🎬 Panchayat Season 3 REVIEW
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कहानी के काल्पनिक पात्र अब जीवंत लगने लगे हैं, स्वयं के गांव से ज़्यादा फुलेरा की गलियों से परिचय हो चुका है। पंचायत की कहानी अब सिर्फ सचिव की कहानी नहीं रह गई है, पूरे फुलेरा की हो चुकी है, दर्शक गांव के एक एक व्यक्ति को अपना मान चुके हैं, इतना अभूतपूर्व लेखन और चित्रांतरण है। आज के आधुनिक युग में जहां हर कोई व्यस्थ है, भव्यिष्य की और अग्रसर है, वहां एक ऐसी धीमी गति का कार्यक्रम, जहां एक छोटे से गांव में कुछ शुष्क दैनिक घटनाएं घट रही हैं उसको हर वर्ग का व्यक्ति बड़ी रुचि से देखता है, तो सोचिए यह एक कितना प्रभावशाली चित्रण होगा।
पंचायत ने आज के सिनेमा के अभद्रता और फूहड़ता के युग में परिवार के साथ बैठ कर आनंद लेने योग्य एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया है, यह एक वैचारिक क्रांति से कम नहीं है। मेरे अनुसार यह कार्यक्रम आलोचना और त्रुटि खोजे जाने के योग्य है ही नहीं।
अंततः यह एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका अंत होते हुए हम नहीं देखना चाहते।
धन्यवाद TVF🙏🏼 ⭐⭐⭐⭐⭐