वर्ष 2001 में शबाना आजमी ने एनडीटीवी के कार्यक्रम में जामा मस्जिद के शाही इमाम से एक सवाल किया था
आप कहते हैं कि भारत के मुसलमान को जिहाद करने के लिए तैयार रहना चाहिए. आप खुद ही जाकर जिहाद क्यों नहीं करते लोगों को क्यों भड़कते हैं ?
शाही इमाम: मैं नाचने गाने वाली और तवायफों के सवालों का जवाब नहीं देता
फर्जी SC ST ACT के दबावों में देवा दुबे ने आत्महत्या कर ली
कोई मीडिया इसको नहीं दिखा रहा
दलित होता तो शायद नेता से लेकर मीडिया तक पैर पकड़ लिए होते
ब्राह्मण था यही गलती है
Late Disha Salian Murder Case:
Shocking revealations by Advocate Nilesh Ojha... Difficult to swallow but according to him it is on record in earlier cases..
नेतन्याहू ने जोहरान ममदानी के घर में घुस कर उसकी ऐसी तैसी कर दी। UNGA में लताड़ते हुए कहा:
"मिस्टर ममदानी,
जब से आप इस शहर के मेयर चुने गए हैं, कई यहूदियों को अब न्यूयॉर्क में सुरक्षित महसूस नहीं होता। वे मुझसे बात करते हैं, वे मुझसे कहते हैं, 'यह वह शहर नहीं है जो हमें याद है, यह इतनी जल्दी बदल गया।'
अब इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आप हमास का समर्थन करने के दोषी अपराधियों की प्रशंसा करते हैं।
आप हसन पाइकर जैसे लोगों को अपना दोस्त मानते हैं, जिन्होंने कहा था कि अमेरिका 9/11 का हकदार था।
आपके कैसे दोस्त हैं?
आप अपने घर में एक फिलिस्तीनी पत्रकार को आमंत्रित करते हैं जिसने हमास के आतंकवादियों को इजराइली बंधकों को पीटते और प्रताड़ित करते हुए फिल्माया था, और बाद में स्वीकार किया कि उसने आतंकवादियों की रक्षा करने के लिए वीडियो प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था।
आपकी पत्नी ने 7 अक्टूबर के नरसंहार की प्रशंसा करने वाली एक पोस्ट को लाइक किया। उन्होंने एक और पोस्ट लाइक की जिसमें कहा गया था कि तेल अवीव का अस्तित्व ही नहीं होना चाहिए। आप इनमें से किसी की भी निंदा करने से इनकार करते हैं। आप बार-बार इजराइल पर नरसंहार का झूठा आरोप लगाते हैं।
मिस्टर ममदानी, आपने मुझे यहाँ आने से रोकने की कोशिश की। आपने मुझे चुप कराने की कोशिश की। खैर, आप मुझे चुप नहीं करा सकते, आप सच को चुप नहीं करा सकते।
और सीधा सच यह है: इजराइल ने नरसंहार नहीं किया; इजराइल ने नरसंहार को रोका।
और यही बिल्कुल वही है जो मिस्टर ममदानी के हमास वाले साथी हमारे साथ करते, अगर हमने उन्हें रोका न होता।"
दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज मोदी एक्ट की धारा 18 और 18ए(2) के अंतर्गत वैधानिक रोक को देखते हुए मेरी अग्रिम जमानत याचिका को निरस्त कर दिया। हायकोर्ट का यह निर्णय अपनी जगह है, पर मैं इस से सम्मानपूर्वक असहमत हूँ।
साथ ही, यह भी स्पष्ट है कि न्यायालय ने कहा है कि इसकी टिप्पणियाँ केवल जमानत आवेदन तक सीमित हैं और मेरी आपराधिकता इससे सिद्ध नहीं हो जाती। इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दूँगा और आशा करता हूँ कि देश की न्यायिक व्यवस्था में सर्वोच्च विश्वास बना रहे।
मुझे एक नीच, अधम, पतित ट्रोल के विरुद्ध अपने परिवार के सम्मान की रक्षा करने के लिए, इस घटिया और दमनकारी मोदी एक्ट (जिसे SC/ST एक्ट भी कहा जाता है) के प्रावधानों के तहत एक आपराधिक मामले में झूठा फँसाया गया है।
मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा है जो किसी व्यक्ति या समुदाय का जाति के आधार पर जानबूझकर अपमान या अपमानजनक व्यवहार माना जा सके। मैं उन किसी भी निहित स्वार्थ वाली ताकतों से लड़ने के लिए तैयार हूँ जो इस देश में स्वतंत्र अभिव्यक्ति और सत्य कथन को दंडित करना चाहती हैं, भले ही इसके लिए मुझे जेल जाना पड़े।
एक नेता द्वारा अपनी राजनैतिक वोटबैंक को साधने के लिए, सामान्य जनता से बिना किसी सोच-विचार के, संशोधित किए गए इस पूरे कानून और इसके संशोधित नियमों का मैं तब तक विरोध करूँगा जब तक इसे पूरी तरह से निरस्त न किया जाए।
और हाँ, पुनः कहूँगा कि हमारी की माँ-बहनें सड़कों पर चलती-फिरती वस्तु नहीं है जिस पर कोई भी टिप्पणी करे और बच जाए। उनके सम्मान की रक्षा हेतु, सौ बार जेल जाना पड़े जाऊँगा और 101वीं बार वही करूँगा जो मैंने किया है।
PS: जो भी इस निरस्तीकरण पर स्खलित हो रहे हैं, तुम्हारी माँ-बहन पर भी हर दिन ऐसी टिप्पणी होती है। उस पर भी मैं ही स्टैंड लूँगा क्योंकि तुम अपनी कायरता में दो शब्द नहीं लिख पाओगे।
@ajeetbharti बलात्कार के मामले में अग्रिम जमानत मिल सकती है भारत में, लेकिन अगर #मोदी एक्ट एक्ट लग गया फिर कोई सवाल ही नहीं है। भले ही आपने अपनी बहन पर की टिप्पणी का जवाब दिया हो, आप सवर्ण हैं तो आपको भुगतना पड़ेगा।
The CCTV footage of Prof Doolla catching Sahil Wakode with a mobile phone in exam hall is out.
Now Sahil’s father should file an Atrocities Act case against the inventor of CCTV, the company that manufactured it, the mechanic who installed it and the officials who leaked it, for causing him the mental agony of being denied victimhood and the potential compensation that comes with it.