A heartbeat of hope, delivered on time!
For the first time, a 'live human heart' was transported by Vande Bharat Express from Surat to Ahmedabad for a life-saving transplant.
A remarkable example of seamless coordination between Indian Railways and State Administration- where every minute mattered, and every effort saved a life.
The mainstream ignored the people. The people made alternative media the mainstream.
Now Alternative media is no longer alternative. It's the Mainstream.
दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले इरफ़ान की आवाज़ में दर्द है सुनिए इस कला को जो दिल से निकलती है।
इतना सच्चा इतना असरदार बोलने वाला शायद हमने आज तक नहीं सुना होगा।
आप भी सुनिए और सच बताइए किसी नेता की आवाज़ में इतनी सच्चाई सुनी है आपने?
जिसको सुनते सुनते अंदर आत्मा तक रोने लगे!
शायद नहीं, इतनी तो नहीं।
मगर इरफ़ान की आवाज़ में दर्द है पीड़ा है, साथ ही संविधान की प्रस्तावना पर क्या गज़ब मोनोलॉग है।
Thank you @RajatpandeyJF , @TheLallantop for this masterpiece ❤️
इस देश में मुसलमान होना गुनाह है क्या ? जामिया इलाके में मुस्लिम स्टूडेंट को क्यों डिटेन किया गया ?
आओ फिर जंतर -मंतर के पास हजारों बच्चों -छात्र बैठे हैं . सबको डिटेन कर लो . या कि देखकर ही डिटेन कर रहे हो ? धार्मिक पहचान के आधार पर ?
#important
सरकार हो या विपक्ष, दोनों ही शायद अभी तक Paper Leak की असली वजह को नहीं समझ पा रहे हैं। Paper Leak में पकड़े गए लोगों को सज़ा छोड़िए, फाँसी भी दे दी जाए, फिर भी इसे रोकना मुश्किल होगा। जब तक ये नहीं समझा जाएगा कि Paper Leak जन्म कैसे लेता है, तब तक समाधान नहीं निकलेगा।
जब आप Tender में समझौता करके, कई बार Ban हो चुकी छोटी-छोटी कंपनियों को Contract देंगे... वो भी इस शर्त पर कि पार्टी फंड में भी पैसा जाए और कम कीमत में भी परीक्षा करा दी जाए... तो वो पैसा कहीं न कहीं से तो वसूल करेंगी ही। यहीं से Paper Leak की शुरुआत होती है।
उन कंपनियों के पास न पर्याप्त Centres होते हैं, न पर्याप्त Employees। ऊपर से Outsourcing और Subletting इतनी ज़्यादा होती है कि Accountability ही खत्म हो जाती है। फिर आप उम्मीद करेंगे कि ऐसे Paper Leak रुक जाएगा?
The sheer innocence. If Dharmendra Pradhan is watching- he will give up politics!! As for the paid haters spewing venom- do these look like anti nationals or kids worried about their future in India! 🇮🇳 ‘Where the mind is without fear … into the heaven of freedom… let my country awake’
धर्मेंद्र प्रधान क्या इन बच्चियो की आवाज आज रात को तुझे सोने देगी।
सबसे ज्यादा गुस्सा ही gen z में है। इन बच्चियो का क्या कसूर है।
इस सरकार ने अपनी बर्बादी की कहानी लिखनी शुरू कर दी है।
#संसद_मार्च#CJPProtest#abhijeetdipke
A protester identified as Devinder, who was injured during the police lathi charge at the "Chalo Sansad" march in Delhi, said he was not affiliated with any political party and described himself as "an Indian."
Speaking after the incident, Devinder criticised Prime Minister Narendra Modi, alleging that institutions such as the CBI and the Intelligence Bureau had been compromised.
He said he was injured during the police action while participating in the protest demanding the resignation of Union Education Minister Dharmendra Pradhan over the NEET paper leak and examination irregularities.
📷 @meerfaisal001
Damn, I checked it and it is true.
Petrol - बिना टैक्स के 50-55 रुपये का पड़ रहा है।
Ethanol - 80 रूपये तक का पड़ता है।
इथेनॉल मिलाने से actually में petrol महंगा हो जाता है।
😂😂😂🤣
सच में फंस गये, क्योंकि गडकरीजी ने लालच में लगवा दिए है दुनिया भर के इथेनॉल प्लांट।
और अब बन रहा है पैसा।। अब न माने कोई भी।
सरकार के सबसे बड़े वकील ने सुप्रीम कोर्ट में सबमिट किया कि 20 परसेंट Ethanol वाला पेट्रोल एक एक्सपेरिमेंट है, जिसके नतीजे आपको अगले साल देखने को मिलेंगे.
