आर्य महासंघ वर्त्तमान में लगभग दो सौ नए "आर्य समाज"स्थापित कर,संचालन कर रहा है। आगामी वर्ष प्रतिपदा तक हमारा लक्ष्य पांच सौ से अधिक "आर्य समाज" स्थापित करने का है।सभी पुरुषार्थ शील आर्य गण अपने-अपने ग्रामों में 'राष्ट्रीय आर्य संरक्षिणी सभा'से सम्पर्क कर"आर्य समाज"स्थापित करवाएं।
श्रेष्ठ विश्व बनता है श्रेष्ठ राष्ट्रों से, श्रेष्ठ राष्ट्रों का निर्माण होता है श्रेष्ठ समाजों से, श्रेष्ठ समाजें बनती है श्रेष्ठ परिवारों से, श्रेष्ठ परिवार बनतें है श्रेष्ठ व्यक्तियों से, श्रेष्ठ व्यक्ति बनतें है आर्य विद्या से और संसार भर को आर्य विद्या देता है आर्य महासंघ
"धर्म" जितना-जितना हमारे आचरण में आएगा मज़हब उतना-उतना नष्ट होगा। क्यों कि-मजहब गहन अन्धकार है,जबकि "धर्म" शाश्वत प्रकाश पुञ्ज। जैसे प्रकाश आते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है,इसी प्रकार "धर्म" धारण करने पर ही मज़हब नष्ट होगा। आइए!आर्य महासंघ के साथ,आइए!धर्म के साथ।
#जय_आर्य
मज़हब ही सिखाता है-'आपस में वैर करना' और मज़हब ने वैर करना ही सिखाया है। धर्म एक है, अतः धर्म मानव में प्रेम बढ़ाता है, एकता बढ़ाता है।
अपने पुत्र-पुत्री,बन्धु-बान्धवों को "धर्म"सिखाइए!आर्य महासंघ धर्म शिक्षा का ही प्रबन्ध करता है।
#जय_आर्य#जय_आर्यावर्त्त
कभी ऐसा समय था कि हमारे राष्ट्र में दोनों समय सभी नर-नारी "सन्ध्या"अवश्य किया करते थे।बिना सन्ध्योपासना किए कुछ भी आहार ग्रहण नहीं किया करते थे।आर्य महासंघ अपने प्रत्येक आर्य-आर्या से यही अपेक्षा करता है कि-सभी आर्य जन "सन्ध्या" के उपरान्त ही आहार ग्रहण किया करें !
#जय_आर्य
हमारे सनातन धर्म में"सोलह संस्कार"तो सभी धर्म प्रचारक मानते हैं, किन्तु सोलह संस्कारों के नाम और क्रम पर वितण्डा ही अधिक दिखाई देता है।
ऋषिवर दयानन्द जी ने गृह्यसूत्रों के आधार पर जो नाम और क्रम खोजकर प्रकाशित किया है वह अद्वितीय है।इनके बिना धर्म की गति नहीं है।#जय_आर्य
सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार करने वाले उपदेशकों का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि वे अपने धर्म के मूल-"वेदों"से सर्वथा अपरिचित हैं अथवा काल्पनिक कथाओं के माध्यम से परिचित हैं।
विवेकशील होकर तर्क पूर्ण रीति से यदि धर्म सीखा-सिखलाया जाता तो आज"धर्म"हासिए पर न होता।#जय_आर्य
सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार करने वाले उपदेशकों का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि वे अपने धर्म के मूल-"वेदों"से सर्वथा अपरिचित हैं अथवा काल्पनिक कथाओं के माध्यम से परिचित हैं।
विवेकशील होकर तर्क पूर्ण रीति से यदि धर्म सीखा-सिखलाया जाता तो आज"धर्म"हासिए पर न होता।#जय_आर्य
धर्म का मूल "वेद" हैं। किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण यह कि धर्म की जय चाहने वाले, धर्म का उपदेश करने वाले और धर्माचरण की इच्छा वाले मानवमात्र को "वेद" छोड़कर धर्म बताने का प्रयत्न हजारों लोग करते हैं। "वेद"का ठीक-ठीक मार्ग मात्र "आर्य महासंघ"ही बतलाता है।#जय_आर्य#जय_आर्यावर्त्त
आर्य=ईश्वर पुत्र।अर्थात् ईश्वरीय नियम-संविधान को मानने वाला होता है,100%शाकाहारी होता है।फिर यह वामपन्थी, दक्षिणपन्थी कम्युनिस्ट कहां से किस आधार पर मानने एवं लिखने लगे कि-आर्य मांस खाते थे?स्वार्थ,हठ और दुराग्रह मनुष्य का पतन तो करता ही है साथ ही उससे पतन खाई भी खुदवा देता है।