और कैसे वो फिर से उस पत्ते को खुद से अलग होते हुए देखता होगा, क्या पता किसको ज्यादा दुःख होता है उस पत्ते को एक बार अलग होकर ग़ुम जाने का या उस पेड़ को बार बार हर बार पत्ते के अलग हो जाने का। वो इंसान हर उस चीज से जुड़ाव महसूस करने लगता है जहाँ कुछ अलग होता है।
और कैसे वो फिर से उस पत्ते को खुद से अलग होते हुए देखता होगा, क्या पता किसको ज्यादा दुःख होता है उस पत्ते को एक बार अलग होकर ग़ुम जाने का या उस पेड़ को बार बार हर बार पत्ते के अलग हो जाने का। वो इंसान हर उस चीज से जुड़ाव महसूस करने लगता है जहाँ कुछ अलग होता है।
पतझड़ में पेड़ों से गिरने वाले पत्तों के बारे में सोचने लगता है। वो सोचता है कि ये पत्ते कैसे अपनी पूरी जिंदगी उसी पेड़ के साथ गुजर देते हैं और क्या पेड़ को पत्ते के दूर जाने का दुःख होता होगा और अगर उसे दुःख होता है तो वो फिर से नए पत्ते के साथ कैसे रहता है.....
तूफान बनने लगता है तो बाहर से इंसान बहुत शांत हो जाता है। ये ही वो वक़्त होता है जब वो सबसे ज्यादा अकेला होता है। वो सम्भल जाना चाहता है, वो खुश रहना चाहता है लेकिन सिर्फ अकेले। इस तरह वो सावन का मौसम जो उसे बहुत अच्छा लगता था कभी वो उस बारे में न सोचकर उसके बाद आने वाले.....
अक्सर कहानी किसी प्यारे लम्हे से शुरू होती है और देखते ही देखते लम्हे दिन में दिन महीनों में और महीने साल में बदलने लगते हैं। इतना सब बदलते बदलते ना जाने कब दूरियाँ नजर आने लगती हैं और याद आने लगते हैं वो ही पुराने लम्हे। फिर अंदर ही अंदर एक शोर गूँजने लगता है और वो शोर जब.....
एक आखिरी ख्वाब था,
मिलना था तुमसे उस छोर पर जहाँ दो किनारे मिला करते हैं,
जहाँ हमें कोई जानता नहीं बस अजनबी कहा करते हैं,
हर ख्वाब की तरह ये भी धुँधला सा हो गया जमाने की धुंध में,
याद हो तो तुम चले आना जहाँ अक्सर हम तुम्हारा इंतजार करते हैं।
बिछड़ कर तुमसे मुझे बहुत दूर चले जाना है,
अब नहीं जानना ये कैसा जमाना है,
मेरी मासूमियत, मेरा बचपन और मेरी मोहब्बत छीन ली है,
बहुत हुईं ये वीरान जिंदगी, अब तो इससे भी गुजर जाना है।
अकेलेपन का एहसास तब सबसे ज्यादा होता है जब आप जानते हो कि आप बात तो बहुत लोगों से कर सकते हो लेकिन जो कहना चाहते हो वो कह नहीं पाओगे। बस यही ख्याल आपको अकेला कर देता है और धीरे धीरे दुनिया से बिल्कुल अलग कर देता है।
हमारी हर कहानी के दो पहलू होते हैं। एक दूसरों को सुनाने के लिए, दूसरा अपने आपको समझाने के लिए। जब कहानी के दोनों पहलू एक हो जाते हैं, उस दिन लेखक अपनी किताब के पहले पन्ने पर लिख देता है, "इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। इनका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से लेना देना नहीं है।"
दूर होता हूँ जब मैं तुमसे तो याद रहती है मुझे सारी दुनियादारी और भूल जाता हूँ सब कुछ तुम्हारे नजदीक आते ही। ऐसा लगता है जैसे मैं हर पल किसी डर में हूँ। डर शायद तुमसे फिर न मिल पाने का या डर के कहीं मैं खुद को ही न भूल जाऊँ और सिर्फ तुम ही याद रह जाओ मुझे।
#इश्क़
भूल गया जब मैं अब तो ये याद क्यूँ है,
इतनी गहरी आखिर ये आज रात क्यूँ है,
जितना निकलता हूँ मैं गम से उतना ही फसता जाता हूँ,
बिन माँगे ये आँसुओं की बरसात क्यूँ है,
तुमने कहा था कि मुझसे बेहतर बहुत है इस जहान में,
आखिर आज भी मुझे याद ये बात क्यूँ है.....
ठहराव ऐसा था उसकी बातों कि जाने वाले भी ठहर जाया करते थे,
इतने लोग थे उसके पास कि हम मन ही मन घबराया करते थे,
वो एक साँस लेता था तो एक महक सी रहती थी फिजाओं में,
एक वो था जो बस मुस्कुराया करता था और एक थे जो उसे देखा करते थे।