ध्यान रहे कि ये सुप्रीम कोर्ट का सबमिशन था.
बड़ी बात है कि सुप्रीम कोर्ट में दिया गया बयान अमूमन किसी झोंक में निकली बात नहीं होती है. कोर्ट में वकालतनामा पढ़-समझकर बाक़ायदा जवाब तैयार किए जाते हैं, वकीलों की पूरी टीम रहती है. ख़ासकर तब, जब एक पक्ष केंद्र सरकार हो.
लेकिन रात होते-होते सरकार ने स्पष्टीकरण जारी किया कि जो कहा गया, उसका मतलब वो नहीं था. इस पर की गई ख़बरें झूठी हैं.
यहां पर सबसे बड़ा सवाल है इंटेंट.
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक बात कही, लेकिन जनता के सामने विज्ञप्ति निकालकर खंडन किया. लेकिन क्या सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कोई हलफनामा दायर करके कहा कि हमारे सरकारी वकील का E20 वाला बयान ग़लत है? उसे रिकार्ड से हटा दिया जाए?
सवाल है कि विज्ञप्ति वाली बात सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं कही गई? और नहीं कही गई तो जनता के सामने अलग से खंडन क्यों किया जा रहा है?
इसलिए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए जा रहे हैं.
मानिए न मानिए, सरकार का ये बयान और उस पर आया स्पष्टीकरण गले की फाँस बनने वाला है.
आज, हिन्दुस्तान के एक अज़ीम सपूत की यौम-ए-पैदाइश है, जिन्होंने अपनी बेमिसाल बहादुरी से वतन का दिफा करते हुए अपनी जान क़ुर्बान कर दी। हम बात कर रहे हैं परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद की, जिनकी शहादत की दास्तान हर हिन्दुस्तानी के दिल में हमेशा ताज़ा रहेगी। ये अफ़सोस की बात है कि हम अक्सर अपने शहीदों को भुला देते हैं, लेकिन आज उनके यौम-ए-पैदाइश पर हम उन्हें याद करेंगे और उनकी अमर कहानी को एक बार फिर ज़िंदा करेंगे।
1965 की जंग में पाकिस्तान के पास अमेरिका से मिले "पैटन टैंकों" का एक ज़ख़ीरा था। इन टैंकों को "लोहे का शैतान" कहा जाता था और पाकिस्तान को इन पर बड़ा नाज़ था। वहीं, हिन्दुस्तानी फ़ौज के पास इन टैंकों का मुक़ाबला करने के लिए सिर्फ़ थ्री नॉट थ्री राइफ़लें थीं।
पाकिस्तान की फ़ौज पंजाब पर क़ब्ज़ा करने की नीयत से आगे बढ़ रही थी और तरनतारन ज़िले के खेमकरण सेक्टर में असल उत्तर गाँव तक पहुँच गई थी। हमारी फ़ौज पीछे हट रही थी, तभी सामने आए वीर अब्दुल हमीद। उनके पास अमेरिकी पैटन टैंकों के सामने खिलौने सी लगने वाली 106 एमएम रिकॉइललेस राइफ़ल वाली गन माउंटेड जीप थी।
ज़रा सोचिए, क्या मंज़र रहा होगा उस वक़्त।
"नज़रें थीं फ़ौजी की, सामने था लोहे का पहाड़;
हिम्मत थी ऐसी कि, दुश्मन की रूह भी काँप उठी।"
जीप पर सवार अब्दुल हमीद ने अपनी बंदूक से पैटन टैंकों के कमज़ोर हिस्सों पर इतने सटीक निशाने लगाए कि एक के बाद एक "लोहरूपी दैत्य" पैटन टैंक तबाह होने लगे। अब्दुल हमीद की ये बेमिसाल जुर्रत देखकर हिन्दुस्तानी सिपाही में नया जोश भर गया। उन्होंने एक-एक करके दो दिनों में सात पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नेस्तनाबूद कर दिया।
पंजाब का असल उत्तर गाँव पाकिस्तानी टैंकों की क़ब्रगाह में बदल गया। पाकिस्तानी सिपाही जान बचाकर भागने लगे, लेकिन वीर हमीद मौत बनकर उनका पीछा करते रहे और अपनी जीप से भागते हुए सिपाहियों को भी मारते गए।
"न झुकने दिया सर वतन का, न मिटने दी शान;
