जैसा कि अपेक्षित था, कृति सेनन ने रक्षाबंधन वाले विज्ञापन को महिला-पुरुष वाला मुद्दा बना दिया है। वो पूछ रही हैं कि महिलाएँ क्या पहनेंगी और क्या नहीं ये बताने वाले कब रुकेंगे।
उनका कहना है कि कपड़े संस्कृति को परिभाषित नहीं करते। अच्छा। अगर ऐसा है तब तो एक पादरी और एक पंडित के वस्त्र समान होने चाहिए। कपड़े पेशे को भी परिभाषित करते हैं और संस्कृति को भी। एक वकील और एक डॉक्टर को उनके यूनिफॉर्म में देखकर उन्हें पहचाना जा सकता है। ठीक उसी तरह, कोई ईसाई संस्कृति के पर्व मना रहा है या हिन्दू संस्कृति के - ये देखकर पहचाना जा सकता है।
आपने विज्ञापन किया। कोई समाज-सुधार का विज्ञापन नहीं था। एक ब्रांड का था, ताकि उसके उत्पाद बिकें। आपने पैसे लिए, तभी एक्टिंग की। फ्री में नहीं किया। अब एक पूरी कमर्शियल प्रक्रिया का बचाव करने के लिए आपने उसमें फेमिनिज्म घुसा दिया। मंदिर में क्या पहनकर जाते हैं और समुद्री बीच पर क्या पहनकर आनंद लेते हैं - इन दोनों में स्पष्ट अंतर है। अगर आप ये अंतर पता नहीं कर पा रही हैं तो आपका पढ़ना-लिखना बेकार है।
बात केवल स्त्री की है ही नहीं। यज्ञोपवीत के समय लड़का क्या पहनेगा, ये भी तय होता है। पूजा या अनुष्ठान के समय कोई पुरुष क्या पहनेगा, ये भी तय है। दक्षिण भारत के मंदिरों में जाइए, अंदर क्या पहनकर जाना है ये तय है। सबकुछ को सबकुछ में घुसकर घालमेल करने की आवश्यकता नहीं है।
वस्त्र संस्कृति तय करते हैं। कल को ये कहेंगी कि इमारतों से तय नहीं होता क्योंकि ईंट-पत्थरों का कोई धर्म-मजहब नहीं होता, फिर मंदिर में नमाज पढ़ी जाएगी और मस्जिद में पूजा होगी। ये व्यावहारिक नहीं है। इसीलिए, इसको स्त्री-पुरुष का मुद्दा बनाना बंद कीजिए, मुद्दा संस्कृति और अनुष्ठान का है।
एटा से दिल्ली पहुंचे प्रदर्शनकारी सूखी रोटी खाते दिखे
“एटा से आए हैं। यहाँ सिर्फ अपनी मांग रखने के लिए आए हैं। हमारी मांग है कि SC/ST Act को रोलबैक किया जाए, आरक्षण में रिफार्म हो और आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया जाए।
आरक्षण गरीबों को मिलना चाहिए।
आपको लगता है कि सरकार हमारी बात सुनने को तैयार है?
अगर सरकार सुनने को तैयार होती तो हम यहाँ क्यों आते?
देखिए, हम घर से सूखी पूड़ी और रोटी का लड्डू बनाकर लाए हैं। थोड़ा-थोड़ा करके खाकर काम चला रहे हैं।
कल शाम को DCP साहब ने हमें रात 12 बजे तक बैठाए रखा। परमिशन की कॉपी देने की बात करते रहे, लेकिन दी नहीं। फिर कहा कि सुबह देंगे। सुबह जब हम यहाँ आए तो कहा गया कि आप लोगों को परमिशन नहीं मिल रहा है।”
अजीत भारती को उनकी बहन की शादी चंद्रशेखर से करने की सलाह देने वाले यह सलाह चंद्रशेखर को ही क्यों नहीं देते कि वो रोहिणी को न्याय दे?
अजीत भारती की बहन पर जो टिप्पणी की गई, उस संदर्भ को लिबरल लॉबी ने गायब कर दिया। उकसाने के बाद अजीत ने क्या कहा, उसे काटकर चलाया जा रहा है कि दलितों को गाली दे दी। यह झूठ है।
यदि टिप्पणी करने वाले की माँ-बहन और चंद्रशेखर को कुछ कहना अगर समूचे दलित समाज का अपमान है तो क्या अजीत की बहन की कोई गरिमा नहीं? या वो इस समाज का हिस्सा नहीं?
चंद्रशेखर किसी भी पद पर हों, उनके सार्वजनिक जीवन के अनेक अध्याय यहाँ उड़ते पाए जाते हैं। यह परिप्रेक्ष्य ही वितृष्णा के लिए पर्याप्त है। ऐसे व्यक्ति से अपनी बहन ब्याहने का कोई विचार भी कर सकता है? इसलिए अजीत पर किए कमेंट के बाद एक भाई का प्रतिकार समाज का अपमान नहीं हो सकता। व्यक्ति पर टिप्पणी थी, समाज पर नहीं। चंद्रशेखर कबसे “दलित समाज” हो गए?
