सर शहरी आ वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सीमित बा। ‘काका’ के रचना हमनी के स्थानीय आ ग्रामीण संदर्भन के ओर ध्यान खिंचऽता। इ रचना हमनी के इहो सिखावऽता कि पर्यावरणीय चेतना खाली वैज्ञानिक या नीतिगत स्तर पर ही ना सांस्कृतिक आ साहित्यिक स्तर पर भी विकसित करे के चाहिं। ‘काका’ के इ रचना, सामाजिक आंदोलन के शक्ति के भी देखावऽता। इ रचना खाली साहित्यिक कृति भर नइखे। एगो वैचारिक हस्तक्षेप बा। भोजपुरी समाज के भाषा, संस्कृति आ पर्यावरण खातिर लड़े के प्रेरणा देता।
रामसुमेर सिंह ‘काका’ के रचना एगो अइसन कृति बा, जे आपन सादगी, व्यंग्य आ सामाजिक सरोकार के चलते अमर बा। इ हमनी के सिखावऽता कि साहित्य खाली शब्दन के खेल भर नइखे बलुक समाज के बदल देबे के सामर्थ रखऽता।
अश्विनी कुमार ‘आँसू’ : स्मृति शेष
जन्मतिथि - 01 जनवरी 1944
पुण्यतिथि - 29 मई 2020
टोअलो में टिसेला छिँउकिया के साटी राम जइसन सुप्रसिद्ध गीत के रचयिता भोजपुरी आ हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि आ उपन्यासकार , अश्विनी कुमार आँसू जी के पुण्यतिथि प आखर परिवार बेर बेर नमन क रहल श्रद्धांजलि दे रहल बा ।
अश्विनी कुमार जी के जनम, 1 जनवरी 1944 के सुगौली के सुगाँव गांव में भइल रहे ।
इहां के लिखल किताबिन में, निलही कोठी, निरालय, दोहावली, मुक्तक मधु, ऐसे होगा भारत महान (नवजागरण गीत), प्रगति के पच्चीस द्वार, मोतियों की माला (हिंदी गीत संग्रह), संजीवनी (हिंदी गजल संग्रह), आराधना(भोजपुरी गजल संग्रह), चंदन,रामा (हिंदी उपन्यास), राष्ट्रपिता (हिंदी महाकाव्य, जवन लिखात रहे ) आ धरोहर ( भोजपुरी गीत आ कविता संग्रह ) ह ।
अश्विनी कुमार 'आँसू' जी के लिखल कुछ दोहा -
खाय आदमी-आदमी अचरज के ई बात।
माँस खवक्कड़ काग जे ऊहो काग ना खात।।
ओछन का मुँह जे लगे, अपने जात नसाय।
सनकी पुरवा संग लगि, बदरा गइल बिलाय।।
कजरा बहि बदरा भइल, तैरत फिरे अकास।
पिय के पता ना पाइ के, बरसे होइ निरास।।
गइल जवानी ना मिले, घीव-मलीदा खाय।
उतरल पानी ना चढ़े, लाख-करोड़ चुकाय।।
पिय के आवन जानि के, मिटत हिया के पीर।
दरस, परस लागे दवा, छूटे रोग गंभीर।।
सुगना सगुन उचारि के, कागा भेज सनेस।
सावन बरसे आग री, पिया बसे परदेस।।
हरन-मरन में जग कहे, मन में राखऽ धीर।
बाँझ भला का जानिहें, परसोता के पीर।।
ताना मारे गोतिनी, कसे परोसिन बोल।
एके गो तोहरे बिना, पिय हम फूटल ढोल।।
अँसुअन शीत न होइहें, बिरहानल के ताप।
मिलन-मरन दू राह से, छूटत ई संताप।।
जीयत जान न छोड़िहें, बेरहमी यमराज।
तबहूँ मनवाँ चेत ना, हरि गुन करे अकाज।।
आखर परिवार, अपना सुप्रसिद्ध साहित्यकार के बेर बेर नमन क रहल बा !
जान रही भा जाई
- महेन्द्र गोस्वामी
होखत जे आ रहल बा, होखे ना अब दिआई।
चाहे ई जान रही चाहे ई जान जाई।।
अधिकार सब गँवा के, जियला में का रखल बा,
दुःख कुल्ही हमरे नामें, सुख तहरे सब दखल बा,
ई बाँट बानर लावल, फिर से सुनऽ बँटाई।
चाहे ई जान रही, चाहे ई जान जाई।।
बरखा लहर-पाला में, खाने-खेते खटीला,
चाहे अंगार बरखो, तिल भर नाहीं हटीला,
महलम से झाँक करके, लिहल मजा बुझाई।
चाहे ई जान रही, चाहे ई जान जाई।।
चाहऽ अगर भलाई, सुख देश आ धरा के,
जीअ आ हमहूँ जीहीं, रस्सी नियन बरा के,
थरती आ धन ह सबके, कबले कहऽ बुझाई।
चाहे ई जान रही, चाहे ई जान जाई।।