हमीद ने लिख दी शौर्य गाथा, बन गए हिन्दुस्तान की पहचान"
9 सितंबर, 1965 को एक बदक़िस्मत वाक़्या पेश आया। अचानक एक गोला अब्दुल हमीद की जीप पर आ गिरा और वो बुरी तरह ज़ख़्मी होकर शहीद हो गए। उनकी शहादत का ऐलान 10 सितंबर, 1965 को किया गया, जब पाकिस्तानी फ़ौज को पंजाब से खदेड़ दिया गया था।
वीर अब्दुल हमीद का जिस्म इतना मुंतशिर हो चुका था कि उन्हें वहीं पंजाब के तरनतारन ज़िले के खेमकरण सेक्टर के असल उत्तर गाँव में दफ़न कर दिया गया।
ये कहना ग़लत न होगा कि अगर वीर अब्दुल हमीद न होते,
तो आज पूरा पंजाब, अमृतसर और स्वर्ण मंदिर भी पाकिस्तान का हिस्सा होता।
ये हमारा अफ़सोसनाक मुक़द्दर है कि वतन के लिए इतना बड़ा बलिदान देने वाले इस नायक के परिवार को हुकूमतों की बेरुखी का सामना करना पड़ा।
उनकी अहलिया रसूलन बीबी ज़िंदगी भर मदद के लिए सरकारों को ख़त लिखती रहीं, लेकिन उन्हें सिर्फ़ फ़ोटो सेशन के लिए बुलाया गया।
वीर अब्दुल हमीद की बेटी, नज़बुन, को अपने शौहर की रिटायरमेंट के बाद की बाक़ाया रक़म के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटने पड़े। उन्हें एश्योर्ड करियर प्रमोशन, लीव एनकैशमेंट, छठे वेतन आयोग के एरियर और ग्रेच्युटी का भुगतान सालों तक नहीं हो सका, जिससे परिवार को फ़ाक़ाकशी का सामना करना पड़ा।
इससे भी ज़्यादा दर्दनाक वाक़्या तब पेश आया जब वीर अब्दुल हमीद के बेटे, अली हसन, ने कानपुर के हैलट अस्पताल में ऑक्सीजन न मिलने के सबब दम तोड़ दिया। अस्पताल के मुलाज़िमीन को वीर अब्दुल हमीद के बारे में कुछ भी नहीं मालूम था, जिससे उनके बेटे को कोई इमदाद नहीं मिल सकी। यहाँ तक कि वीर अब्दुल हमीद के गाँव में उनके नाम पर बने स्कूल का नाम भी बदल दिया गया, जिसे सोशल मीडिया पर भारी एहतेजाज के बाद फिर से उनके नाम पर रखा गया।
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा... ये मिसरा हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपने शहीदों को वो इज़्ज़त दे पा रहे हैं, जिसके वे हक़दार हैं? आज उनके यौम-ए-पैदाइश पर, हम सभी को ये अज़्म करना चाहिए कि वीर अब्दुल हमीद जैसे नायकों की शहादत हम कभी नहीं भूलेंगे। ये हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उनकी दास्तानों को ज़िंदा रखें और ये यक़ीन दिलाएँ कि उनके ख़ानदान को कभी भी बेरुखी का सामना न करना पड़े।
आइए, आज वीर अब्दुल हमीद की यौम-ए-पैदाइश पर उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करें। अल्लाह उन्हें मग़फ़िरत अता फ़रमाये
Sarthak Goswami has exposed the ugly truth behind the ethanol narrative.
He travelled to Byrnihat to find out why a town with fewer than one lakh residents is more polluted than Delhi, Ghaziabad, and even Lahore.
What he found was shocking: over 80 factories crammed into a small area, relentlessly pumping pollutants into the air.
The irony? Many of these factories produce ethanol—the very fuel being promoted as a solution to pollution.
Now the question is simple: can Nitin Gadkari answer these concerns with facts, instead of branding critics as anti-national?