और वैसे भी, कॉकरोच आंदोलन के बाद इन लिबरल्स ने सार्वजनिक भाषा का नया मानदंड रचा ही है कि गालियाँ दी जानी चाहिए, कोई अपराध नहीं है। कुछ दिन पहले ही गालियों के पक्ष में अनेक सौंदर्यशास्त्र रचा जा रहा था। आज अचानक ‘गाली’ पर मुक़दमा कैसे हो रहा है?
मोदी की माँ और उनको दी भद्दी गालियों से जब ओबीसी का अपमान नहीं हुआ तो आज दलितों का अपमान कैसे हो गया?
#AjeetBharti
बिहार में SC समुदाय की 21 जातियों में 20 आज भी वंचित/पिछड़ी हैं तो आरक्षण का फायदा किसको मिल रहा इसकी समीक्षा क्यों न हो?
राज्य सरकारों की ख़ुद की रिपोर्ट्स में SC समुदाय को लेकर आरक्षण का बराबर फ़ायदा न मिलने की बात है बावजूद इसके ऑटो पायलट मोड में चले जा रहा है आरक्षण।
गजबे है
सही कह रहे हो दलित भैया, @MVS_Films
झारखंड में भी यही हाल है, लोकसभा की 5 और विधानसभा की 28 सीटें आदिवासियों (ST) के लिए आरक्षित हैं, पर विधायक सांसद इनके अपने ही परिवार के लोग भाई-बहन, बीबी, बेटा- बेटी, बहू- दामाद ही बनते हैं। हमारा नंबर नहीं आता। आरक्षण सुधार पर चर्चा होनी चाहिए। #ReformReservation
कील लगी लाठी लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच पहुँचना बेहद शर्मनाक है।😡
क्या ये बच्चे आतंकवादी हैं? अगर नहीं, तो इतनी बर्बरता क्यों?
सवर्णों के खिलाफ इतना आक्रोश क्यों? जनता जवाब मांगेगी।
#JantarMantar#Justice#StopMisuseOfSCSTAct
दिल्ली में, तिलक हटाकर घूमना पड़ रहा है, यही दिन देखना बाकी रह गया था बस!
"मैं हनुमान मंदिर गया था, भजन-कीर्तन करने के लिए। वहाँ से मुझे माला दी गई। लेकिन मुझे तिलक हटाना पड़ा और माला उतारकर अंदर रखनी पड़ी।
जो व्यक्ति तिलक लगाकर घूम रहा है, वह उनके लिए प्रोटेस्टर है।
एक तरफ हिंदू राष्ट्र की बात होती है और दूसरी तरफ आपको तिलक हटाना पड़ रहा है। अब मैं क्या करूँ? हम किसी भी नाव में पैर नहीं रख सकते।"
>दिल्ली
>देश की राजधानी
>सीएम रेखा गुप्ता जी
एक बच्चा खेलते खेलते नाले में गिर गया, मर गया, प्रशासन ढूंढ नहीं पाया।
बेचारा मजबूर बाप खुद ढूंढ रहा है, वाह रे सिस्टम।
Reservation Hatao Andolan में आए छात्रों को बेरहमी से पीटने का आदेश Delhi Police को क्या गृह मंत्रालय से मिला!
आरक्षण हटाओ आंदोलन में शामिल छात्रों पर दिल्ली पुलिस की कथित बर्बर कार्रवाई का वीडियो सामने आया है। छात्रों का आरोप है कि पुलिस ने गाली-गलौज करते हुए उनके साथ मारपीट की। आखिर छात्रों के खिलाफ इतनी सख्ती का आदेश किसने दिया? क्या गृह मंत्रालय से दिल्ली पुलिस को कोई निर्देश मिला था? पूरी घटना और छात्रों के आरोप जानने के लिए वीडियो देखें।
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@WokeFuneral@Harshdubey9956@DelhiPolice@sumitsharmagzb
भारत में न्याय व्यवस्था कैसे चलती है, उसका एक नमूना देखिए। गुरु नानक डेयरी एंड स्वीट्स में हाइजीन के इश्यू पर कार्रवाई हुई।
36 में से 35 मानकों का पालन कर लिया, फिर भी लाइसेंस रिन्यू नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा, 98 परसेंट तो फॉलो कर दिए, FDA पाँच लाख का हर्जाना भरे!
मिठाई में कॉकरोच मिले तो निकालकर फेंक दीजिए, दुकान क्यों बंद करनी?
राष्ट्रीय महिला आयोग में भी कई बार कंप्लेन की थी, उत्तरप्रदेश पुलिस में भी कई बार कंप्लेन की थी, और तब तो ये सांसद भी नहीं था,
गली का छुटपुटिया गुंडा था मगर तब भी किसी में इसे अरेस्ट करने का दम नहीं था,
राष्ट्रीय महिला आयोग में भी कई बार कंप्लेन की थी, उत्तरप्रदेश पुलिस में भी कई बार कंप्लेन की थी, और तब तो ये सांसद भी नहीं था,
गली का छुटपुटिया गुंडा था मगर तब भी किसी में इसे अरेस्ट करने का दम नहीं था,