-छनकर/कुशाग्र अद्वैत (पूरी कविता)
मेज़ पर रखी चाय
अभी छानकर आई है
कुछ पत्ती नीचे छूट गई है
मेरे पीछे दीवार पर जो
सुंदर अल्पना बनाती है
वह धूप इस बैठक में
कुछ छनकर आती है
इस महादेश में
सोहनी की तरह
मुझ तक सब ख़बरें भी
बहुत पहरेदारी, क़िलेबंदी से
होकर-छिपकर-छानकर आती हैं
कुछ तो अधरस्ते ही डूब जाती हैं
एक तुम ही हो जो
छनकर नहीं आती
एक अपूर्व संसार के
दर्शन हो कराती
मेरी जान
छनन-छनन आओ मेरे पास
पायल पहनकर
हम बस
दो दिनों के लिए मिले हैं
दो दिन तक तो
पहनी जा सकती है पायल!
दो दिन तो
सुन लूँ
घुँघरूओं का बजना
फिर पीछे
तुम्हारी बिंदी
भूल जाऊँ शायद!
निश्चित ही
भूल जाऊँगा पापड़
भूल जाऊँगा तहरी
दो दिन यदि बजी पायल
उसकी हिलोर रहेगी भीतर
मुझे दौड़ाती, मुझे तैराती
दो दिन
कितने कम होते हैं
दो लिखने में
एक से भी
कम जगह घिरती है
दो दिनों में
बहुत कम भी सोओगी
तो दस घण्टे होंगे
कम अज़ कम
दस कितना वजनी लगता है
जैसे ग्यारह, जैसे बारह
दो में ही बस
कोई वज़्न नहीं है
दो दिन में
कुल कितने पहर होते हैं
कितने घण्टे, कितने मिनट
किसी को मालूम है?
मुझे कुछ मालूम नहीं
दो दिन में दो लोग
एक शहर नहीं नाप सकते
पूरम पूर
दो दिन में
तुम्हारे लिए आख़िर
कितनी कविताएँ पढ़ लूँगा
दो दिन में हम
कैसे समेटेंगे
सारा वसंत, सारा आषाढ़
दो दिन तो तुम्हारे
दो स्तन ही ले लेंगे
बची देहराशि के लिए
एक जीवन भी कम है
फिर तुम्हारा मन है
छन-छन आओ
न आओ
दो ही दिन हैं
जो है
जैसा है
कहो, बताओ
Train 20801 Magadh Express is currently stopping at Fatuha Platform 7, which is not of standard height. This is causing trouble for elderly passengers, women & children.
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मौत के 36 साल बाद भी अबतक क्यों नहीं सुलझी अमर सिंह चमकीला के मौत की गुत्थी? चमकीला के गाने क्या आज भी प्रासंगिक हैं? परिवार का इसपर क्या कहना है....
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पढ़िए @TejaswitaUpadh2 की रिपोर्ट
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