खाओ-पीओ और फुटपाथ पर सोओ लेकिन जंतर-मंतर पर डंटे रहो....खेल बड़ा है...
जंतर-मंतर पर चल रहे छात्रों के प्रदर्शन में उमड़ रही भीड़ के पीछे केवल स्वतःस्फूर्त जनसमर्थन ही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित डिजिटल समन्वय तंत्र के भी खूब सक्रिय होने का खेल सामने आ रहा है। मतलब इस तरह के ग्रुपों के सक्रिय होने के दावे किए जा रहे हैं। प्रदर्शन से जुड़े टेलीग्राम, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, सिग्नल और डिस्कॉर्ड जैसे सोशल मीडिया एवं मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर लगातार संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं। इन संदेशों में प्रदर्शनकारियों को यह जानकारी दी जाती है कि उन्हें किस समय, किस स्थान से और किस माध्यम से जंतर-मंतर पहुंचना है।फिर वहां खाने पीने की भी जबरदस्त व्यवस्था। खाओ पिओ और जंतर मंतर पर डंटे रहो....
सूत्रों के अनुसार, टेलीग्राम पर बड़ी संख्या में सदस्यों वाले कई समूह सक्रिय हैं, जहां संदेश प्रसारित होते ही अलग-अलग इलाकों से लोगों के लिए ऑनलाइन कैब, ऑटो और रैपिडो जैसी परिवहन सेवाओं की व्यवस्था की जाती है। कई मामलों में यात्रा का किराया पहले ही ऑनलाइन अदा कर दिया जाता है, ताकि प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद कुछ प्रतिभागियों ने भी दावा किया कि उनके लिए घर अथवा पहले से तय स्थान पर वाहन उपलब्ध कराए गए थे।
इसी समन्वित व्यवस्था का असर सोमवार और मंगलवार को स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। सुबह तक अपेक्षाकृत शांत नजर आने वाला जंतर-मंतर दोपहर होते-होते प्रदर्शनकारियों से खचाखच भर गया।
विशेष रूप से 18 जुलाई को लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा सफदरजंग अस्पताल ले जाने की घटना के बाद आंदोलन की गतिविधियों में तेजी आने का दावा किया जा रहा है। इसके बाद संसद मार्च के दौरान भी प्रदर्शनकारियों की संख्या लगातार बनाए रखने के लिए डिजिटल नेटवर्क पहले से अधिक सक्रिय हो गया।
जानकारी के मुताबिक, रणनीति इस प्रकार तैयार की गई कि बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ प्रदर्शन स्थल पर भेजने के बजाय अलग-अलग समय पर छोटे-छोटे समूहों में रवाना किया जाए। इसका परिणाम यह रहा कि पूरे दिन धरना स्थल पर भीड़ का प्रवाह बना रहा। एक समूह के लौटने के साथ दूसरा समूह पहुंचता रहा, जिससे सुबह, दोपहर और शाम ...यानी हर समय प्रदर्शन स्थल पर नए लोगों की मौजूदगी बनी रही।
दिल्ली पुलिस ने संसद मार्च के दौरान और उसके बाद जंतर-मंतर तथा आसपास के कई मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश एवं निकास पर समय-समय पर प्रतिबंध लगाए, ताकि प्रदर्शन स्थल तक लोगों की आवाजाही सीमित की जा सके। हालांकि, इसके बावजूद प्रदर्शनकारी वैकल्पिक मार्गों और अन्य परिवहन साधनों के जरिए लगातार पहुंचते रहे। देर शाम भीड़ कम होने के बाद अगले दिन सुबह फिर नए समूहों के साथ धरना उसी सक्रियता के साथ शुरू हो जाता है...
प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों के अनुसार, आंदोलन को निरंतर बनाए रखने के लिए भीड़ का प्रबंधन चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है......इसके साथ ही बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी जंतर-मंतर पहुंच रहे थे, जो किसी संगठन के माध्यम से नहीं, बल्कि आंदोलन के समर्थन में अपनी इच्छा से शामिल हो रहे थे। यही कारण है कि जंतर-मंतर, जनपथ और आसपास का इलाका दिनभर आंदोलन से जुड़ी गतिविधियों का केंद्र बना रहा।
हालांकि, डिजिटल माध्यमों से भीड़ जुटाने, परिवहन व्यवस्था कराने और ऑनलाइन भुगतान किए जाने जैसे दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
एक तरफ़ प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार NEET पेपर लीक मामले में स्पीडी ट्रायल और दोषियों को कड़ी सज़ा देने की बड़ी-बड़ी बातें कर रही है, तो दूसरी तरफ़ CBI ने 2024 NEET पेपर लीक के सरगना संजीव मुखिया के खिलाफ़ चार्जशीट ही दाखिल नहीं की, तो सरकार बताए कि आखिर देश के करोड़ों छात्रों को न्याय कब मिलेगा?
स्पीडी ट्रायल सिर्फ़ भाषणों तक सीमित है, जब मास्टरमाइंड के खिलाफ़ ही चार्जशीट नहीं, तो फिर कार्रवाई किस पर और किस बात की?
देश के युवाओं का भविष्य राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं, निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय मांगता है…
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के 20 जुलाई के सांसद मार्च के दौरान पै$लेट लगने से 19 साल के साहिल की आंखों की रोशनी खतरे में है।
साहिल के परिवार का दावा है कि 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान उन्हें शरीर पर पैलेट लगे थे।
साहिल के चाचा अजय का कहना है कि डॉक्टरों ने उन्हें बताया है कि उनकी आंखों की रोशनी वापस आने की संभावना बहुत कम है।
@HarishD_BJP राहुल को तो तुमलोगो की नाकामी ने जगह दिला दी वरना धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो जाता और कुछ मांगे है उसे मान ली गई होती तो आज ये देश ऐसे आंदोलन की आग मे जल न रहा होता और राहुल तो अभी भी शायद विदेश मे ही पडा होता